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कोरोना वायरस की उत्‍पत्ति पर क्या कहती हैं विशेषज्ञों की रिसर्च रिपोर्ट?

कोरोना वायरस की उत्‍पत्ति पर क्या कहती हैं विशेषज्ञों की रिसर्च रिपोर्ट?

दुनियाभर में कोविड-१९ को लेकर कई तरह की बातें हो रही है। जिसमें इसके फैलने को लेकर चीन पर भी आरोप लगते आए हैं। हालाँकि चीन हर बार एक नई थ्योरी देता आया है। कोरोना वायरस के फैलने का क्या कारण है। इसपर अभी तक कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिल पाया है। जानलेवा बन चुके इस वायरस के उत्पन्न होने को लेकर अमेरिका और चीन के मध्य कई बार बहस हुई। दोनों ही देश इसकी उत्पति कर इसे पूरी दुनिया में फैलाने का इल्जाम एक दूसरे पर लगा रहे है। परन्तु बाद में धीरे-धीरे छवि साफ होने लगी और पूरे देश की मीडिया और वैज्ञानिकों ने इसको किसी भी तरह साजिश होने की बात से साफ़ इंकार किया और तो और साइंस जर्नल और मीडिया से जो रिसर्च पेपर प्राप्त हुए उनके मुताबिक भी इसके प्राकृतिक होने की पुष्टि हुई।

साजिश बताने वाली थ्‍योरी

इस बात से पर्दा उठाने के लिए  जर्मनी के अखबार डायचे वेले के डिजिटल एडिशन में इस पर एक विस्‍तृत रिपोर्ट प्रकाशित की गई। इससे शोधकर्ताओं को यह पता लगा की ह़ॉर्सशू प्रजाति के चमगादडों के मल से इस वायरस का पता चला था। प्रारंभ में वाशिंगटन पोस्ट ने कोरोना वायरस का साजिश बताने वाले सिद्धांत का खंडन किया था। इसके रिसर्च रिपोर्ट के हवाले से लिखा गया है कि यह किसी साजिश का नतीजा नहीं अपितु प्राकृतिक था।

इसके उपरांत नेचर मैगज़ीन में  क्रिस्टियान एंडरसन ने एक रिसर्च पेपर पब्लिश किया। इस रिसर्च पेपर में भी इसके प्राकृतिक होने की पुष्टि की गई। आपको यह भी बता दें कि पश्चिमी मीडिया ने चीन की जिस लैब को लेकर सवाल उठाए थे। उस लैब पर डेली मेल की एक खबर में कहा गया है कि यह लैब सीक्रेट नहीं है अपितु वहां होने वाली हर रिसर्च साइंस मैग्‍जीनों में छपती रहती हैं।

इतना ही नहीं इसमें ये भी कहा गया था कि यहां पर होने वाली लैब में पश्चिमी देशों के वैज्ञानिक भी शामिल होते हैं और तो और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास की गैलवेस्टन नेशनल लैब इस लैब की पार्टनर के तौर पर काम करती है। इसके अलावा अमेरिका की इको हेल्थ अलायंस भी इसकी पार्टनर है। डेली मेल की रिपोर्ट के मुताबिक यहां पर होने वाली रिसर्च में अमेरिकी सरकार भी निवेश करती है। फिलहाल अमेरिका ने निवेश से अब इंकार कर दिया है।

क्या चीनी मार्केट से फैला कोरोना?

लांसेट और साइंस मैगजीन में छपे लेख में चीन के एक अधिकारी ने उस बयान पर सवाल उठाया है। जिसमें कहा गया था कि ये वायरस वुहान की मीट मार्केट से फैला था। इन मैगज़ीन्स में छपे लेख में कहा गया कि कोरोना वायरस  के शुरुआती 41 मामलों में से 13 तो कभी वुहान के मीट बाजार गए ही नहीं थे। अमेरिका की जॉर्जटन यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के डेनियल लूसी ने एक इंटरव्यू के दौरान इस सवाल का जवाब दिया है। उनका कहना था कि ये काफी हद तक ठीक है कि जो लोग कभी मीट मार्केट नहीं गए थे  वो उन व्‍यक्तियों के संपर्क में आए हो जो इस वायरस संक्रमित थे। साथ ही साथ उनका ये भी कहना था कि इस वायरस की शुरुआत दिसंबर में न होकर नवंबर में हो चुकी थी।

वायरस बनाने की बात गलत

फिर यहाँ एक और सवाल ने जन्‍म लिया था कि आखिर वुहान तक ये वायरस पहुंचा कैसे? इसका उत्तर देने से पूर्व आपको बता दें कि वुहान की मीट मार्केट चीन की सबसे बड़ी मीट मार्केट में से एक है। यहां पर कई तरह के जानवरों का मांस बेचा जाता है। इनमें चमगादड़ और पैंगोलिन भी शामिल हैं।  जिनका इस्तेमाल स्‍थानीय स्‍तर पर दवा बनाने के लिए भी होता है। वुहान के प्रोफेसर शी झेंगली ने नेचर मैगजी के अपने एक लेख में लिखा था कि वह करीब 28 गुफाओं में जाकर चमगादड़ों का मल एकत्रित कर चुके है। इसके पश्चात उन्‍होंने चमगादड़ के वायरसों का एक पूरा आर्काइव तैयार किया। उनके इस शोध में नोवेल कोरोना वायरस का भी जिक्र था जो हॉर्सशू प्रजाति के चमगादड़ों में पाया गया था।

चीन में इस वायरस का संक्रमण फैलने के बाद प्रोफेसर शी और उनकी टीम ने मिलकर इसका बायोस्‍ट्रक्‍चर तैयार किया और इसको पब्लिश भी किया। बाद में इस शोध के आधार पर चीन में कोरोना वायरस के टीके के बनाने की प्रक्रिया भी शुरू हो सकी। इसके बाद चाइना मॉर्निंग पोस्ट से भी प्रोफेसर शी ने इन अनुभवों को साझा किया था। इको हेल्थ अलायंस के अध्यक्ष पीटर दाचाक ने अमेरिकी रेडियो चैनल डेमोक्रेसी नाउ को दिए इंटरव्यू में लैब में वायरस को बनाने की बात को कोरी बकवास करार दिया था।

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