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Uttarakhand

कौन मरा? बाबा, फुटबाल या शहर?

विमल सती

स्वतंत्र पत्रकार

 

करीब एक साल पहले, फुटबाॅल को दीवानगी की हद तक प्यार करने वाले मोहम्मद इदरीश “बाबा” फुटबाॅल टीम लेकर पौडी़ गए थे, लौटे तो शरीर की शिथिलता उनकी अस्वस्थता की बयानी कर रही थी। पता चला बाबा को भोजन के प्रति भी अनिच्छा सी हो रही है। सामान्य तौर पर मैंने स्वास्थ्य के बारे में पूछा तो बाबा ने बताया कि पौडी़ में जिस जगह टीमों के लिए खाने की व्यवस्था थी उस जगह का मंजर कुछ ऐसा था (जानवरों आदि के कारण) कि खाने की इच्छा ही मर गई। पता नहीं ऐसा बाबा ने क्यों कहा – शायद वह अपने भीतर पनप रहे असाध्य रोग से अनभिज्ञ थे। तब से बाबा का स्वास्थ्य निरंतर गिरता और शरीर छिरता चला गया लेकिन भीतर की हार न मानने की जिद ही थी कि बाबा ने नर सिहं मैदान मिलते ही राज्य स्तरीय फुटबाल टूर्नामेंट सिर पर उठा लिया| हालांकि मैदान में व्यवस्था का जिम्मा कुछ फुटबाल खेल से जुडे़ रहे युवाओं ने उठाया हुआ था और बाबा आमंत्रित टीमों के भोजन की व्यवस्था में लगे थे, जवाब देते शरीर के बावजूद मैंने बाबा को लंगर के लिए खुद तेल मसाले के डब्बे थैलियां ढोते देखा। अजीब सी जिद थी बाबा की रानीखेत को फुटबालमय बनाने की।

अभी इस साल फरवरी की ही तो बात है, मुझे पत्रिका के लिए रानीखेत में फुटबॉल के इतिहास पर लेख तैयार करना था जानकारी का पूरे शहर में एक ही स्रोत था बाबा। बाबा कुछ ब्रिटिश वक्त के रानीखेत फुटबाल टीमों के चित्र लेकर मेरे घर के दरवाजे पर नमूदार हुए, हमने साथ में चाय पी और फुटबाॅल के कुछ पुराने खिलाडि़यों के नाम जानने की उत्सुकता में मैं उन्हें टटोलने लगा। बाबा स्मृति पर जोर देते हुए दो एक नाम ही बता पाए| हालांकि चार साल पहले उन्होंने कई एक नाम मुझे बातचीत में बताए थे ऐसा मुझे ध्यान था। बाबा की बात फुटबाल से फिसलकर खेल मैदान की कमी और फिर शहर पर आकर टिक गई। बाबा बात करते हुए उठे दरवाजे से बाहर जाकर सड़क किनारे नाली में कफ़ का गुल्ला थूका और खरांश कर फिर बात को जोड़ते हुए शेर पेश कर बोले,

“अगर मौजे़ डूबो देती तो कुछ तस्कीन हो जाती
किनारों ने डुबोया है, मुझे इस बात का ग़म है”

बाबा बेहतरीन शेरों शायरी की चलती फिरती डायरी भी थे। इस शेर का इशारा समझ पाता बाबा ने बात बढा़ते कहा”बिरमल भाई, (बाबा की जुबान पर मेरा यही नाम अटका था) इस शहर में मुझ पर ऐसी-ऐसी मार की है…। बोलते-बोलते बाबा की जुबान लटपटाने लगी थी मगर चेहरे की टीस साफ पढ़ी जा सकती थी। उस बैठक के बाद लाॅक डाउन पीरियड में एक ही मुहल्ले में रहने के कारण बाबा से कमोवेश हर रोज मुलाकात होती रही, खडी़ बाजार से ऊपर-नीचे जाते बाबा के कदमों का फासला निरंतर सिकुड़ रहा था, साथ में देह भी।किसे पता था कदम इतनी जल्दी थम भी जाएंगे। जून माह में बाबा बेहद अशक्त हो गए, गिरीश भगत जी, मोहन नेगी जी ने उन्हें नागरिक चिकित्सालय में भर्ती कराया। शरीर में थोडा़ जान आने पर नौ दिन बाद बाबा अपनी कोठरी में लौट आए। एक प्राइवेट अस्पताल में भी दिखाया गया लीवर संबंधी बीमारी जाहिर हुई। इधर निरंतर गिरते स्वास्थ्य और उस पर बाबा के प्रति शहर की कृतघ्नता भरी अनदेखी पर अमर उजाला के युवा संवाददाता नवीन भट्ट ने स्टोरी प्रकाशित की जिसपर नगर के सामाजिक सरोकार रखने वाले नौजवान भाष्करबिष्ट, उमेश बिष्ट बेदी, कुंदन, मुस्सु, शकील और कुछ बाबा के तराशे युवा चेहरे सामने आए, बाबा को स्थानीय अस्पताल में दिखाने, परामर्श लेने के बाद हल्दवानी जांच के लिए ले जाया गया जहां उनके लीवर कैंसर से पीडित होने का पता चला। बाबा को पुनः रानीखेत लाने के बाद निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया बाद में हमने २६ अगस्त को उन्हें नागरिक चिकित्सालय में भर्ती कराया। आज १२ सितंबर की शाम बाबा ने नागरिक चिकित्सालय में अंतिम सांस ली। बाबा ने फुटबाल खेल के फलक पर रानीखेत को ज्वाज्ल्यमान नक्षत्र की तरह चमकाया, खिलाडि़यों को ऊंची उडा़न दी, पर निढाल, अशक्त, असाध्य रोग से पीडि़त बाबा का अंतिम वक्त में हाल चाल जानने तक के लिए न ये शहर उमडा़ न घुमडा़, बस बाबा से भी अधिक अशक्त निढाल बना अपने में मशगूल रहा, हमेशा की तरह।बाबा के इर्द-गिर्द अस्पताल में अंतिम समय में मुट्ठी भर लोगों का होना ये बताने के लिए काफी है। आप मरी हुई संवेदनाओं के इस शहर को जिंदा भी कैसे कह सकते हैं? फिर मरा कौन बाबा, फुटबाॅल या शहर?

(लेखक “प्रकृत लोक” पत्रिका के सम्पादक हैं)

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