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डोनाल्ड ट्रम्प बोले, अगर चुनाव हार गया तो आसानी से छोड़ दूंगा ऑफिस

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा, नहीं लगेगा दोबारा देश में लॉकडाउन

अमेरिका में इस साल होने वाले चुनाव को लेकर दिन-ब-दिन वहां की राजनीति में उठा-पटक चल रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने शनिवार को एक बयान में कहा कि अगर वह चुनाव हार गए तो आसानी से ऑफिस छोड़ देंगे। लेकिन इससे पहले डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बिडेन ने कहा था कि डोनाल्ड ट्रम्प चुनाव में धांधली करा सकते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि अगर वह हार भी गए तो आसानी से ऑफिस नहीं छोड़ेंगे। इन आरोपों को अब ट्रम्प ने खारिज कर दिया है।

डोनाल्ड ट्रम्प ने फॉक्स न्यूज से बातचीत करते हुए कहा कि अगर मैं नहीं जीतता तो मतलब नहीं जीता। तो मैं आगे बढ़ूंगा और दूसरी चीजें भी करूंगा। अगर मैं चुनाव हारा तो यह देश के लिए बहुत ही बुरा होगा। इस साल के आखिर में अमेरिका में तीन नवंबर को राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव होने हैं। रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रम्प की टक्कर डेमोक्रेटिक जो बिडेन से है।

डेमोक्रेटिक पार्टी से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जो बिडेन ने आरोप लगते हुए कहा था कि वे (डोनाल्ड ट्रम्प) नवंबर में होने वाले चुनावों में धांधली करवा सकते हैं। अगर वह हारते भी हैं तो आसानी से ऑफिस नहीं छोड़ेंगे। ये बातें बिडेन ने ही फॉक्स न्यूज पर कहीं। शो के होस्ट ट्रेवर नोआ ने बिडेन से पूछा था कि आपने कभी सोचा है अगर ट्रम्प चुनाव हारने के बाद भी पद न छोड़ें। इस पर बिडेन ने कहा कि ट्रम्प ऐसा कर सकते हैं, लेकिन मुझे सेना पर भरोसा है। उधर, व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कायली मैक्नेनी ने बिडेन के बयान को मजाकिया और हास्यास्पद बताया था।

मेल-इन बैलेट्स को बताया धोखा

अभी पूरे देश में कोरोना अपना विकारल रूप लेते जा रहा है। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश अमेरिका ही है। कोरोना वायरस के कारण अमेरिका के चुनावों में मेल-इन बैलेट (ईमेल या लेटर पोस्ट कर वोटिंग) की मांग हो रही है। ट्रम्प ने मेल-इन बैलट को एक धोखा बताया। उन्होंने ट्वीट किया था कि डेमोक्रेट्स 2020 के चुनावों में धोखेबाजी करना चाहते हैं। ट्रम्प कोरोना महामारी के बावजूद मेल-इन बैलेट के खिलाफ हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सामने अमेरिका में बढ़ते कोरोना के मामलों को रोकने, अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस हिरासत में मौत होने के बाद भड़के हुए प्रदर्शनों से निपटने और इस साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए रणनीति तय करने की भी चुनौती है। वहीं वुहान से निकलकर दुनियाभर में फैले कोरोना वायरस की वजह से राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने चीन की छवि सुधारने की चुनौती है।

ट्रम्प को घर में ही मुश्किलों का सामना

ट्रम्प के लिए 2020 का अभी तक का वक्त कई बड़ी घटनाओं से भरा रहा है। इस साल अमेरिका ने आईएसआईएस का सफाया किया। सीरिया में रूस के दखल को रोका। ईरान को बैकफुट पर कर दिया। ट्रम्प अपने ही घर में अमेरिका फर्स्ट की पॉलिसी पर अमल नहीं करा सके। अब कोरोना और जॉर्ज फ्लॉयड केस की वजह से ट्रम्प के लिए चुनाव जीतने की राह आसान नहीं है।

ट्रम्प पहले कोरोना को महामारी मानने को तैयार नहीं थे। जनवरी में ट्रम्प ने कोरोना को महामारी मानने से ही इनकार कर दिया था। उन्होंने कोविड-19 को मामूली वायरस बताया था। तब वे मास्क पहनने का विरोध कर रहे थे। कीटनाशक दवाई से इंजेक्शन बनाने जैसी बातें कर रहे थे। इस वजह से पूरी दुनिया में उनका मजाक उड़ा था। राष्ट्रपति ट्रम्प ने अपनी स्ट्रैटजी में अब बदलाव किया है। अमेरिका में आक्रामक सोच रखने वाले समूहों का सपोर्ट बनाए रखने के लिए ट्रम्प MAGA यानी मेक अमेरिका ग्रेट अगेन को ही अपने इलेक्शन कैम्पेन का नारा बना रहे हैं। वे अमेरिका को इंटरनेशनल लेवल पर मिली कामयाबी का मुद्दा उठा रहे हैं। वे चाइना कार्ड खेल रहे हैं। उनका कहना है कि चीन उन्हें हराने की साजिश रच रहा है।

ट्रम्प की पहली रैली 19 जून को

ट्रम्प ओकलाहोमा में 19 जून को अपनी पहली रैली करेंगे। यह ट्रम्प का गढ़ माना जाता है। ट्रम्प ने जेसन मिलर को अपने कैम्पेन का चीफ एडवाइजर बनाया है। मिलर डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बिडेन और उनके बेटे हन्टर बिडेन के चीन के साथ रिश्तों को उजागर करने वालों में शामिल रहे हैं। ट्रम्प के लिए हालात मुश्किल हैं। सितंबर तक भी कोरोना खत्म नहीं होगा। 3 नवंबर से इलेक्शन प्रोसेस शुरू होगी।

उनके सामने खतरा यह है कि उनके विरोधी ज्यादा ताकतवर तरीके से वोटिंग कर सकते हैं। 67 साल के हो रहे जिनपिंग माओ जेडोंग और चाउ एन लाई के बाद सबसे असरदार नेता माने जाते हैं। चीन की पॉलिसी का पहला हिस्सा साम्राज्यवाद था। दूसरा- मैन्यूफैक्चरिंग और तीसरा- ग्लोबल मार्केट पर कब्जा करना। इसकी जिम्मेदारी अब जिनपिंग पर है। कोरोना ने चीन की इमेज खराब की, लेकिन जिनपिंग अब इसे सुधारना चाहते हैं।

दुनिया के सामने अच्छा बन रहा चीन

चीन का भारत के साथ सीमा विवाद है, लेकिन वह भारतीय बाजार में सालाना 80 हजार करोड़ रुपये का सामान बेचता है। जब वह सीमा पर तनाव पैदा करता है तो भारत में उसके विरोध के सुर उठते हैं। नेपाल और पाकिस्तान को उकसाने में उसकी भूमिका पर भी सवाल उठते हैं, लेकिन वह दुनिया के सामने अच्छा बने रहना चाहता है।

यूरोप के देश सामानों के लिए अमेरिका के बाद दूसरे नंबर पर चीन पर निर्भर हैं। कोरोना को नहीं रोक पाने में चीन की नाकामी के बाद यूरोप में भी उसके प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है। जर्मनी और फ्रांस भी इस मोेर्चे पर चीन के खिलाफ और अमेरिका के साथ खड़े हैं। ट्रेड वॉर से लेकर वर्ल्ड डिप्लोमेसी में चीन का अमेरिका से टकराव है। इस वजह से चीन ने दो साल में 165 तरह की मैन्यूफैक्चरिंग में 70 करोड़ डॉलर का बिजनेस खोया है।

सीरिया विवाद में चीन अपना रवैया नर्म करने में कामयाब रहा। इससे दुनिया में उसकी तारीफ हुई। हो सकता है कि अब चीन भारत के साथ सीमा विवाद कम कर दे और पाकिस्तान के आतंकी एजेंडे का यूएन में समर्थन करना रोक दे। यूरोप और भारत के बाजार में हुए नुकसान की भरपाई के लिए चीन अब अफ्रीकी देशों पर फोकस कर सकता है। जॉन हॉपकिंस स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के मुताबिक, पिछले 5 साल में चीन ने अफ्रीकी देशों के साथ बिजनेस 120 अरब डॉलर से बढ़ाकर 185 अरब डॉलर कर दिया है।

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