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महिलाओं पर ड्रेसकोड का ज्यादा ही दबाव डाल रहा इंडोनेशिया: HRW रिपोर्ट  

दुनिया भर में कोरोना संक्रमण का संकट अभी भी टला नहीं हैं लेकिन इसको लेकर विचार-विमर्श के अनेक आधार जरूर तय हो गए हैं। इनमें सबसे अधिक जरुरी मुद्दा है महिलाओं के साथ व्यवहार और उनको लेकर समाज में संकुचित होती समझ। बड़ा ही अजीब है लेकिन दिलचस्प भी है कि इस कोरोना के कठिन संकट के दौरान भी अगर कुछ नहीं बदला है तो वो है महिलाओं की समाज में स्थिति। इन सबके बीच सबसे बढ़िया बात तो यह है कि अब अपनी स्थिति को बेहतर बनाने का जिम्मा भी महिलाओं ने खुद ही संभाल लिया है। दुनियाभर में ‘मीटू आंदोलन’ से अपनी कहानी को खुलकर सामने रखा जा रहा है। हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में महिलाएं नेताओं के सामने डटकर खड़ी है और यौन उत्पीड़न का खुलकर विरोध कर रही हैं।

दरअसल, महिलाओं से जुड़ी इन सभी समस्याओं की एक ही जड़ दिखाई देती और वो है उनके वस्त्रों को लेकर समाज में फैली अनगिनत मानसिकता। उसके आगे महिलाओं की सुरक्षा, प्रतिभा और इच्छाएं सब बौनी नजर आती हैं। बात केवल कार्यस्थल या किसी सार्वजानिक स्थल तक सीमित नहीं रही है। संसद, घर, बाजार हर जगह यहां तक कि स्कूल भी लड़कियों के कपड़ों से उनके चरित्र का आकलन करता नजर आता है। ताजा उदहारण है हाल ही में जारी ह्यूमन राइट्स वॉच की एक रिपोर्ट। जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि इंडोनेशिया में महिलाओं और लड़कियों के लिए ड्रेस कोड छात्राओं, असैन्य कर्मचारियों और सरकारी कार्यालयों में जाने वाले मुलाकातियों के साथ भेदभाव की भावना को दर्शाता है और इसलिए इसे खत्म किया जाना चाहिए।

18 मार्च, गुरुवार को प्रकाशित ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) की एक नई रिपोर्ट में इंडोनेशिया और उसके स्कूलों में बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता की पड़ताल की गई और पाया गया कि महिलाओं और लड़कियों को अपने विश्वास की परवाह किए बिना मुस्लिम-बहुल देश में धार्मिक ड्रेस कोड का पालन करने के लिए दबाव बढ़ रहा है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इंडोनेशिया के राजकीय स्कूलों में छात्राओं और शिक्षिकाओं के लिए ड्रेस कोड पर प्रतिबंध लगाने के फरवरी 2021 के फैसले को पूरी तरह लागू करना चाहिए और महिलाओं और लड़कियों के साथ भेदभाव ख़त्म करने के लिए अतिरिक्त कानूनी कदम उठाए।

98 पन्नों की इस रिपोर्ट में इंडोनेशिया में महिलाओं और लड़कियों के लिए ड्रेस कोड उन सरकारी नियमनों संबंधी तथ्यों व आंकड़ों का समावेश बताया गया है जिसके मुताबिक लड़कियों और महिलाओं को सिर, गर्दन और छाती को ढंकने वाला मुस्लिम परिधान, जिल्बाब पहनना आवश्यक कर दिया गया है। ह्यूमन राइट्स वॉच पहनावा संबंधी भेदभावपूर्ण नियमों को थोपने और ‘जिल्बाब’ पहनने के लिए डराने-धमकाने से महिलाओं एवं लड़कियों को होने वाले मनोवैज्ञानिक तनाव का विवरण भी प्रस्तुत करता है। नियमों का अनुपालन नहीं करने वाली लड़कियों को स्कूल छोड़ने के लिए मजबूर किया गया या दबाव में उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी, जबकि असैन्य महिला कर्मचारियों ने अपनी नौकरी खो दी या नियमों के पालन के लगातार दबाव से बचने के लिए इस्तीफा दे दिया।

वर्ष 2001 के बाद से इंडोनेशिया के स्थानीय अधिकारियों ने 60 से ज्यादा स्थानीय और प्रांतीय अध्यादेश जारी किए हैं। उन्होंने यह दावा किया कि ये अध्यादेश “मुस्लिम लड़कियों और महिलाओं के इस्लामी पहनावे” को लागू करने के लिए लाए गए हैं। इंडोनेशिया के लगभग 3 लाख राजकीय स्कूलों में अधिकांश, खास तौर से 24 मुस्लिम-बहुल प्रांतों के स्कूलों में, मुस्लिम लड़कियों के लिए प्राथमिक स्कूलों से ही जिल्बाब पहनना अनिवार्य किया हुआ है।

शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय द्वारा वर्ष 2014 में राष्ट्रीय स्तर पर राजकीय स्कूलों के लिए यूनिफ़ॉर्म का एक आदेश जारी किया गया। जिसमें एक रेखाचित्र में एक लंबी स्कर्ट, पूरी आस्तीन वाली कमीज़ और जिल्बाब को “मुस्लिम परिधान” के बतौर दर्शाया गया और इसे मुस्लिम लड़कियों के लिए एकमात्र विकल्प बताया गया। इस आदेश ने ही प्रांतीय और स्थानीय शिक्षा कार्यालयों को नए नियम लागू करने के लिए प्रेरित किया, नतीज़े के तौर पर प्राथमिक से हाई स्कूल स्तर तक के हजारों राजकीय स्कूलों ने मुस्लिम लड़कियों के लिए जिल्बाब को आवश्यक बनाते हुए अपने स्कूलों की यूनिफार्म नीतियों में बदलाव कर दिए।

2014 के प्रत्यादेश पर हस्ताक्षर करने वाले इंडोनेशिया के शिक्षा मंत्री मोहम्मद नुह ने एक इंटरव्यू में ह्यूमन राइट्स वॉच को इस रिपोर्ट पर बताया कि यह प्रत्यादेश यूनिफार्म के संबंध में दो विकल्प देता है। एक तो लंबी आस्तीन की कमीज़, लंबी स्कर्ट और जिल्बाब पहनने का और दूसरा जिल्बाब रहित यूनिफार्म। उन्होंने कहा, “वह नियमन मैंने लिखा था। लेकिन यह अनिवार्य नहीं है।” उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी मुस्लिम लड़की को यह चुनने का अधिकार होना चाहिए कि वह जिल्बाब पहनेगी या नहीं।

हालांकि स्कूल अधिकारियों ने भी यह स्वीकार किया कि राष्ट्रीय नियमन के तहत कानूनी रूप से जिल्बाब आवश्यक नहीं है, फिर भी नियमन की मौजूदगी से स्कूलों को लड़कियों को जिल्बाब पहनने के लिए दबाव डालने का मौक़ा मिल गया है। नए आदेश के तहत, स्थानीय सरकारों और स्कूल के प्राचार्यों को 5 मार्च तक किसी भी अनिवार्य जिल्बाब संबंधी नियम रद्द करने को कहा गया और 25 मार्च तक इसको नहीं मानने वाले स्थानीय सरकार के प्रमुख या स्कूल के प्राचार्य पर प्रतिबंध लगाए जाएंगे। शिक्षा मंत्री के आदेश को नजरअंदाज करने वाले स्कूलों की शिक्षा निधि पर रोक भी लग सकती है।

यह आदेश केवल शिक्षा और संस्कृति मंत्रालय के प्रबंधन के तहत स्थानीय सरकारी और सरकारी स्कूलों पर लागू होता है। यह धार्मिक मामलों के मंत्रालय के तहत इस्लामिक स्टेट स्कूलों और विश्वविद्यालयों पर लागू नहीं होता है। आचे प्रांत में भी यह आदेश लागू नहीं होता है, जिसमें विशेष व्यवस्था के तहत अन्य प्रांतों की तुलना में अधिक स्वायत्तता है और एकमात्र प्रांत है जो आधिकारिक तौर पर शरिया या इस्लामी कानून के प्रारूप का पालन करता है।

इस रिपोर्ट के एक परिशिष्ट में रूस के चेचेन्या, फ्रांस, जर्मनी, ईरान, सऊदी अरब, इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) के अधीन सीरियाई क्षेत्र, तुर्की और चीन के शिनजियांग में अनिवार्य धार्मिक ड्रेस कोड नियमों के बारे में विवरण प्रस्तुत किए गए हैं।

अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून भेदभाव के बिना अपने धार्मिक विश्वासों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शिक्षा को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने के अधिकार की गारंटी देता है। महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त हैं, जिसमें उनकी पसंद की पोशाक चुनने का अधिकार भी शामिल है।

इन अधिकारों पर कोई भी प्रतिबंध एक वैध उद्देश्य के लिए होना चाहिए और इसे बिना किसी मनमानी और भेदभाव के लागू किया जाना चाहिए। इक्का प्रांत सहित अन्य क्षेत्रों में अनिवार्य जिल्बाब नियम, इंडोनेशिया के संविधान के तहत प्राप्त “किसी भी आधार पर भेदभावपूर्ण व्यवहार” से मुक्त होने के लिए लड़कियों और महिलाओं के अधिकार को कमजोर करते हैं।

अगर देखा जाए तो दुनिया महिलाओं के कपड़ों को लेकर दो हिस्सों में बंट चुकी हैं। एक तरफ ऐसे परिधान की सिफारिश की जा रही है जिसमें केवल आंखे दिखाई दे और एक ओर ऐसे परिधान की जहां स्त्री काया के प्रत्येक कोण को नापा जा सके। इसका उदहारण भी हम सबके सामने है , फ्रांस में मुस्लिम औरतें शरीर को ढकने वाली तौराकी पोशाक पहनने के अधिकार से वंचित हैं तो वहीं ईरान में महिलाओं ने जबरदस्ती हिजाब पहनने के सरकारी नियमों के खिलाफ संघर्ष किया।

महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले कपड़ो का इतिहास भी गवाही देता है कि समाज सदियों से महिलाओं के कपडे तय करता आया है। 1840 के आसपास की अवधि आधुनिक फैशन की मानी जाती है। तब से, फैशन डिजाइनर महिलाओं के लिए उनकी सुविधा के बजाय उनके शरीर के अंगों को सुशोभित करने के लिए वस्त्र बना रहे हैं। समय बीतने के साथ, फैशन की इस परंपरा को इतना अपनाया गया कि आज इसके खिलाफ आवाज उठने लगी है।

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