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सरकार-अफसर में तकरार

आमतौर पर ब्यूरोक्रेसी राजनेताओं के इशारे पर ही ता& थैया करती रही है। लेकिन यह सच सिर्फ सतह पर दिखाई देता है जो पूरी तरह सच नहीं होता। पूरा सच यह है कि राजनेताओं को अच्छे बुरे कई रास्ते ब्यूरोक्रेट्स ही सिखाते और दिखाते हैं। सरकार और अफसरों में टकराहटें की खबरें बहुत कम आती हैं तो इसकी वजह साफ है। वह यह कि टकराहट की नौबत ही नहीं आती। लेकिन सरकार&अफसर की टकराहट की खबर २० फरवरी को चर्चा का विषय बन गई। इस दिन देर शाम तक दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश से हथापाई के आरोप में आम आदमी पार्टी के विधायक प्रकाश जरवाल को गिरफ्तार कर लिया गया। अंशु प्रकाश ने आरोप लगाया कि आप के दो विधायकों ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की मौजूदगी में उन्हें पीटा।

मुख्य सचिव ने आप के विधायकों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज कराई है। इसके मुताबिक १९ की देर रात मुख्यमंत्री केजरीवाल के ?kj में मीटिंग के दौरान विधायकों ने उनके सिर और मुंह पर मुक्के मारे और गालियां दी। आरोपी विधायक प्रकाश जरवाल और अजय दत्त थे। बात यहीं खत्म नहीं हुई। अलबत्ता २० फरवरी को दोपहर के वक्त भीड़ ने सचिवालय में दिल्ली सरकार के मंत्री इमरान हुसैन के निजी सचिव पर हमला किया। इसके बाद मामला बिगड़ गया। अधिकारी बगावत पर उतर गए।

हालांकि आप सरकार मुख्य सचिव के आरोपों को सिरे से खारिज कर रही है। उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया ने कहा कि मारपीट के आरोपों में सच्चाई नहीं है। विधायकों ने राशन का मुद्दा उठाया था] लेकिन मुख्य सचिव ने जवाब देने से मना कर दिया। इसी पर थोड़ी गरमा&गरमी हुई। जिसे मुख्यसचिव बेवजह तूल दे रहे हैं। लेकिन मुख्य सचिव का कहना है कि उनसे सरकार के तीन साल पर टीवी विज्ञापन में देरी पर पूछा गया था। इस पर मुख्य सचिव ने कहा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार काम हो रहा है। इस बात पर विधायक भड़क गए।

मुख्य सचिव ने मारपीट प्रकरण पर उपराज्यपाल अनिल बैजल ने अपनी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को सौंप दी है। इसके पहले केंद्र ने उपराज्यपाल से इस मामले में रिपोर्ट मांगी थी। अंशु प्रकाश प्रकरण के बाद २० फरवरी को दिल्ली सरकार का कामकाज ठप हो गया। सरकार के सभी अफसर अपने&अपने दफ्तर से बाहर निकल गए और आरोपियों की गिरफ्तारी के वक्त तक काम नहीं करने का ऐलान किया। बाद में विधायकों की गिरफ्तारी के बाद अफसर काम पर लौटे। इस ?kVuk पर केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा दिल्ली सरकार  के मुख्य सचिव के साथ हुए ?kVuk¨e से उन्हें गहरा दुख पहुंचा है। प्रशासनिक सेवाओं के लोगों को निडरता और गरिमा से काम करने देना चाहिए। दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन ने इस बाबत टिप्पणी की& ^आम आदमी पार्टी की ?kVuk¨e रणनीति है। दिल्ली के मुख्य सचिव को रात १२ बजे बुलाओ] उन्हें विधायकों से पिटवाओ और नीरव मोदी से ध्यान भटकाकर भाजपा की मदद करो।^

गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी के विधायक प्रकाश जारवाल पर जुलाई २०१६ में छोड़छाड़ का मामला दर्ज हुआ था। दिल्ली पुलिस ने एक महिला की शिकायत पर केस दर्ज किया था। गिरफ्तार विधायक प्रकाश जारवाल की दलील है& मैंने राशन की समस्या को लेकर मुख्य सचिव से कई बार समय मांगा था। लेकिन वह हर बार टाल रहे थे। ?kVuk वाले दिन मैंने और अजय दत्त ने दलितों के परिवारों को राशन न मिलने का मुद्दा उठाया। इस पर वह भड़क गए और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया। इस ?kVuk के बाद दिल्ली सरकार के अधिकारी बहुत आक्रोश में हैं। अफसरों ने अब यह फैसला लिया है कि मुख्यमंत्री] उपमुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों से अब केवल लिखित संवाद  जरिए ही विवाद का निपटरा होगा। अधिकारी दिल्ली सरकार की किसी भी बैठक में शामिल नहीं होंगे।

असल में सरकार और अधिकारियों के बीच का यह टकराव कोई नया नहीं है। इससे पहले भी यह टकराव समय&समय पर सामने आता रहा है। बिहार में जब लालू प्रसाद का शासन था तब भी कई ऐसे मौके आए जब प्रदेश में वरिष्ठ अधिकारी अपमान से आहत होकर बगावत पर उतर आए। लालू प्रसाद के बारे में मशहूर था कि वह अपने निजी सचिव को पीकदान लाने को कहते थे ताकि वह उसमें पान थूक सकें। यह बात जरूर थी कि लालू प्रसाद को अधिकारियों का आक्रोश मैनेज करना आता था। उत्तर प्रदेश में मायावती भी अपने शासन के दौरान अधिकारियों का अपमान करने के लिए कुख्यात रहीं। तब भी कई अधिकारी अपमान का जहर पीते हुए कसमसाहट में रहे।

आम आदमी पार्टी के साथ मुश्किल यह है कि इनके पास राजनीतिक अनुभव की कमी है। वे जोश से भरे हुए हैं। कई बार अत्याधिक जोश आपको विवेक के साथ शालीनता का भी अपहरण कर लेता है। अपको हालात और अधिकारियों को मैनेज करना सीखना होगा। अगर ऐसा नहीं हुआ तो इस प्रकार की अप्रिय परिस्िथतियां बार&बार आती रहेगी जो पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। यह बात पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल कितने जल्द समझ लें] वही ठीक रहेगा।

गांधी के बाद गुप्ता

देश वही है। मतलब दक्षिण अफ्रीका। मगर साल] सियासी हालात और चेहरे बदल गए। जिस दक्षिण अफ्रीका के लोग भारत को महात्मा गांधी के नाम&काम से जानते रहे थे। अब उस देश के लोगों के जेहन में गुप्ता बंधुओं का नाम है] जिनकी वजह से वहां के राष्ट्रपति जैकब जूमा को अपनी सत्ता गंवानी पड़ी। दक्षिण अफ्रीका की सत्तारूढ़ अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस ¼एनसीसी½ के नेता साइरिन रामफोसा को संसदीय मतदान में देश का नया राष्ट्रपति चुन लिया गया है। भ्रष्टाचार मामले में फंसे राष्ट्रपति जैकब जुमा के इस्तीफे के बाद रामफोसा को राष्ट्रपति बनाया गया। जुमा पर गुप्ता बंधुओं को नियम विरुद्ध सहयोग करने का आरोप है।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से ताल्लुक रखने वाले अजय] अतुल और राजेश गुप्ता ने बहुत कम समय में दक्षिण अफ्रीका में बड़ा कारोबारी साम्राज्य खड़ा कर लिया। अतुल गुप्ता की अगुवाई में यह परिवार १९९३ में दक्षिण अफ्रीका आया था। इस परिवार के आने के साल भर बाद ही अंतरराष्ट्रीय कद के नेता नेल्सन मंडेला ने देश के पहले लोकतांत्रिक चुनावों में जीत हासिल की थी। वहां लोकतंत्र स्थापित होने के बाद दक्षिण अफ्रीका ने अपने दरवाजे विदेशी निवेश के लिए खोले थे।

भारत में छोटे स्तर पर कारोबार करने वाले गुप्ता परिवार ने कुछ ही दिनों में दक्षिण अफ्रीका में बड़ा व्यवसाय खड़ा कर लिया। परिवार ने कंप्यूटर] खनन] मीडिया] टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में तेजी से तरक्की की। इस परिवार ने वर्ष २०१० में ^द न्यूज एज^ नाम का एक अखबार भी लॉन्च किया। इस अखबार को जैकब जुमा का समर्थक माना जाता है। इसी तरह २०१३ में गुप्ता परिवार ने एएनएन७ नाम से एक २४ द्घंटे का न्यूज चैनल भी लॉन्च किया। इसके साथ ही सियासी गलियारों में गुप्ता परिवार का प्रभाव बदलने लगा।

इस बात की काफी चर्चा है कि २००९ में जुमा के राष्ट्रपति बनने से पहले ही उनकी सत्ताधारी अफ्रीकन कांग्रेस ¼एएनसी½ से नजदीकियां बढ़ गई। इतना ही नहीं गुप्ता परिवार के मालिकाना हक वाली कंपनी सहारा कंप्यूटर में जैकब जुमा का बेटा निदेशक था। स्मरण रहे गुप्ता परिवार ने अपने गृहनगर सहारनपुर के नाम से प्रभावित होकर अपनी कंपनी का नाम सहारा कंप्यूटरर्स रखा था। जुमा की तीसरी पत्नी बैंगी जुमा भी गुप्ता ब्रदर्स की कंपनी में काम करती थी। जुमा की बेटी भी गुप्ता ब्रदर्स की कंपनी से जुड़ी हुई थी।

गुप्ता परिवार का नाम विवादों में पहली बार उस समय आया जब मार्च २०१५ में पूर्व डिप्टी फाइनेंस मिनिस्टर मिलेसी जोनस ने दावा किया कि गुप्ता ब्रदर्स ने उन्हें रिश्वत देने की कोशिश की। वहां का सांसद तब जोनस ने आरोप लगाया कि गुप्ता ब्रदर्स ने उन्हें ६० करोड़ रैंड ¼यानी ३२० करोड़ रुपए½ देने की पेशकश की थी। आरोपों के मुताबिक गुप्ता ब्रदर्स ने जोनस के सामने भी वित्त मंत्री के पद का प्रस्ताव रखा था। इसी एवज में उनको गुप्ता बंधुओं के मुताबिक काम करना था।

सत्ता में गुप्ता बंधुओं की धमक का प्रमाण बार&बार मिलता रहा। ९ दिसंबर २०१५ में बहुत कम समय के लिए वित्त मंत्री बने डेविड वैन रूयेन भी शपथ से एक रात पहले गुप्ता के ?kj गए थे। इसके अलावा भी कई तथ्य हैं जो गुप्ता बंधुओं के वर्चस्व को साबित करते हैं। दक्षिण अफ्रीका में भ्रष्टाचार निरोधक इकाई पाबेल्क प्रोटेक्टर ने अक्टूबर २०१६ में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि किस तरह बिजली के क्षेत्र में स्वाधिकार रखने वाली सरकारी कंपनी ने गुप्ता से जुड़ी कंपनियों से मार्केट प्राइस से ज्यादा दर बड़े पैमाने पर कोयले की खरीददारी की थी।

जैकब जुमा का राजनीतिक संद्घर्ष गहरा रहा है। दक्षिण अफ्रीका की सत्ता और उससे पहले अश्वेतों के खिलाफ संद्घर्ष में जैकब जुमा की अहम भूमिका रही है। विवादों से भी उनका पुराना रिश्ता है। उन पर उपराष्ट्रपति रहते भी आरोप लगे थे] बर्खास्तगी हुई थी] फिर आरोपों से बरी भी हुए। इस बार क्या होता है] यह देखना बाकी है।

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