पड़ोसी देश नेपाल को लेकर भारत की बेफिक्री दुनिया के कई देशों को फिक्र में डालने वाली होती है। लेकिन पिछले कुछ समय से चीन, नेपाल अौर भारत के त्रिकोण की पूरी दुनिया में तरह-तरह से व्याख्या हो रही है। इधर चीन ने चालबाजियां भी की हैं जिसमें निशाने पर भारत रहा है। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा औली के चीन दौरे को अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने काफी तवज्जो दी। इस पांच दिवसीय दौरे के कई मतलब और निहितार्थ भी निकाले गए।
नेपाल और चीन ने २० जून को २.२४ अरब डालर यानी १५२ अरब रुपये के आठ समझौते भी किए। ये समझौते दोनों देशों की सरकारों और निजी क्षेत्र के दरम्यान हुए। फरवरी में सत्तासीन होने के बाद केपी शर्मा औली को यह पहला चीन का अधिकारिक दौर है। वर्ष २०१८ में प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल में औली ने चीन और नेपाल के संबंधों को बढ़ावा दिया था। उन्होंने उस वक्त मधेशी आंदोलन के बढ़ते प्रभाव के वक्त भारत पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए चीन के साथ ट्रांजिट व्यापार संधि भी की थी। मौजूदा दौर के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने औली को भरोसा दिलाया कि वे सहयोग बढ़ायेंगे। शी ने यह भी विश्वास दिलाया कि बेल्ट एंड रोड परियोजना के तहत चीन-नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने को तैयार है। नेपाल की राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को बनाए रखने के वास्ते चीन प्रतिबद्ध है।
औली के चीनी दौरे को चीन के मीडिया ने काफी अहमियत दी है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक नेपाल आर्थिक सहयोग और आधारभूत ढांचे के विकास से जुड़े मुद्दों को परिणति तक पहुंचना चाहता है। अखबार ने रडार भारत की और घुमाते हुए यह भी कहा कि भारत को इस यात्रा और दोनों देशों के बीच हुए समझौते से मायूस नहीं होना चाहिए क्योंकि नेपाल में उसका प्रभाव तक नहीं होगा।
औली का यह चीन दौरा भारत को थोड़ी चिंता में डालने वाला है। इस दौरे से भारत की नेपाल के प्रति अब तक की बेफिक्री टूटी है। चीन-नेपाल के बीच हुए कुछ समझौते भारत के लिए सुखद नहीं हैं। भारत-चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना बन बेल्ट वन रोड का विरोध कर रहा है। जिसमें अब चीन उसके साथ हो गया है। नेपाल का इस परियोजना को समर्थन देना भारत के लिए चिंता में डालने वाली बात है। असल में औली की मंशा यह है कि चीन तिब्बत के साथ अपनी सड़कों का जाल फैलाए और उसमें नेपाल को भी ले ताकि भारत पर उसकी निर्भरता कम रहे। चीनी रेलवे का विस्तार हिमालय के जरिए नेपाल तक ले जाने की बात भी कही जा रही है।
नेपाल चीन के बीच रिश्ते की मजबूती से भारत का फिक्रमंद होना स्वाभाविक है। नेपाल के प्रधानमंत्री औली का रुख शुरू से ही भारत विरोधी रहा है। वे अपने पहले कार्यकाल में भी चीन और पाकिस्तान के साथ ही जुड़ते हुए दिखे थे। इस दूसरी पारी में भी यही आलम है। उन्होंने चुनाव भी भारत विरोधी भावनाओं को भड़का कर जीता था। चीन के लिए नेपाल एक रणनीति ठिकाना है। नेपाल में हजारों तिब्बती हैं। चीन को हमेशा ही यह भय बना रहता है कि कहीं नेपाल में तिब्बतयों का कोई अंदोलन न खड़ा हो जाए। साथ ही वह नेपाल में अपनी मौजूदगी से भारत पर भी दबिश बढ़ाने की जद्दोजहद में लगा रहता है। नेपाल तो एक बहाना है असली लड़ाई तो चीन-भारत की है। चीन की इस चाल का भारत को काट ढूंढना होगा।

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