[gtranslate]
world

तालिबान का क्रूर चेहरा

अफगानिस्तान में सत्ता हथियाने के साथ ही तालिबान ने महिलाओं पर अत्याचार शुरू कर डाले हैं। हालांकि इस बार उसे पूरे देश भर में विरोट्टा-प्रदर्शनों का सामना करना पड़ रहा है लेकिन महिलाओं द्वारा किए जा रहे प्रतिरोट्टा से तालिबान पीछे हटते नजर नहीं आ रहा। उसने लड़कियों और महिलाओं के अधिकारों में भारी कटौती करते हुए एक बार फिर से अपनी क्रूरता शुरू कर डाली है

अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा हुए एक महीने से भी ज्यादा समय हो गया है। अमेरिकी फौज की वापसी बाद सत्ता पर काबिज तालिबान ने एक बार फिर से कठोर इस्लामी कानूनों को लागू कर दिया है। अफगानिस्तान में की जा रही बर्बरता खासकर महिलाओं के अधिकारों को लेकर तालिबानी फरमानों से पूरी दुनिया चिंतित हैै। संयुक्त राष्ट्र से लेकर दुनियाभर की सरकारें अफगानिस्तान में शांति कायम किए जाने की बात कर रही हैं। इस बीच तालिबान ने एक कदम आगे बढ़कर महिला मंत्रालय को ही खत्म कर दिया है। इस मंत्रालय की जगह
‘मिनिस्ट्री ऑफ प्रमोशन एंड प्रिवेंशन ऑफ वाइस’ को सक्रिय कर दिया है। दरअसल, अफगानिस्तान में जब से तालिबान की सरकार बनी है, तब से महिलाओं को लेकर जो फैसले हुए हैं उसने महिला वर्ग को दहशत में डाल दिया है।

कामकाजी महिलाओं को लेकर तालिबान ने इसी हफ्ते एक नया आदेश भी जारी किया है। तालिबान का कहना है कि महिलाओं को सिर्फ वही काम करने की इजाजत होगी जो पुरुष नहीं कर सकते हैं। यह फैसला अधिकतर महिला कर्मचारियों को काम पर लौटने से रोकेगा। देश की अधिकांश महिला श्रमिकों को वापस काम पर जाने से रोकने का फैसला एक और संकेत है कि तालिबान कठोर इस्लामिक कानूनों को लागू कर रहा है, जबकि उसने सहिष्णु और समावेशी सरकार का वादा किया था। तालिबान नेताओं ने महिला अधिकारों को लेकर अब तक यही कहा है कि महिलाओं को शरिया कानून के दायरे में आजादी दी जाएगी।

हाल ही में काबुल के अंतरिम मेयर हमदुल्लाह नामोनी ने अपनी नियुक्ति के बाद पहली बार प्रेस कांफ्रेंस करते हुए कहा कि पिछले महीने तालिबान के सत्ता पर काबिज होने से पहले शहर में करीब तीन हजार महिला कर्मचारी थीं और वे सभी विभागों में काम करती थी। लेकिन अब महिला कर्मियों पर अगला फैसला होने तक उन्हें घर पर ही रहना होगा। पिछली बार जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर वर्ष 1996-2001 के बीच राज किया था तब लड़कियों को स्कूल जाने की इजाजत नहीं थी और महिलाओं के काम करने पर कड़ी पाबंदियां लगी हुई थी। धार्मिक पुलिस को बहुत ज्यादा ताकत हासिल थी और वे किसी को भी नियम तोड़ने के आरोप में कोड़े लगा सकते थे।

हाल के दिनों में नई तालिबान सरकार ने लड़कियों और महिलाओं के अधिकारों को वापस लेते हुए कई फरमान जारी किए हैं। इसमें मिडिल और हाई स्कूल की छात्राओं से कहा कि वे फिलहाल स्कूल नहीं लौट सकतीं, जबकि उसी ग्रेड के लड़कों के लिए पिछले सप्ताह के अंत में स्कूल खोल दिए गए। विश्वविद्यालय की छात्राओं से कहा गया कि वे लड़कों से अलग हटकर बैठेंगी। साथ ही उन्हें सख्त इस्लामी ड्रेस कोड का पालन करने को कहा गया है। अमेरिका के समर्थन वाली पिछली सरकार में अधिकतर स्थानों पर विश्वविद्यालयों में सह शिक्षा थी। तालिबान ने बीते 17 सितंबर को ही महिला मामलों के मंत्रालय को बंद कर दिया और इसके बदले ‘सदाचार प्रचार एवं अवगुण रोकथाम’ मंत्रालय बनाया, जिसका काम इस्लामी कानून लागू करना है। इसके विरोध-प्रदर्शन में 19 सितंबर को एक दर्जन से अधिक महिलाओं ने मंत्रालय के बाहर प्रदर्शन किया और महिलाओं की भागीदारी की मांग की। एक तख्ती पर लिखा था ‘जिस समाज में महिलाएं सक्रिय नहीं होती हैं, वह समाज बेजान होता है।’

तालिबान सरकार के खिलाफ मुखर हुई महिलाएं

तालिबान को अफगानिस्तान पर काबिज हुए महीना भर से ज्यादा हो गया है। इस दौरान हर छोटे-बड़े शहरों में लगभग रोज विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। आमतौर पर महिलाएं इन प्रदर्शनों की अगुवाई करती हैं। ये प्रदर्शन तालिबान के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। ऐसी स्थिति में पूरी दुनिया में एक सवाल उठना लाजमी है कि आखिर तालिबान के शासन में महिलाओं की स्थिति कैसी होने वाली है? इन सवालों के जवाब में तालिबान ने कहा कि शरिया कानून के तहत ही अफगानिस्तान में महिलाओं को रहना होगा और उन्हें मुस्लिम कानून के तहत ही आजादी हासिल होगी। सवाल ये है कि आखिर तालिबान ने शरिया कानून की कैसी व्याख्या की है या तालिबान की नजर में शरिया कानून क्या है, जिसके तहत उसने महिलाओं और लड़कियों से अधिकार छीनने की बात की है।

शरिया कानून के तहत सजा ‘ताज़ीर’, यानी अगर अपराध की गंभीरता कम हो तो मुस्लिम कोर्ट के जज पर निर्भर करता है कि वो किस तरह की सजा सुनाता है। दूसरा है ‘कसीस’, इसमें अपराधी को पीड़ित के समान ही पीड़ा का सामना करना पड़ता है। वहीं तीसरा है, ‘हुदूद’ यानी सबसे गंभीर प्रकार का अपराध, जिसे खुदा के कानून के खिलाफ माना जाता है। ‘हुदद’ अपराधों में चोरी, डकैती, अश्लीलता और शराब पीना शामिल है। इसके तहत कठोर सजा का प्रावधान किया गया है। जिसमें हाथ पैर काट देना, कोड़े मारना और मौत की सजा तक देने का प्रावधान है। ‘इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लोबल कल्चरल स्टडीज’ के अली मजरुई के मुताबिक ज्यादातर मुस्लिम देश जहां इस्लाम की उत्पत्ति हुई है, अब शरिया कानून के पारंपरिक सजा देने के तरीकों को हटा दिया है और उन्होंने लोकतांत्रिक कानून बनाने शुरू कर दिए हैं। ‘कसीस’ एक इस्लामी शब्द है जिसका अर्थ है आंख के बदले आंख। हत्या के मामले में अगर अपराधी पर आरोप साबित हो जाता है, तो इस कानून के तहत अदालत को हत्यारे की जान लेने का अधिकार देता है।

महिलाओं पर तालिबान शासन का प्रभाव अपने पिछले शासनकाल में शरिया कानून के तहत तालिबान ने हर प्रकार की गीत-संगीत को बैन कर दिया था। इस बार भी कंधार रेडियो स्टेशन पर कब्जा करने के बाद तालिबान ने गीत बजाने पर पाबंदी लगा दी है। वहीं पिछली बार चोरी करने वालों के हाथ काट लिए जाते थे। इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, शरिया कानून का हवाला देकर तालिबान ने अफगानिस्तान में बड़े नरसंहार किए। वहीं करीब एक लाख 60 हजार लोगों को भूखा रखने के लिए उनका अनाज जला दिया गया और उनके खेतों में आग लगा दी गई थी। तालिबान के शासन के तहत पेंटिंग, फोटोग्राफी पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, किसी भी तरह की फिल्म पर भी प्रतिबंध था।

तालिबान के शासन के तहत महिलाओं को प्रभावी रूप से नजरबंद कर दिया गया था और उनकी पढ़ाई-लिखाई पर पाबंदी लगा दी गई थी। आठ साल की उम्र से ऊपर की सभी लड़कियों के लिए बुर्का पहनना अनिवार्य था और वे अकेले घर से बाहर नहीं निकल सकती थीं। इस बार भी तालिबान ने इसी नियम को लागू किया है। महिलाओं के लिए हाई-हिल्स सैंडल या जूते पहनने पर पाबंदी थी। तालिबान का मानना है कि हाई हिल्स जूतों से पुरुषों के मन में गलत ख्याल आते हैं। इसके साथ ही महिलाओं और लड़कियों के लिए खिड़की से देखना मना था और वह घर की बालकनी में भी नहीं आ सकती थी।

तालिबान के पिछले शासनकाल के दौरान अखबारों को सख्त हिदायत दी गई थी कि महिलाओं की तस्वीरें नहीं छापें। वहीं दुकानों में भी महिलाओं की तस्वीर लगाना प्रतिबंधित था। इसके साथ ही जिन दुकानों के नाम में ‘महिला’ शब्द आ रहा था, उन दुकानों से ऐसे शब्द हटा दिए गये थे। तालिबान के पिछले शासनकाल में महिलाओं का सड़क पर निकलना, रेडियो पर बोलना और टीवी पर दिखना प्रतिबंधित था। इसके साथ ही महिलाएं सार्वजनिक कार्यक्रम में भी हिस्सा नहीं ले सकती थीं। अगर कोई महिला इन नियमों के उल्लंघन का दोषी पाया जाती थी, तो फिर उन्हें भीड़ बुलाकर, स्टेडियम या फिर शहर के टाउन हाल में कोड़े से पिटाई की जाती थी।

यही नहीं, नेल पॉलिस लगाने पर तालिबान के पिछले शासनकाल के दौरान महिलाओं के लिए नेल पॉलिस का इस्तेमाल करना प्रतिबंधित था। अगर कोई महिला ने नेल पॉलिस लगा लिया तो उसके अंगूठे के सिरे को काट दिया जाता था। इसके अलावा अफगानिस्तान के नागरिकों के लिए तालिबान की बफादारी साबित करनी होती थी। अगर कोई तालिबान के खिलाफ जाता था तो फिर उसे पत्थर से मारा जाता था। नियम तोड़ने वालों को तालिबान की धार्मिक पुलिस सार्वजनिक तौर पर पिटाई करती थी या फिर उसे फांसी की सजा दी जाती थी।

You may also like

MERA DDDD DDD DD