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संयुक्त राष्ट्र : प्रवासियों पर तेजी बढ़ रहा खतरा

बीते कुछ सालों में हिंसक टकराव और युद्ध , असुरक्षा , बदलते जलवायु की वजह से बड़ी संख्या में लोगों को अपने ही देश की सीमाओं के भीतर या किसी दूसरे देशों में जाकर मजबूरन रहना पड़ता है। इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र ने अंतराष्ट्रीय प्रवासी दिवस के मौके पर प्रवासियों के लिए गरिमामय जीवन समेत उनकी रक्षा के लिए उठाये जाने वाले कदमों को सुनिश्चित करने के लिए अपील की है।

 

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक साल 2020 में, 28 करोड़ से ज्यादा लोग अंतरराष्ट्रीय प्रवासी थे और इसी साल के अंत तक, 5 करोड़ 90 लाख लोग आन्तरिक रूप से विस्थापन का शिकार हुए हैं । गौरतलब है कि यूएन के मुताबिक दुनिया भर में, 80 प्रतिशत से अधिक प्रवासी, सुरक्षित व व्यवस्थित ढंग से सीमाओं को पार करते हैं। इसी संदर्भ में यूएन महासचिव का कहना है कि प्रवासन आर्थिक प्रगति, गतिशीलता और एक शक्तिशाली वाहक है। लेकिन प्रवासियों पर तस्करों के शिकार में फसने का खतरा तेजी से मंडराने लगा है। तस्करों के क्रूर दबदबे वाले जोखिम भरे रास्तों पर नियमों के बिना बढ़ रहे प्रवासन की एक भयानक क़ीमत चुकाई जा रही है। इस वजह से बीते आठ वर्षों से अधिक समय में 51 हजार प्रवासियों की मौत चुकी है। जबकि हजारों लोगों का कोई पता नहीं चला पाया है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव गुटेरेश ने प्रवासियों पर बढ़ते तस्करी के खतरे को लेकर कहा है कि बढ़ते तस्करी की संख्या के पीछे एक मनुष्य है जो , भाई, बहन ,बेटी, बेटा , माँ और पिता ही अक्सर शामिल होता है।

 

 

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक हर प्रवासी का अधिकार, मानवाधिकार होता है फिर चाहे वो किसी भी देश या राज्य से ही क्यों न आया हो । इनका बिना किसी भेदभाव के सम्मान किया जाना चाहिए। यूएन ने ज़ोर देकर कहा है कि प्रवासियों की जीवन हानि की रोकथाम हेतु हर संभव कदम उठाने होंगे। मानवतावादी होने के नाते यह एक नैतिक व कानूनी दायित्व भी है। संघ ने प्रवासियों के हित और सुरक्षा को देखते हुए उनके अधिकारों पर जोर दिया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार प्रवासी लोगों के लिए अधिकार-आधारित मार्गों का विस्तार व उनमें विविधता उत्पन्न करनी होगी, जिससे टिकाऊ विकास लक्ष्यों को आगे बढ़ाया जा सके और श्रम बाजार में किल्लत से निपटा जा सके। इसी संदर्भ में महासचिव गुटेरेश ने प्रवासियों के मूल स्थान वाले देशों में निवेश के लिये अंतरराष्ट्रीय समर्थन बढ़ाए जाने की अपील की है। ताकि लोगों के लिए प्रवासन जरूरी न होकर केवल एक विकल्प हो।

 

गौरतलब है कि इससे पहले संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय द्वारा कहा गया था कि प्रवासी कामगारों को अक्सर अमानवीय बना दिया जाता है, यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि वे भी मनुष्य हैं, उनके मानवाधिकार हैं, और उनकी मानवीय गरिमा की पूर्ण रक्षा की जानी होगी। प्रत्येक वर्ष काम – काज और आर्थिक लाभ हेतु लोग दूसरे देशों का रुख करते हैं। उन्हें अक्सर भीड़ भाड़ वाले स्थानों पर गंदगी भरे माहौल में रहने के लिए विवश होते हैं । वे पोषक आहारों का सेवन कर सकें इतनी उनकी क्षमता नहीं होती। यहाँ तक उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं भी मुहैया नहीं कराई जाती। ऐसे कामगारों को लम्बे समय के लिए अपने परिवार से दूर जीवन गुजारना पड़ता है। इसके अलावा इन्हे कुछ देशों में सरकारी योजनाओं से दूर रखा जाता है। मानवाधिकार उच्चायुक्त के मुताबिक उनसे यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि काम के लिये प्रवासन के बदले वे अपने अधिकारों को त्याग देंगे। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक कुछ चिन्हित पारिवारिक ज़ोन में, अस्थाई प्रवासियों को मकान किराये पर नहीं दिया जा सकता है, क्योकि कामगारों को अपने परिवार के साथ प्रवासन की अनुमति नहीं है।

 

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