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सऊदी अरब में बढ़ रही बेरोजगारी का असर प्रवाशियों पर

बेरोजगारी सिर्फ की ही समस्या नहीं है. यह वैश्विक समस्या बनती जा रही है. जिस वजह से दुनिया के हर देश की सरकार पर अपने नागरिकों को रोजगार देने का दबाव है. ऐसी स्थिति में वैसे देश जहां विदेशी ज्यादा संख्या में नौकरी कर रहे हैं, उनमें कटौती हो रही है.अमेरिका और यूरोपीय देशों के बाद बेरोजगारी की समस्या अब अरब देशों भी बढ़ रही है. इस कारण वहां की सरकार पर रोजगार पैदा करने का दबाव बढ़ रहा है. सऊदी अरब ने इस दबाव को कम करने के लिए कदम उठाना शुरू भी कर दिया है. पहला या कहें सबसे आसान तरीके (विदेशी नागरिकों को नौकरी से हटाना और न देना) को एक्टिव मोड में ला दिया गया है. सऊदी अरब के कई क्षेत्रों में भारत और फिलीपींस के लोग ज्यादा नौकरी करते हैं. ऐसे में इनकी नौकरी पर संकट के बादल मंडराने लगा है.
सऊदी सरकार आर्थिक वृद्धि दर में गति लाना चाहती है और अपने नागरिकों के लिए नई नौकरियां पैदा करना चाहते हैं. सऊदी में विदेशी कंपनियां सरकार की मांग पूरी करने में जूझ रही हैं.
जो काम सऊदी के लोग करना नहीं चाहते थे, दशकों से भारत और फिलीपींस के कामगार वह काम करते रहे हैं.
वॉल स्ट्रीट जनरल की एक रिपोर्ट के अनुसार किचन, कंस्ट्रक्शन और स्टोर काउंटर के पीछे काम करने वाले या तो भारतीय होते हैं या फिलीपींस के. सऊदी के लोग ये काम करना पसंद नहीं करते हैं. तेल के विशाल भंडार वाले इस देश में ज़्यादातर नागरिक सरकारी नौकरी करते हैं. इसके साथ ही कई कामों में वहां के नागरिक दक्ष नहीं होते हैं और निजी सेक्टर में नौकरी को लेकर उनमें वैसा उत्साह भी नहीं होता है. सऊदी में विदेशी कंपनियों पर वहां के नागरिकों के लिए कई तरह के दबाव होते हैं. इनमें काम के घंटों का कम होना और अच्छी तनख़्वाह शामिल हैं.
कई कंपनियां तो जुर्माने और वीज़ा की समस्या के कारण डरी होती हैं. इन्हें नियमों के कारण सऊदी के लोगों को नौकरी पर रखना पड़ता है. वॉल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट के अनुसार नियमों के कारण इन कंपनियों को वैसे लोगों को भी रखना पड़ता है जिनकी कोई ज़रूरत नहीं होती है.
सऊदी लॉजिस्टिक कंपनी के एक्जेक्युटिव अब्दुल मोहसीन ने वॉल स्ट्रीट को दिए एक साक्षात्कार में बताया, ‘उनकी कंपनी में आधे से ज़्यादा वैसे सऊदी नागरिक नौकरी पर हैं जो बस नाम के लिए हैं. मेरी कंपनी विदेशी कामगारों के बिना नहीं चल सकती है, क्योंकि कुछ ऐसे काम हैं जिन्हें सऊदी के लोग कर ही नहीं सकते हैं. इसमें एक काम है ट्रक की ड्राइवरी.’
जबकि देश के शाही शासक का मानना है कि श्रमिकों में सऊदी के नागरिकों की प्राथमिकता एक ज़रूरी चीज़ है. हालांकि इसे इस स्तर तक ले जाने की मंशा नहीं है जिससे आर्थिक नुक़सान हो.
मोहम्मद बिन-सलमान सऊदी को तेल आधारित अर्थव्यवस्था से आगे ले जाना चाहते हैं. उन्हें लगता है कि उनकी अर्थव्यवस्था तभी गतिशील होगी जब तेल से निर्भरता कम होगी.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार इसी के तहत सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको के छोटे हिस्से को बेचने की तैयारी है. इसके शेयर को जल्द ही बाज़ार में उतारा जा सकता है. सऊदी के क्राउन प्रिंस इस बात पर भी ज़ोर दे रहे हैं कि लोग सरकारी नौकरी का मोह छोड़ प्राइवेट सेक्टर की तरफ़ रुख़ करें. सऊदी के श्रम मंत्रालय के अनुसार यहां के क़रीब दो तिहाई लोग सरकारी नौकरी करते हैं.
सऊदी कंपनियों पर दबाव बन रहा है कि वो विदेशी कामगारों की जगह सऊदी के नागरिकों को रखें.सऊदी के श्रम मंत्रालय के अनुसार 2017 में यहां बेरोज़गारी दर 12.8 फ़ीसदी थी, जिसे 2030 तक 7 फ़ीसदी करने का लक्ष्य रखा गया है. सऊदी इस साल सितंबर महीने से अलग-अलग सेक्टर में सऊदी मूल के कामगारों को रखने के लिए और दबाव बनाने जा रहा है. इसमें सेल्समैन, बेकरी, फर्नीचर और इलेक्ट्रॉनिक्स आदि प्रमुख हैं. ऐसे में इन सेक्टरों में काम करने वाले विदेशी कामगारों की नौकरी पर असर पड़ना लाजिमी है.
पिछले साल ही ज्वैलरी सेक्टर में इसी तरह विदेशी कामगारों की जगह सऊदी के लोगों को रखने के लिए कहा गया तो इस सेक्टर में काफ़ी उठापटक देखने को मिली थी.गल्फ़ बिज़नेस की एक रिपोर्ट के अनुसार इस सेक्टर के लोगों के लिए मुश्किल स्थिति यह थी कि वो सऊदी के मूल लोगों को लाकर इस काम में लगाएं. इससे सैकड़ों विदेशी कामगारों की नौकरी तो गई ही साथ में जूलरी सेक्टर पर भी इसका बुरा असर पड़ा. न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार सऊदी विदेशी कामगारों के लिए वीज़ा महंगा करने जा रहा है. सऊदी के श्रम मंत्रालय ने एक नियम बनाया है, जिसमें निजी कंपनियों को सऊदी के नागरिकों की तुलना में ज़्यादा विदेशी कामगार रखने पर जुर्माना देना होता है. सऊदी के कंपनी मालिकों का कहना है कि सरकार नियम को मानने पर मजबूर तो कर रही है, लेकिन सऊदी में ऐसे दक्ष लोग हैं कहां, जिन्हें काम पर रखा जाए

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