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श्रीलंका में ‘चीनी’ चाल

यह एक रेखांकित करने वाली बात है कि भारत के पड़ोसी देश नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका राजनीतिक अस्थिरता या उथल-पुथल से लगातार जूझ रहे हैं। कोई भी सरकार वहां अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पा रही है। अब नया सियासी संकट श्रीलंका में आ गया है जिसके संबंध चीन से भी जोड़ने की कोशिशें हो रही हैं। श्रीलंका में तब राजनीतिक तूफान खड़ा हुआ जब पूर्व राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे को प्रधानमंत्री बनाकर उनकी सत्ता में वापसी कराई गई। राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना ने प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंधे को बर्खास्त कर राजपक्षे को शपथ दिलाई है।

इस घटनाक्रम के बाद वहां तनाव की स्थिति है। इसमें कुछ लोगों की मौत भी हो चुकी है। रानिल विक्रमसिंधे की पार्टी ने राष्ट्रपति के फैसले के विरोध में पूरे देश में विरोध प्रदर्शन कर दिया है। वहां के संसद के स्पीकर ने राष्ट्रपति को चेतावनी के अंदाज में कहा है कि अगर इस राजनीतिक संकट का जल्दी हल नहीं निकला तो सड़कों पर खून खराबा होगा।

इस सत्ता परिवर्तन के पीछे चीन की भूमिका है जैसा कि बताया जा रहा है। मगर इसकी पृष्ठभूमि में ही तनाव के कण पहले से ही मौजूद थे। वर्ष 2015 में राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसैना की यूनाईटेड पीपल्स फ्रीडम अलायंस (यूपीएफए) ने रानिल विक्रमासिंधे की यूनाईटेड पार्टी (यूएनपी) के साथ मिलकर संसदीय चुनाव लड़ा था। चुनाव में गठबंधन की जीत हुई और सरकार भी बनी। लेकिन रातोंरात भारत के बिहार की तर्ज पर राष्ट्रपति सिरिसेना की पार्टी ने प्रधानमंत्री विक्रमसिंधे की पार्टी से गठबंधन तोड़ दिया। उसी दिन राष्ट्रपति ने वहां के पूर्व राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे को बुलाकर प्रधानमंत्री पद की शपथ दिला दी।

विक्रमसिंधे इसे संवैधानिक चुनौती देते, विशेष सत्र बुलाते, उसके पहले ही राष्ट्रपति सिरिसेना ने संसद को 16 नवंबर तक के लिए निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया। श्रीलंका की संसद में कुल 228 सीटे हैं। बहुमत के लिए 113 सीटों की दरकार होती है। विक्रमसिंधे के नेतृत्व वाली यूएनसी और उसकी सहयोगी पार्टियों के पास सबसे ज्यादा 186 सीटें है। कहा जा रहा है कि यदि विक्रमसिंधे को सदन में बहुमत साबित करने का मौका मिला तो इसमें सफल हो जायेंगे। कारण कि श्रीलंका की मुख्य तमिल पार्टी ‘तमिल नेशनल अलायंस’ के 16 संसद भी विक्रमसिंधे के साथ हैं। यह पार्टी महिंद्रा राजपक्षे की प्रखर विरोधी मानी जाती है। दूसरी तरफ राष्ट्रपति सिरिसैना की पार्टी के समर्थन के बाद भी उनके पास महज 95 ही संसद हैं। बहुमत के लिए जरूरी 18 सांसदों का समर्थन मिलना उनके लिए किसी चमत्कार सरीखा ही होगा।

स्मरण रहे, श्रीलंका में शासन की अर्द्ध-राष्ट्रपति प्रणाली है जिसमें प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के अलावा राष्ट्रपति की भी बड़ी भूमिका होती है। यहां का प्रधानमंत्री देश की विधायिका के प्रति जवाबदेह देता है। राष्ट्रपति कार्यपालिका प्रमुख सरकार का प्रमुख और सशस्त्र बलों का मुखिया होता है। शायद यह कि वहां भारत जैसी स्थिति नहीं है, यहां के उलट राष्ट्रपति के पास प्रधानमंत्री की तुलना में ज्यादा शक्ति निहित है।

श्रीलंका का सत्ता-परिवर्तन भारत और चीन के साथ एक सियासी त्रिकोण बनाता है। राजनीति के जानकार बताते हैं कि राजपक्षे का वहां प्रधानमंत्री बनना भारत के लिए ठीक नहीं है। बल्कि यह हिंद महासगार में दो आर्थिक शक्तियों के वर्चस्व की लड़ाई में चीन की जीत के तौर पर देखा जा रहा है। राजपक्षे के शासन में श्रीलंका चीन के कर्ज की जाल में पूरी तरह फंस गया। विक्रमसिंधे की यूनाईटेड नेशनल पार्टी के सांसद रंजन रामनाथ ने श्रीलंका में उत्पन्न हुए संवैधानिक संकट के पीछे चीन का हाथ बताया है। उन्होंने चीन पर आरोप लगाया कि चीन हर संसद को 80 करोड़ रुपए दे रहा है ताकि वे राजपक्षे की पार्टी को समर्थन दें। राजपक्षे और राष्ट्रपति सिरिसैना को चीन अपना हितैषी मानना है। यह दोनों हिंद सागर में भारत के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं। बतौर प्रधानमंत्री राजपक्षे के शपथ लेने के साथ ही चीनी राजदूत का उनसे मिलना इस आशंका की पुष्टि करता है।

चीन इन दिनों अमेरिका की साम्राज्यवादी राह पर चल रहा है जबकि उसकी छवि एक कम्युनिस्ट देश की रही है। पिछले दिनों चीनी निवेश को लेकर श्रीलंका, म्यांमार जैसे की देशों में चीन के प्रति नाराजगी बढ़ी है। कर्ज के बोझ में दबे श्रीलंका को हंबनटोटा बंदरगाह की बड़ी हिस्सेदारी चीन को देनी पड़ी थी। जिससे उसकी प्रमुखता को खतरा पैदा हो गया था।

दक्षिण एशिया में समारिक दृष्टि से श्रीलंका भारत के लिए अहम है। लिहाजा भारत को चीन की इस चतुराई के प्रति संजीदा रहने की जरूरत है। उस श्रीलंका की राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर रखने के साथ-साथ चीन की चालों की काट भी खोजना होगा। इस काम में किसी किस्म की कोताही खतरे को जन्म दे सकती है।

3 Comments
  1. Kent Petrocco 4 weeks ago
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