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Uttarakhand

बसपा की कीमत पर आगे बढ़ती आप

बहुजन समाज पार्टी उत्तराखण्ड गठन के बाद से राज्य में कांग्रेस-भाजपा से इतर एक तीसरे शक्ति केंद्र के रूप में उभरने लगी थी। वर्ष 2012 में तो कांग्रेस के नेतृत्व में बनी सरकार में बसपा ने भागीदारी करने का सफर तक तय कर डाला था। वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में लेकिन बसपा का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। इस बार भी कुछ ऐसा ही होने की संभावना नजर आने लगी है। बसपा के अधिकांश बड़े नेता पार्टी छोड़ने को आतुर हैं जिन्हें लपकने के लिए आम आदमी पार्टी ने अपनी बाहें फैला दी हैं

 

उत्तराखण्ड में चुनावी सरगर्मियां जोरों पर है। जैसे-जैसे ठंड बढ़ रही है वैसे ही चुनावी राजनीति में गर्माहट बढ़ती जा रही है। उत्तराखण्ड के लिए यह महीना राजनीतिक रूप से बहुत खास रहा है। प्रदेश में कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे राहुल गांधी और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों ने आगामी विधानसभा चुनाव का बिगुल बजा दिया है। इसके साथ ही आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ ही दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने भी उत्तराखण्ड में जनसभाएं कर मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की कवायद शुरू कर दी है। उत्तराखण्ड क्रांति दल भी मिशन 2022 को लेकर गंभीर हो गया है। उत्तराखण्ड क्रांति दल की गंभीरता को इससे समझा जा सकता है कि इस दल ने सबसे पहले चुनावी घोषणा पत्र उतार कर चुनावी समर में मजबूती से उतरने का एलान कर दिया है। लेकिन वहीं दूसरी तरफ उत्तराखण्ड में कभी तीसरी ताकत के रूप में जाने जानी वाली बहुजन समाज पार्टी ने अभी तक अपने राजनीतिक अस्त्र म्यान से बाहर तक नहीं निकाले हैं। राज्य स्थापना के बाद उत्तराखण्ड में बहुजन समाज पार्टी न केवल तीसरे दल के रूप में सबसे मजबूत बनकर उभरी थी, बल्कि एक बार किंग मेकर की भूमिका में भी सामने आई थी। 2012 में बसपा के समर्थन की बदौलत ही प्रदेश कांग्रेस की सरकार बनी थी। 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा कोटे से बकायदा उत्तराखण्ड में पार्टी के हरिद्वार जिले की भगवानपुर सीट से विधायक रहे सुरेंद्र राकेश को कांग्रेस सरकार में मंत्री बनाया था।

बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने वैसे तो उत्तराखण्ड में 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है, लेकिन अभी तक भी वह राजनीतिक रूप से सक्रिय नहीं दिखाई दे रही है। महज एक जिले हरिद्वार को छोड़ दें तो बसपा के उम्मीदवारों की कहीं घोषणा भी नहीं हुई हैं। गत दिनों उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के पार्टी प्रभारी शम्सुद्दीन राइन ने हरिद्वार जिले की महज 5 विधानसभा सीटों पर पार्टी प्रत्याशियों की घोषणा की है। जिनमें लक्सर विधानसभा के लिए पूर्व विधायक मोहम्मद शहजाद, खानपुर के लिए चैधरी रविंद्र पनियाला, झबरेड़ा के लिए आदित्य बृजपाल, हरिद्वार ग्रामीण के लिए दर्शनलाल शर्मा, पिरान कलियर सीट के लिए सुरेंद्र सैनी को प्रभारी घोषित किया गया है। गौरतलब है कि बसपा में विधानसभा प्रभारी को ही पार्टी का उम्मीदवार माना जाता रहा है।

बसपा का राज्य में सिमटता जनाधार और आम आदमी पार्टी की तेज होती सक्रियता के चलते उत्तराखण्ड में इस बार मुख्य मुकाबला भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच हो सकता है। हालांकि उत्तराखण्ड क्रांति दल भी एक बार फिर अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस लाने के लिए सक्रिय तौर पर मतदाताओं के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करता दिखाई दे रहा है। हालांकि हरिद्वार जिले में पिछले दिनों बसपा ने एक उपलब्धि हासिल की है। भगवानपुर विधानसभा क्षेत्र के भाजपा नेता सुबोध राकेश ने भाजपा को अलविदा कह बसपा ज्वाइन कर ली है। सुबोध राकेश भगवानपुर के पूर्व विधायक और कैबिनेट मंत्री रहे सुरेंद्र राकेश के भाई हैं। सुबोध राकेश 2017 में भाजपा के टिकट पर भगवानपुर से विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुके थे। तब वह अपनी भाभी और कांग्रेस की कैंडिडेट ममता राकेश से हार गए थे। इसके बाद सुबोध राकेश ने भगवानपुर नगर पंचायत का चुनाव अपनी माता सहती देवी को भाजपा के टिकट पर लड़ाया था। जिसमें वह चुनाव जीत गई थी।

गौरतलब है कि राज्य में जब 2002 में पहले विधानसभा चुनाव हुए तो तब सबसे ज्यादा सीटें कांग्रेस को मिली थी। जिसमें कांग्रेस को 36 तो भाजपा को 19 तथा बहुजन समाज पार्टी को सात सीटें मिली थीं। बसपा को तब हरिद्वार जिले की 9 में से 5 सीटों पर विजय मिली थी। जिनमें लालढ़ाग, बहादराबाद, इकबालपुर, मंगलौर व लंढौरा आदि थी। इसके अलावा ऊधमसिंह नगर जिले की 7 में से 2 सीटों सितारगंज, पंतनगर-गदरपुर पर जीत मिली थी। इस तरह राज्य बनने के बाद पहले ही आम चुनाव में बसपा को कुल 7 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। इनमें पंतनगर के अलावा सभी 6 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटें थीं।

प्रदेश में जब 2007 में दूसरे विधानसभा चुनाव हुए तो बसपा ने न केवल अपना पुराना प्रदर्शन दोहराया बल्कि पहले से एक सीट की ज्यादा बढ़त हासिल की। तब भी बसपा हरिद्वार जिले में 6 सीटें लालढ़ाग, बहादराबाद, भगवानपुर, इकबालपुर, मंगलौर व लंढौरा (अनुसूचित जाति आरक्षित) के अलावा ऊधमसिंह नगर जिले में 2 सीटें सितारगंज (अनुसूचित जाति आरक्षित) और पंतनगर-गदरपुर सहित कुल 8 सीटें जीतने में कामयाब रही थी।

प्रदेश में 2008 का परिसीमन हुआ। इसके बाद 2012 में तीसरा विधानसभा चुनाव हुआ तो बसपा की राजनीतिक ताकत काफी घटने लगी। इस परिसीमन में ऊधमसिंह नगर जिले में 2 सीटें बढ़ गई थी। उसके बाद यहां कुल सीटों की संख्या 9 हो गई। जिसमें बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। इसी तरह हरिद्वार जनपद में भी नए परिसीमन के बाद 2 विधानसभा सीटें बढ़ीं। जिनमें कुल विधानसभा सीटें 11 हो गईं। लेकिन यहां बसपा को केवल 3 सीटों भगवानपुर (आरक्षित), झबरेड़ा और मंगलौर सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। इनमें भी भगवानपुर सीट पर बाद में हुए उपचुनाव में यह सीट कांग्रेस ने बसपा से झटक ली। उसके बाद बसपा के पास महज 2 सीटें ही रह गईं। मत प्रतिशत के हिसाब से देखा जाए तो अलग राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड में बसपा का मजबूत जनाधार रहा है। राज्य गठन के बाद पहली बार वर्ष 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में बसपा ने 10.93 मत प्रतिशत लेकर सात सीट पर कब्जा जमाया था और तीसरी ताकत के रूप में सामने आई थी। 2007 में हुए दूसरे विधानसभा चुनाव में बसपा को 11.76 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। मत प्रतिशत में बढ़त के साथ ही पहले के मुकाबले बसपा की एक सीट बढ़ी। इसके साथ ही बसपा ने उत्तराखण्ड में तीसरे सबसे बड़े दल के रूप में अपनी पकड़ को और अधिक मजबूत कर लिया था। यह बसपा का अब तक का सबसे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा था। वर्ष 2012 में हुए तीसरे विधानसभा चुनाव में बसपा का मत प्रतिशत तो बढ़ कर 12.19 प्रतिशत तक पहुंच गया था। लेकिन सीटों की संख्या आठ से घट कर तीन पर पहुंच गई थी। राज्य के चैथे 2017 के विधानसभा चुनावों में केवल बसपा के जनाधार में भारी गिरावट देखने को मिली। तब बसपा का मत प्रतिशत गिरकर 6.98 ही रह गया था। इसी के साथ 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा का निराशाजनक प्रदर्शन देखने को मिला और उसकी झोली खाली रही। इस विधानसभा चुनाव में हाथी जीरो से आगे नही बढ़ सका।

नए विकल्प के तौर पर उत्तराखण्ड में आम आदमी पार्टी की धमक

आम आदमी पार्टी ने सबसे पहले बसपा के पूर्व में कैंडिडेट रहे नेताओं को अपने पाले में करा। जिनमें गदरपुर से बसपा के 2017 में मजबूत प्रत्याशी रहे जरनेल सिंह काली, रानीखेत से बसपा के 2017 में प्रत्याशी रहे और पार्टी के अल्मोड़ा जिलाध्यक्ष रहे कृपालराम, जागेश्वर से पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा उम्मीदवार रहे तारा पांडेय, कपकोट से 2012 में प्रत्याशी रहे कर्ण सिंह दानू, यहीं से 2017 में बसपा के ही उम्मीदवार रहे भूपेश उपाध्याय, चंपावत से 2012 में हाथी के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लडे़ मदन महर, बागेश्वर से 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ चुके बसंत कुमार, हरिद्वार से प्रशांत राय तथा खटीमा से रमेश राणा ऐसे नेता हैं जिन्होंने 2017 का विधानसभा चुनाव बसपा के टिकट पर लड़कर कड़ी टक्कर दी थी। वर्तमान में उक्त सभी नेता अब बसपा छोड़ आम आदमी पार्टी का दामन थाम चुके हैं। इनमें से अधिकतर को आम आदमी पार्टी अपना 2022 का विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बना चुकी है। इससे बसपा की जमीन आम आदमी द्वारा हाइजैक होती दिखाई दे रही है। आप की इस रणनीति के चलते बसपा जनाधार के प्रमुख क्षेत्र रहे तराई के ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार की 20 विधानसभा सीटों पर अब पूर्व की भांति बसपा का नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी का जोर दिखाई दे रहा है। उत्तराखण्ड में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने पूरी जान फूंक दी है। जबकि इसके बनिस्वत बहुजन समाज पार्टी अभी तक प्रदेश में कहीं खड़ी तक नहीं दिखाई दे रही है।

 

हाथी की मंद चाल, हाथ में आई जान

कभी हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जनपदों की राजनीति में बसपा का एक निश्चित जनाधार था। देखने में आता है कि इसके चलते यहां कांग्रेस के लिए ज्यादा परेशानी रही है। ऐसा इसलिए भी बताया जाता रहा है कि बसपा के कारण ही कांग्रेस तराई के इन दो जिलों में पिछले तीनों विधानसभा चुनावों में भाजपा के मुकाबले हर बार पिछड़ती रही है। लेकिन इस बार बसपा की निष्क्रियता के चलते कांग्रेस की भी बांछे खिल गई हैं। कांग्रेस को उम्मीद है कि आगामी विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट बैंक उससे छिटककर उनकी पार्टी की ओर शिफ्ट हो जाएगा। प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पिछले विधानसभा चुनाव में सितारगंज से बसपा के प्रत्याशी रहे नवतेज पाल सिंह के अनुसार बसपा के बहुत सक्रिय नहीं होने का पार्टी को फायदा मिल सकता है। क्योंकि ऐसी स्थिति में कांग्रेस और भाजपा का सीधा मुकाबला होने की संभावना बन सकती है। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर में दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या काफी है, ऐसे में पार्टी को इन दोनों जिलों में बढ़त मिल सकती है।

यहां यह भी बताना जरूरी है कि तराई क्षेत्र में बसपा का असर कम करने के लिए कांग्रेस के दिग्गज नेता पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की तर्ज पर दलित मुख्यमंत्री बनने का जिक्र कर चुके हंै। इसके बाद ही भाजपा के कैबिनेट मंत्री रहे यशपाल आर्या और उनके पुत्र नैनीताल विधायक संजीव आर्या ने कांग्रेस ज्वाइन कर ली थी। उत्तराखण्ड में अनुसूचित जाति की आबादी करीब 18 फीसदी है। इसमें ज्यादातर तराई क्षेत्र में है। पार्टी रणनीतिकार मानते हैं कि चन्नी को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाने के बाद दलितों का कांग्रेस पर विश्वास बढ़ा है और विधानसभा चुनाव में इसका फायदा कांग्रेस को मिल सकता है।

 

बात अपनी-अपनी

बसपा में सबसे बड़ी कमी यह रही है कि पार्टी ने उत्तराखण्ड का प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया। प्रदेश अध्यक्ष ज्यादातर उत्तर प्रदेश से आते रहे और वह पार्टी के प्रत्याशियों को टिकट देने के नाम पर लूटते खाते रहे। पैसे दे देकर टिकट दिए जाते और चुनाव लड़ने के बाद उन प्रत्याशियों को पूछा तक नहीं जाता था। जिससे न केवल नेताओं बल्कि कार्यकर्ताओ तक में पार्टी के प्रति निराशा का माहौल पैदा हो गया था। बाद में कार्यकर्ताओं की यही निराशा निराशाजनक प्रदर्शन में परिवर्तित हो गई। ऐसी स्थिति में बसपा के नेता आम आदमी पार्टी की ओर शिफ्ट होना शुरू हो गयें हैं।’ अभी बसपा के प्रदेश स्तर के कई बड़े नेता आम आदमी पार्टी के संपर्क में हैं जो जल्द ही बसपा छोड़ आप की सदस्यता ग्रहण कर लेंगे।

कृपाल राम, पूर्व बसपा जिलाध्यक्ष, अल्मोड़ा

भाजपा ने प्रदेशवासियों को धोखा दिया है। केंद्र सरकार ने वायदों को पूरा नहीं किया है। बसपा अभी बूथ कमेटी, सेक्टर व विधानसभा कमेटी पर फोकस कर रही है। प्रदेश में कितनी सीटों पर चुनाव लड़ना है यह बहनजी तय करेंगी। सूची जारी करने के विषय में वह ही निर्णय लेगी। सभी को साथ लेकर आगे बढ़ा जाएगा। पूरी कोशिश रहेगी कि बिना बसपा के समर्थन के कोई सरकार प्रदेश में न बने। भाजपा ने प्रदेश में पांच साल में कुछ नहीं किया। महंगाई, बेरोजगारी जैसे तमाम मुददे हैं। उत्तराखण्ड में हमारी पार्टी शिक्षा, स्वास्थ्य व बेरोजगारी को लेकर जनता के बीच जाएगी और रिकार्ड तोड़ जीत हासिल करेगी।

शीशपाल चैधरी, प्रदेश अध्यक्ष, बसपा, उत्तराखण्ड

प्रदेश की जनता भाजपा और कांग्रेस से उकता चुकी है। बारी-बारी दोनों ने ही प्रदेश को जमकर लूटा है। इस बार जनता परिवर्तन करेगी। जनता ऐसे दल को ही वोट करेगी जो प्रदेश में शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और पलायन के मुद्दों का समाधान कराने में सक्षम होगी। हमारी पार्टी किसी एक विशेष दल के नेताओं को अपनी पार्टी में ज्वाइनिंग नहीं करा रहे है बल्कि जिताऊ कैंडिडेट ही उनकी पार्टी में आ रहे हैं। चाहे वह किसी भी दल के हों।

दिनेश मोहनिया, प्रभारी, आम आदमी पार्टी, उत्तराखण्ड

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