जीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार के राज में भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारियों को गले लगाया जाता है और जो अधिकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाए उन्हें प्रताड़ित किया जाता है। हालात यह हैं कि कृषि विभाग के जिन अधिकारी जेसी खुल्बे को भ्रष्टाचार के मामले में चार्जशीट जारी हुई वे आज मुख्यमंत्री के पावरफुल ओएसडी हैं और जिन ईमानदार अधिकारी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बिगुल बजाया उन्हें सरकारी कामकाज में बाधा डालने के आरोप में जेल जाना पड़ा। ईमानदार अधिकारी जब उत्पीड़न से त्रस्त हुए तो अंततः वे न्यायालय की शरण में गए। उनकी शिकायत पर अदालत ने मुख्यमंत्री के चहेते ओएसडी जेसी खुल्बे के खिलाफ परिवाद दर्ज करने के आदेश जारी किए। इससे सरकार की खूब किरकिरी हो रही है
मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का जो नारा दिया था, वह दो साल बाद भी एक जुमला ही साबित हुआ है। राज्य में भ्रष्टाचार और भ्रष्ट अधिकारियों को किस तरह से संरक्षण दिया जा रहा है यह देहरादून के मुख्य न्यायायिक मजिस्ट्रेट के हालिया फैसले से साफ हो गया है कि सरकार भ्रष्टाचारियों पर कार्यवाही करने के बजाये उनको पूरा संरक्षण दे रही है। इसके चलते कृषि विभाग के एक सेवानिवृत अधिकारी को विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्यवाही करवाने के लिए मजबूरन न्यायालय की शरण में जाना पड़ रहा है। दूसरी तरफ भ्रष्टाचार में आरोपित अधिकारी सरकार के अंग बनकर निरंतर अपने आप को बचाने के प्रयास कर रहे हैं। पूरी सरकारी मशीनरी उनका सरंक्षण करने में लगी हुई है।
वर्ष 2015 में कृषि विभाग में हुये एक बड़े घोटाले में आरोपित कृषि भूमि संरक्षण अधिकारी और मौजूदा समय में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के सबसे चहेते ओएसडी जेसी खुल्बे के खिलाफ देहरादून के मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट मनिन्द्र मोहन पांडे की अदालत ने परिवाद दर्ज करने के आदेश जारी कर दिये। साथ ही मामले में कृषि निदेशक गौरी श्ांकर तथा सेवानिवृत तत्कालीन कृषि अधिकारी ओमबीर सिंह और मुख्य कृषि अधिकारी विजय देवराड़ी के खिलाफ शिकायत और सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त अभिलेखों को संज्ञान में लेते हुये धारा 202 के तहत परिवाद दर्ज कर दिया है। इस प्रकरण में राज्य सरकार को धारा 197 के तहत मामले में शामिल सभी लोगों के खिलाफ मुकदमा चलाये जाने की अनुमति के लिए जिलाधिकारी देहरादून को सूचित कर दिया है।
उल्लेखनीय है कि कृषि विभाग से सेवानिवृत रमेश चौहान द्वारा माननीय मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट मनिंद्र मोहन पांडे की अदालत में शिकायत पत्र दिया गया। जिसमें सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त अति आवश्यक अभिलेखों को संलग्न किया गया है। इस शिकायत पत्र में रमश्े चौहान द्वारा माननीय न्यायालय में पुलिस विभाग को धारा 156(3) के तहत  रिपोर्ट दर्ज करवाने के आदेश जारी करने की प्रार्थ्ाना की गई। माननीय मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट मनिंद्र मोहन पांडे ने रमेश चौहान के आवदेन के साथ संलग्न सभी अभिलेखां का अध्ययन किया और इस मामले को गंभीर मानते हुये भारतीय दण्ड सिंहता की धारा 202 के तहत परिवाद दर्ज कर दिया। साथ ही राज्य सरकार को प्रकरण में शामिल सभी व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा चलाये जाने के लिए जिलाधिकारी को अनुमति दिये जाने के आदेश जारी कर दिये गये।
मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट मनिंद्र मोहन पांडे की अदालत द्वारा मुकदमा दर्ज करने के साथ एक बार फिर से भाजपा की त्रिवेंद्र सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। भ्रष्टाचार के आरोपां में घिरे जेसी खुल्बे को मुख्यमंत्री द्वारा अपना ओएसडी ही नहीं बनाया गया, बल्कि उन्हें अपना सबसे पावरफुल ओएसडी तक बना डाला। जबकि कृषि विभाग द्वारा जेसी खुल्बे को भ्रष्टाचार और अनियमिता के मामले में विभागीय चार्जशीट तक जारी की जा चुकी है। इसके अलावा घोटाले में आरोपित अन्य के खिलाफ भी कोई कार्यवाही नहीं होने से स्पष्ट हो गया है कि मौजूदा सरकार में भ्रष्टाचारियों को पूरा संरक्षण प्राप्त है।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2015 में देहरादून जिले की चकराता और कालसी तहसील में  कøषि विभाग की ओर से करवाये गये लाखों के कार्यों में कूटरचित दास्तावेजों द्वारा सरकारी खजाने से तकरीबन 70 लाख रुपये का हेरफेर किया गया था। इस पूरे घोटाले में तत्कालीन भूमि सरंक्षण अधिकारी और तत्कालीन कृषि अधिकारी पर लाखों का घोटाला करने के आरोप लगाये गये हैं। गौर करने वाली बात यह है कि तत्कालीन भूमि संरक्षण अधिकारी जेसी खुल्बे जो कि मौजूदा समय में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के सबसे चहेते ओर सबसे ताकतवर ओएसडी के पद पर तैनात हैं, पूर्व में भाजपा सरकार के समय भी तत्कालीन कृषिमंत्री त्रिवेंद्र रावत के ओएसडी पद पर रह चुके हैं। इससे इतना तो साफ हो जाता है कि जेसी खुल्बे मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत के कितने खास और चहेते अधिकारी हैं। साथ ही दूसरे आरोपी तत्कालीन कृषि अधिकारी ओमबीर सिंह का नाम सामने आया है। ओमबीर सिंह भी जेसी खुल्बे की ही तरह राजनीतिक सरंक्षण वाले कर्मचारी नेता हैं।  सेवानिवृत होने के बावजूद वह नियमों के विपरीत राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के देहरादून जिला अध्यक्ष बने हुए हैं।
लाखां का यह घोटाला कोई नया नहीं है। वर्ष 2015 में देहरादून के चकराता और कालसी में भूमि संरक्षण अधिकारी द्वारा अपने अधीनस्थ सहयोगियों ओैर ग्राम सभाओं के जनप्रतिनिधियों के साथ मिलकर तकरीबन 70 लाख रुपए का गबन किये जाने के आरोप लगाये गये हैं। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे प्रकरण में जिलाधिकारी देहरादून और उप जिलाधिकारी द्वारा जांच तक की गई और जांच में  पाया गया कि मामले में भारी अनियमिततायें की गई हैं। बावजूद इसके कोई कार्यवाही नहीं हुई और जेसी खुल्बे विभागीय तरक्की पाते रहे। जबकि ओमबीर विभाग से सेवानिवृत हो गए। अब तकरीबन 4 वर्ष बाद इस पूरे प्रकरण में पहली बार मुकदमा दर्ज करवाने के आदेश जारी हुये हैं। इस पूरे प्रकरण में एक सेवानिवृत कर्मचारी रमेश चौहान द्वारा सूचना के अधिकार के तहत सूचनाओं को एकत्र करके इस मामले को उजागर किया। रमेश चौहान की इस मामले का खुलासा करने पर कई बार विभागीय स्तर से उत्पीड़न किया गया। यहां तक कि सूचना आयेग द्वारा रमेश चौहान को भयभीत करने के प्रयास तक किये गये हैं।
‘दि संडे पोस्ट’ ने इस पूरे प्रकरण को ‘वर्ष 9 के अंक 47’ में सूचना आयेग का तुगलकी फरमान शीर्षक से प्रकाशित किया था। जिसमें  प्रमाणों के साथ खुलासा किया था कि किस तरह से भूमि संरक्षण अधिकारी रहे जेसी खुल्बे को राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से सरंक्षण दिया जा रहा है। विभाग द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ चार्जशीट तक देने के बावजूद चार वर्ष तक किसी भी प्रकार की जांच पूरी नहीं की गई है जिसमें स्पष्ट तौर पर यह सामने आया था कि मुख्यमंत्री के ओएसडी जेसी खुल्बे के खिलाफ विभाग जांच करवाने में कोई रुचि तक नहीं दिखा रहा है। साथ ही इसका भी ख्ुलासा किया था कि व्हिसिल ब्लोअर रमेश चौहान के खिलाफ किस तरह से कृषि विभाग के उच्चधिकारी झूठे प्रमाणों से उनका उत्पीड़न करते रहे है, ताकि रमश्े चौहान विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर न कर पायें। जिसमें एक तरह से राज्य का सूचना आयोग भी सवालां के घेरे में आया था। रमेश चौहान सूचना के लिए अपील में गये थे। उनके विरूद्ध सूचना का अधिकार अधिनियम के खिलाफ एक कदम आगे बढ़कर पुलिस को जांच करने के आदेश जारी कर दिये गए थे। जबकि सूचना आयोग को इस तरह के आदेश जारी करने के अधिकार ही नहीं दिये गये हैं।
प्रदेश का कøषि विभाग और कृषि निदेशालय लगातार भ्रष्टाचार के मामलों में चर्चित रहा है। कभी ढैंचा बीज घोटाला कभी अदरक घोटाला और कभी कृषि यंत्र घोटाले से हमेशा से चर्चित रहा है। ढैंचा बीज घोटाले के प्रकरण में पूर्ववर्ती कांग्रेस की बहुगुणा सरकार ने जांच आयोग का गठन तक किया था। जिसमें घोटाले के शमिल तत्कालीन कृषि निदेशक ओैर तत्कालीन कृषि मंत्री रहे त्रिवेंद्र रावत पर गम्भीर सवाल खड़े किये गये थे। आयेग ने तत्कालीन कृषि निदेशक मदनलाल पर घोटाला करने के आरोप सही पाये थे। साथ ही कृषि सचिव पर भी गंभीर सवाल खड़े किये थे।
कृषि विभाग से सेवानिवृत कृषि अधिकारी रमेश चौहान ने मुख्यमंत्री, मुख्यसचिव, कृषिमंत्री, कृषि सचिव के अलावा पुलिस के आला अधिकारियों तक लाखों के गबन के मामले में समस्त प्रमाणों के साथ शिकायत की। लेकिन उनके शिकायत पत्र पर कोई कार्यवाही करना तो दूर उल्टे उनके ही खिलाफ ही विभाग के अधिकारियों द्वारा मारपीट और सरकारी काम में बाधा पहुंचाने का मामला दर्ज करवा दिया गया। जिस पर रमेश चौहान को जेल तक जाना पड़ा। जबकि रमेश चौहान ने विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ उत्पीड़न की शिकायत पुलिस को पहले ही दी थी। लेकिन उनके किसी भी पत्र पर कोई कार्यवाही पुलिस ने नहीं की। विभाग के अधिकारियों द्वारा की गई शिकायत पर पुलिस ने रमेश चौहान के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने और जेल भेजने में त्वरित कार्यवाही की।
आखिरकार थक हारकर रमेश चौहान को देहरादून के मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट मनिन्द्र मोहन पांडे की अदालत में अपने अधिवक्ता संजीव कुकरेती के माध्यम से आवेदन देना पड़ा जिसके तहत तकरीबन 70 लाख के सरकारी खजाने के गबन के मामले में परिवाद दर्ज किया जा सका। मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट मनिंद्र मोहन पांडे के द्वारा राज्य सरकार को संबंधित सभी अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाये जाने की अनुमति देने के लिए जिलाधिकारी देहरादून को सूचना जारी करने से यह तो साफ हो गया कि अब शायद घोटाले में शामिल अधिकारियों के पर कार्यवाही की तलवार लटक गई है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और विभाग मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट के हालिया आदेश पर क्या कार्यवाही करते हैं। कर्मचारी आचरण नीति के तहत किसी कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद उसको विभाग से निलंबित किये जाने का प्रावधान है। तो क्या अब मुख्यमंत्री के ओएसडी जेसी खुल्बे जो कि कृषि विभाग में उच्चाधिकारी के पद पर तैनात हैं के खिलाफ कार्यवाही होगी या सरकार ओैर विभाग इसका भी कोई न कोई तोड़ निकालने में सफल हो पायेंगे। जिस तरह से पूर्व में जेसी खुल्बे के खिलाफ विभाग द्वारा आरोप पत्र जारी किये गये हैं और जांच के लिये विजिलेंस को पत्र दिया हुआ है उसके बावजूद न तो जांच आगे बढ़ी है और न ही संबधित अन्य अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की गई है। यहां तक कि एक आरोपित अधिकारी ओमबीर सिंह बड़ी शान से सेवानिवृत हो चुके हैं। विभागीय चार्जशीट के आधार पर इन पर भी 40 लाख की वित्तीय अनियमितता के आरोप ओैर इनके खिलाफ विजलेंस की जांच प्रचलित है। बावजूद इसके ओमबीर सिंह राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के देहरादून जिला अध्यक्ष के पद पर काबिज हैं, जबकि राज्य कर्मचारी संघ के नियमों के अनुसार सेवानिवृत कर्मचारी या अधिकारी किसी भी सूरत में राज्य कर्मचारी संघ या यूनियन का पदाधिकारी नहीं हो सकता।
मौजूदा कृषि निदेशक गौरी श्ांकर आर्य को भी रमेश चौहान द्वारा अपने शिकायती पत्र में भ्रष्टाचार को सरंक्षण देने वाला बताया गया है। जिस पर माननीय न्यायालय ने संज्ञान लेते हुये गौरी शंकर के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने के लिये सरकार से अनुमित देने की सूचना जारी की है। जबकि इन्ही गौरी शंकर के कार्यकाल में इस बड़े घोटाले के आरोपित अधिकरियों के खिलाफ आरोप पत्र जारी किये गये और विजिलेंस को जांच के लिये पत्र लिखा गया है। बावजूद इसके कृषि निदेशक गौरी श्ांकर न्यायालय के आदेश को ही नकार रहे हैं। चार्जशीट जारी करने को एक सामान्य प्रक्रिया बता कर मामले से बच रहे हैं।
हैरानी इस बात की है कि कृषि निदेशक गौरी श्ांकर साफ कह रहे हैं कि अभी तक किसी भी प्रकार की जांच पूरी नहीं हुई है और न ही उनको कोई जांच रिपोर्ट मिली है। जबकि संयुक्त कृषि निदेशक के.सी. पाठक  ‘दि संडे पोस्ट’ को दिये गये अपने बयान में स्पष्ट कहना है कि उनके द्वारा कृषि अधिकारी जेसी खुल्बे की जांच पूरी करके विभाग को दी जा चुकी है। इस से यह साफ हो जाता है कि कृषि निदेशक गौरी शंकर मुख्यमंत्री के वर्तमान ओएसडी और कृषि अधिकारी जेसी खुल्बे को बचाने का काम कर रहे हैं और जांच पूरी न होने की बात कह कर पल्ला झाड़ रहे हैं।

बात अपनी-अपनी

मेरे खिलाफ हर तरह के षडयंत्र रचे गये। मेरा हर तरह से उत्पीड़न किया गया। झूठे मुकदमे और शिकायतें की गई। मेरा पांच साल तक का कैरियर तबाह किया गया। झूठे मामले में मुझे जेल भेजा गया। मैने मुख्यमंत्री, कृषिमंत्री, मुख्य सचिव को इस पूरे प्रकरण की प्रमाणां के साथ शिकायत की। लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की गई। आखिरकार मुझे न्यायालय की शरण में जाना पड़ा और अब लगता है कि राज्य में भ्रष्टाचारियां के खिलाफ कोई न कोई कार्यवाही जरूर होगी। मुझे माननीय न्यायालय पर पूरा विश्वास है।
रमेश चौहान, सेवानिवृत कृषि अधिकारी 
हमने माननीय मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट मनिंद्र मोहन पांडे की अदालत के समक्ष धारा 156(3) के तहत पुलिस को इस बड़े घोटाले में शामिल सभी संबधित लोगों के खिलाफ पुलिस जांच किये जाने के आदेश जारी करने के लिये आवेदन दिया था। हमने आरटीआई से प्राप्त सभी प्रमाणिक दास्तावेजां को भी आवेदन में संलग्न किया था। माननीय मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट महोदय ने आरटीआई में प्राप्त किये गये सभी अभिलेखां का अध्ययन किया और माना कि यह मामला बड़े भ्रष्टाचार से जुड़ा है। जिस पर माननीय मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट ने हमारे पत्र को धारा 202 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत सबंधित सभी चारां व्यक्तियों के खिलाफ परिवाद दर्ज कर दिया और सरकार को धारा 197 दण्ड प्रक्रिया सहिंता के तहत अनुमति के लिए जिलाधिकारी महोदय को सूचित करके आदेश जारी कर दिये हैं। अब कम से कम इतना तो तय है कि माननीय मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट इस मामले में कोई जांच कमेटी का गठन करके मामले में दोषी लोगों के खिलाफ कार्यवाही करेंगे। यही हम चाह रहे थे।
संजय कुकरेती, अधिवक्ता देहरादून
अदालत ने क्या निणर्य दिया है? यह मुझे नहीं पता। अदालत तो अपना निर्णय देती रहती है किसी अधिकारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने के लिए पहले विभाग से अनुमति लेनी होती है। इस मामले में तो अभी तक किसी प्रकार की जांच रिपोर्ट ही नहीं आई है तो हम कैसे किसी को दोषी मान लें। मुझे नहीं पता कि इस मामले में कोई विभागीय चार्जशीट दी गई है। अगर दी भी गई होगी तो वह एक सामान्य विभागीय प्रक्रिया होती है। इससे यह साबित नहीं होता कि कोई दोषी है। मैं इससे ज्यादा आपको नहीं बता सकता।
गौरी शंकर आर्य, कृषि निदेशक
हमने अधिकारी के खिलाफ अपनी जांच पूरी करके विभाग को सौंप दी है और ओमबीर सिंह के खिलाफ जांच चल रही है।
केसी पाठक, संयुक्त निदेशक कृषि निदेशालय देहरादून

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