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इमरान की हिमालयी चुनौतियां

क्रिकेट जगत में नाम कमा चुके इमरान के सामने अब खुद को बेहतर प्रधानमंत्री साबित करने की चुनौती है। खासकर तब जब उन्हीं की तलाकशुदा पत्नी कह चुकी हैं कि पाकिस्तान को जूता पॉलिस करने वाला मिला है

इमरान की पाकिस्तान-तहरीके-इंसाफ (पीटीआई) पार्टी पाकिस्तान के आम चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। हालांकि वे जादुई आंकड़े से करीब 22 सीट दूर रहे। चुनाव पूर्व ही उनकी जीत की भविष्यवाणी होने लगी थी। अभी तक पाकिस्तान की राजनीति में नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल (एन) और भुट्टो की पीपीपी का दबदबा रहा है। इमरान खान करीब 22 साल के राजनीतिक संघर्ष के बाद अपनी पार्टी की सरकार बनाने में सफल हुए हैं। खबरों के मुताबिक वे 11 अगस्त को शपथ लेंगे। प्रधानमंत्री बनते ही उनके सामने चुनौतियों का हिमालयी पहाड़ खड़ा होगा। अपने हरफनमौला खेल से क्रिकेट में नाम कमा चुके इमरान इन चुनौतियों से सफलतापूर्वक लड़कर ही राजनीति में नाम कमा सकते हैं।

पाकिस्तान के भावी प्रधानमंत्री इमरान खान के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने देश में लोकतंत्र को मजबूत करने की होगी। हालांकि पाकिस्तान और भारत के निर्माण का इतिहास समान है। लेकिन लोकतंत्र के मामले में दोनों का इतिहास एकदम उलट है। वहां की सरकार शुरुआती समय से अभी तक स्वतंत्र निर्णय नहीं कर पाई है। यानी पाकिस्तानी सरकार मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर रही है। सेना हमेशा सरकार पर हावी रही है। यही कारण रहा है कि पाकिस्तान में तख्ता पलट का लंबा इतिहास रहा है। चुनी हुई सरकार का तख्ता पलट कर सेना सत्ता में काबिज होती रही है।

ऐसा माना जाता है कि पाकिस्तान पर वास्तव में सेना, आईएसआई और आतंकियों की तिकड़ी राज करती है। खासकर पाकिस्तान की भारत नीति पर सेना और आईएसआई का काफी दखल रहता है। पाकिस्तान के 71 साल के इतिहास में ज्यादातर समय तक सत्ता पर सेना का ही कब्जा रहा है। वहां सेना बहुत मजबूत है और देश में कई बार तख्तापलट की घटनाएं हो चुकी हैं। चुनाव के दौरान से ही चर्चा रही है कि इमरान खान के सिर पर सेना का हाथ रहा है। उनके आलोचक यहां तक कह रहे हैं कि इमरान खान ‘सेना और आईएसआई की सर्कस के ही कलाकार’ हैं। यहां तक की उनकी तलाकशुदा दूसरी पत्नी मेहर ने भी कहा है कि ‘पाकिस्तान को जूता पॉलिस करने वाला मिला है।’

दूसरी तरफ, खुफिया एजेंसी आईएसआई भी काफी मजबूत है और उसका भी पाकिस्तान की राजनीति में काफी दखल रहता है। ऐसा माना जाता है कि कई आतंकी संगठनों को आईएसआई प्रश्रय देती है और उन्हें ट्रेनिंग आदि मुहैया कर कश्मीर में हमले के लिए भेजती है। पाकिस्तान दुनिया के अन्य देशों में भी आतंक का निर्यात करता है। हालांकि अब वही आतंकी खुद उनके लिए भस्मासुर साबित हो रहे हैं। इसलिए इमरान के सामने पाकिस्तान को इस भस्मासुर से निजात दिलाने की भी चुनौती है। पाकिस्तान में हर हफ्ते, दस दिन में कहीं न कहीं बम धमाके की घटनाएं होती रहती हैं। इन घटनाओं में सैकड़ों लोगों की जानें जा चुकी हैं। यहां तक कि चुनाव के दौरान सख्त सुरक्षा इंतजाम के बाद भी बम धमाका हुआ। जिसमें दो दर्जन से ज्यादा लोग मर गए थे। इमरान खान ने एक भारतीय चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि वे 90 दिन में आतंक का फन कुचल देंगे। उनके लिए आतंकियों का खात्मा एक बड़ी चुनौती होगी। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि तमाम आतंकी संगठन आईएसआई की सरपरस्ती में पनप रहे हैं।

इमरान की पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं आने के कारण उन्हें छोटी-छोटी पार्टियों से समर्थन की जरूरत है, क्योंकि पीएमएल (एन) और पीपीपी ने समर्थन देने से साफ इंकार कर दिया है। बताया जा रहा है कि इमरान खान को सरकार बनाने के लिए कुछ कट्टरपंथी इस्लामी पार्टियों का समर्थन लेना होगा। उनके राजनीतिक भविष्य के लिए यह सही नहीं माना जाता है। वह भी तब जब वे पाकिस्तान से कट्टरपंथ को खत्म करना चाहते हों। इससे उनकी मुश्किलें बढ़ेंगी। पाकिस्तान की राजनीति में धार्मिक कट्टरपंथी बड़ी संख्या में हैं।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था बेहद खराब है। पाकिस्तानी रुपए में भारी गिरावट आ गई है। यह गिरावट अभी भी जारी है। जीडीपी ग्रोथ दर भी काफी धीमी है। देश आईएमएफ और चीन के कर्ज में डूबा हुआ है। चुनाव के पहले खबरें यह भी आई थी कि पाकिस्तान में कुछ ही हफ्तों के लिए विदेशी मुद्रा बची है। देशी की ऐसी आर्थिक स्थिति में प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालना कंटीला ताज पहनने के समान है। उन्हें इस चुनौती का भी सामना करना पड़ेगा। दो पुरानी और पारंपरिक पार्टियां को छोड़कर इमरान की पार्टी पर जनता ने भरोसा जताया है। इसका अर्थ है वहां की जनता को इमरान से काफी उम्मीदें हैं। तभी उन्होंने बदलाव किए हैं।

पाकिस्तानी जनता ने अपना काम कर दिया है। अब इमरान खान के सामने आम पाकिस्तानियों की उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती है। चुनाव के दौरान उन्होंने कई वायदे किए हैं। वहां के युवाओं को सपना दिखाया है। चुनाव के बाद भी इमरान खान ने प्रेस के सामने अपने पहले वक्तव्य में ‘नया पाकिस्तान बनाने का वादा दोहराया है।’ युवाओें के इन सपनों को पूरा करना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी। बेरोजगारी से युवाओं में काफी हताशा है। अर्थव्यवस्था की हालत ठीक नहीं होने से रोजगार बढ़ने की संभावना भी कम ही है। युवाओं का एक तबका कट्टरपंथियों के प्रभाव में और चरमपंथी संगठनों में सक्रिय है। यही नहीं हाफिज जैसे आतंकियों के मुखिया पैसे के बल पर युवाओं को लुभाते रहे हैं। पाकिस्तानी युवाओं को इस दलदल से बाहर निकालना इमरान के लिए कम चुनौती नहीं है।

भारत-पाक संबंध को लेकर भारत में इमरान से काफी उम्मीदें हैं। दोनों देशों की आम जनता शांति चाहती है। लेकिन पाकिस्तान की ओर से आतंक के निर्यात से इस पर हर बार ब्रेक लग जाता है। इमरान खान भारत के साथ शांति बहाली के लिए कदम उठाते हैं या नहीं यह भी देखना होगा। वह भी ऐसी परिस्थिति में जब बताया जाता है कि उन्हें सत्ता पर बैठाने के लिए सेना ने पीछे से काम किया है। बिना सेना के चाहे इमरान भारत से संबंधित कोई भी नीति स्वतंत्र रूप से नहीं बना सकते। पाकिस्तान का इतिहास गवाह है, जब कोई पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यह सोच लेता है कि वह स्वतंत्र है और भारत के प्रति शांति- अमन की दिशा में आगे बढ़ता है तो उसके पर कतर दिए जाते हैं। इसलिए भारत के साथ शांति की बहाली भी इमरान के लिए बड़ी चुनौती है। इसके अलावा आतंकवादियों का जन्म स्थल होने के कारण पाकिस्तान का यह सच पूरी दुनिया के सामने आ गया है। जिस कारण पूरी दुनिया से पाकिस्तान अलग-थलग हो गया है। अभी चीन को छोड़ किसी अन्य देश से पाकिस्तान का विश्वसनीय संबंध नहीं है। कभी अमेरिका के सबसे करीब रहे एशियाई देशों में पाकिस्तान आज उससे बहुत दूर हो गया है। ऐसे में उन्हें अपनी कूटनीति से दुनिया में पाकिस्तान की छवि को दुरुस्त करना होगा।

अमेरिका और चीन का बदल रहा रवैया भी इमरान के लिए एक मुश्किल माहौल दे सकता है। अपने भाषण में तो बड़ी बात करते हुए इमरान ने अमेरिका से बराबरी का व्यवहार करने की अपेक्षा की है, लेकिन पाकिस्तान जिस तरह से अमेरिकी सहायता पर निर्भर रहा है, उससे यह दिवास्वप्न ही लगता है। यह रिश्ता एकतरफा है। उन्होंने पाकिस्तान के ट्राइबल इलाकों में अमेरिकी ड्रोन हमलों की सख्त आलोचना की है। अमेरिका ने इसी साल पाकिस्तान की आर्थिकी सहायता रोक दी थी। दूसरी तरफ चीन के भारत से रिश्ते सामान्य हो रहे हैं। चीन सीपीईसी के रूप में पाकिस्तान में अगर भारी निवेश कर रहा है तो वह पाकिस्तान पर अपना दबदबा भी कायम रखना चाहेगा। निवेश के नाम पर चीनी कर्ज से मुक्त होना भी इमरान के लिए चुनौती है।

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