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खाड़ी में बढ़ता तनाव

इरान को झुकाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जो जिद पकड़ी है उसके चलते खाड़ी में तनाव बढ़ता जा रहा है। दुनिया के कई मुल्क आशंकित हैं कि जिस तरह वर्ष 1991 में अमेरिका ने बहुराष्ट्रीय सेना के साथ इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को झुकाना चाहा, कहीं वही रवैया वह इस बार भी न अख्तियार कर ले। सद्दाम हुसैन की तरह ईरान की वर्तमान सत्ता भी अमेरिका के आगे झुकने को तैयार नहीं है। यह स्थिति जंग का कारण भी बन सकती है।

दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले राष्ट्रपति चुनाव के दौरान अपने देशवासियों से वादा किया था कि वे ओबामा प्रशासन के दौरान हुए परमाणु समझौते को तोड़कर ईरान को नए समझौते के लिए मजबूर कर देंगे। उनका तर्क था कि समझौते में ईरान को बहुत ज्यादा सहूलियत दी गई है जो सही नहीं है। चुनावी वादा पूरा करने के चक्कर में ट्रंप ईरान को झुकाने की जिद पाले हुए है। इसके चलते बीते एक महीने के दौरान अमेरिका और ईरान के बीच तनाव काफी बढ़ गया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ बड़ा कदम उठाते हुए ईरान की सेना ‘रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर’ को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया। इसके जबाब में ईरान ने भी अपनी संसद में अमेरिकी सेना को आतंकी संगठन बताने वाला बिल पास कर दिया। कुछ ही दिन बीते थे कि अमेरिका ने ईरान को झटका देते हुए उन आठ देशों पर भी उससे तेल खरीदने पर रोक लगा दी जिन्हें बीते साल छूट दी गई थी। इस दौरान अमेरिका ने ईरान के धातु निर्यात पर भी प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद बीते पांच मई को ईरान को सीधी चेतावनी देते हुए उसके आसपास के क्षेत्रों में बमवर्षक विमानों की तैनाती कर दी।

जंगी विमानों की तैनाती की घोषणा करते हुए अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन का कहना था कि मध्य पूर्व से लगातार चेतावनी भरे संकेत मिल रहे हैं जिनसे युद्ध छिड़ने का अनुमान लगाया जा सकता है। खास तौर पर ईरान के साथ। इसीलिए यह तैनाती की जा रही है ताकि ईरान को स्पष्ट संकेत दिया जा सके कि वह अमेरिका या उसके सहयोगी देशों के प्रतिष्ठानों पर हमले की गलती न करे। हम ईरान के साथ हर तरह की लड़ाई को तैयार हैं।

अमेरिका के इस रुख के बाद ईरान ने भी एक बड़ा फैसला ले लिया। उसने घोषणा की कि वह अमेरिका की इन हरकतों के बाद अब 2015 के परमाणु समझौते की शर्तों का पालन नहीं करेगा। और ईरान ने यूरेनियम और भारी जल के उत्पादन को बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी है। इस सबसे ऐसा माहौल बन गया है कि अमेरिका इराक के बगदाद स्थित अपने वाणिज्यिक दूतावास के कर्मचारियों को अमेरिका वापस लौटने का आदेश दे दिया है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक ईरान के साथ बढ़ते तनाव के मद्देनजर यह कदम उठाया गया है। अमेरिका और ईरान के बीच बीते एक महीने में जो कुछ भी हुआ है उसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका और ईरान युद्ध की कगार पर आ पहुंचे हैं और क्या इनके बीच जल्द ही जंग छिड़ने वाली है?

हालांकि कुछ जानकार मानते हैं कि अमेरिकियों के रुख से इस बात की संभावना काफी कम है कि डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर हमला करेंगे। इस समय वे अमेरिकियों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेंगे क्योंकि अगले साल ही उन्हें चुनावी मैदान में उतरना है। अमेरिका के ईरान पर हमला न करने की एक वजह यह भी है कि इस समय अमेरिका अलग-थलग पड़ जाएगा। विशेषज्ञों की मानें तो ईराक और अफगानिस्तान में जब अमेरिका ने हमला किया था तो उसके पास एक बड़ी वजह थी। लेकिन ईरान के मामले में ऐसा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी और 2015 में हुए परमाणु समझौते का हिस्सा रहे सभी देशों का कहना था कि यह परमाणु समझौता सही था और ईरान पूरी तरह से उसका पालन कर रहा है। ईरान का पक्ष नैतिक रूप से सही नजर आता है। जानकारों के मुताबिक अगर ऐसे में अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो तबाही के लिए उसे ही कोसा जाएगा और वह इस लड़ाई में अकेला पड़ सकता है। यूरोप तो पहले से ही इस मामले में उसके साथ नहीं है। बहरहाल दोनों देशों के बीच तनाव के हालात जारी हैं।

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