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आंग सान सू की असली अग्नि-परीक्षा अब

बीते साल नवंबर में होने वाले चुनाव में आंग सान सू ची की पार्टी एनएलडी को 83 फ़ीसदी वोट मिले थे लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप के चलते सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर देश में एक वर्ष का आपातकाल लगा दिया है। पर यह दिलचस्प है कि नवंबर में  वोट, आंग सान सू ची की सरकार पर रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार के लगने वाले आरोपों के बावजूद मिले थे।

पर विश्व स्तर पर लोकप्रिय और म्यांमार में द लेडी के नाम से मशहूर, शांति के लिए वर्ष 1999 में नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सू की की छवि में अब कुछ परिवर्तन आये हैं या नहीं इसे समझने की अब जरुरत है।  ऐसा क्यों हुआ इसके पीछे हमें म्यांमार के रखाइन प्रान्त में हो रहे रोहिंग्या मुसलामानों पर अत्याचार को समझना होगा।

इसके पीछे ”नरसंहार की कोई मंशा नहीं थी।”  : आंग सांग सू

अफ्रीकी देश गांबिया ने म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ 2017 में चलाए गए सैन्य अभियान का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय अदालत में उठाया था। वर्ष 1999 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित म्यांमार की नेता आंग सांग सू ची ने 11 दिसंबर 2017 को संयुक्त राष्ट्र की शीर्ष अदालत में रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ अपने देश के सैन्य अभियान का बचाव करते हुए कहा था कि इसके पीछे ”नरसंहार की कोई मंशा नहीं थी।”

हेग में जजों को संबोधित करते हुए सू ची ने माना कि सेना ने अत्यधिक बल प्रयोग किया, लेकिन इससे साबित नहीं होता है कि अल्पसंख्यक समूहों का सफाया करने की मंशा थी। सेना के अभियान में हजारों लोग मारे गए और सात लाख 40 हजार रोहिंग्या लोगों ने पड़ोस के बांग्लादेश में पनाह ली। लंबे समय तक म्यांमार के जुंटा को चुनौती दे चुकी सू ची इस बार अपने देश का पक्ष रख रही थीं।

बर्मा का पारंपरिक पोशाक पहने और बालों में फूल लगाए सू ची ने कहा था

 

बर्मा का पारंपरिक पोशाक पहने और बालों में फूल लगाए सू ची ने अदालत से कहा था, ”अफसोसजनक है कि गांबिया ने रखाइन प्रांत में हालात के बारे में अदालत के सामने भ्रामक और बनावटी तस्वीरें पेश की हैं।” उन्होंने दलील दी कि 2017 में सैकड़ों रोहिंग्या आतंकवादियों के हमले के बाद सेना ने कार्रवाई की थी।

उन्होंने कहा था, ”इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का अनादर करते हुए कुछ मामलों में रक्षा सेवाओं के सदस्यों ने अत्यधिक बल का प्रयोग किया या वे हमलावरों और नागरिकों के बीच भेद नहीं कर पाए।” सू ची ने कहा था कि म्यांमार खुद ही मामलों की जांच कर रहा है। उन्होंने जोर दिया कि ”निश्चित रूप से इन परिस्थितियों में नरसंहार की मंशा एकमात्र अवधारणा नहीं हो सकती है।” 

मुस्लिम बहुल गांबिया का आरोप था कि म्यांमार ने नरसंहार रोकने में 1948 के समझौते का उल्लंघन किया। संयुक्त राष्ट्र के जांच अधिकारियों ने वर्ष 2016 में रोहिंग्या के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को नरसंहार बताया था।

आंग सान सू की विश्व स्तरीय छवि

 

लेकिन अब सेना द्वारा नजरबंद किये जाने के बाद यह आंग सान सू की की यह असली अग्नि-परीक्षा होगी कि क्या उनके समर्थक अब सेना के खिलाफ उठ खड़ी होगी। अंतराष्ट्रीय स्तर पर देखें तो अमेरिका और भारत देश ने आंग सान सू की का समर्थन किया है। यह आंग सान सू की के विश्व स्तरीय छवि का ही कमाल है कि विभिन्न देशों से इन्हें समर्थन मिल रहा है।

इन नतीज़ों के बाद सेना के समर्थन प्राप्त विपक्षी पार्टी ने चुनाव में धोखाधड़ी का आरोप लगाया। इस आरोप को एक बयान की शक्ल देते हुए नए कार्यकारी राष्ट्रपति मीएन स्वे ने हस्ताक्षर के साथ बयान जारी किया और इसके साथ ही देश में साल भर लंबा आपातकाल लागू हो गया।

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