Uttarakhand

कल फिर आएंगे हमसे बेहतर करने वाले

हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड

आपदा, पुनर्निर्माण, पुनर्वास की चुनौतियों से जूझते-जूझते भी भूमि सुधार का सवाल मुझे बार-बार झकझोरता था। मैं सुझाव मांगने मुख्यमंत्री एडवाइजरी काउंसिल के पास गया। वहां भी कई सवाल उठे, सबसे बड़ा सवाल उठा कि आपके पास यह सब करने के लिए मशीनरी कहां है। लोगों ने कहा कि यह दस वर्ष का प्रोजेक्ट है। मैं स्वयं जानता था कि इस कार्य का कोर बिंदु भू बंदोबस्त है जो पचास से अधिक वर्ष पहले हुआ था। मैंने राज्य की राजस्व व्यवस्था को टटोला, पता चला कि राज्य में पटवारियों की भारी कमी है। व्यवस्था के केंद्र बिंदु नायब तहसीलदार, पेशकार के ७० प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। राज्य में वर्ष २००३ के बाद पटवारियों की भर्ती ही नहीं हुई थी। मेरे सम्मुख प्रश्न था इस दिशा में कार्य कहां से प्रारंभ करूं। मैंने पहले संस्थागत ढांचा तैयार करने का निर्णय लिया और नई तहसीलें, उपतहसीलें और नए पटवारी हल्के गठित किए। राज्य की लगभग आधी तहसीलें, उपतहसीलें मेरे दौर में गठित हुई हैं। मैंने अनुभवी पटवारियों-पेशकारों को तरक्की देकर नायब तहसीलदार और पूर्व नायबों को तहसीलदार बनाया। फिर भी पटवारियों की कमी पूरा किए बिना भूमि सुधार की दिशा में सोचना भी कठिन था। मैंने सरकार के पहले ही वर्ष में पटवारियों के पदों को भरने का अधियाचन जारी करने के निर्देश दिए और सभी भूराजस्व रिकॉर्ड को सुधारने, अपडेट और कम्प्यूटराइज्ड करने के निर्देश दिए

पद पर रहते हुए आप ढेर सारे निर्णय लेते हैं एवं लागू करते हैं। मैं मुख्यमंत्री के रूप में इस मामले में खासा चर्चित रहा हूं। हारजन्य एकांत वास में मुख्यमंत्री के रूप में लिए गए ये निर्णय मेरे मन को गुद-गुदाते हैं। मुझसे कहते हैं, पट्ठे मौका मिला था खूब उपयोग किया। यदा-कदा टीबी डिबेट और अखबारी-बयानों में भी हमारे राजनीतिक विरोधी मेरे इन निर्णयों का हवाला देकर मुझे कोसते रहते हैं। धन्यवाद सत्ता पक्ष, सवा साल बाद भी मैं आपकी जुबान पर हूं। मुझे विश्वास है २०२२ तक मेरा नाम आपकी जुंबा पर बना रहेगा। यही स्वस्थ्य लोकतांत्रिक प्रेम है। ढेर सारे निर्णयों में कुछ अधूरे काम आपके मन में बड़ी कसक छोड़ जाते हैं। एक ऐसा ही निर्णय जिस पर मैंने बतौर मुख्यमंत्री काम तो किया, मगर काम अधूरा ही रह गया। बड़ी कसक दे गया है। यदि यह कार्य पूर्ण हो जाता तो मैं अपने जन्म को धन्य मानता। यह कार्य है राज्य में भूमि सुधारों को लागू करने का। आज जब इस विषय पर कुछ लिखने बैठा हूं तो, यह लेख आज सहित आने वाले मुख्यमंत्रियों को समर्पित कर रहा हू। इस लेख को लिखते वक्त मेरा मन बार-बार गुन-गुना रहा है ”कल फिर आएंगे हमसे बेहतर करने वाले” मेरी कामना है, वह कल शीद्घ्र आए। इस राज्य की बिडंवना है, लोगों ने कई बार भूमि सुधार के मुद्दे को छुआ पर आगे नहीं बढ़े। एक व्यक्ति इस मुद्दे को दोहराते -दोहराते विकास पुरुष बन गए। दूसरे सज्जन मुख्यमंत्री बन गए। मगर कोई आगे नहीं बढ़ा। राज्य के तराई भाबर में ऐसी भूमियों के कई प्रकार थे, जिन्हें नियमित करना बिजली के नंगे तार छूने जैसा था। यदि मैं इन भू प्रकारों का यहां जिक्र करूंगा तो लेख बहुत लंबा हो जाएगा। हरिद्वार में हजारों गरीब लोग छोटे-छोटे कब्जेधारक थे। पहाड़ों में दर्जनों इंदिरा ग्राम एवं हरिग्राम इसी श्रेणी में थे। वन भूमि के कब्जेदार विस्थापित भू आंवटी आदि के कब्जों और पट्टों को नियमिति करना बहुत सारी जटिलताएं थी। समस्या का छोर ढूंढ़ना हिब्रू पढ़ने जैसा कार्य था। चालू भूमि चकबंदी के साथ पहाड़ों में भूमि की चकबंदी का सवाल राज्य के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती के रूप में खड़ा था। हम सब जानते हैं, इस प्रश्न के समाधान में राज्य के अग्रोत्तर विकास की कुंजी छिपी हुई है। आपदा, पुनर्निर्माण, पुनर्वास की चुनौतियों से जूझते-जूझते भी भूमि सुधार का सवाल मुझे बार-बार झकझोरता था। मैं सुझाव मांगने मुख्यमंत्री एडवाइजरी काउंसिल के पास गया। वहां भी कई सवाल उठे, सबसे बड़ा सवाल उठा कि आपके पास यह सब करने के लिए मशीनरी कहां है। लोगों ने कहा कि यह दस वर्ष का प्रोजेक्ट है। मैं स्वयं जानता था कि इस कार्य का कोर बिंदु भू बंदोबस्त है जो पचास से अधिक वर्ष पहले हुआ था। मैंने राज्य की राजस्व व्यवस्था को टटोला, पता चला कि राज्य में पटवारियों की भारी कमी है। व्यवस्था के केंद्र बिंदु नायब तहसीलदार, पेशकार के ७० प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। राज्य में वर्ष २००३ के बाद पटवारियों की भर्ती ही नहीं हुई थी। मेरे सम्मुख प्रश्न था इस दिशा में कार्य कहां से प्रारंभ करूं। मैंने पहले संस्थागत ढांचा तैयार करने का निर्णय लिया और नई तहसीलें, उपतहसीलें और नए पटवारी हल्के गठित किए। राज्य की लगभग आधी तहसीलें, उपतहसीलें मेरे दौर में गठित हुई हैं। मैंने अनुभवी पटवारियों- पेशकारों को तरक्की देकर नायब तहसीलदार और पूर्व नायबों को तहसीलदार बनाया। फिर भी पटवारियों की कमी पूरा किए बिना भूमि सुधार की दिशा में सोचना भी कठिन था। मैंने सरकार के पहले ही वर्ष में पटवारियों के पदों को भरने का अधियाचन जारी करने के निर्देश दिए और सभी भूराजस्व रिकॉर्ड को सुधारने, अपडेट और कम्प्यूटराइज्ड करने के निर्देश दिए। मैंने राजस्व परिषद के अध्यक्ष, मुख्य सचिव, सचिव राजस्व को कहा कि वे राज्य हेतु चकबंदी का कैडर गठित करें और आवश्यक समझें तो रिटायर्ड राजस्व अधिकारियों की सेवाएं भी अधिग्रहित करें। भूमि सुधार की दिशा में सबसे बड़ी बाधा थी राज्य में बड़ी संख्या में बिखरे हुए कब्जेधारक और पट्टेधारक। देश में सर्वाधिक प्रकार का भूमि वर्गीकरण इस राज्य में था। मेरे मन को एक सवाल कुरेदता था कि अन्य मुख्यमंत्रियों ने इस समस्या का समाधान क्यों नहीं किया। इस समस्या का संवैधानिक पहलू भी था। कई कानूनी जटिलताएं सामने थी। इन सबके बावजूद मेरा स्पष्ट मानना था कि बिना इस उलझनपूर्ण वर्गीकरण को समाप्त किए और कब्जाधारकों को भू-द्घर के अधिकार दिए बिना राज्य में भूमि सुधार का कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ सकता है। मैंने स्वयं इस समस्या से जुड़ी फाइलों का कई बार अध्ययन किया और बहुत सारे लोगों से सलाह ली। सौभाग्य से मुझे अच्छे काम करने वाले सचिव का साथ मिला और मैंने समस्याग्रस्त समुद्र में छलांग लगा दी। आज उत्तराखण्ड में विद्यमान अंतरद्वंदयुक्त भूवर्गीकरण समाप्त हो गया है। मेरी सरकार का यह बड़ा फैसला था। मंत्रिमंडल ने एक राय से मगर विस्तृत विवेचना के बाद यह निर्णय लिया। डेढ़ लाख से अधिक लोगों के सर पर लटकी तलवार हट गई। अकेले हरिग्रामों में ऐसे सैंकड़ों काश्तकारों को हमारे निर्णय से नैनीताल में चल रहे भू-मुकदमों से छुटकारा मिल गया। तराई के कई क्षेत्रों में जहां इस समस्या के कारण गहरा सामाजिक तनाव रहता था, आज शांति है। हम कब्जेधारकों को मालिकाना हक देने में सफल हुए। इस बड़ी मशक्कत के बाद भी राज्य की आबादी का एक हिस्सा वन भूमि में कब्जेदार हैं। ये ऐसे लोग हैं जिन्हें विस्थापन के कारण भूमि मिली है, मगर मालिकाना हक नहीं मिला है। मैंने इस दिशा में आवश्यक पहल प्रारंभ की। दमुवाढूंगा, टिहरी विस्थापित, इंदिराग्राम जैसे बसावटों की भूमि का वर्गीकरण बदल कर उन्हें शहरी भूमि का दर्जा देकर नगर निकाय का भाग बना दिया है। हमने बिंदुखत्ता के लिए भी यही समाधान निकाला था जो उन्हें स्वीकार नहीं हुआ। विस्थापित पट्टे धारक और आपदा पीड़ित गैंडीखत्ता, पथरी, आमबाग, सितारगंज आदि में बसे हैं, मैंने उन्हें भी भूमि का मालिकाना हक देने की प्रक्रिया प्रारंभ करवाई। गोठ, खत्तों और सुअरखाल जैसे क्षेत्रों में मैंने इस समस्या का समाधान फोरेस्ट डेवलपर्स एक्ट के तहत खोजकर निराकरण की प्रक्रिया प्रारंभ की, जो अब भी चल रही है। इन सवालों से जूझते हुए मैंने भू-बंदोबस्त और चकबंदी के पक्ष प्रश्नों को कभी भी अपने मानस से ओझल नहीं होने दिया। राज्य का अपना कोई चकबंदी कानून एवं चकबंदी सोच का न होना सरकार के रास्ते में एक बड़ी कठिनाई थी। हरिद्वार सहित राज्य के एक बड़े हिस्से में हम उत्तर प्रदेश के वर्षों पुराने कानून और स्टाफ से चकबंदी का काम चला रहे हैं। यहां भी समस्या के हल के बजाय नई-नई समस्याएं पैदा हो रही हैं। मैंने उत्तर प्रदेश से डेपुटेशन पर लिए गए चकबंदी स्टाफ के साथ राज्य कैडर के लोगों को जोड़ा, ताकि उन्हें काम करते-करते प्रशिक्षित किया जा सके। इस सबके बावजूद पहाड़ी क्षेत्रों के लिए क्या किया जाए, बड़ा कठिन प्रश्न था। सीधे-सीधे चकबंदी के लिए लोग तैयार नहीं थे। मैंने जब इस प्रश्न को हल करना प्रारंभ किया, उस समय पहाड़ों में खेती-किसानी के लिए वातावरण नहीं रह गया था। लोग नौकरी के अलावा हल, कुदाल उठाने को उत्साहित नहीं थे। दुर्भाग्य से अभी भी यह उदासीनता बनी हुई है। गोष्ठियों आदि में भले ही हम इस दिशा में कुछ कह रहे हों, परंतु धरती पर कोई पहल करने को तैयार नहीं हैं। मैं स्वयं इसके लिए अपने गांव को तैयार नहीं कर पा रहा हूं। राज्य बनने से पहले भी स्वैच्छिक चकबंदी के लिए चौखुटिया और नौगांव विकासखंडों का चयन हुआ था। मेरी सरकार ने भी स्वैच्छिक चकबंदी को लागू करने के लिए चकबंदी ग्राम्य पुरस्कार योजना बनाई। ऐसे गांवों के विकास के लिए दो करोड़ रुपए की प्रोत्साहन राशि तय की गई। चकबंदी परिवारों को प्रथम ३ वर्ष में खेती सुधार एवं आवास के लिए धन देने का प्रावधान किया गया। मगर सारा अभियान श्री कुंवर सिंह कर्मठ साहब के जोश और स्व राजेंद्र सिंह रावत, बड़कोट के सफल प्रयासों तक सीमित रह गया। श्री रावत ने अपने गांवों में स्वैच्छिक चकबंदी करवाई और स्वप्रेरणा से करवाई। श्री रावत उत्तराखण्ड में जनसेवकाें में एक अनूठे उदाहरण हैं, जिन्होंने डॉ यशवंत सिंह परमार का रास्ता अपनाया। उत्तराखण्ड उनको उनके सदप्रयास के लिए हमेशा याद करता रहेगा। उन्होंने अपने द्घर गांव में स्वैच्छिक चकबंदी का सफल मॉडल तैयार किया। मैंने जब पर्वतीय चकबंदी कानून बनाने का निर्णय लिया तो इसके लिए स्व राजेंद्र सिंह के छोटे भाई श्री केदार सिंह रावत की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया। श्री नारायण दत्त तिवाड़ी जी ने भी स्व पूरन सिंह डंगवाल के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया था। सौभाग्य से केदार सिंह कमेटी ने गहन अध्यन के बाद एक समपुष्ट दस्तावेज तैयार किया, जिस पर पहले विभागीय मंत्री ने अधिकारी स्तर पर, फिर एक उप समिति ने विस्तृत मंथन किया। अंततोगत्वा इस दिशा में कानून बनाने का फैसला किया गया। राज्य में आई राजनीतिक अस्थिरता ने इस पवित्र कार्य को कई प्रकार से दुष्प्रभावित किया। पहले विभागीय मंत्री फिर कमेटी के अध्यक्ष दल बदल कर गए। मैंने हिम्मत नहीं हारी और अंततोगत्वा हमारी सरकार राज्य का चकबंदी कानून बनाने में सफल हुई। आज राज्य के पास एक कानूनी दस्तावेज है। इसके क्रियान्वयन के लिए मैंने विशेषज्ञों से एक रोडमैप बनवाया था। दोनों दस्तावेज आज राज्य की पूंजी हैं। यहां से आगे बढ़ने के लिए राज्य को नए सिरे से संकल्प शक्ति को समेटना पड़ेगा और राज्य के संसाधनों के एक बड़े हिस्से को प्रतिवर्ष चकबंदी और तत्पश्चात की आवश्यकताओं के लिए आवंटित करना पड़ेगा। अभी शासन में इस दिशा में कोई हलचल नहीं है। मुझे मालूम नहीं राज्य पलायन आयोग ने भी इस बिंदु पर अभी चर्चा प्रारंभ की है या नहीं। हम जितना देर करते जाएंगे, पलायन, गरीबी, बेरोजगारी के चक्र में फंसते जाएंगे। राज्य अपने गोल्डन हनीमून का दस वर्ष कब का बिता चुका है। अब तो सरकार के सम्मुख हर वर्ष चुनौतियां बढ़ती जाएंगी। बढ़ते हुए कर्ज के साथ संसाधन जुटाने की चुनौती से राज्य संद्घर्ष कर रहा है। हम अपनी सबसे बड़ी पूंजी भूमि का उपयुक्त उपयोग प्रारंभ किए बिना तरक्की के वर्तमान स्तर को बनाए नहीं रख पाएंगे। चकबंदी लागू करने के साथ भू-बंदोबस्त का बड़ा सवाल जुड़ा हुआ है। मैं भू-बंदोबस्त पर पृथक से कुछ लिखूंगा। मगर यह स्पष्ट है कि राजनीतिक दलों में चकबंदी के प्रश्न पर आम सहमति है। यह आम सहमति मुख्यमंत्री के लिए बड़ी ताकत है। सत्ता से बाहर मैं जागर लगाता रहूंगा, उम्मीद है सत्ता का देवता नाचेगा।

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