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श्रीलंका की नई चुनौती

करीब साढे़ तीन साल तक जातीय गृहयुद्ध की लपटों से झुलसे श्रीलंका का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि 2009 से शांतिपूर्ण माहौल में सांस लेने लगे इस देश में दहशतगर्दों ने अपने मन की कर डाली। ईस्टर के मौके पर कोलंबो और अन्य स्थानों पर हुए आतंकी हमलों में मरने वालों की संख्या 310 हो चुकी है। 600 से अधिक घायलों का उपचार चल रहा है। जैसा कि आशंकाएं व्यक्त की जा रही थी कि हमलों के पीछे किसी संगठित आतंकी गिरोह का हाथ हो सकता है, हुआ भी वैसा ही। दुनिया के लिए दहशत का पर्याय बन चुके खतरनाक आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेंट यानी आईएस ने इसकी जिम्मेदारी ली है।


गौरतलब है कि तमिल विद्रोहियों और श्रीलंकाई सेना के संघर्ष के दौरान लापता हुए 16 हजार से अधिक नागरिकों तथा पांच हजार से अधिक सैनिकों का अभी तक पता नहीं है। उस संघर्ष में एक लाख से ज्यादा लोग मारे गए थे। लिट्टे के विरुद्ध निर्णायक अभियान में तमिल आबादी पर जो अत्याचार हुए उनके मामलों का अभी निपटारा नहीं हुआ है। सिंहली बौद्धों और मुस्लिम समुदाय के बीच बढ़ती खाई भी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई थी, इसी बीच आतंकी हमलों ने अब देश के ईसाई समुदाय को भी भयभीत कर दिया है। हालांकि पहले भी ईसाई समुदाय पर सांप्रदायिक हमलों की घटनाएं होती रही हैं, परंतु दंगे, लूट और आगजनी जैसी वारदातें नहीं होती थीं। जातीय और सामुदायिक संघर्षों से भी यह समुदाय बचता रहा है। लेकिन जानकारों के मुताबिक ईसाइयों के लिए हालात अब पहले जैसे नहीं रह सकेंगे। ईस्टर के पवित्र अवसर पर हुए हमले बहुसंख्यक सिंहली बौद्ध आबादी और करीब 10 फीसदी मुस्लिम आबादी के बीच खाई को बहुत बढ़ा देंगे। इसका नाजायज फायदा दोनों तरफ के चरमपंथी गुट उठा सकते हैं। इनसे निपटना श्रीलंका सरकार के लिए एक नई चुनौती बन गई है।

वर्ष 2009 के बाद एक शांत और मनोरम देश के रूप में अपनी नई पहचान बना रहे श्रीलंका में हुए सिलसिलेवार बम धमाके न केवल दुखद, बल्कि सबके लिए सबक भी हैं। अब तक मिले आकंड़ों के मुताबिक आठ विस्फोटों में 310 लोग मारे गए और 600 से ज्यादा घायल हुए हैं। स्वाभाविक है कि इन हमलों से पूरी दुनिया में मातम और चिंता का माहौल है। तमाम देश इन हमलों की कड़े शब्दों में निंदा कर रहे हैं। ये हमले मानवता पर ठीक उसी तरह से हमला हैं, जैसे हाल ही में न्यूजीलैंड में मस्जिद पर हुआ हमला था। दोनों ही जगह धार्मिक कार्य में लगे लोगों को निशाना बनाया गया है। साफ है कि यह अलग तरह की अंधी हिंसा है। यह श्रीलंका ही नहीं, बल्कि दक्षिण एशिया एवं दुनिया के लिए भी गंभीर चिंता और विचार का विषय है। आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं कि कहीं श्रीलंका में हिंसा का नया दौर न शुरू हो जाए। वहां जातीय या सांप्रदायिक घृणा का जहर न फैल जाए। वहां की सरकार को ही नहीं, बल्कि श्रीलंका से

सरोकार रखने वाली तमाम सरकारों को सोचना होगा कि आखिर वे कौन लोग हैं जो चाहते हैं कि यदि किसी देश में तीन दशक बाद अमन और शांति लौटी है तो उसे कैसे बर्बाद किया जाए। खासकर भारत के लिए यह सोचने का विषय है। ध्यान रखना होगा कि श्रीलंका में अशांति भारत के लिए शुभ संकेत नहीं है।

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