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तेल के लिए खेल

भारत में लगातार पेट्रोल डीजल की कीमतें आसमान छू रही हैं। तेल की बढ़ती इन कीमतों की वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आगामी लोकसभा चुनाव में पराजित हो जाने का खतरा अनुभव होने लगा है। मुश्किल यह है कि तेल पर भारत सरकार का कोई वश नहीं है, वह बुरी तरह लाचार है। तेल का खेल बड़े देशों का शगल है। खासकर
अमेरिका ने तेल के खेल के कई देशों को मटियामेट कर दिया और कई देशों को शिकंजे में कसे हुए है ताकि उन देशों में उत्पादित होने वाले तेल पर उसका कब्जा बना रहे।
अमेरिका ने तेल पर आधिपत्य के लिए मध्यपूर्वी देशों पर काफी सितम ढाहे। कई कूटनीतिक चालें चली। इस पर जो हमला किया गया वह उसके मूल में भी तेल का ही खेल था? रसायानिक हथियार तो बहाना था जो गहन तलाशी के बाद भी नहीं मिले। जो चीज थी ही नहीं, वह मिलती भी कैसे। अभी अमेरिका ने जो सऊदी अरब और ईरान पर जो दबाव बनाना शुरू किया है उसके मूल में भी तेल ही है। लेकिन राजनीति का यह सिद्धांत होता है कि मूल बात को नेपथ्य में रखा जाता है। जो मूल कारण होता है, वह सतह पर बहुत कम बाहर ही दिखाई देता है।

हाल ही में अमेरिकी सीनेट की उच्च समिति के सदस्यों ने इस बात पर काफी जोर दिया है कि अमेरिका के कार्य तेल और शैल गैस के उत्पादन में इजाफे में ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध को मजबूत करने में योगदान दिया है। इसके बाद अमेरिका कांग्रेस ने मई महीने में एक प्रस्ताव पारित किया कि यूरोपीय संघ को गैस की निर्यात बढ़ाया जाए ताकि वह रूस से कार्य तेल के आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सके। अमेरिका के सहयोगी देश मध्य पूर्व के देशों पर तेल के लिए निर्भर हैं। अमेरिका कांग्रेस के प्रस्ताव का लथ्य भी यही था कि वे मध्यपूर्व देशों में अपनी निर्भरता कम करें।

ईरान के साथ हुए परमाणु करार से बाहर निकलने का फैसला भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी की ऊर्जा निर्यात की क्षमता हासिल कर लेने के बाद किया था। बहुत संभव है कि अमेरिकी प्रतिबंध के कारण ईरान से कच्चे तेल के निर्यात में प्रतिदिन एक बिलियन बैरल के हिसाब से कमी आ सकती है। लेकिन ऐसा लगता नहीं कि विश्व बाजार में अमेरिका कच्चा तेल और गैस ईरान से होने वाली कमी की भरपाई भी कर सकता है। अक्टूबर के पहले हफ्ते में ईरान में विदेशी मुद्रा और सोना बाजार में खामोशी छायी रही।

उधर ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध के फिर से लगने के बाद सऊदी अब ने दावा किया कि उसके पास दुनिया की भर के तेल की जरूरत पूरा करने के लिए पर्याप्त भंडार है।
सीधे तो नहीं मगर अप्रत्यक्ष रूप से भारत पर अमेरिका लगातार दबाव बनता रहा है कि वह ईरान से तेल खरीदना बंद कर दे। सवाल है कि सऊदी अरब कब तक काम चलाएगा। उसके पास तेल का कुल कितना भंडार है। तेल विशेषज्ञों के मुताबिक सऊदी अरब के पास प्रमाणित तेल भंडार 266 अरब बैरल्स है। मतलब यह कि 1 ़ 2 करोड़ बैरल प्रतिशत के उत्पादन के हिसाब से सऊदी अरब का तेल भंडार अगले 70 सालों में समस्त हो जाएगा। सऊदी अरब में 1936 से 1970 के बीच ही तेल के भंडार के विशाल और बेशुमार ठिकानों की खोज की गई। इसके बाद नए ठिकानों की खोज का सिलसिला ठप्प है।

यह एक तथ्य है कि भारत में करीब 12 प्रतिशत कच्चा तेल सीधे ईरान से आता है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले साल भारत ने ईरान से करीब सात अरब डालर के कच्चे तेल का आयात किया था। यह राशि देखकर ही अमेरिका, ईरान के साथ से तेल आयात बंद करने का निरंतर दबाव बना रहा है। मगर भारत के लिए ईरान पर तेल की निर्भरता एक मजबूरी है। अलबत्ता भारत की एक महती योजना को भारत से लेकर ईरान तक तेल पाईप बिछाने की है जो अभी तक अधर में ही लटकी हुई है।

अमेरिका ने भारत के साथ-साथ चीन और पाकिस्तान के लिए भी कई महीने भी फरमान जारी किया था कि वह ईरान से तेल का आयात बंद कर दे। असल में ईरान पर अमेरिका के नए और पुराने प्रतिबंध के बीच फर्क है। पुराने प्रतिबंध में बहुत से देश भी शामिल थे। इसलिए उसका व्यापक सुभाव था। लेकिन नए प्रतिबंध में यूरोपीय संघ जैसे बड़े ब्लॉक शामिल नहीं हैं। यह अमेरिका का एकतरफा प्रतिबंध है। दूसरी बात यह है कि ईरान से तेल आयात सऊदी के मुकाबले सस्ता पड़ता है और वह भुगतान को समय सीमा में भी काफी छूट देता है जो भारत के लिए मुफीद साबित होता है।

लबोलुआब यह है कि अमेरिकी दबाव का निष्कर्ष ईरान के तेल पर अपना कब्जा जमाना है। तेल के बहाने अपनी संपत्ति में ईजाफा करना भी अमेरिकी मकसद है। दुनिया के तेल भंडारां पर वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ढंग से कब्जा जमाना चाहता है ताकि उसकी कीमतों में अपनी मनमाने कर सके।

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