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Uttarakhand

खुले में शौचमुक्त का सफेद झूठ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुडबुक में आने के लिए त्रिवेंद्र रावत सरकार ने दावे कर डाले कि उत्तराखण्ड खुले में शौच मुक्त देश का पहला राज्य है। लेकिन बहुत जल्द उसे बैकफुट पर आना पड़ा। आज सरकार खुद मान रही है कि प्रदेश में हजारों घर और सैकड़ों स्कूल शौचालयविहीन हैं। स्वच्छता मिशन के नाम पर श्रेय लेने वाली त्रिवेंद्र सरकार के लिए एक बड़ा झटका यह भी है कि स्वच्छता सर्वेक्षण में प्रदेश के छोटे से लेकर बड़े शहरों की रैंकिंग में भारी गिरावट आई है। कागजों में ही शौचालय निर्माण का फर्जीवाड़ा होता रहा है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन के नाम पर प्रदेश में चल रहे फर्जीवाड़े की हकीकत आखिरकार सामने आ ही गई। पिछले दिनों विधानसभा के बजट सत्र में विधायकों ने प्रदेश को खुले में शौच मुक्त करने के सरकारी दावों पर सवाल खड़े किए तो सरकार को बैकफुट पर आकर मामलों के परीक्षण की बात कहनी पड़ी। अर्थात एक तरह से सरकार ने यह मान लिया है कि प्रदेश पूरी तरह से खुले में शौच मुक्त नहीं हुआ है। सरकार ने बड़े जोर-शोर से प्रचार एवं दावा किया था कि उत्तरखण्ड देश का पहला प्रदेश है जो पूरी तरह से खुले में शौच मुक्त हो गया है। इसके अलावा यह खुलासा भी सदन में स्वयं सरकार के शिक्षा मंत्री ने एक सवाल के जबाब में कर दिया कि आज भी प्रदेश के सैकड़ों विद्यालयों में शौचालय की सुविधा नहीं है। हैरानी की बात यह है कि प्रदेश सरकार की स्वच्छता कवायद की प्रशंसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जी भरकर की थी। लेकिन अब जब सरकार सदन में अपने पूर्व के दावां के उलट मामलों के परीक्षण की बात कह रही है, तो साफ हो गया है कि सरकार केवल और केवल प्रधानमंत्री मोदी की गुडबुक में आने के लिए झूठे दावे कर रही थी।
तीन वर्ष पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत देश को स्वच्छ और साफ बनाने की योजना को मूर्तरूप दिया था। योजना के तहत देश को खुले में शौचमुक्त करने के लिए शौचालयों का निर्माण करके स्वच्छता लानी थी। साथ ही नगरों और कस्बों को स्वच्छ रखने के लिए तमाम तरह की योजनाएं लागू की गई। कई प्रदेशों ने इस पर काम भी किया। पहली बार देश में स्वच्छता के लिए जनता में व्यापक स्तर पर जागरूकता देखने को मिली। उत्तराखण्ड प्रदेश में भी सरकार ने इसके लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं की। तमाम तरह की योजनाएं प्रदेश में चलाई गई। लेकिन लगता है कि सरकार की स्वछता की यह कवायद केवल कागजों में ही सिमट कर रह गई। नतीजा यह है कि प्रदेश पूरी तरह से खुले में शौचमुक्त नहीं हो पाया है।
प्रदेश में स्वच्छता के सरकारी दावां को देखें तो सरकार हर कदम पर पिछड़ती हुई दिखाई दे रही है। हालात यह हैं कि स्वच्छता सर्वेक्षण 2019 में प्रदेश के तकरीबन हर बड़े शहर पिछड़ चुके हैं। पिछले वर्ष के सर्वेक्षण में इन शहरों की रैंकिंग बढ़ी थी, जबकि इस वर्ष के सर्वे में सभी नगर पिछड़ चुके हैं। प्रदेश सरकार अपने नगरां को स्मार्ट नगरों का तमगा देने के दावे तो कर रही है। लेकिन हालात इस कदर हैं कि देहरादून जैसा नगर भी पिछले वर्ष की रैंकिंग में पिछड़ा है। कहने को देहरादून प्रदेश की राजधानी और सबसे बड़ा नगर है। लेकिन सरकार अपनी ही राजधानी को स्वच्छ नहीं रख पा रही है।
खुले में शौच मुक्त के सरकारी दावों पर सवाल खड़े होते रहे हैं। खासतोर पर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों एवं दुर्गम क्षेत्रों में खुले में शौच पर सरकार रोक नहीं लगा पाई है। आज भी प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रां में शौचालयों के नाम पर बड़ा फर्जीवाड़ा किया जा रहा है। कागजों में ही शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है और सरकार इसे एक बड़ी उपलब्धि बताकर अपनी पीठ थपथपाने का काम कर रही है। कुछ समय पूर्व प्रदेश के कई क्षेत्रों में शौचालय निर्माण में धांधली की खबरें आई थी, लेकिन प्रशासनिक अधिकारियों के बेलगाम होने के चलते कार्यवाही नहीं की जा सकी।
खुले में शौचमुक्त के दावों पर सवाल खड़े करने के मामले केवल मीडिया के कारण सामने नहीं आए हैं, बल्कि कई स्थानों पर स्वयं जिलाधिकारियों ने भी ऐसे मामलां को पकड़ा है। लेकिन उन पर क्या कार्यवाही हुई, इसका अभी तक कोई पता नहीं चला पाया है। उत्तरकाशी के जिलाधिकारी द्वारा जिले में योजनाओं की समीक्षा के लिए दौरे किए गए तो कि कई गांवों में अभी तक शौचालयों का निर्माण नहीं हो पाया है। लेकिन सरकारी कागजों में सभी शौचालयों का निर्माण हो चुका है। जिले के लिवाली ओैर ओसड़ा गांव में एक-दो घरों को छोड़ दें तो किसी भी घर में शौचालय नहीं बनाए गए हैं, जबकि अधिकारियों ने सरकार को गुडवर्क दिखाने के लिए जिले के खुले में शौच मुक्त होने का दावा कर दिया।
विधानसभा के बजट सत्र में सरकार के दावों की पोल कई विधायकों ने खोल कर हकीकत सामने रख दी। कई विधायकों ने अपने क्षेत्रों में शौचालयों का निर्माण न होने की बात कहकर सरकार को आईना दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। विधायक कुंवर प्रणव चैंपियन ने हरिद्वार जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों का निर्माण न होने और शौचालयों के निर्माण में भारी अनियमितता पर सरकार से सवाल पूछे। इसके जबाब में सरकार ने बताया कि हरिद्वार जिले में 19 हजार से भी अधिक परिवार शौचालयविहीन हैं। यानी कि एक तरह से सरकार ने यह मान लिया कि उसके दावे धरातल पर खोखले हैं। भीमताल के विधायक राम सिंह कैड़ा ने तो सदन में साफ तोर पर आरोप लगाया कि उनके क्षेत्र में केवल कागजों पर ही शैचालयों का निर्माण किया जा रहा है। इस पर सरकार को सभी मामलां का परीक्षण दोबारा से किए जाने का आश्वासन विधायकों को देना पड़ा। ऐसा नहीं है कि सरकार के खुले में शौचमुक्त होने के दावां पर पहले कोई सवाल खड़े नहीं हुए हैं। जब सरकार ने प्रदेश के खुले में शौचमुक्त होने के दावे किए थे, तो उसी समय प्रदेश के ही ग्रमीण विकास विभाग से आंकड़े प्रस्तुत किए गए थे कि राज्य में तकरीबन 60 हजार परिवारों के पास शौचालय नहीं हैं। बावजूद इसके सरकार द्वारा प्रदेश के ओडीएफ होने का दावा किया जाता रहा है। अब स्वयं सरकार को अपने दावों की जमीनी हकीकत से दो-चार होना पड़ा है, तो साफ है कि त्रिवेंद्र सरकार केवल प्रधानमंत्री की गुडबुक में आने के लिए झूठे दावे कर रही थी।
अब राज्य में स्वच्छता सर्वेक्षण की बात करें तो पिछले वर्ष की तुलना में प्रदेश राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण में ओैर भी पिछड़ा है। खास बात यह है कि प्रदेश के हर बड़े शहर का हाल तकरीबन ऐसा ही रहा है। कुछ छोटे शहरों के हालात कुछ बेहतर रहे हैं। सरकार शहरों को स्वच्छ और सुंदर बनाने के साथ-साथ स्मार्ट बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रही है। बावजूद इसके कोई भी बड़ा नगर सर्वे में खरा नहीं उतरा है।
केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय की ओर से जारी राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण के आंकड़ों में उत्तराखण्ड पूरे देश में 19वें स्थान पर रहा, जबकि उत्तराखण्ड के साथ ही अस्तित्व में आए राज्य झारखण्ड और छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड से बहुत बेहतर रैंकिंग में हैं। इसके अलावा देश के 500 शहरों के स्वच्छता सर्वे में प्रदेश का कोई भी बड़ा शहर अपना बेहतर मुकाम हासिल नहीं कर पाया है। यहां तक कि नगर निगमों की रैंकिंग में भी बड़ी भारी कमी इस बार के सर्वे में देखने को मिली है।
देहरादून को ही लें तो यह नगर स्मार्ट सिटी बनाए जाने के दावों के विपरीत दिखाई दे रहा है। पिछले वर्ष 2018 में राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण की रैंकिंग में देहरादून को 259वीं रैंकिंग मिली थी जो कि इस बार के सर्वे में घटकर 384 रैंकिंग में पहुंच गया है। गौर करने वाली बात यह है कि देहरादून नगर प्रदेश की राजधानी है और नगर निगम में भाजपा सत्तासीन है।
बावजूद इसके राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण में देहरादून एक दो नहीं, बल्कि पूरे 139 रैंकिंग पिछड़ गया है। इसी तरह से हरिद्वार नगर भी पिछले वर्ष 205 की रैंकिंग में था जो कि इस वर्ष घटकर 376 की रैंकिंग में पहुंच गया। रुड़की नगर निगम के हालात भी इसी तरह हैं। जहां यह पिछले वर्ष 158 की रैंकिंग में था वहीं 281 की रैकिंग पर पहुंच गया है। कुमाऊं का द्वार कहा जाने वाला हल्द्वानी नगर पिछले वर्ष राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण में  251 की रैकिंग में था। लेकिन इस वर्ष के सर्वे में घटकर 350 की रैकिंग में पहुंच गया है। रुद्रपुर नगर निगम की राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण रैंकिंग में बहुत गिरावट आई है। पिछले वर्ष 281 की रैकिंग वाला रुद्रपुर इस वर्ष 403 की रैकिंग में पहुंच गया है। पिछले वर्ष काशीपुर की रैंकिंग 310 थी जो कि इस वर्ष दो नंबर बढ़कर 208 में पहुंची है। इससे यह माना जा सकता है कि काशीपुर ही अपनी रैंकिंग में सुधार कर पाया है।
छोटे शहरों की स्थिति भी ज्यादा ठीक नहीं है। राज्य के मात्र तीन छोटे शहर ही ऐसे रहे हैं जो कि देश भर के एक हजार छोटे शहरों की श्रेणी में राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण के तहत अपना बेहतर स्थान बना पाए हैं। मुनि की रेती, गौचर और अगस्तमुनि ये तीन शहर हैं। मुनी की रेती को देश के एक हजार शहरों के राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण के तहत 53, अगस्तमुनि को 60 तथा गौचर को 70वीं रैंकिंग मिली है।
 जिन नगर निगमां के लिए सरकार बड़े-बड़े दावे करती रही है, वे दावे धरातल पर दिखाई नहीं दे रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि तकरीबन हर बड़े नगर में चाहे वह नगर निगम हो, नगर पालिका हो या फिर नगर पंचायत, सभी में भाजपा का बोर्ड काबिज है। बावजूद इसके जनता को स्वच्छता और साफ-सफाई के लिए जूझना पड़ रहा है। इससे सरकार के उन तमाम दावां पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं जिनमें सरकार ने नगरों को स्मार्ट नगर बनाए जाने की बात कही है।
प्रदेश को खुले में शौचमुक्त करने के दावों पर सवाल खड़े होना यह साफ करता है कि सरकार केवल गुडबुक में अपना नाम दर्ज करवाने की जल्दबाजी में इस तरह के दावे कर रही थी। जिनका खुलासा अब सदन में हो चुका है। सरकार के दावों पर तब और भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं जब सदन में प्रदेश के शिक्षा मंत्री ने खुद माना कि आज भी प्रदेश में 300 विद्यालयां में शौचालय नहीं हैं।

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