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सबसे निचले स्तर पर पहुंची अमेरिकी ‘मीडिया’

अमेरिकी देश की मीडिया अब इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है। हर साल जारी होने वाले एल्डरमैन ट्रस्ट बैरोमीटर के अनुसार, अमेरिकी सोशल मीडिया पर इस वक्त केवल 27 फीसदी लोग ही भरोसा करते हैं। 21 जनवरी, गुरुवार को इस बैरोमीटर में अमेरिका से संबंधित मीडिया में विश्वास के नतीजे जारी हुए। एल्डरमैन बैरोमीटर पूरी दुनिया में विभिन्न संस्थाओं और लोगों के विश्वास का सर्वे करता है।

बीते वर्ष 2020 में अमेरिका में हुए इस सर्वे से यह सामने आया है कि आज लोगों द्वारा तथ्यों की मांग की जा रही हैं और साथ ही उनमें पत्रकारों को लेकर भरोसा भी घटता जा रहा है। सर्वे रिपोर्ट आने के बाद कई जानकारों का कहना है कि मीडियाकर्मियों और मीडिया संस्थानों को इस नतीजे को बेहद गंभीरता से लेना चाहिए। साथ ही यह भी कहा गया है कि उन्हें खुद में लोगों का भरोसा बरकरार रखने के लिए अब अतिरिक्त उपाय करने चाहिए।

समाजशास्त्रियों ने यह भी ध्यान दिलाया है कि किसी समाज की स्थिरता के लिए सरकार और मीडिया में लोगों का भरोसा होना अनिवार्य है। परंतु अब ऐसा प्रतीत होता है कि लाखों की संख्या में अमेरिका के लोगों का इन दोनों संस्थाओं से विश्वास उठ चुका है।

एल्डरमैन ट्रस्ट सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, ’56 फीसदी लोगों ने इस कथन पर अपनी सहमति जताई है कि पत्रकार जानबूझ कर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। लोगों का मानना है कि मीडियाकर्मी या तो पूरी तरह झूठ बोलते हैं या फिर चीजों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं।’

58 फीसदी अमेरिका के लोगों का कहना है कि अधिकतर समाचार संगठनों को ज्यादा चिंता किसी विचारधारा या राजनीतिक रुख का समर्थन करने की रहती है। उनकी मुख्य चिंता समाज को सूचना देने की नहीं होती है।

सर्वे एजेंसी एल्डरमैन का कहना है कि उसने अमेरिका में हुए राष्ट्रपति चुनाव होने के बाद दोबारा सर्वे किया है। इसमें मीडिया में यकीन के नतीजे पहले से भी काफी बदतर आए है। इस सर्वे के अनुसार डेमोक्रेटिक पार्टी के 57 फीसदी समर्थकों का कहना है कि वे मीडिया में भरोसा रखते हैं परंतु रिपब्लिकन पार्टी के सिर्फ 18 फीसदी समर्थकों ने ही ऐसी राय जताई है।

एल्डरमैन के अनुसार ताजा सर्वे से एक बड़ी तस्वीर यह सामने आई है कि अमेरिका में भी वैश्विक ट्रेंड के अनुसार परंपरागत मीडिया से लोगों का भरोसा तेजी से घटता जा रहा है। यानी की पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मेनस्ट्रीम मीडिया के विरुद्ध जो मुहिम छेड़ी गई थी, यह ताजा आंकड़े उसी का नतीजा हैं।

अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स में एक टिप्पणी में एंथ्रोपॉलिजिस्ट हेइदी लार्सन ने कहा, ‘अमेरिका में समस्या केवल गलत सूचनाओं के प्रचार की ही नहीं है। यहां समस्या भरोसे की भी है। मीडिया के विश्लेषज्ञों का कहना है कि मीडिया संस्थान हमेशा से विज्ञापन पर ही निर्भर रहे हैं । आज के दौर में विज्ञापन की अधिकतम रकम गूगल और फेसबुक जैसे टेक प्लेटफॉर्म हड़प रहे हैं। ऐसे में परंपरागत मीडिया संस्थानों का ढांचा काफी कमजोर हो गया है। इससे उनकी रिपोर्टिंग भी काफी कमजोर हुई है और उसका असर लोगों के भरोसे पर पड़ा है।

वेबसाइट एक्सियोस.कॉम ने अपने एक विश्लेषण में कहा है कि मीडिया में लोगों का विश्वास बहाल करना अब बहुत बड़ी चुनौती बन गया है। परन्तु सबसे अच्छी बात तो यह है कि अब इस समस्या पर पत्रकारों के बीच भी चर्चा शुरू हो चुकी है। वेबसाइट के अनुसार, लंदन के एक अखबार ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ के पूर्व संपादक लियोनेल बार्बर ने हाल ही में लिखा है कि मीडिया संस्थान केवल तथ्य आधारित रिपोर्टिंग करके ही लोगों का भरोसा वापस पा सकते हैं।

अखबार वॉशिंगटन पोस्ट की स्तंभकार मार्गरेट सुलिवान का कहना है कि मीडिया का मकसद केवल सच्ची सूचना देना ही नहीं होना चाहिए अपितु उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि लोग उन सूचनाओं को स्वीकार कर रहे है या नहीं। परंतु विश्लेषकों का यह कहना है कि ये सभी बातें कहने में जितनी आसान हैं, उन पर अमल उतना ही मुश्किल है। लोगों का विश्वास लंबे समय के अनुभव से ही घटा है। इसे बहाल करने का इस वक्त कोई रेडीमेड तरीका मौजूद नहीं है।

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