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दलितों की मौत पर कटघरे में दल

ऊंची जाति के लोगों ने दलित युवक जितेंद्र दास को इस कदर पीटा कि वह दस दिन तक अस्पताल में पड़ा रहा। लेकिन इस बीच उसकी सुध लेने की फुरसत न तो सत्ता पक्ष को रही और न विपक्ष को। ऐसा इसलिए कि राजनितक पार्टियों के लिए पर्वतीय क्षेत्र के दलित मैदानी क्षेत्रों के दलितों की तरह सशक्त वोट बैंक नहीं हैं। जितेन्द्र की मौत का मामला समाचार माध्यमों में उछला तो तब जाकर शासन-प्रशासन और राजनेताओं की नींद टूटी। इस पूरे प्रकरण में सरकार और राजनीतिक पार्टियां सवालों के घेरे में हैं
भारत के दलित वर्ग में महर्षि बाल्मीकि और संत रविदास को उच्च स्थान प्राप्त है। ये संत सामाजिक एवं सांस्कøतिक चेतना के पर्याय माने जाते हैं। ठीक इसी तरह उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र के दलित वर्ग में ‘निरंकार’ नाम के एक देवता को महत्व दिया गया है। हालांकि उत्तराखण्ड का दलित वर्ग हिन्दू धर्म के अन्य देवी-देवताओं के प्रति भी गहरी आस्था रखता है। दलितां के बगैर उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों में न तो देवताओं की पूजा-अर्चना होती है और न ही कोई मांगलिक कार्य संपन्न होते हैं। यह परम्परा सदियां से चली आ रही है। लेकिन इस सबके बावजूद राजनीति या आम भारतीय समाज में महर्षि बाल्मीकि और संत रविदास को जो स्थान प्राप्त है उतना निरंकार को नहीं है। इसका एक बड़ा असर राजनीतिक व्यवस्था पर भी पड़ा है। भारत के दलित वर्ग को हर दल ने एक बड़ी राजनीतिक ताकत के तौर पर स्वीकार करके दलित हितों के लिए जो मुखरता दिखाई है, वह पहाड़ी दलितों के लिए आज तक देखने को नहीं मिली है। जिसके चलते ‘निरंकार’ और उसके पूजक दलित आज भी हाशिये पर ही हैं।
मेदानी इलाकों के दलितों के खिलाफ अगर ऊंची जाति के लोगों द्वारा कोई अपराध हो जाये तो  प्रमुख राजनीतिक पार्टियां उठ खड़ी होती हैं। एक बड़े वोट बैंक के तोर पर दलित आज हर राजनीतिक दलों के लिए जरूरी बन चुके हैं। लेकिन उत्तराखण्ड के पहाड़ी दलित आज भी भाजपा ओैर कांग्रेस एवं अन्य पार्टियों के लिए खास जरूरत नहीं बन पाये हैं। हाल ही में नैनबाग क्षेत्र के बसाण गांव निवासी जितेन्द्र दास की हत्या के मामले में टिहरी गढ़वाल के अंतर्गत राजनीतिक दलों की जो उदासीनता देखने को मिली उससे यह स्पष्ट हो गया है कि पहाड़ी दलित वर्ग राजनीतिक दलों के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना मेदानी क्षेत्र का दलित वर्ग है। 26 अप्रैल को श्रीकोट के बसाण तोक में विवाह समारोह में जितेन्द्र दास को गांव के ही कुछ ऊंची जाति के सवर्णों द्वारा महज इसलिए मारा-पीटा गया कि वह उनके सामने कुर्सी पर बैठकर भोजन कर रहा था। ऊंची जाति के लोगों को यह बात पंसद नहीं आई और उन्होंने जितेन्द्र दास के साथ बुरी तरह से मारपीट की जिससे वह बेहोश हो गया। परिजन उसे देहरादून स्थित इंद्रेश अस्पताल में लाए जहां 5 मई की सुबह उसकी मौत हो गई।
 जितेन्द्र दास बढ़ई का काम करना था। वह अपने परिवार का एक मात्र कमाने वाला सदस्य था। पिता की मौत के बाद जवान बहन, छोटे भाई और वृद्ध मां का जितेन्द्र ही एक मात्र सहारा था। अब परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट गया है। खास बात यह है कि जिस विवाह समारोह में जितेन्द्र दास के साथ मारपीट हुई,  वह उसके ही परिवार का था। नैनबाग क्षेत्र की सामाजिक परम्परा के अनुसार दलित परिवार में विवाह आदि समारोह में सवर्णों को बुलाया जाता है तो उनके भोजन आदि की व्यवस्था सवर्णों द्वारा ही की जाती है। हालांकि खर्च दलित परिवार द्वारा ही उठाया जाता है। सामाजिक मान्यताआें के चलते दलित इस व्यवस्था का उल्लंघन नहीं करते। लेकिन जितेन्द्र दास ने चाहे भूलवश की हो या जानबूझ कर, इस व्यवस्था ओैर परम्परा को तोड़ने का प्रयास किया जिसके चलते आखिरकार उसे अपने प्राण गंवाने पड़े।
26 अप्रैल की रात को यह प्रकरण हुआ, लेकिन मीडिया और राजनीतिक दलों ने इसे संज्ञान में नहीं लिया। यहां तक कि जितेन्द्र दास को पहले नैनबाग राजकीय चिकित्सालय और फिर दून अस्पताल में लाया गया। उसके बाद उसे महंत इंद्रेश अस्पताल में भर्ती किया गया जहां वह बेहोशी की हालत में दम तोड़ गया। दस दिनों के बाद जब जितेन्द्र दास की मौत की खबर समाचार माध्यमों में आई तब जाकर प्रशासन सक्रिय हुआ और मारपीट करने वालों की धरपकड़ आरम्भ की गई।
एक दलित युवक को इस तरह से मार डाला गया, लेकिन हैरत की बात यह है कि छोटी-मोटी बातों पर सरकार के खिलाफ आंदोलन करने वाला विपक्ष इस मामले में पूरी तरह से अनजान बना रहा। दलित युवक के परिवार को सांत्वना देने के लिए न तो सरकार और न ही विपक्षी नेताओं ने कोई पहल की। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष किशोर उपाध्याय के इस प्रकरण में बयान देने और दलित युवक के घर जाने की बात सोशल मीडिया में आने के बाद अचानक पूरी कांग्रेस सक्रिय हुई। जब किशोर उपाध्याय बसाण गांव का दौरा करके वापस आये और समाचार चैनलों में इसका प्रसारण हुआ तो तब कांग्रस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह पीड़ित परिवार को सांत्वना देने बसाण गांव पहुंचे। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी पूरे 14 दिन तक इस मामले में एक भी शब्द नहीं कह पाये। सोशल मीडिया में भी इसके लिए कोई पोस्ट नहीं डाल पाए। किशोर उपाध्याय और प्रीतम सिंह के बसाण दौरे के बाद हरीश रावत ने भी 12 मई को बसाण का दौरा किया और अगले दिन 13 मई को गांधी पार्क में दलित युवक की हत्या के विरोध में उपवास का कार्यक्रम किया। जबकि देहरादून के ही अस्पताल में दस दिनों तक जितेन्द्र दास जिंदगी और मौत से झूझते हुए मरा, लेकिन कांग्रेस के किसी नेता ने इस मामले में अपना बयान तक देना उचित नहीं समझा। कोई भी जितेन्द्र दास के हाल-चाल जानने और उसके परिवार को सांत्वना देने नहीं पहुंचे।
सत्ताधारी पार्टी भाजपा के किसी नेता ने इस मामले पर बोलना उचित नहीं समझा। चुनाव में पहाड़ों का जर्रा-जर्रा नापने वाली निवर्तमान भाजपा सांसद माला राज लक्ष्मी शाह या फिर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत हों या प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट, किसी ने भी इस मामले में अपनी जुबान नहीं खोली। यहां तक कि इस प्रकरण की निंदा तक नहीं की। भाजपा के विधायक खजानदास जरूर इस मामले में बोले क्योंकि मामला उन्हीं के मूल क्षेत्र का था। लेकिन खजानदास भी कहीं न कहीं इस प्रकरण में छुआछूत और दलित विरोधी आरोपों को नकारते रहे। वह आपसी झगड़े की बात कह कर सरकार का बचाव करते रहे। हालांकि खजानदास ने अपने बयानों में मामले के आरोपियों को कड़ी सजा दिलाए जाने और दलित युवक के परिजनों को हर संभव सहायता दिए जाने की मांग सरकार से जरूर की।
 इस पूरे प्रकरण में सरकार और प्रशासन के अलावा पुलिस पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं, लेकिन सबसे बड़े सवाल राजनीतिक दलों पर उठ रहे हैं। जो राजनीतिक दल मैदानी क्षेत्रों में दलितों पर होने वाले जुल्म के खिलाफ सड़कां पर उतर जाते हैं। आंदोलनां से प्रदेश को पाट देते हैं, वे जितेन्द्र के मामले में क्यों चुप्पी साधे रहे, यह बड़ा सवाल है। पूर्व में जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा दलित एक्ट में गिरफ्तारी को लेकर कुछ संशोधन किया गया था तो कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से दलितां के साथ थी और आंदोलन में जुट गई थी। केन्द्र सरकार के खिलाफ कांग्रेस ने दलित आंदेलन को पूरा समर्थन दिया था। लेकिन पहाड़ में दलितों के खिलाफ हो रहे अत्याचार के खिलाफ कांग्रेस की हैरतनाक चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। जितेन्द्र दास के परिवारजनों को मिलने के लिए कांग्रेस नेताओं के पास समय नहीं रहा और न ही उन्होंने सरकार के खिलाफ कोई बयान जारी किया। अब जो थोड़ी बहुत सक्रियता दिखाई दी वह कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के फायदे-नुकसान के समीकरणां के चलते दिखाई दे रही है।
ऐसा नहीं है कि उत्तराखण्ड में दलितों के खिलाफ ऐसा मामला पहली बार हुआ हो। अगर अनुसूचित जाति आयोग के आंकड़ों को देखें तो दो वर्षों में ही दलितों के उत्पीड़न के सेकड़ां मामले सामने आ चुके हैं। इनमें महिला अत्याचार और नागरिक हनन के मामले भी दर्ज हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के अलावा शहरी क्षेत्रों में भी दलित उत्पीड़न के मामलों में तेजी आई है। इनमें नौकरी में स्थानातरण, पदोन्नति, मारपीट, सामाजिक अपमान और तिरस्कार के अलावा भूमि के मामले तक दर्ज हैं। साफ है कि सरकार इन मामलां में ढीला रवेया अपनाये हुए है।
मौजूदा त्रिवेंद्र रावत सरकार पर्वतीय क्षेत्र में दलितों के प्रति कुछ ज्यादा ही उदासीन रही है, जबकि शहरी क्षेत्रों में दलितों के प्रति उसकी सक्रियता जग जाहिर है। हाईकोर्ट ने अवैध मलिन बस्तियों को खाली करने का आदेश दिया तो सरकार कानून बनाने के लिए त्वरित सक्रिय हुई क्यांकि इन मलिन बस्तियों में एक बड़ी तादात दलित वर्ग की है। शहरी क्षेत्रों का दलित वर्ग एक बड़ा वोट बैंक माना जाता है। दूसरी ओर पहाड़ी क्षेत्रों में कई गांव आपदा के कगार पर हैं, लेकिन उनके लिए सरकार ने कोई कानून बनाने की पहल नहीं की, क्योंकि वे वोट बैंक नहीं हैं। अब विपक्ष इस मामले में मुखर तो हुआ है, लेकिन जिस तरह से बसाण गांव और पूरे क्षेत्र में सामाजिक वैमनस्यता का बातावरण बन चुका है उसे राजनीतिक दल किस तरह से समाप्त कर पाएंगे, यह बड़ा सवाल है। कांग्रेस की टिहरी जिला कमेटी इस मामले में दलित युवक के घर महज इसलिए जाने से कतराती रही कि इससे सवर्ण वोट बैंक खतरे में पड़ सकता है। ऐसे में कांग्रेस की पूरी कवायद पर संदेह होना स्वाभाविक है। भाजपा का जबाब तो बेहद ही निराशाजनक रहा है। कांग्रेस को अलवर की घटना पर जबाब देने की बात कहकर अपनी जिम्मेदारी से किनारा कर रही है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के उपवास को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर वे इतनी देर तक चुप क्यों रहे? इन सबसे यह तो साफ हो ही गया है कि आज भले ही राजनीतिक दल दलित हितों के लिए सड़कां पर उतरने का नाटक करते रहे हों, लेकिन हकीकत में महज अपने-अपने राजनीतिक समीकरणों को साधने के लिए ही दलित प्रेम दिखाया जाता है।

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