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अफ्रीकी देशों में गहराया अन्न संकट

रूस-यूक्रेन युद्ध से सप्लाई चेन पर गहरा असर पड़ा है। तेल की कीमतों में इजाफे के चलते हर चीज की कीमत बढ़ गई है। बढ़ती महंगाई को लेकर लगभग सभी देशों की सरकारों को जनता की नाराजगी झेलनी पड़ रही है, वहीं मौजूदा समय में दुनियाभर में लगभग 82.8 करोड़ लोगों के सामने, खासकर अफ्रीका महाद्वीप के देशों में भुखमरी जैसे हालात पैदा हो गए हैं

पिछले तीन वर्षों से कोरोना महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर ऐसा कहर ढाया कि अमीर देशों में गरीबी बढ़ गई और गरीब देशों के लिए जीना दुश्वार हो गया है। महामारी थमी और अर्थव्यवस्थाओं ने फिर से पटरी पर दौड़ना शुरू किया तो यूक्रेन -रूस के युद्ध ने ऐसे हालात पैदा कर दिए कि इसका असर दुनियाभर के मुल्कों में देखने को मिल रहा है। जो मौजूदा समय में विश्व की सबसे बड़ी समस्या हो गई है। दरअसल रूस- यूक्रेन युद्ध से सप्लाई चेन पर असर पड़ा है, तेल की कीमतों में इजाफे के चलते हर चीज की कीमत बढ़ गई है। बढ़ती महंगाई को लेकर लगभग सभी देशों की सरकारों को जनता की नाराजगी झेलनी पड़ रही है। ऐसी स्थिति में अफ्रीका महाद्वीप के देशों में भुखमरी जैसे हालात पैदा हो गए हैं।

हाल ही में जारी संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसी संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की एक रिपोर्ट के अनुसार हॉर्न ऑफ अफ्रीका का क्षेत्र 40 वर्षों में सबसे भयावह सूखे का सामना कर रहा है। अफ्रीकी देशों में इथियोपिया, सोमालिया और केन्या के 2.2 करोड़ लोग भुखमरी के शिकार हैं। गौरतलब है कि अफ्रीका के कई देशों में काफी समय से चल रहे सूखे, आंतरिक हिंसा और अन्य कारणों से पहले से खाद्य संकट मौजूद था। इनमें से कई देश यूक्रेन और रूस पर कुछ मुख्य खाद्यों जैसे गेहूं, मक्का, खाद्य तेल आदि के लिए काफी हद तक निर्भर थे। लेकिन रूस-यूक्रेन के टकराव के चलते अब वह भी उनके हिस्से से गायब हो गया है। इन देशों से उन्हें रासायनिक खाद भी अधिक मात्रा में मिलते थे जिस पर उनकी अपनी खाद्य उत्पादन क्षमता आश्रित है। ऐसे में इन देशों की हालत यह हो गई है कि इनके लोग सूखे और खाद्य संकट के चलते पालायन करने पर मजबूर हो गए हैं। कई लोगों ने तो पलायान भी कर लिया है। अफ्रीकी देशों में भूख और कुपोषण की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। जलवायु से लेकर युद्ध, महामारी और तमाम देशों की सरकारों की नाकामी ने दुनिया के लिए एक बड़ा मानवीय संकट का खतरा पैदा कर दिया है।

पूरब से लेकर पश्चिम तक पूरे अफ्रीका में लोग भोजन के संकट से जूझ रहे हैं। देश के राजनयिकों और मानवीय सहायता पहुंचाने में जुटे लोगों के मुताबिक इतना जटिल और बड़ा भोजन संकट इससे पहले इस देश ने कभी नहीं झेला है। विश्व खाद्य संगठन और विश्व खाद्य कार्यक्रम ने वर्ष 2021 के आरंभ में रिपोर्ट तैयार की थी ‘हंगर हॉटसपॉट’ जिसमें विश्व में उन 20 देशों की पहचान की गई थी जहां भूख की समस्या सबसे कम है और भविष्य में और उग्र हो सकती है। इन 20 देशों में से 12 देश अफ्रीका महाद्वीप के थे।

दुनिया में लगभग 82.8 करोड़ लोग भुखमरी का सामना कर रहे हैं। साल 2019 से गंभीर खाद्य असुरक्षा के शिकार लोगों की तादाद 13.5 करोड़ से बढ़कर 34.5 करोड़ हो गई है। विश्व के 49 अलग-अलग देशों के कुल 4.9 करोड़ लोगों के सामने भूखे पेट सोने के हालात पैदा हो गए हैं। दुनिया के एक बड़े इलाके में संघर्ष और जलवायु परिवर्तन से करोड़ों लोग भुखमरी की कगार पर पहुंच गए हैं।
दरअसल, भूख से जुड़ी इस समस्या की मुख्य वजह संघर्ष है। विश्व में भुखमरी की चपेट में आए 60 फीसद लोग हिंसा- प्रभावित और युद्धग्रस्त इलाकों में रह रहे हैं। हथियारबंद टकराव से लोग बेघरबार हो जाते हैं और उनकी आमदनी के रास्ते बंद हो जाते हैं। इससे भूख का संकट और संगीन हो जाता है। यूक्रेन संघर्ष इसकी जीती-जागती मिसाल है।

दूसरी ओर, जलवायु संकट से जिंदगी, फसल और रोजी-रोजगार बर्बाद हो जाते हैं, नतीजतन लोगों की माली हालत विकट हो जाती है। मध्य अमेरिकी ड्राई कॉरिडोर, हैती से साहेल, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, दक्षिणी सूडान, हार्न ऑफ अफ्रीका, सीरिया और यमन से लेकर अफगानिस्तान तक फैला यह इलाका रिंग ऑफ फायर के नाम से जाना जाता है। कोरोना महामारी के वित्तीय प्रभावों की वजह से भुखमरी की समस्या जबरदस्त ऊंचाई पर पहुंच गई है।

वर्ष 2021 में खाद्य पदार्थों की कीमतों में हुई बढ़ोतरी ने निम्न आय वाले देशों में तीन करोड़ की अतिरिक्त आबादी को खाद्य असुरक्षा के दलदल में धकेल दिया। दुनिया की आबादी का करीब 80 फीसद हिस्सा सब-सहारा अफ्रीका, दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया में निवास करता है। यहां खेती-बाड़ी के काम में लगे परिवार तंगहाल हैं और बेहद नाजुक हालात में जी रहे हैं। ये इलाके जलवायु परिवर्तन के चलते फसल खराब होने और अकाल से जुड़े खतरों की जद में हैं। मौसम के अल-नीनो रुझान से पैदा भयंकर सूखे की वजह से करोड़ों लोगों के गरीबी के मकड़जाल में फंसने की आशंका है। फिलीपींस और वियतनाम जैसे अपेक्षाकृत ऊंची आय वाले देशों में भी अल-नीनो के चलते जीडीपी, उपभोग और पारिवारिक आय में गिरावट का खतरा है। कई इलाकों में पानी की जबरदस्त किल्लत के चलते सीमित जल संसाधन से गुजारा हो रहा है। यहां जलवायु परिवर्तन का कृषि उत्पादन पर धीरे-धीरे ऐसे ही नकारात्मक प्रभाव पड़ता रहेगा।

जलवायु परिवर्तन
बरसात के चार मौसम में भी यहां बारिश नहीं हुई। डब्ल्यूएफपी के पूर्वी अफ्रीका निदेशक मिषाएल डनफोर्ड का कहना है कि यहां बीते 40 साल का सबसे भयानक सूखा पड़ा है। दुनिया भर में होने वाले जलवायु परिवर्तन का कारण बने कार्बन उत्सर्जन के महज 3 फीसदी के लिए अफ्रीकी देश जिम्मेदार हैं लेकिन किसी भी दूसरे इलाके की तुलना में सबसे अधिक नुकसान इसी हिस्से को हो रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे नुकसान को झेल रहे 20 देशों में से चार को छोड़कर बाकी सभी अफ्रीकी देश के हैं।

एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक दुनिया की 17.5 करोड़ आबादी को जिंक की कमी का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा 12.2 करोड़ लोगों में प्रोटीन की भी कमी हो सकती है। जलवायु परिवर्तन का पेड़-पौधों पर आधारित आहार व्यवस्था की गुणवत्ता के साथ-साथ पशुओं पर भी प्रभाव पड़ता है। खाने-पीने, तगड़े होने और मांस, अंडे और दूध के उत्पादन के लिए ये पशु उन्हीं संसाधनों का प्रयोग करते हैं, जिनपर खुद इंसान भी निर्भर हैं।

सूखे की वजह से पूर्वी अफ्रीका में मर सकते हैं लाखों लोग केवल सूखे के कारण अत्यधिक खाद्य असुरक्षा का सामना करने वाले देशों में इथियोपिया, केन्या, सोमालिया के करीब 2.2 करोड़ लोग हैं। अगर यहां फिर से बारिश नहीं हुई तो फरवरी में यह संख्या 2.6 करोड़ तक पहुंच जाएगी। बारिश न होने के कारण फसल उत्पादन नहीं हो पा रहा है। हालात इतने बुरे हैं कि लोग अपने मवेशियों को बचाने के लिए पानी की तलाश में गहरी से गहरी खुदाई कर पानी ढूंढ रहे हैं। केन्या और अन्य अफ्रीकी देशों के मसाई समुदाय के लोगों का जीवन उनके मवेशियों पर निर्भर है जिसके कारण उनके मरते देखने से अच्छा वे उन्हें बेच रहे हैं।

अफ्रीका में संघर्ष
अफ्रीकी देशों में लंबे समय से संघर्ष भुखमरी का एक मुख्य कारण रहा है। आम लोगों को जंग के चलते अपना घर, रोजगार, खेत और भोजन के स्रोत से दूर जाना पड़ता है। इस संघर्ष के बीच में सहायता पहुंचाना भी मुश्किल भरा काम होता है। पिछले एक दशक में अफ्रीका के बेघर लोगों की संख्या तीन गुनी बढ़ कर 2022 में रिकॉर्ड 3.6 करोड़ तक जा पहुंची है। अगर देखा जाए तो यह पूरी दुनिया में युद्ध के कारण बेघर हुए कुल
लोगों की संख्या का आधा है। अफ्रीका के हथियारबंद गुटों के वर्ष 2016 के बीच 3 हजार 682 लड़ाइयां हुईं। 2021 में इन संघर्षों की संख्या 7 हजार 418 हो गई। वहीं सोमालिया तो 1990 के दशक से अब तक गृहयुद्ध के साये में जी रहा है।

अफ्रीका की समस्याओं को फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण ने और बढ़ा दिया। इसने अमीर देशों की सरकारों की राहत एजेंसियों का सारा ध्यान यूक्रेन की ओर मोड़ने का काम किया। इस साल की शुरुआत में जब संकट ज्यादा बढ़ने लगा तो अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक द्वारा एक आपातकालीन भोजन उत्पादन कोष बनाया गया। 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर के इस कोष का उद्देश्य अफ्रीकी किसानों को गेहूं, मक्का, चावल और सोयाबीन की खेती में सहयोग करना था।

हालांकि पूरे अफ्रीका में संकट केवल पिछले एक साल में ही 14 फीसदी बढ़ गया और दानदाताओं की संख्या 12 फीसदी बढ़ने के बावजूद भी देश की आधी जरूरतें ही पूरी हो पाईं। चौतरफा समस्याओं के बाद यूरोपीय देशों ने मुख्य तौर पर अफ्रीका के लिए सहायता में कमी की है। वर्ष 2022 में यूरोपीय देशों द्वारा अफ्रीकी देशों को मदद में 21 फीसदी का योगदान दिया गया। लेकिन वर्ष 2018 से यह 16 फीसदी कम है। हालांकि अमेरिका जैसे अमीर देशों ने कुछ आर्थिक मदद बढ़ाई है लेकिन उससे भी कोई खास असर नहीं हुआ है।

सबसे ज्यादा मानवीय सहायता कोष से मदद पाने वाले पांच में से चार अफ्रीकी देश हॉर्न ऑफ अफ्रीका इलाके के हैं जो सूखे का सामना कर रहे हैं। इसकी वजह से वर्ल्ड फूड प्रोग्राम को कुछ सख्त निर्णय भी करने पड़े हैं। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम कभी- कभी कुछ मामलों में राशन की कटौती करता है। डब्ल्यूएफपी का कहना है कि अगर जल्द ही और धन नहीं मिला तो उसे 10 फीसदी शरणार्थियों को राशन देना बंद करना पड़ सकता है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अनाज के निर्यात पर भी काफी असर पड़ा है। तुर्की और संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में काला सागर के तीन यूक्रेनी बंदरगाहों से 1 अगस्त को अनाज का निर्यात शुरू हुआ। 13 दिसंबर तक 615 जहाज यहां से रवाना हुए लेकिन इनमें से महज 11 जहाज ही उप सहारा अफ्रीका तक पहुंच पाए हैं।

कर्ज के जाल में अफ्रीकी देश
अगले कई सालों के लिए कोरोना महामारी ने अफ्रीका को आर्थिक रूप से कमजोर करने का काम किया है। कई सालों तक कर्ज लेने के बाद अब इसे चुकाने के लिए वह मुश्किलों से घिर गया है। आईएमएफ के मुताबिक उप सहारा के 35 में से 19 देश कर्ज के कारण तनाव में हैं। इन देशों में सरकारें अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों को पूरा करने में समर्थ नहीं हैं।

अफ्रीकी देश चाड के 3.2 करोड़ लोगों पर सितंबर में 42 अरब डॉलर का कर्ज बकाया है। यानी हर नागरिक पर करीब 13,000 डॉलर का कर्ज है। इसी तरह दिसंबर में घाना का कर्ज उसकी जीडीपी के 100 फीसदी से ऊपर जा चुका है।

अफ्रीकी सरकारों ने बार-बार आ रहे खाद्य संकटों को रोकने के लिए बहुत कम काम किया है। 2003 में अफ्रीकी नेताओं ने उत्पादन बढ़ाने, आयात कम करने और खाद्य सुरक्षा में सुधार करने के लिए पांच वर्षों के भीतर कृषि और ग्रामीण विकास पर अपने राष्ट्रीय बजट का 10 प्रतिशत खर्च करने का वायदा किया था। लेकिन वर्ष 2021 में जब लगभग दो दशक बीत चुके हैं, केवल माली और जिम्बाब्वे ही ऐसा कर पाए हैं। ब्रिटेन की चैरिटी संस्था ऑक्सफैम के मुताबिक वर्ष 2019 से 2021 के बीच अफ्रीका के 39 देशों में हुए सर्वे से पता चला कि उनका कृषि खर्च और कम हो गया है।

अफ्रीका के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान लगभग 20 प्रतिशत है और आधे से अधिक अफ्रीकी इस क्षेत्र में काम करते हैं। हालांकि इनमें से अधिकांश खेती छोटे पैमाने पर निर्वाह खेती है, अफ्रीका को भी गेहूं, ताड़ के तेल और चावल जैसी बुनियादी वस्तुओं का आयात करना पड़ता है।

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