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तुर्की में तंगहाल जनतंत्र

इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि दुनिया भर में कट्टरवादी ताकतें लगातार विस्तार पा रही हैं। लोकतंत्रिक शक्तियां का कमजोर होते जाना विडम्बना का हिस्सा नहीं, हमारे मन-मिजाज के बदल जाने का सबूत है। इसका नया दृष्टांत तुर्की का चुनाव है। आमतौर पर चुनाव के लोकतंत्र को मजबूत करने वाला माना जाता है। लेकिन तुर्की में इसका एक नया ही संदर्भ देखने को मिला जो निश्चित तौर पर चिंता में डालने वाला हैं। तुर्की में हुए चुनाव के नतीजों में वहां के लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर किया है।

पिछले डेढ़ दशकों से तुर्की की सत्ता पर काबिज राष्ट्रपति रिचेप तैयिप एर्दागान 53 फीसदी वोट हासिल कर एक बार फिर राष्ट्रपति पद पर हो गए हैं। उनकी पार्टी ने सहयोगी दल एमएचपी के साथ मिलकर संसदीय चुनावों में बहुमत हासिल कर लिया हैं। राष्ट्रपति पद के चुनाव में इनके प्रतिद्वंद्वी रिपब्लिकन पीपुल्स पार्टी के उम्मीदवार मुहेर्रेम इंस को महज 31 प्रतिशत वोट मिले। इस जीत के साथ 64 साल के एर्दोगान तुर्की के इतिहास में दूसरे बड़े ताकतवर नेता के रूप में सामने आए हैं। उनके आगे सिर्फ तुर्की के संस्थापक मुस्तफा कमात अतुर्क या मुस्तफा कमाल पाशा का ही नाम आता है। गौरतलब है कि यह सामान्य चुनाव नहीं था। यह एक ऐसा चुनाव था जो तुर्की के लोकतंत्रिक को मजबूत करने के बजाय उसकी जड़ें काटने वाला साबित हो सकता है। एर्दोगान के दोबारा राष्ट्रपति बनते ही देश में एक नया संविधान भी लागू होना है। इस नए संविधान में मानवाधिकारों और बुनियादी स्वतंत्रता की छोड़कर बाकी सब कुछ बदल देने का अधिकार राष्ट्रपति को होगा, शर्त यह है कि ससंद उस बारे में कोई नया कानून न पारित कर दे। इस चुनावी नतीजे के साथ ही नए संविधान में तुर्की में अब कोई प्रधानमंत्री नहीं होगा। राष्ट्रपति ही खुद ही कैबिनेट बनाए और चलाएंगे।

अपने डेढ़ दशक के शासन के दौरान एर्दनागो ने तुर्की को विकास के पथ पर लाने की बजाए रसातल में धकेलने का काम किया है। उनकी छवि भी एक निरंकुश तानाशाह शासक की रही है। उनके बारे में बताया जाता है कि अपने शासनकाल के दौरान एर्दोगान के अपने पड़ोसी देशों के साथ सुल्ताना जैसा व्यवहार करते रहे हैं। कभी वह सेना लेकर सीरिया और इराक में दाखिल हो जाते हैं जो किसी शासक की शोभा नहीं देता। वह कई बार रूस में भी घुस गए हैं। देश की आर्थिक स्थिति भी लगातार बिगड़ती गयी है। महंगाई और बेरोजगारी वहां की सबसे बड़ी समस्या है। जिसकी तरफ उन्होंने कभी ध्यान नहीं दिया। हालांकि अभी चुनाव प्रचार के दौरान एर्दोगान ने कहा था कि तुर्की की तरक्की का नमूना यह है कि यहां घर-घर में फ्रिज है। लेकिन हकीकत यह है कि घरों में रखा फ्रिज खाली है क्योंकि उनमें समान रखने की माली हालत वहां के लोगों की नहीं है। देश में दो साल से इमरजेंसी लगी हुई है। वहां 90 प्रतिशत मीडिया सरकारी कंपनियों के अधीन है। नतीजतन केवल एक ही पक्ष की बातें प्रचारित की जाती हैं। हजारों की तादाद में विपक्षी कार्यकर्ता लंबे वक्त से जेलों में सड़ रहे हैं। सत्ता से असहमति रखने वाले बैद्धिक और पत्रकार या तो जेल में डाल दिए गए या वे देश से पलायन कर गए।

एर्दागान 2014 में राष्ट्रपति बनने से पूर्व ग्यारह सालों तक प्रधानमंत्री रहे। वे निरंकुशता पसंद हुक्कमरान हैं। अपनी एकछत्र राज चाहते हैं। इसी मकसद में उन्होंने चुनाव के लिए संविधान में बदलाव का खुद को हमेशा के लिए सत्ता पर काबिज रखने का रास्ता खोल दिया है। तुर्की में जनतंत्र को विपक्षी दल कैसे बढ़ पाते हैं, यह देखना बाकी है और चिंता में डालने वाला भी।

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