[gtranslate]
Uttarakhand

कांग्रेस में नहीं यशपाल की काट

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक ऐसी बड़ी भूल कर दी थी जो आगामी विधानसभा चुनाव में भी पार्टी के लिए भारी पड़ने वाली है। दरअसल, तब कांग्रेस के पास यशपाल आर्य एक ऐसे बड़े दलित चेहरा थे जो अपने काम और व्यवहारकुशलता के कारण सवर्णों में भी लोकप्रिय हैं। लेकिन कांग्रेस यशपाल को संभाल नहीं पाई और भाजपा ने उन्हें लपकने में जरा भी देर नहीं की। तब कांग्रेस को यह अहसास नहीं रहा कि आखिर प्रदेश की 18 से 20 सीटों पर दलित मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। अब 2022 में कांग्रेस के पास यशपाल आर्य जैसा कोई बड़ा अस्त्र नहीं हैं, तो चुनावी संग्राम में जूझने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटना स्वाभाविक होगा

उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव के लिए अब ज्यादा समय नहीं बचा है। अगले साल 2022 के शुरू में ही चुनाव हो जाएगा। इसी के चलते राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो चुकी हैं। भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, उत्तराखण्ड क्रांति दल और आप सहित क्षेत्रीय दलों ने भी अपने-अपने स्तर से चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं। भारतीय जनता पार्टी अपने भरपूर संसाधनों के बल पर चुनाव की तैयारियों में सबसे आगे दिख रही है, वहीं कांग्रेस के नए प्रभारी देवेंद्र यादव के आने के पश्चात कांग्रेस संगठन भी सक्रिय दिख रहा है। राजनीतिक दल क्षेत्रीय समीकरणों के साथ-साथ जातीय समीकरणों को साधने की दिशा में भी काम कर रहे हैं। सवर्ण बाहुल्य उत्तराखण्ड राज्य में संख्या के हिसाब से ठाकुर मतदाता लगभग 60 प्रतिशत हैं। ब्राह्मणों का प्रतिशत भी अच्छा-खासा है। सवर्ण मतदाताओं के अतिरिक्त एक और बड़ा तबका है जिसकी अनदेखी कोई भी राजनीतिक दल नहीं कर सकता। वो है दलित तबका जो कि 19 से 20 प्रतिशत तक है। आजादी के बाद से ही कांग्रेस का परंपरागत समर्थक रहा दलित वर्ग अब अपनी नई भूमिका की तलाश में है। अब किसी का पिछलग्गू की मानसिकता से उबरता ये वर्ग उत्तराखण्ड की राजनीति में अपनी नई पहचान के लिए अग्रसर है। खास बात ये है कि राज्य की 18 से 20 विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाने वाला दलित मतदाता अपने लिए एक बड़े चेहरे की तलाश में है जो उसे उत्तराखण्ड की राजनीति में पहचान दे सके।

आज राजनीतिक दलों खासकर भाजपा-कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती यही है कि राज्य के सबसे दलित वर्ग पर अपनी पकड़ कैसे बनाई रखी जाए। भाजपा को पहले सवर्ण वर्ग की पार्टी ही माना जाता था, लेकिन कांग्रेस के साथ ऐसा नहीं था। ठाकुर, ब्राह्मण के साथ उसके पास दलित एवं मुस्लिम का मजबूत गठजोड़ था जो उसे सत्ता में बनाए रखता था। लेकिन उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद समीकरण बदले हैं। जहां सवर्ण मतदाता रुझान के अनुसार कांग्रेस-भाजपा में बंध गए, वहीं ज्यादातर दलित मतदाता खासकर मैदानी क्षेत्रों में मायावती की बहुजन समाज पार्टी एवं भाजपा की ओर चला गया। पर्वतीय क्षेत्रों में कुछ प्रतिशत दलित मतदाता कांग्रेस से छिटक कर भाजपा की ओर चला गया।

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस के सामने दलित मतदाताओं को अपने-अपने पाले में लाने की चुनौती है। ज्यादा बड़ी चुनौती कांग्रेस के सामने है। चुनाव में कांग्रेस के सामने भारतीय जनता पार्टी की चुनौती तो है ही, मगर चुनौती उस दलित वर्गा को अपनी ओर लाने की भी है जो कभी उसका परंपरागत वोटर हुआ करता था। ये विडंबना ही है कि कभी दलितों के एकमुश्त वोटों पर अधिकार रखने वाली कांग्रेस के पास आज प्रदेश स्तरीय कोई ऐसा दलित चेहरा नहीं है जिसको आगे कर वो दलित वोटरों को रिझा सके। कांग्रेस के बड़े नेता यशपाल आर्य के भाजपा में जाने के बाद की शून्य कांग्रेस में पैदा हुआ है उसे कांग्रेस आज तक नहीं भर पाई है या यूं कहें कि उस शून्य को भरने का प्रयास पार्टी ने किया ही नहीं। यूं तो कांग्रेस में राजपूत नेता हरीश रावत और इंदिरा हृदयेश ब्राह्मणों में बड़ा चेहरा हैं और ठाकुर-ब्राह्मण नेताओं की एक लंबी पांत है, लेकिन दलित नेता कहीं नजर नहीं आता जो इनके समकक्ष हो। वह भी उस कांग्रेस के पास जो दलितों के सबसे बड़े पैरोकार होने का दंभ भरती है और दावा करती है कि दलित वर्ग के हित सिर्फ कांगे्रस में ही सुरक्षित हैं। हालांकि कांग्रेस में राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा भी दलित वर्ग से ही आते हैं, लेकिन उनकी अपील जनता में उतनी प्रभावी नहीं है जो कांग्रेस के लिए दलित मतदाताओं को खींच सके। आगामी विधानसभा चुनाव में ये फैक्टर कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकता है।

भारतीय जनता पार्टी का जहां तक सवाल है उसके पास भी ऐसा कोई बड़ा नेता नहीं था जिसे वो अपने दलित वर्ग के चेहरे के रूप में प्रस्तुत कर सके। अमित शाह के भाजपा अध्यक्ष का कार्यभार संभालने के बाद भाजपा ने इसके लिए सोशियल इंजीरियरिंग पर कार्य शुरू किया और उनके जातीय प्रबंधन का परिणाम अन्य पार्टियों के जातीय नेताओं को अपने साथ जोड़ने के प्रवाह के रूप में हुआ। उत्तराखण्ड में 2017 के विधानसभा चुनाव से ऐन वक्त पहले कांग्रेस के बड़े दलित नेता जिनका चेहरा पूरे प्रदेश में दलित नेता के रूप में मान्य था यशपाल आर्य और उनके पुत्र संजीव आर्य को अपने साथ जोड़कर अमित शाह ने अपनी शैली को उत्तराखण्ड में भी अंजाम दिया। अमित शाह के लिए उन चुनावों में यशपाल आर्य का महत्व इतना ज्यादा था कि परिवारवाद के खिलाफ भाजपा के स्थापित सिद्धांत को दरकिनार करते हुए उन्होंने यशपाल आर्य को बाजपुर और उनके पुत्र संजीव आर्य को नैनीताल से टिकट दे दिया। यशपाल आर्य का कांग्रेस छोड़ने का कारण भी यही था कि वो अपने साथ संजीव के लिए भी कांग्रेस से टिकट मांग रहे थे जिसे कांग्रेस ने स्वीकार नहीं किया। आज यशपाल आर्य भाजपा का बड़ा दलित चेहरा बनकर उभरे हैं। ऐसा नहीं है कि भाजपा के पास दलित नेता नहीं हैं। खजान दास, अजय टम्टा जैसे नेता हैं, लेकिन उनका प्रभाव अपने क्षेत्रों तक ही सीमित है। यशपाल आर्य पर विश्वास जताकर पार्टी उनका भरपूर फायदा उठा रही है। जनता के बीच यशपाल आर्य की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लाया जा सकता है कि वर्ष 1989 और 1993 में खटीमा विधानसभा क्षेत्र से उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने जाने के बाद यशपाल आर्य ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद 2002 में हुए विधानसभा चुनाव में वे मुक्तेश्वर विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए तथा विधानसभा अध्यक्ष बने। 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में फिर मुक्तेश्वर से विधायक बने।

विधानसभा क्षेत्रों के नए परिसीमन के बाद मुक्तेश्वर विधानसभा सीट खत्म होने के बाद उन्होंने बाजपुर सीट पर अपना भाग्य आजमाया और विधायक चुने जाने के बाद 2012 में विजय बहुगुणा और हरीश रावत की कैबिनेट में वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री रहे। 2017 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने के बाद बाजपुर विधानसभा सीट से विधायक चुने जाने के बाद कैबिनेट मंत्री हैं। भारतीय जनता पार्टी में उनका कितना महत्व है वो इसी बात से जाहिर होता है कि सल्ट विधानसभा उपचुनाव लड़ाने की जिम्मेदारी भाजपा ने यशपाल आर्य को ही दी है। साथ ही भारतीय जनता पार्टी के अनुसूचित मोर्चे की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी उन्हें जगह दी गई है। इससे पहले हल्द्वानी नगर निगम में मेयर को जिताने की जिम्मेदारी, पंचायती चुनाव एवं सहकारी चुनाव में भाजपा की सफलता के पीछे यशपाल आर्य की कुशल रणनीति थी।

यशपाल आर्य आज उत्तराखण्ड की राजनीति में एक बड़ा दलित चेहरा हैं, लेकिन उन्हें एक दलित के दायरे में ही बांधकर देखना उनकी छवि से मेल नहीं खाता। खुद यशपाल आर्य का भी कहना है कि सिर्फ जाति के दायरे में रख उनका मूल्यांकन करना उनके साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने राजनीति और धर्म के बंधनों से ऊपर उठकर जनता के हर वर्ग के लिए काम किया है। शायद उनके इसी आत्मविश्वास का परिणाम था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने नैनीताल-ऊधमसिंह नगर लोकसभा सीट से दावेदारी प्रस्तुत की थी। हालांकि पार्टी ने उन्हें प्रदेश की राजनीति में ही रखना ज्यादा उचित समझा। यशपाल आर्य और उनके पुत्र संजीव आर्य ने नैनीताल लोकसभा सीट से पार्टी प्रत्याशी अजय भट्ट को जितवाने में अहम भूमिका निभाई। 2012 में उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पद की दहलीज पर पहुंच चुके यशपाल आर्य उस वक्त कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का शिकार हो गए थे, वरना उत्तराखण्ड को उसका पहला दलित मुख्यमंत्री मिल गया होता।

2012 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने यशपाल आर्य के प्रदेश अध्यक्ष रहते लड़ा था और कांग्रेस की सरकार बनी थी। नैनीताल- ऊधमसिंह नगर में यशपाल आर्य को छोड़कर शायद ही कोई ऐसा नेता हो जो नैनीताल के पर्वतीय क्षेत्र से लेकर नैनीताल एवं ऊधमसिंह नगर के तराई क्षेत्र में समान प्रभाव रखता हो। यशपाल आर्य से जब एक बार पूछा गया कि 2017 में अगर कांग्रेस में होते तो क्या हरीश रावत किच्छा से चुनाव हारते तो उनका स्पष्ट जवाब था कि नहीं हारते। शायद जमीनी नेताओं की हकीकत उनका आत्मविश्वास ही होता है। अब जब 2022 के विधानसभा चुनाव में मात्र नौ माह का समय बचा है, तो ये अंदेशा लगाना मुश्किल है कि उस वक्त की राजनीतिक परिस्थितियां क्या होंगी? कौन किस पाले में होगा? लेकिन फिलहाल इस वक्त में ये दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ है कि उत्तरखण्ड में कांग्रेस के पास बड़े दलित चेहरे का अभाव है और भाजपा सौभाग्यशाली है कि उसके पास यशपाल आर्य के रूप में एक बड़ा चेहरा है। भले ही 41 साल कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति में रहकर यशपाल आर्य का व्यक्तित्व निखरा हो, लेकिन आज का सच तो यही है कि वे भाजपा के बड़े नेता हैं।

You may also like

MERA DDDD DDD DD