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हांगकांग में चीन की मुखालफत

सन् 1842 में ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश बने हांगकांग को 1997 में चीन के हवाले कर दिया गया था। ब्रिटेन ने चीन संग हांगकांग पर आधिपत्य को लेकर 99 बरस का करार किया था जो 1997 में समाप्त हो गया था। हांगकांग वर्तमान में चीन द्वारा नियंत्रित एक स्पेशल जोन है जहां नागरिकों को चीनी नागरिकों से इत्तर विशेष अधिकार प्राप्त हैं। ब्रिटेन ने हांगकांग को चीन के हवाले करने से पूर्व एक सिनो-ब्रिटिश ज्वाइंट समझौता तैयार किया था जिसमें स्पष्ट है कि विदेश और रक्षा मामलों को छोड़कर हांगकांग अपना पृथक अस्तित्व बनाए रखने को स्वतंत्र है। हांगकांग के पास इसी प्रावधान के चलते अपना अलग संविधान है। चीन के कानून यहां लागू नहीं होते हैं। चीन लेकिन येन-केन-प्रकारेण हांगकांग पर अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ाते जा रहा है। यही कारण है कि इस समय पूरा हांगकांग चीन के खिलाफ असंतोष की आग में झुलसने लगा है। 2 जून को शहर की सड़कों पर पांच लाख नागरिक चीन के खिलाफ हुए प्रदर्शन में शामिल हुए। यह प्रदर्शन प्रत्यार्पण कानून में चीन द्वारा एकतरफा संशोधन के खिलाफ आयोजित किया गया था। इस कानून के अनुसार यदि कोई शख्स अपराध कर हांगकांग भाग आता है तो उसे चीन वापस भेज वहां के कानून अनुसार दंडित किया जाएगा। इस संशोधन के मूल में ताइवान के एक व्यक्ति द्वारा अपनी प्रेमिका की हत्या कर हांगकांग भाग आना रहा है। चूंकि हांगकांग और ताइवान के मध्य प्रत्यार्पण संधि नहीं है इसलिए इस व्यक्ति को ताइवान नहीं भेजा जा सकता है। ऐसे में मौके का फायदा उठा चीन ने प्रत्यार्पण कानून ही बदल डाला। अब नए कानून के लागू होने के बाद चीन ऐसे किसी भी कथित अपराधी को अपने कानून के हिसाब से दंडित कर सकेगा। पूरा हांगकांग इसका विरोध इसलिए कर रहा है, क्योंकि 1997 में जब हांगकांग चीन शासित स्पेशल जोन बनाया गया तब बीजिंग ने ब्रिटेन संग हुए करार में गारंटी दी थी कि कम से कम 2047 यानी पचास बरस तक वह ‘एक देश-दो व्यवस्था’ की अवधारणा का पालन करेगा। चीन लेकिन अपने वचन का अब पालन करने को तैयार नहीं दिख रहा है। वर्ष 2014 में चीन से आजादी की मांग के लिए शुरू हुआ ‘अम्ब्रेला मूवमेंट’ चीनी सरकार को खासा नागवार गुजरा था। तब चीन ने इस आंदोलन को दबाने की नीयत से ‘एक देश-दो व्यवस्था’ संधि का उल्लंघन किया था। विरोध-प्रदर्शन करने वालों को जेल में डालने, विदेशी पत्रकारों को हांगकांग से निष्कासित करने जैसे कई कदम चीन ने तब उठाए थे। हांगकांग के लोग आशंकित हैं कि चीन धीरे- धीरे उनके देश में अपनी दखलअंदाजी बढ़ा रहा है। उन्हें डर है कि इस कानून की आड़ में चीन अंधाधुंध गिरफ्तारियां कर उन्हें अपने देश ले जाकर जेलों में डाल देगा। हांगकांग की सरकार का हालांकि कहना है कि केवल गंभीर अपराध करने वालों को ही चीन भेजा जाएगा। सरकार यह भी दावा कर रही है कि बोलने की आजादी और सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करने वालों को इस कानून की जद से बाहर रखा जाएगा लेकिन हांगकांग की जनता का भरोसा अपनी सरकार से उठ गया है। अधिकांश हांगकांगवासियों का मानना है कि उनकी सरकार पूरी तरह चीन के हाथों गिरवी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चीन के इस कदम पर चिंता व्यक्त की जा रही है।


हांगकांग स्थित अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स का मानना है कि इस कानून का सीधा नेगेटिव असर हांगकांग के संग व्यापार पर पड़ेगा। मानवाधिकार वॉच संस्था, कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट समेत सत्तर संगठन इस कानून का विरोध करने वालों में शामिल हो चुके हैं। हांगकांग सरकार ने लेकिन पीछे हटने से साफ इंकार कर दिया है।

गत् 12 जून को एक बार फिर भारी तादात में हांगकांग वासी इस प्रत्यार्पण कानून के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। पुलिस बलों ने प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस और रबर की गोलियां दाग माहौल को खासा गर्मा दिया है। पुलिस ने यह कदम तब उठाया जब प्रदर्शनकारियों ने सरकारी इमारतों की घेराबंदी शुरू कर दी। माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया कि हांगकांग की संसद में प्रत्यार्पण कानून को लेकर होने वाली बहस को स्थगित करना पड़ा है। अब 20 जून को यह बैठक होनी तय की गई है।

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