उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानम’ के अपने मूल उद्देश्य का मजाक उड़ा रहा है। अपने आकाओं पर श्रद्धा रखने वालों को यहां बड़े मजे से नियुक्तियां मिल जाती हैं। हाल में ऐसे ही आठ सहायक क्षेत्रीय निदेशकों की नियुक्ति सुर्खियों में है। जिन लोगों की नियुक्ति हुई वे या तो किसी नेता के चहेते हैं या फिर अट्टिकारी के। कुछ राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता इन नियुक्तियों के विरुद्ध अदालत में जाने का मन बना चुके हैं

 

उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय अपने मूल उद्देश्य से भटकता प्रतीत हो रहा है। ‘श्रद्धावान लभते ज्ञानम’ के अपने मोटो यानी मूल उद्देश्य का विश्वविद्यालय ही उपहास उड़ा रहा है। मंत्री से लेकर अधिकारी तक हर कोई बड़ी शान से यहां अपने निजी हित साध रहे हैं। हाल ही में इस विश्वविद्यालय में हुई सहायक क्षेत्रीय निदेशकों की नियुक्ति सुर्खियों में है। चहेतों को नियुक्ति देने के कथित आरोपों ने विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिÐ लगा दिया है। स्व एनडी तिवारी और डॉ इंदिरा हृदयेश के प्रयासों से 2005 में स्थापित इस विश्वविद्यालय का उद्देश्य शिक्षा का लोकतांत्रिकरण करना बताया गया था ताकि जनसंख्या के एक बड़े भाग तक व्यावसायिक शिक्षा पहुंच सके। परंतु जो संस्थान स्वयं में लोकतांत्रिक एवं पारदर्शी न हो उससे शिक्षा के लोकतांत्रिककरण की अपेक्षा कोई कैसे कर सकता है? सहायक क्षेत्रीय निदेशकों की नियुक्ति की प्रक्रिया में जिस प्रकार पर्दादारी बरती गई है उसने नियुक्ति की प्रक्रिया को कठघरे में खड़ा कर दिया है। राज्य के एक मंत्री और विश्वविद्यालय के अधिकारियों से जुड़े लोगों को जिस प्रकार नियुक्ति में तवज्जो दी गई है उससे साफ जाहिर होता है कि लिखित परीक्षा से लेकर नियुक्ति तक जो प्रक्रिया अपनाई गई उसमें व्यक्ति विशेषों के लिए ही परीक्षा की औपचारिकताएं निभाई गई, वरना ये पहले से तय था कि किन लोगों की नियक्ति होनी है।

उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय में सहायक क्षेत्रीय निदेशक के आठ पदों के लिए आवेदन मांगे गए थे। आवेदन मांगने के एक लंबे अंतराल के पश्चात 28 जुलाई 2019 को लिखित परीक्षा संपादित कराई गई। जिसमें देशभर से 700 से अधिक लोगों ने आवेदन किया था। सामान्यतः ऐसी परीक्षाओं में अंग्रेजी एवं हिंदी दोनों भाषाओं में प्रश्न पत्र होते हैं, परंतु यहां अपने खास लोगों की सहूलियत के हिसाब से प्रश्न पत्र सिर्फ हिंदी माध्यम से ही था। जब परीक्षा की प्रक्रिया एवं खास लोगों के चुने जाने की सुगबुगाहट शुरू हुई तो विश्वविद्यालय ने 30 अगस्त 2019 को स्किल टेस्ट करवाकर आनन-फानन में 2 सितंबर 2019 को कार्य परिषद की बैठक बुलाकर इन नियुक्तियों का अनुमोदन कराकर ई-मेल के माध्यम से उसी दिन नियक्ति पत्र भी जारी कर दिए। इस तरह 3 सितंबर 2019 को तुरत-फुरत ज्वाइनिंग भी ले ली गई। नियुक्त व्यक्तियों की सूची पर नजर डालें तो अपनों को तवज्जो देने के आरोपों में सच्चाई एक हद तक नजर आती है। सहायक क्षेत्रीय निदेशक पद पर चयनित गोविंद सिंह वर्तमान में उच्च शिक्षा राज्यमंत्री डॉ धन सिंह रावत के पूर्व निजी सहायक रह चुके हैं। दूसरे चयनित डॉ बृजेश बनकोटी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की राजनीति में सक्रिय रहे और लंबे समय तक विद्यार्थी परिषद के विभाग संगठन मंत्री रहे हैं। वर्तमान में आरएसएस की मजदूर शाखा भारतीय मजदूर संघ के प्रदेश संगठन महामंत्री हैं। तीसरी चयनित महिला भारतीय जनता पार्टी के एक नेता की बहन हैं। विश्वविद्यालय के अधिकारी भी इसमें पीछे नहीं रहे। कुलपति की निजी सचिव रेखा बिष्ट चयनित लोगों की सूची में हैं, वहीं सहायक परीक्षा नियंत्रक की पत्नी रुचि आर्या को भी नियुक्ति मिली है।

कुलपति डॉ ओपीएस नेगी भले ही सभी चयन त्रुटिहीन प्रक्रिया से होने का दावा करें, लेकिन चुने गये लोगों की सूची से लगता है कि लिखित परीक्षा से लेकर कम्प्यूटर कौशल परीक्षा व सक्षात्कार महज औपचारिकता थी और नियुक्त किए जाने वाले लोग पहले से तय थे। चर्चा है कि अनिल कण्डारी के लिए राज्य के एक आला मंत्री उत्सुक थे। अनुसूचित जाति कोटे से चयनित पंकज कुमार उप शिक्षा नियंत्रक सुमित प्रसाद के मौसेरे भाई बताए जाते हैं। इसी प्रकार भास्कर जोशी विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक प्रो. पीडी पंत के निकट संबंधी हैं। बताया जाता है कि प्रियंका लोहनी सिर्फ इसलिए चुन ली गई कि विश्वविद्यालय के ही एक प्रोफेसर उनकी सिफारिश कर रहे थे। सामान्य महिला हेतु क्षैतिज आरक्षण में प्रियंका लोहनी का चयन होता है। उनके ही आस-पास लिखित परीक्षा में 67.5 अंक लाने वाली प्रियंका सांगुड़ी फुलारा तथा 68.25 अंक लाने वाली मीना नेगी को कम्प्यूटर स्किल और साक्षात्कार में अंक इस तरह दिए जाते हैं जिससे वो प्रियंका लोहनी से कुछ कम अंक पाकर मैरिट में पीछे रह जाती हैं। इसी प्रकार अति पिछड़ा वर्ग में मनोहर सिंह पंवार लिखित परीक्षा में 75 ़25 कम्प्यूटर स्किल में 9 ़5 अंक और साक्षात्कार में 5 अंक पाते हैं। लेकिन यहां उनका मुकाबला गोविंद सिंह जो उच्च शिक्षा मंत्री डॉ धन सिंह रावत के पूर्व पीएस रह चुके हैं, से था। ऐसे में उनकी इस कोशिश का कोई मतलब नहीं था क्योंकि साक्षात्कार में उन्हें पिछड़ना ही था। गोविंद सिंह को साक्षात्कार में 7 अंक देकर मनोहर सिंह पंवार से आगे कर दिया जाता है। ‘दि संडे पोस्ट’ की जानकारी में ये भी आया है कि लिखित परीक्षा का प्रश्नपत्र सेट भी चयनित एक महिला अभ्यर्थी की मां ने किया था।

उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय हालांकि नियुक्तियों के मामले में हमेशा विवादित रहा है। इससे पूर्व भी एक वरिष्ठ अधिकारी को कार्यपरिषद के अनुमोदन से पहले ही ज्वाइन करा देने का आरोप कुछ वर्ष पूर्व भाजपा नेताओं ने लगाया था। परंतु इस बार सहायक क्षेत्रीय निदेशकों की नियक्ति में जिस प्रकार पारदर्शिता को ताक पर रखकर प्रक्रिया अपनाई गई उससे साफ होता है कि अपने चहेतों को नियुक्ति दिलाने में मंत्री व अधिकारी कितने उत्सुक थे। सब कुछ छिपाने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस नियुक्ति की परीक्षा से जुड़ी सूचनाओं को सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत मांगने से प्रतिबंधित कर दिया था। अंतिम परीक्षाफल के परिणाम में ये निर्देश दिया गया कि अभ्यर्थी के प्राप्तांक कट ऑफ मार्क्स की सूचना अंतिम चयन परिणाम घोषित किए जाने की कोई भी जानकारी भारत सरकार के सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत नहीं मांगी जा सकेगी, जबकि लोक सेवा आयोग और राज्य लोक सेवा आयोग प्रतियोगी परीक्षाओं की जानकारी स्वयं या सूचना का अधिकार के अंतर्गत उपलब्ध कराते हैं। अगर आप सही हैं तो इतने प्रतिबंध क्यों? खास बात है लिखित परीक्षा में वो ही व्यक्ति अच्छे अंकों से चुने गए हैं जो मंत्री, सत्तारूढ़ दल की विचारधारा और विश्वविद्यालय के लोगों से जुड़े हैं। सहायक परीक्षा नियंत्रक, कुलपति की पीएस के विषय में विश्वविद्यालय की आंतरिक परीक्षा प्रणाली कितनी पवित्र व निष्पक्ष रह पाई होगी, ये समझना आसान है और वो भी तब जब परीक्षा का आपने एक ही स्वकेंद्र रखा है।

कांग्रेस भी इन नियुक्तियों की प्रक्रिया एवं चयनित लोगों की पृष्ठभूमि पर सवाल उठा चुकी है। बार काउंसिल के सदस्य और पूर्व सांसद महेंद्र सिंह पाल तथा हल्द्वानी बार एसोसिएशन के अध्यक्ष गोविंद सिंह बिष्ट ने नियुक्तियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि दल एवं विचारधारा विशेष के लोगों को संस्थाओं में नियुक्त कर सरकार विचारधारा विशेष को संस्थाओं में थोपना चाहती है। अगर इन नियुक्तियों को रद्द नहीं किया गया तो वे न्यायालय की शरण लेंगे।

अंधा बांटे रेवड़ी

  • डॉ. बृजेश बनकोटी – भारतीय मजदूर संघ के महामंत्री

  • अनिल कंडारी – एक आला मंत्री के करीबी

  • भास्कर चंद्र जोशी – मुख्य परीक्षा नियंत्रक के करीबी रिश्तेदार

  • प्रियंका लोहनी – एक प्रोफेसर की करीबी रिश्तेदार

  • रेखा बिष्ट – कुलपति की निजी सचिव

  • रुचि आर्या – सहायक परीक्षा नियंत्रक की पत्नी

  • पंकज कुमार – उप परीक्षा नियंत्रक के मौसेरे भाई

  • गोविंद सिंह – उच्च शिक्षा मंत्री के पूर्व सचिव

 

बात अपनी -अपनी

उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय एकमात्र विश्वविद्यालय है जिसे स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी और मेरे प्रयासों से स्थापित किया गया जो कि अपने खूबसूरत भवन में चल रहा है। इस शीर्ष संस्था में हजारों विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। मेरी जानकारी में जो तथ्य आए हैं अगर उन पर नजर डालें तो इस संस्थान में शिक्षा की दुर्गति के लिए जो जिम्मेदार हैं उन्हें बख्शा नहीं जाना चाहिए। मेरी भारी नाराजगी है कि इन नियुक्तियों में भारी अनियमितताएं हुई हैं। बिना डरे खुलेआम बेईमानी हो रही है।
डॉ. इंदिरा हृदयेश, नेता प्रतिपक्ष

जिस प्रकार परीक्षार्थियों को परीक्षा की जानकारी लेने के लिए सूचना के अधिकार से वंचित किया गया है, ये घोर आपत्तिजनक है। यह चयन प्रक्रिया पर संदेह पैदा करता है।
डॉ महेंद्र सिंह पाल, पूर्व सांसद

सभी नियुक्तियां प्रक्रिया के तहत हुई हैं। लिखित परीक्षा के माध्यम से परीक्षार्थियों के चयन के बाद कम्प्यूटर परीक्षा एवं साक्षात्कार के बाद इन नियुक्तियों को कार्यपरिषद ने अनुमोदित किया है। तभी नियुक्ति पत्र जारी किए गए हैं। जहां तक आपका कुछ खास लोगों के निकट या परिचितों की नियुक्ति का प्रश्न है, तो ये छोटा प्रदेश है। यहां हर कोई किसी न किसी का खास है। जिसमें कुछ लोगों का पता चल जाता है तो कुछ लोगों का पता नहीं चल पाता।
डॉ. ओमप्रकाश सिंह नेगी, कुलपति उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय

इन नियुक्तियों में प्रक्रियाओं को ताक पर रख खास लोगों को नियुक्त करने के लिए परीक्षा का प्रपंच रचा गया है। इन नियुक्तियों को रद्द कर पारदर्शी तरीके से योग्य व्यक्तियों का चयन किया जाना चाहिए।
गुरविंदर सिंह चड्डा, आरटीआई एवं सामाजिक कार्यकर्ता

सारी नियुक्तियां पारदर्शी प्रक्रिया के तहत हुई हैं इन पर प्रश्नचिÐ लगाना गलत है।
डॉ अनिल कपूर, प्रदेश प्रवक्ता भाजपा

नोट :- इस संबंध में उच्च शिक्षा राज्यमंत्री डॉ धन सिंह रावत का पक्ष जानने के लिए फोन से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनके पीएस द्वारा बाद में बात कराने की बात कही गई। लेकिन बाद में किसी प्रकार का संपर्क नहीं साधा गया।

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