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नया खेला करने की फिराक में चीन

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते दो खेमों में बंट चुकी दुनिया के सामने जहां आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। चीन भारत के साथ खड़ा हो, दोनों देशों की बढ़ती करीबी का ढिंढोरा पीटना चाहता है तो दूसरी तरफ सीमा विवाद को भी ताजा रखना चाहता है

करीब पिछले तीन महीनों से भी ज्यादा समय से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध से दुनिया में खतरे का अलार्म बज रहा है। रूस ने जिस तरह से यूक्रेन से लगी सीमाओं पर सैन्य तैनाती की है उससे स्थिति की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। दुनिया दो खेमों में बंट चुकी है। एक तरफ रूस और चीन है तो दूसरी तरफ यूक्रेन के साथ अमेरिका, ब्रिटेन सहित नाटो देश हैं। इस सबके बीच चीन इन दिनों भारत के साथ नया खेल करता नजर आ रहा है। जिसमें वह एक तरफ तो भारत के साथ खड़ा होता दिखना चाहता है वहीं दूसरी तरफ सीमा विवाद को भी ताजा रखना चाहता है। यानी चीन एक तरफ तो भारत का समर्थन कर, दुनिया के सामने चीन और भारत की बढ़ती करीबी का ढिंढ़ोरा पीटना चाहता है, दूसरी तरफ सीमा विवाद में कोई नरमी न दिखाकर, अपनी जनता को भी खुश रखना चाहता है। दरअसल, चीन ने कुछ समय पहले रूस और यूक्रेन युद्ध में भारत के रुख का समर्थन किया था। अब भारत के गेहूं पर निर्यात प्रतिबंध लगाने के फैसले का भी समर्थन किया है। लेकिन अभी जब चीन के बदले रवैये की बातें हो रही थी, तभी पैंगोंग झील की नई तस्वीरों ने चीन की साजिश का भी खुलासा कर दिया है।

ताजा सेटेलाइट तस्वीरों से खुलासा हुआ है कि चीन यु्द्ध के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण पूर्वी लद्दाख के पैंगोग झील के आस-पास अपने कब्जे वाले क्षेत्र में दूसरा पुल बना रहा है। तस्वीरों से साफ है कि नया पुल चीनी सेना के लिए इस क्षेत्र में अपने सैनिकों को जल्द पहुंचाने में मददगार साबित होगा। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि एक तरफ चीन वैश्विक मंच पर भारत के फैसलों का समर्थन कर रहा है तो दूसरी तरफ वह सीमा पर अपनी हरकतों से बाज क्यों नहीं आ रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चीन ने अपने बुनियादी रूख में कोई बदलाव नहीं किया है। वह केवल बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए कुछ मसलों पर भारत के साथ खड़ा दिखना चाहता है। जहां तक सीमा विवाद की बात है तो वह पिछले दो साल से अधिक समय से पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के बीच कई स्थानों को लेकर बना हुआ है। और दोनों देशों की सेनाएं अपने क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने में लगी हुई हैं। इसके अलावा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए घरेलू स्तर पर मौजूदा स्थितियां बेहद सामान्य नहीं हैं। शी जिनपिंग की जीरो कोविड नीति से जहां लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा है, वहीं आर्थिक विकास पर भी असर हुआ है। लॉकडाउन से फैक्ट्रियां बंद रही हैं। लोगों की खरीद क्षमता घटी है। इसी का असर है कि एस एंड पी ने चीन की जीडीपी ग्रोथ रेट का अनुमान 2022-23 के 0.70 फीसदी घटाकर 4.2 फीसदी कर दिया है। जाहिर है ऐसे में शी जिनपिंग घरेलू स्तर पर सीमा विवाद पर अपने को कमजोर नहीं दिखा सकते हैं।

दूसरे मामले में समर्थन क्यों
हाल ही में रूस-यूक्रेन युद्ध और गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के भारत के फैसले पर चीन का रूख सकारात्मक रहा है। चीन जहां रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत के तटस्थ रूख, पर चीन भारत के पक्ष में ही खड़ा दिखाई दिया। इसके जरिए चीन की दुनिया के सामने यह दिखाने की कोशिश रही कि भारत-रूस- चीन एक साथ है क्योंकि भारत और पश्चिमी देशों के साथ मिलकर बने क्वाड ने नई चुनौती खड़ी कर दी है। ऐसे में जब जी-7 देशों ने भारत के गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के फैसले की आलोचना की तो चीन का सरकारी मीडिया भारत के फैसले के साथ खड़ा दिखाई दिया।

कहा जा रहा है कि चीन ने भारत का समर्थन कर भविष्य के लिए रास्ता खोलने की कोशिश की है, जिससे कि आने वाले समय में जब उसे कूटनीतिक मदद की जरूरत पड़े तो भारत भी उनका समर्थन करें। इसके अलावा चीन पर सोयाबीन, खाद की जमाखोरी के आरोप लगे हैं। ऐसे में आने वाले समय में अगर चीन के खिलाफ पश्चिमी देश कोई बयान दें, तो भारत का उसे समर्थन हासिल हो सके।  इसके अलावा चीन जून में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में यह चाहता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उसमें शिरकत करें। क्योंकि अगर ऐसा होता है तो पूर्वी लद्दाख के विवाद के बाद पहली बार मोदी और जिनपिंग आमने-सामने होंगे। हालांकि ऐसा होने की संभावना बेहद कम है। इसी बीच प्रधानमंत्री मोदी क्वाड सम्मेलन में भाग लेने के लिए जापान गए। जाहिर है चीन ऐसे में कूटनीति के जरिए भारत को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इस मामले में सबसे बड़ी बाधा दोनों देशों के बीच पिछले दो साल से पूर्वी लद्दाख में चल रहा सीमा विवाद है।
गौरतलब है कि भारतीय गेहूं को लेकर पश्चिमी देश और चीन आमने-सामने हो गए हैं। अहम बात यह है कि हर बार भारत का विरोध करने वाला चीन इस बार भारत के साथ खड़ा हुआ है। जबकि विकसित देशों के समूह जी-7 भारत के गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के फैसले पर नाराजगी जता रहे हैं। बीते 13 मई को भारत ने गिरते उत्पादन और बढ़ती कीमतों को देखते हुए गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। जिसके बाद दुनिया में गेहूं का संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है। असल में रूस और यूक्रेन युद्ध के बाद से दुनिया भर में गेहूं की आपूर्ति का संकट बढ़ गया है। क्योंकि रूस और यूक्रेन मिलकर करीब दुनिया का 28 फीसदी गेहूं निर्यात करते हैं। और युद्ध की वजह से आपूर्ति नहीं हो पाने के कारण फरवरी के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमतें 60 फीसदी तक बढ़ चुकी है।

क्यों नाराज हैं पश्चिमी देश
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गेहूं का उत्पादन करने वाला देश है। लेकिन वह अपनी घरेलू जरूरतों और फूड सब्सिडी जरूरतों को देखते हुए बेहद कम निर्यात करता है। भारत में साल 2020-21 में 10.96 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन किया था। इसमें से केवल 70 लाख टन गेहूं का निर्यात किया गया था। पिछले साल के उत्पादन को देखते हुए, सरकार ने इस साल 11.13 करोड़ टन गेहूं उत्पादन का अनुमान लगाया गया था। लेकिन गेहूं उत्पादक राज्यों में 45 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा तापमान की वजह से इस बार उत्पादन में 15-20 फीसदी तक कमी का अनुमान है। इसे देखते हुए अब सरकार ने गेहूं उत्पादन का अनुमान 10.5 करोड़ टन कर दिया है। और अभी मई तक के लिए करीब 43 लाख टन निर्यात के सौदे किए जा चुके हैं। इन परिस्थितियों में भारत सरकार के लिए घरेलू मांग को पूरा करने के लिए प्रतिबंध का ही विकल्प बचा नजर आ रहा था।

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