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हरिद्वार में कांग्रेस ने न केवल मदन कौशिक की व्यूह रचना तोड़ी, बल्कि उनका किला भी ढहा दिया। मेयर पद पर भाजपा प्रत्याशी अनु कक्कड़ की हार मदन कौशिक की हार मानी जा रही है। ऐसा इसलिए की अनु को टिकट दिलवाने के लिए उन्होंने न सिर्फ वीटो किया, बल्कि जितवाने में ऐड़ी-चोटी का जोर भी लगाया
चुनाव में वैसे तो हर सीट किसी भी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होती है। लेकिन कुछ ऐसी सीटें भी होती हैं, जिन पर हर दल अपना कब्जा जमाना चाहता है। प्रदेश में हरिद्वार नगर निगम के मेयर की सीट भी एक ऐसी ही हाईप्रोफाइल सीट है। यहां से कद्दावर नेता और प्रदेश सरकार के ताकतवर मंत्री मदन कौशिक लगातार विधानसभा चुनाव जीतते रहे हैं। एक तरह से हरिद्वार शहर कौशिक का गढ़ माना जाता है। मगर इस बार निकाय चुनाव में कौशिक अपना गढ़ नहीं बचा पाए। हरिद्वार के मेयर की कुर्सी कांग्रेस ने भाजपा से छीन ली।
हरिद्वार नगर निगम के नतीजे अप्रत्याशित कहे जा रहे हैं। शहर के लगभग हर होर्डिंग और यूनीपॉल पर भाजपा उम्मीदवार अनु कक्कड़ का ही चेहरा दिख रहा था। प्रचार में कक्कड़ बहुत आगे थीं। मतदान के दिन तक उनकी जीत पक्की मानी जा रही थी। मगर हरिद्वार के मतदाताओं ने अंदरखाने अपने मन में भाजपा को हराने की ठान ली थी। हरिद्वार के बुद्धिजीवियों का मानना है कि नगर निगम में न अनु कक्कड़ हारीं न भाजपा। यहां हार मदन कौशिक की हुई है। मदन कौशिक ने अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी। फिर भी वे मेयर सीट नहीं बचा पाए। कांग्रेसी उम्मीदवार अनीता शर्मा ने भाजपा की अनु कक्कड़ को 3467 वोटों से पटखनी दी।
वर्ष 2013 में हरिद्वार नगर निगम बना। उसी वर्ष हरिद्वार निगम का पहला चुनाव हुआ। उस वक्त प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। हरिद्वार को निगम का दर्जा देने का श्रेय भी कांग्रेस ने लिया। तब मदन कौशिक सिर्फ हरिद्वार के विधायक थे। फिर भी मदन कौशिक मेयर सीट पर अपने उम्मीदवार को आसान जीत दिलवाने में कामयाब हो गए। लेकिन इस बार सरकार के सबसे ताकतवर मंत्री होने के बावजूद कौशिक इस सीट पर पार्टी को जीत नहीं दिलवा पाए। बताया तो यहां तक जा रहा है कि उन्होंने प्रचार में साम, दाम, दंड, भेद जैसे हर तरीके का प्रयोग किया था। फिर भी वे नाकामयाब रहे।
मदन कौशिक ने मेयर सीट जीतने के लिए पूरी व्यूह रचना कर रखी थी। मगर इस बार कांग्रेस ने उनकी व्यूह रचना को न सिर्फ समझा बल्कि उसको तोड़ भी दिया। व्यूह रचना को तोड़ने के पीछे कई कारण रहे हैं। सबसे बड़ा कारण यह रहा कि पंजाबी मूल की अनु कक्कड़ को लक्सर से हरिद्वार में पैराशूट प्रत्याशी की तरह उतारा गया। इससे उन पर बाहरी होने का ठप्पा लग गया। शायद इसी कारण अनु कक्कड़ को शहर की जनता अपना नहीं पाई। मदन कौशिक के लिए सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि वे विधानसभा चुनाव में जिस क्षेत्र (उत्तरी हरिद्वार) से हमेशा हजारों वोट से आगे रहते थे, मेयर चुनाव में इस बार भाजपा उसी क्षेत्र से बहुत ज्यादा पिछड़ गई। भाजपा के गढ़ उत्तरी हरिद्वार से ही अनु कक्कड़ की हार की पटकथा लिखनी शुरू हो गई थी।
 मेयर सीट के अलावा हरिद्वार की कुल 60 पार्षद सीटों में भाजपा गिरते-पड़ते किसी प्रकार अपनी बढ़त बनाने में कामयाब रही। पार्षदों की कुल 60 सीटों में से भाजपा ने 33 पर जीत दर्ज की। कांग्रेस के 19 पार्षद तो निर्दलीय 7 पार्षद जीते। यहां बसपा को भी एक सीट मिली। हरिद्वार में भाजपा की इस स्थिति के लिए राजनीतिक विश्लेषक मदन कौशिक को ही जिम्मेवार मानते हैं। वे इसे भाजपा की नहीं, बल्कि सीधे कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक की हार बताते हैं। इसके पीछे उनका तर्क यह है कि यदि हरिद्वार की जनता भाजपा को हराना चाहती तो पार्षद सीट पर भी उसे बढ़त नहीं मिलती। दूसरा, अनु कक्कड़ उत्तरी हरिद्वार से सबसे ज्यादा पिछड़ गईं। जबकि उस क्षेत्र के तीन 3 वार्डों में भाजपा के पार्षदों ने धमाकेदार जीत दर्ज की। उत्तरी हरिद्वार के सप्त ऋषि, भूपतवाला और दुर्गानगर इलाकों में भाजपाई पार्षदों ने जीत दर्ज कराई जबकि यहां अनु पिछड़ गईं।
कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक इस उत्तरी हरिद्वार क्षेत्र से विधानसभा चुनाव में 5 से 6 हजार वोट की हमेशा बढ़त बनाकर ही आगे बढ़ते थे। यहां से अनु कक्कड़ की हार का साफ अर्थ है कि उत्तरी हरिद्वार के लोगों ने मदन कौशिक को नकार दिया। नगर में चर्चा यह है कि अनु कक्कड़ को टिकट दिलवाने के लिए मदन कौशिक ने पार्टी के कई समर्पित नेताओं और मजबूत उम्मीदवारों की अनदेखी की थी। मदन कौशिक के वीटो के कारण ही अनु कक्कड़ को मेयर का टिकट मिला था। इससे पार्टी के कई वरिष्ठ नेता और संघ कार्यकर्ता नाराज थे। चुनाव के दौरान संघ के कई कार्यकर्ता खुलकर अनु कक्कड़ का विरोध करते नजर आए थे। उत्तरी हरिद्वार की जनता के विश्वास बहाली के लिए मदन को नए सिरे से मेहनत करनी होगी। ताकि उन्हें आगे विधानसभा चुनाव में दिक्कत न हो। अन्यथा उनकी विधायकी भी खतरे में पड़ सकती है।
कुछ लोग मेयर पद की हार का बड़ा कारण हाल ही में चलाये गये अतिक्रमण हटाओ अभियान को भी मान रहे हैं। लेकिन यह भी सही है कि वार्ड संख्या 24 कृष्णानगर में भाजपा प्रत्याशी परमिंदर सिंह चुनाव जीते। अतिक्रमण हटाओ अभियान से सबसे ज्यादा नुकसान कृष्णानगर की जनता को हुआ था। सबसे ज्यादा मकान यहीं ढहाए गए थे। कइयों का मानना है कि इस हार में निशंक खेमे का चुनाव के दौरान उदासीन बन जाना भी एक कारण रहा है। रानीपुर विधायक आदेश चौहान के प्रभाव वाले इलाकों में अनु कक्कड़ पिछड़ी हैं। उससे इस तरह की चर्चाओं को बल भी मिलता है। क्योंकि विधायक आदेश चौहान निशंक खेमे के मजबूत पिलर माने जाते हैं। इससे इतर पार्टी के अंदरूनी सूत्र बताते हैं कि पिछले दिनों मदन कौशिक और सांसद रमेश पोखरियाल निशंक की दो गुप्त बैठकें दिल्ली में हुई थी। जिसमें दोनों के बीच यह सहमति बनी थी कि निशंक केंद्रीय राजनीति करेंगे। यानी लोकसभा चुनाव के दौरान कौशिक खेमा उनका पूरा साथ देगा। प्रदेश की राजनीति के मद्देनजर हरिद्वार में कौशिक को निशंक साथ देंगे। मगर भाजपा उम्मीदवार की हार से इस समझौते पर कितना असर पड़ेगा, यह भविष्य में पता चलेगा।
भाजपा के कुछ वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी भी मेयर सीट के इस परिणाम के लिए उत्तरदायी हो सकती है। कुछ वरिष्ठ नेताओं ने भी चुनाव में दिलचस्पी नहीं दिखाई। उसका कारण निवर्तमान मेयर मनोज गर्ग के गृह वार्ड गोविंदपुरी में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। जबकि यहां मलिन बस्ती के कारण मदन कौशिक का यह अतिसुरक्षित क्षेत्र माना जाता था।
भाजपा उम्मीदवार अनु कक्कड़ पंजाबी समाज की हैं। इसके बावजूद हरिद्वार के पंजाबी समाज उनका खुलेमन से समर्थन नहीं किया। पंजाबी बाहुल्य वार्ड से भी अनु कक्कड़ पिछड़ गईं। इसका कारण यह माना जा रहा है कि अनु कक्कड़ की छवि साफ-सुथरी नहीं है।
मेयर पद पर भाजपा की हार का एक बड़ा कारण इस बार कांग्रेस नेताओं की एकजुटता भी रही है। चुनाव में पूरी कांग्रेस लॉबी पर इस बार मदन कौशिक के लिए काम करने का ठप्पा नहीं लगा। शहर में हर चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद यही चर्चा रहती है कि उनके स्थानीय नेताओं ने अंदरखाने मदन कौशिक के लिए काम किया। इस बार ऐसा कुछ नहीं रहा। तभी कांग्रेस यहां मेयर सीट पर मदन कौशिक के उम्मीदवार को धराशायी कर पाई। मलिन बस्ती के वोटर मदन कौशिक का वोट बैंक माने जाते हैं। राज्य बनने के बाद से ही मदन कौशिक हरिद्वार से विधायक हैं। इन मलिन बस्तियों को बसाने में उनका हाथ बताया जाता रहा है। इसलिए वहां के वोटर हमेशा से मदन कौशिक को वोट करते रहे हैं। विधानसभा चुनाव के अलावा दूसरे चुनाव में यहां के वोटर मदन कौशिक के कहने पर ही वोट डालते हैं। पर इस बार मंत्री जी के वेरी-वेरी रिजर्व वोट बैंक में भी कांग्रेस ने सेंध लगा ही ली। सबसे बड़ी मलिन बस्ती वाले क्षेत्र गोविंदपुरी वार्ड में भी कांग्रेस जीत दर्ज कर ली। यह क्षेत्र मंत्री जी का एकछत्र किला माना जाता रहा है। वहां से मेयर सीट पर अनु कककड़ तो पिछड़ी हीं, वार्ड में भी कांग्रेस की आशा सारस्वत ने बीजेपी की शालिनी शर्मा को मात दे दी।
कांग्रेस प्रत्याशी अनिता शर्मा को मेयर बनाने में मुस्लिम वोट बैंक ने किंगमेकर की भूमिका निभाई है। अपेक्षा के अनुरूप अनिता शर्मा ने मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों मे झंडे गाड़े हैं। अकेले कस्साबान मोहल्ले से ही अनिता शर्मा को करीब एक हजार वोट की बढ़त मिली।

बात अपनी-अपनी

नगर निगम चुनाव में हमारा साथ ब्राह्माण-मुस्लिम समुदाय के लोगों ने खुलकर दिया। कनखल हालांकि हमारा होम ग्राउंड है पर पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस बेहद मजबूत स्थिति में आकर यहां उभरी है। चुनाव के नतीजों ने बता दिया कि जनता अब परिवर्तन चाहती है।
अनिता शर्मा, नवनिर्वाचित मेयर हरिद्वार 
कुछ रुष्ट कार्यकर्ताओं ने ही बीजेपी को हराने का काम किया है। कांग्रेस को यह भ्रम कतई नहीं पालना चाहिए कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भी उनका प्रभाव रहेगा क्योंकि लोकसभा चुनाव केवल और केवल भाजपा ही जीतेगी।
आलोक चौहान, अध्यक्ष भाजपा रानीपुर मंडल

गौचर में खिला कमल

के.एस. असवाल
नगर पंचायत गौचर में 2003 में कांग्रेस की शिव देवी और 2008 एवं 2013 में मुकेश नेगी ने जीत दर्ज की थी। लेकिन इस बार यह सीट पालिका बनी तो भाजपा की अंजू बिष्ट ने कांग्रेस प्रत्याशी इंदू पंवार को हराकर पहली नगर पालिका अध्यक्ष बनने का सौभाग्य प्राप्त किया।
गौचर के नगर पंचायत से नगर पालिका बनने पर यह पहला चुनाव था। अध्यक्ष पद के लिए सभी पार्टियों ने दांव लगाया था। लेकिन भाजपा की अंजू बिष्ट ने सभी को पछाड़ कर अध्यक्ष की कुर्सी प्राप्त की। सात वार्डों में से छह सीटों पर भी भाजपा विजयी रही जबकि कांग्रेस को 1 सीट प्राप्त हुई। चुनाव के बाद अब गौचर मेला शुरू हो रहा है। प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर को संजोये यह मेला विकास का प्रतीक है। यह  मेला 23 नवंबर से शुरू हो रहा है। एक समय सीमांत जनपदों के भोटिया जनजाति के लोगों ने गौचर मेले को नींव रखी, जो तिब्बत से व्यापार करते हुए चमोली के गौचर एवं पिथौरागढ़ के जौलजीवी में परांपरागत तरीके से एक हाट बाजार लगाते थे। जिसकी अहमियत अंग्रेजी हुकूमत ने स्वीकारी। अंग्रेजों ने ही इस हाट बाजार को मेले का स्वरूप दिया जिसके बाद यह धीरे-धीरे परंपरा बन गई। पूर्व में यह मेला 1 नवंबर से 7 नवंबर तक आयोजित होता था। आजादी के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू के जन्म दिवस 14 नवंबर से आयोजित किया जाने लगा। नगर निकाय चुनावों के चलते इस बार मेला 14 नवंबर से शुरू नहीं हो पाया लिहाजा जिला प्रशासन एवं मेला समिति इस बार 23 नवंबर से 29 नवंबर तक मेले का आयोजन कर रहे हैं। इस बार मेले में राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों को निमंत्रित किया गया है।

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