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अल्पसंख़्यको संग दुर्व्यवहार पर घिरता बांग्लादेश

बांग्लादेश में हमेशा से अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते आये है गौरतलब है की धार्मिक कारणों के चलते बांग्लादेश के हिंदुओं को वहां पर परेशान किया जाता रहा है। ऐसी घटनाये सामने आती रही है। 1901 में  बांग्लादेश में हिंदुओं  की जनसंख्या 33 फीसदी हुआ करती थी।  जो आजादी के बाद 1951 में (बांग्लादेश के पूर्वी पाकिस्तान बन जाने के बाद) घटकर 22 फीसदी हो गई थी। 1974 में जब बांग्लादेश में हिंदू 13.5 फीसदी थे।  उसके बाद उनकी संख्या में तेज गिरावट  आई थी। हालांकि 2001 की जनगणना के हिसाब से 9.2 फीसदी थी । भारत विभाजन, शेख मुजीबुर्रहमान की हत्या और बाबरी विध्वंस के बाद हुए दंगों के बाद बांग्लादेश में हिंदुओं की संख्या में तेजी से गिरावट आई थी। वक्त-वक्त पर उन्हें परेशान करने के साथ ही उनके धार्मिक स्थलों को भी निशाना बनाया जाता रहा है। तोड़े गये हिंदू मंदिरों में से कई ऐतिहासिक महत्व के भी रहे है।  लेकिन इसी बीच 2016 में आई बांग्लादेश की सरकारी रिपोर्ट हिंदुओं के लिए राहत लेकर आई थी।  बांग्लादेश ब्यूरो ऑफ स्टेटिक्स की रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश में हिंदुओं की जनसंख्या बढ़कर 1.7 करोड़ हो गई थी।  जो 2014 में 1.55 करोड़ थी।  जिसके हिसाब से वहां की जनसंख्या में 2015 में 10.7 फीसदी की बढ़त देखी गई थी। . इसी रिपोर्ट के मुताबिक 2015 के आखिरी तक बांग्लादेश की कुल जनसंख्या 15.89 करोड़ थी।  जिसमें से 1.7 करोड़ लोग हिंदू थे, यानि जनसंख्या के करीब 9 फीसदी. भारत और बांग्लादेश के बीच 4,096 किमी लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। बांग्लादेश में हिंदू ही दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक समूह है।  इनमें से ज्यादातर बंगाली हिंदू हैं और उनके रीति-रिवाज भी भारत के पश्चिम बंगाल के हिंदुओं से मिलते-जुलते है।  इन हिंदुओं के बीच सबसे ज्यादा देवी काली की पूजा की जाती है। और इन हिंदुओं में ज्यादातर की भाषा बांग्ला ही है। पश्चिम बंगाल के हिंदुओं की तरह ही बांग्लादेश के हिंदुओं का प्रमुख त्योहार भी दुर्गापूजा है। लगातार घटती हिंदुओं की जनसंख्या के आंकड़ों के बीच बांग्लादेश के हिंदू नेताओं के ऐसे बयान आते रहते हैं, जिनमें वे हिंदुओं को बांग्लादेश से बाहर जाने को मजबूर किए जाने के जिन पर आरोप लगते आये है। उनका कहना है कि इसके चलते बांग्लादेशी हिंदू भारत में जाकर बसने को मजबूर है। हालांकि उस वक्त बांग्लादेश की 3 सौ सदस्यीय संसद में हिंदू सांसदों की संख्या केवल चार थी। वहीं संसद में महिलाओं के लिए आरक्षित 50 सीटों में किसी भी महिला को मनोनीत नहीं किया गया।  इन सीटों पर व्यक्तियों का मनोनीत सीधे बांग्लादेश के प्रधानमंत्री करते है।  यानि की बांग्लादेश में हिंदुओं को राजनीति में जितना अधिकार मिलना चाहिये उतना अधिकार उनको  प्राप्त नहीं है।   पिछले कुछ वर्षों में यहां हिन्दुओं पर हमलों की कई घटनाएं हुई हैं। हिन्दुओं की संपत्तियों को लूटा गया, घरों को जला दिया गया तथा मंदिरों की पवित्रता को भंग कर उसे आग के हवाले कर दिया गया और ये हमले बेवजह किए गए। ऐसी ही एक घटना थी जब २०१५ में बांग्लादेश की उत्तरी हिस्से में एक हिन्दू मंदिर के प्रांगण में अज्ञात हमलावरों के द्वारा देसी बम फेकने से कई लोगो को अपनी जान गवानी पड़ी थी। दिनाज कांताजी मंदिर में लोग किसी महोत्वसव के दौरान एकत्रित हुए थे । उसी  दौरान तीन बम विस्फोट हुए थे।  जिसके बाद से प्रशासन द्वारा  इस वार्षिक महोत्सव को बंद कर दिया गया था। अल्पसंख्यकों की जमीन पर कब्जा कर लेने की समस्या भी यहाँ  लगातार बनी रहती है, क्योंकि वे कमजोर हैं और सरकार और प्रशासन का भी साथ उन्हें नहीं मिलता।


अन्तर्राष्ट्रीय दवाब के कारण वहा  स्तिथियो को सही दर्शाने के लिए बांग्लादेश सरकार अब कुछ सार्थक कदम उठाती नज़र आ रही है।  समय समय पर दर्शाया गया की बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को  कोई कठिनाई नहीं है और उन्हें सरकार का भरपूर सहयोग भी दिया  जाता है परन्तु  हाल ही में  बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना द्वारा एक हिंदू महिला के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज करने के लिए सरकार को इस कदम को अनुमति नहीं दी गयी। दरअसल,बांग्लादेश हिन्दू ,बौद्ध ,ईसाई एकता परिषद की सचिव प्रिया द्वारा  १९ जुलाई को वहाइट हाउस में  आयोजित एक बैठक में भाग लिया गया था और इस दौरान वीडियो कांफ्रेंसिंग का उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। प्रिया साहा के इस बयान पर बांग्लादेश में बवाल मच गया था। प्रिया  साहा उन पांच बांग्लादेशी और दो रोहिंग्या शरणार्थियों में शामिल थीं जिन्हें ढाका स्थित अमेरिकी दूतावास ने वाइट  हाऊस भेजा गया  था।  साहा इस वीडियो में  अपनी पहचान बांग्लादेशी नागरिक बताती  दिख रही है और अमेरिकी राष्ट्रपति से यह कहती दिख रही हैं कि बांग्लादेश से अल्पसंख्यक समुदाय के 3.7 करोड़ लोग लापता हो गए है। उन्होंने  अमेरिकी राष्ट्रपति को यह भी बताया कि उसकी जमीन को मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हड़प लिया था, और उसकी मदद मांगी ताकि अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्य बांग्लादेश में रह सकें। “कृपया, बांग्लादेशी लोगों की मदद करें,” । हम अपने देश में रहना चाहते हैं। अभी भी 18 मिलियन अल्पसंख्यक लोग हैं। मेरा अनुरोध है, कृपया हमारी सहायता करें, हम अपना देश नहीं छोड़ना चाहते हैं। बस हमें बने रहने में मदद करें। मैंने अपना घर खो दिया है, उन्होंने मेरा घर जला दिया, उन्होंने मेरी जमीन ले ली; लेकिन यहाँ कोई निर्णय नहीं हुआ”। प्रिया साहा के बयान पर प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए सड़क परिवहन मंत्री एवं सत्तारूढ़ अवामी लीग महासचिव ओबैदुल कादिर द्वारा शनिवार को संवाददाताओं से कहा गया की उन्होंने एक गलत और देशद्रोही टिप्पणी की थी तथा उनके खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया जाएगा। प्रिया साहा की खिलाफ देशद्रोह का केस चलने की मांग अवश्य उठी परन्तु ,रविवार को अवामी लीग महासचिव औबेदुल कादिर द्वारा कहा गया कि बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना द्वारा प्रिया साहा के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज करने के कदम को इजाजत नहीं दी गयी। उन्होंने मीडिया ब्रीफिंग में कहा, ”प्रधानमंत्री ने बीती रात ब्रिटेन( जहा वह आधिकारिक यात्रा पर गयी थी ) से मुझे एक संदेश भेजा जिसमें कहा गया था कि जल्दबाजी में कोई कानूनी कार्रवाई करने की जरूरत नहीं है।” हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि  प्रिया साहा को अवश्य ही सार्वजनिक रूप से एक बयान जारी कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह ट्रंप से क्या कहना चाहती थी।  कानून मंत्री द्वारा न्यायाधीश प्रशिक्षण कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह के मौके पर मीडिया से कहा गया कि प्रिया साहा ने अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को पूरा करने के लिए “सरासर झूठे आरोप लगाए” और उन्हें नजरअंदाज किया जाना चाहिए लेकिन “मुझे लगता है कि हमें इस बात को इतना महत्व नहीं देना चाहिए” हमें सच्चाई को उजागर करना चाहिए और उसकी उपेक्षा करनी चाहिए। मुझे लगता है कि ऐसे छोटे मामलों को ‘देशद्रोही अपराध’ कहना सही नहीं है, लेकिन यह न्यायपालिका और न्यायाधीशों पर निर्भर है कि वे क्या निर्णय ले”।

इस घटना से समझा जा सकता है की यह मुद्दा तूल न पकड़ ले इसलिए शेख हसीना इसे दबाने का भरसक प्रयास करती नज़र आ रही है। प्रिया साहा के बयान से साफ़ ज़ाहिर होता है की वहा अभी भी हिन्दू समुदाय सुरक्षित नहीं है और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना इसी कारण इस मुद्दे को किसी तरह उठने से बचाती नज़र आ रही है।

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