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Uttarakhand

निशाने पर क्यों हैं महारथी महाराज

सतपाल महाराज को कांग्रेस से भाजपा में आए करीब आठ साल हो गए हैं। लेकिन भाजपा संगठन और सरकार के मंत्री उन्हें पचा नहीं पा रहे हैं। यहां तक कि उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। उनके बयानों का शासकीय प्रवक्ता खारिज तक कर देते हैं

कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज एक बार फिर भाजपा नेताओें के निशाने पर है। महाराज के बयानों पर भाजपा नेताओं द्वारा जिस तरह से त्वरित प्रतिक्रिया दी जाती है उससे यह तो साफ है कि आज भी भाजपा का एक तबका उनकी हर तरह से मुखालफत करने में ही लगा हुआ है। भाजपा संगठन उन्हें आज तक पचा नहीं पाया है। यहां तक कि महाराज के बयान को सरकार के प्रवक्ता द्वारा हवा-हवाई बताकर बयान को महत्वहीन करने की बात हो या फिर बैठकों में महाराज के द्वारा कही गई बातों को नकारने की बात हो, कमोवेश सतपाल महाराज को लेकर अनेक बार भाजपा में ही ऐसी बातें समाने आ चुकी हैं। इससे यह तो स्पष्ट है कि कहीं न कहीं महाराज और भाजपा के नेताओं के बीच एक बड़ी खाई पनप रही है जिसे पाटने की कोशिशंे भी नहीं की जा रही हैं।


कुछ समय पूर्व सतपाल महाराज ने हरिद्वार में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण और इसके लिए जमीन तलाशने के लिए कमेटी बनाए जाने की बात कही तो इसके तुरंत बाद सरकार के प्रवक्ता और मंत्री सुबोध उनियाल ने बयान जारी करके साफ कर दिया कि सरकार को ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है। उनियाल ने तो यहां तक कह दिया कि हरिद्वार में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा सतपाल महाराज की कल्पनाओं में हो गया, सरकार के पास ऐसी कोई सूचना नहीं है। शासकीय प्रवक्ता के बयान के बाद सतपाल महाराज के बयान को झूठा बताया जाने लगा। सोशल मीडिया में भी उनके बयान को लेकर तमाम तरह कीं बाते कहीं जाने लगीं। एक तरह से सोशल मीडिया में सतपाल महाराज की राजनीतिक क्षमता पर सावल खड़े किए जाने लगे और उन पर अति महत्वकांक्षावादी होने का भी आरोप लगाया जाने लगा। कांग्रेस ने इसे सरकार और मंत्रियों के बीच आपसी तालमेल न होना बताया और जनता के साथ छल करने का भी आरोप मढ़ दिया। हालांकि सतपाल महाराज ने हरिद्वार में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के बारे में दिए गए अपने बयान को झूठा और भ्रामक बताने वाले पर पलटवार करके साफ कर दिया कि हरिद्वार में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का मामला स्वयं मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के संज्ञान में है और इसके बारे में मुख्यमंत्री सहित केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीपपुरी से भी वार्ता हो चुकी है। अपने ट्वीटर से महाराज ने ट्वीट करके यह भी बताया कि स्थलीय निरीक्षण करने के अलावा विभागीय क्लीरेंस के बाद ही प्रस्ताव कैेबिनेट में आएगा।

इसके बाद फिर आगे की कार्यवाही अमल में लाई जाएगी। महाराज के इस नए दांव से महाराज पर सवाल खड़े करने वालों को तो महाराज ने जवाब दे दिया है। लेकिन इससे महाराज की छवि को भी खासा नुकसान पहुंचा है। शासकीय प्रवक्ता और मंत्री सुबोध उनियाल द्वारा जिस तरह से महाराज के बयान के जवाब में ‘कल्पनाओं में ही होने’ का बयान दिया गया उससे दोनों के बीच चली आ रही खटास सामने आ गई है। सुबोध उनियाल और सतपाल महाराज के बीच रिश्ते कांग्रेस के समय से ही चर्चाओं में रहे हैं। दोनों नेताओं के बीच कई बार बयानों को लेकर तल्खियां सामने आ चुकी है। बहुगुणा सरकार के समय में भी सतपाल महाराज और उनियाल के आपसी संबंध मधुर नहीं थे। यहां तक कि हरीश रावत सरकार के समय में जब महाराज कांग्रेस का दामन छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए तो उनकी पत्नी अमृता रावत को कांग्रेस में रहने और मंत्री पद से नवाजे जाने पर कांग्रेस के एक बड़े धड़े ने निशाना साधने में कमी नहीं की। ऐसा ही एक मामला हाल ही में कुमाऊं दौरे पर महाराज द्वारा समीक्षा बैठक में भी सामने आया है जिसमें महाराज ने अवेैध खनन को लेकर हो रही वसूली पर जमकर अधिकारियों को लताड़ लगाते हुए उनको अपने रवैया सुधारने की बात कही, लेकिन उनके ही बयान को नैनीताल सीट से सांसद अजय भट्ट ने मीडिया के सवाल पर साफ कर दिया कि उनके संज्ञान में ऐसा कोई मामला नहीं आया है कि अवैध खनन पर कोई वसूली हो रही है।

हैरानी की बात यह है कि सरकार के एक कैबिनेट मंत्री जो कि अधिकारियों को अवैध खनन के ट्रकों से हो रही वूसली पर जमकर लताड़ लगा रहे हैं तो भाजपा सांसद एक तरह से महाराज के बयान को ही झूठा साबित करने की बात कह रहे हैं। इससे तो यह साफ होता है कि महाराज ने झूठ कहा है या फिर अजय भट्ट ही सही कह रहे हैंे कि अवैध खनन में कोई वसूली नहीं हो रही है। सतपाल महाराज को भाजपा में आए हुए तकरीबन आठ वर्ष हो चुके हैं। लेकिन इन आठ वर्षों में महाराज अनेक बार भाजपा नेताओं के निशाने पर रहे हैं। हालांकि महाराज भाजपा में एक बड़े नेता के तौेर पर पहचान बना चुके हैं। साथ ही केंद्रीय भाजपा और संघ के साथ भी महाराज के संबंध बेहद मजबूत माने जाते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में तीरथ सिंह रावत का टिकट काटकर महाराज को भाजपा ने चैबट्टाखाल सीट से उम्मीदवार बनाया, जबकि तीरथ सिंह रावत भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके थे। बावजूद महाराज की इच्छा अनुसार उनको सीट दी गई। इन सबके बावजूद सतपाल महाराज उत्तराखण्ड प्रदेश में भाजपा की अंदरूनी राजनीति में अपने आप को बनाए रखने के लिए संघर्ष ही करते दिखाई दे रहे हैं। 2017 में भाजपा सरकार में उनको कैबिनेट मंत्री बनाया गया और भारी-भरकम विभागों से नवाजा गया। यह महाराज के राजनीतिक ताकत के ही अनुरूप माना गया। हालांकि मंत्री बनने के बाद भी सतपाल महाराज और तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ उनके संबंधों में खटास को लेकर कई बार चर्चाएं भी होती रही।

महाराज और मुख्यमंत्री के बीच संबंध किस तरह से तनातनी के थे इसका सबसे पहला प्रमाण सरकार गठन के एक माह बाद ही सामने आ गया, जबकि मुख्यमंत्री ने चारधाम यात्रा का शुभारंभ ऋषिकेश में किया तो पर्यटन और धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज की बजाय यात्रा का शुभारंभ सतपाल महाराज के ही छोटे भाई भोले जी महाराज और माता मंगला के हाथों करवाया। इस कार्यक्रम में सतपाल महाराज की गैर मौजूदगी से यह साफ हो गया था कि आने वाले समय में सतपाल महाराज और भाजपा के बीच संबंध तनातनी के ही होने वाले हैं। देवयोग से ऐसा हुआ था और अनेक बार महाराज के विभागों के कामकाज को लेकर स्थितियां पैदा हुई जिसमें सिंचाई विभाग में प्रमोशन, पेंशन आदि को लेकर विभाग को हाईकोर्ट से फटकार तक मिली, जबकि इन मामलों में सतपाल महाराज अपने आदेश जारी कर चुके थे। लेकिन विभागीय अधिकारी फाइल दबाकर बैठे रहे। कई बार सतपाल महाराज अपने विभाग के अधिकारियों की कार्यशैली से नाराज होकर मुख्यमंत्री तक अपनी शिकायतें करते रहे, लेकिन उनकी बातों को कोई खास तवज्जो नहीं दी गई। यहां तक कि महाराज भी पहले ऐसे मंत्री थे जिन्होंने विभागीय सचिवों की सीआर मंत्री द्वारा लिखे जाने की बात कही। यह साफ था कि महाराज के अपने ही विभागों के अधिकारियों, सचिवों से तालमेल नहीं बैठ पा रहा था या बैठाने नहीं दिया जा रहा था। यह अलग विषय है लेकिन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत भी अधिकारियों से काम लेने का तरीका आना चाहिए, कहकर मामले को सामान्य ही बताते रहे।

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