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Uttarakhand

खनन बिना चैन कहां रे …

वर्ष 1985 में एक हिंदी फिल्म ‘साहेब’ रिलीज हुई थी। अनिल कपूर और अमृता सिंह अभिनीत इस फिल्म का एक गाना सुपरहिट हुआ था जिसके बोल थे ‘यार बिना चैन कहां रे, प्यार बिना चैन कहां रे…।’ इस गाने की तर्ज पर उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद से ही राजनेता, नौकरशाह और खनन व्यवसायी की तिकड़ी ‘खनन बिना चैन कहां रे, अवैध खनन बिना चैन कहां रे’ का राग अलाप राज्य की जीवनदायी नदियों संग खिलवाड़ करती आ रही है। पर्यावरण संग ऐसा जघन्य अपराध तब जबकि राज्य के आधे से अधिक भू-भाग को संवदेनशील अथवा अति संवेदनशील ईको जोन चिन्हित किया जा चुका है। प्रदेश में दोबारा सत्तारूढ़ धामी सरकार ने चुनाव से ठीक दो माह पूर्व नदियों से खनन के लिए आपदा प्रबंधन की आड़ लेकर एक नई ‘रिवर ड्रेजिंग नीति-2021’ लागू कर डाली। सात जनवरी यानी आचार संहिता लागू होने से ठीक दो दिन पूर्व तत्कालीन खनन सचिव आर. मीनाक्षी सुंदरम ने इस नीति का हवाला देते हुए अति संवेदनशील ईको जोन एवं नन्धौर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी क्षेत्र में बहने वाली नन्धौर नदी से आरबीएम/सिल्ट हटाने का कार्य एक कंपनी मैसर्स एपीएस इन्फ्रा इंजीनियर्स प्रा. लिमिटेड को सौंपने का आदेश जारी कर दिया। राज्य सरकार का यह आदेश न केवल पर्यावरण संरक्षण मानकों के खिलाफ है बल्कि सुप्रीम कोर्ट, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा तय नियमों की भी खुली अवहेलना करता है। हाल-फिलहाल नैनीताल हाईकोर्ट ने खनन प्रेमियों के इस ‘खेला’ पर रोक लगा डाली है

उभूमिका

उत्तराखण्ड गठन के बाद से ही राजनेता, नौकरशाह और खनन व्यापारी की तिकड़ी पूरी व्यवस्था पर हावी होती चली गई है। राज्य में चाहे जिस दल की सरकार रही हो, अवैध और अंधाधुंध खनन के आरोपों से हर सरकार, हर मुख्यमंत्री का दामन दागदार रहा है। खनन माफिया के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले हरिद्वार स्थित मातृसदन के स्वामी गोकुलानंद की नारायण दत्त तिवारी शासनकाल में हत्या कर दी गई थी। धर्मनगरी में एक संत की हत्या से लेकिन सत्ता तंत्र और माफिया का कुछ बिगड़ा नहीं और प्रदेश की नदियां जिनमें मां गंगा भी शामिल है, जमकर अवैध खनन का शिकार होती रही हैं। जून 2011 में गंगा नदी में बेतहाशा हो रहे अवैध खनन की तरफ भारत ही नहीं पूरी दुनिया का ध्यान तब आकर्षित हुआ था जब मातृसदन के ही एक ब्रह्मचारी स्वामी निगमानंद की अवैध खनन के खिलाफ सौ दिन तक आमरण-अनशन करने के बाद मृत्यु हो गई।


निगमानंद की मृत्यु संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई थी। इस घटना ने पूरे देश, यहां तक कि विश्वभर के पर्यावरणविदों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को सकते में डाल दिया था। निगमानंद की शहादत भी भ्रष्टतंत्र में कुछ बदलाव न ला सकी। मां गंगा समेत प्रदेश की समस्त नदियों में बेतहाशा खनन सरकारी संरक्षण में बदस्तूर जारी है। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय समय-समय पर इस अवैध खनन को रोकने के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी करता रहा है लेकिन राज्य की नौकरशाही नए-नए तरीके ईजाद कर ‘खनन की गंगा’ को बहते रहने का मार्ग साफ कर देती है। 2020 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के समय खनन माफिया को लाभ पहुंचाने की नीयत से एक नई नीति ‘रिवर ट्रेनिंग नीति’ बनाई गई थी। इस नीति की आड़ में जमकर अवैध खनन को परवान चढ़ाया गया। अब पुष्कर सिंह धामी सरकार एक कदम आगे बढ़कर एक नई नीति लेकर आई है जिसे नाम दिया गया है ‘उत्तराखण्ड रिवर ड्रेजिंग नीति- 2021’। इस नई नीति की आड़ में धामी सरकार ने तमाम नियम-कानून, यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट तक के आदेशों को दरकिनार करते हुए ‘नन्धौर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी’ जैसे अति संवेदनशील इको सेंसटिव जोन में खनन की अनुमति एक निजी निर्माण कंपनी को दिए जाने का आदेश जारी कर डाला है। पूरी तरह अवैध खनन को वैध बनाने के इस ‘महाघोटाले’ की बुनियाद में है ‘उत्तराखण्ड रिवर ड्रेजिंग नीति-2021’। खनन के इस ‘खेला’ को समझने के लिए पहले इस नीति को समझा जाना जरूरी है।

उत्तराखण्ड रिवर ड्रेजिंग नीति-2021
वर्ष 2021 में सत्तारूढ़ भाजपा ने राज्य में मुख्यमंत्री बदलने का निर्णय लिया। मार्च 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को हटाकर तीरथ सिंह रावत मुख्यमंत्री बनाए गए। तीरथ सिंह रावत का कार्यकाल संक्षिप्त रहा। 4 जुलाई, 2021 को उनके स्थान पर पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। धामी के प्रथम शासनकाल में ही 10 नवंबर, 2021 को राज्य सरकार ने ‘उत्तराखण्ड रिवर ड्रेजिंग नीति’ को लागू किया है। इस नीति का उद्देश्य ‘रिवर ड्रेजिंग से नदी के जलप्रवाह को यथासंभव प्राकृतिक रूप में नदी/जलाशय/नहर के मध्य में केंद्रित करने हेतु आरबीएम/सिल्ट की सफाई’ करना है। नीति में कहा गया है कि किसी भी नदी/गदेरों/नहर इत्यादि में यदि मलबा/आरबीएम/सिल्ट अत्यधिक मात्रा में जमा होने के चलते भू-कटान, बाढ़ एवं जान-मान का खतरा होने की संभावना हो तो संबंधित जिलाधिकारी द्वारा एक समिति बनाकर ऐसे क्षेत्र में मलबा, सिल्ट इत्यादि की मात्रा का आकलन कर उसे हटाने के लिए जिला स्तर पर इच्छुक व्यक्तियों/ संस्थाओं को खुली नीलामी द्वारा यह कार्य सौंपा जाएगा। इस नीति की बिंदु संख्या 10(2) में यह व्यवस्था है कि राष्ट्रीय महत्व की केंद्र/राज्य सरकार की परियोजनाओं का निर्माण कार्य कर रही सरकारी संस्था को समय पर कार्य पूरा करने के उद्देश्य से इस प्रकार के आरबीएम/सिल्ट/ मलबा इत्यादि को हटाने का कार्य सीधे (बगैर निलामी के) दिया जा सकता है। नीति में यह भी कहा गया है कि ऐसी सरकारी संस्था के अनुमोदन पर यह कार्य ऐसे निजी ठेकेदार को भी दिया जा सकता है जो सरकारी कंपनी के साथ काम कर रहा हो।

चुनाव से ठीक पहले हुआ ‘खेला’
राज्य सरकार द्वारा चुनाव से मात्र चार माह पूर्व खनन के लिए नई नीति का लाया जाना कई सवाल खड़े करता है। इस नीति की आड़ में 7 जनवरी, 2022 को यानी चुनाव से मात्र दो माह पूर्व और चुनाव आचार संहिता लागू होने से मात्र दो दिन पहले राज्य सरकार ने आनन-फानन में नैनीताल जिले की हल्द्वानी तहसील के अपर नन्धौर चोरगलिया इलाके में बहने वाली नन्धौर नदी से मलबा/आरबीएम के खनन की अनुमति एक निजी कंपनी मैसर्स एपीएस इन्फ्रा इंजीनियर्स प्रा लिमिटेड को सौंपे जाने का आदेश जारी कर दिया। इस आदेश में कहा गया है कि मैसर्स एपीएस इन्फ्रा इंजीनियर्स द्वारा निकाले जाने वाले माल को राष्ट्रीय राजमार्ग-87 के निर्माण कार्य में प्रयोग में लाया जाएगा। आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि मैसर्स एपीएस इन्फ्रा इंजीनियर्स एनएच-87 का निर्माण कर रही किस सरकारी संस्था के साथ पंजीकृत है। गौरतलब है कि रिवर ड्रेजिंग नीति में ऐसे किसी भी प्रकार के खनन को खुली नीलामी के जरिए स्थानीय लोगों से कराए जाने का नियम है। इस नीति के बिंदु संख्या 10(2) में अवश्य कहा गया है कि राष्ट्रीय महत्व का निर्माण कार्य कर रही सरकारी कंपनियों को अथवा उनके साथ काम कर रहे ठेकेदारों को रिवर ड्रेजिंग का काम सीधे दिया जा सकता है। मैसर्स एपीएस इन्फ्रा किसी सरकारी कंपनी के साथ ठेके पर काम कर रही है, का उल्लेख 7 जनवरी को जारी आदेश में स्पष्ट नहीं किया गया है। विधानसभा चुनाव से ठीक पूर्व जारी इस आदेश में भारी गड़बड़ी की पुष्टि इस बात से भी होती है कि आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 का सहारा लेते हुए राज्य सरकार ने पर्यावरण मानकों, नियमों, यहां तक कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एवं सुप्रीम कोर्ट तक के आदेशों को दरकिनार करते हुए एक अति संवेदनशील क्षेत्र में बहने वाली नदी में खनन की इजाजत दे डाली है। उल्लेखनीय है कि जिस नन्धौर नदी में खनन की अनुमति दी गई है वह अतिसंवेदनशील पर्यावरण क्षेत्र होने के साथ-साथ वन्यजीव अभ्यारण्य (वाइल्ड लाइफ सेंचुरी) भी है।

प्रकृति के साथ खिलवाड़ का ‘खेला’
नन्धौर वन्यजीव अभ्यारण्य का गठन 2012 में किया गया था। नैनीताल और चंपावत जिलों के 270 वर्ग किलोमीटर में फैला यह अभ्यारण्य नेपाल के ब्रह्मदेव और शुक्ला फाटा वन्यजीव अभ्यारण्यों और रामनगर के जिम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व फॉरेस्ट के बीच की कड़ी है। यहां पर 32 टाइगर वर्तमान में हैं। 100 से अधिक प्रजातियों के पेड़, घास की 35 प्रजातियां, 100 से अधिक पक्षियों, 15 प्रकार के सांप की प्रजातियों के साथ-साथ वन क्षेत्र में हाथी, बाघ, भालू, तेंदुआ इत्यादि का वास है। प्रकृति की इस अनुपम धरोहर को मई, 2020 में भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा ‘परिस्थिति संदेही जोन’ (ईको सेंसटिव जोन) घोषित किया जा चुका है। राज्य सरकार द्वारा इस क्षेत्र में बहने वाली नन्धौर नदी पर खनन की अनुमति एक निजी कंपनी के हाथों में दिए जाने से कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। राज्य में प्रकृति का प्रकोप 2013 में आई केदारनाथ आपदा के रूप में देखा-भोगा जा चुका है। लेकिन हजारों निर्दोष की जान जाने के बाद भी राज्य के नीतिकारों ने कोई सबक नहीं लिया है। सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही और पूरी तरह भ्रष्ट हो जाने के एक नहीं, कई दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं :

बीते पांच वर्ष में भूस्खलनों की संख्या में 2900 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

2015 से 2020 के मध्य 37 पुल धराशाई हुए हैं और 27 टूटने की कगार पर हैं। इन पुलों के टूटने का सबसे बड़ा कारण बेतहाशा खनन का होना है।

बीते बीस बरसों में यानी राज्य गठन के बाद उत्तराखण्ड में पांच सौ किलोमीटर का वन क्षेत्र कम हो चला है। हजारों की तादात में काटे गए पेड़ों की वजह से मिट्टी के कटाव रोकने की क्षमता कम हो गई है जिसके चलते सितंबर, 2021 में भारी वर्षा से बही मिट्टी ने राज्य की सड़क व्यवस्था को तबाह कर डाला था। अक्टूबर, 2021 में 54 लोगों की मृत्यु बाढ़ एवं भूस्खलन चलते दर्ज की गई।

वाडिया इंस्टीट्यूट फॉर हिमालयन ज्योलॉजी द्वारा 2021 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड का आधा से अधिक हिस्सा ‘संवेदनशील’ और ‘अति संवेदनशील’ ईको क्षेत्र में आ चुका है जहां भूस्खलन के खतरे बढ़ते जा रहे हैं।

इतनी भयावह स्थिति होने के बावजूद राज्य सरकारों का खनन के प्रति प्रेम लगातार परवान चढ़ता रहा है जिसका ताजातरीन उदाहरण रिवर ड्रेजिंग नीति के रूप में सामने आ चुका है। इस नीति से ठीक पहले 28, अक्टूबर 2021 को जारी ‘उत्तराखण्ड उपखनिज (परिहार) नियमावली(Uttarakhand Minor Mineral (Concession) Rules, 2021) में धामी सरकार ने खनन प्रक्रिया को जटिल बनाने के बजाय सरल बना डाला है। इस नियमावली में खनन द्वारा पर्यावरण को होने वाली हानि एवं प्रभाव की प्रक्रिया के नियमों को सरल कर दिया गया है ताकि बगैर रोकटोक खनन किया जा सके। वर्ष 2007 में तत्कालीन सरकार ने हाईकोर्ट की सख्ती के बाद निर्णय लिया था कि आबादी क्षेत्र से पांच सौ मीटर की परिधि में लगाए गए स्टोन क्रशर हटाए जाएंगे। ऐसा असल में कभी हुआ ही नहीं। स्टोन क्रशर लॉबी इस आदेश को लागू न करवाने के लिए हर सरकार पर दबाव बनाती रही। जुलाई 2015 में इस पांच सौ मीटर की दूरी को राज्य सरकार ने 300 मीटर की दूरी कर डाला जिसका भारी लाभ स्टोन क्रशर मालिकों को मिला और नुकसान उन गांव वालों को हुआ जो इन स्टोन क्रशर के चलते पैदा हुए दुष्प्रभाव की चपेट में आकर नाना प्रकार की बीमारियों के शिकार हो गए।

एपीएस इन्फ्रा को खनन की अनुमति के खिलाफ वन विभाग


राज्य सरकार द्वारा आनन-फानन में एक निजी कंपनी को अतिसंवेदनशील पर्यावरण क्षेत्र में खनन की अनुमति दिए जाने को विरोध डीएफओ, हल्द्वानी क्षेत्र द्वारा किया गया है। ‘दि संडे पोस्ट’ के पास उपलब्ध दस्तावेज स्पष्ट करते हैं कि राज्य सरकार का यह निर्णय पूरी तरह से नियम विरुद्ध होने के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के दिशा- निर्देशों की अवमानना भी करता है। डीएफओ, हल्द्वानी वन क्षेत्र ने 2803/2022 को नैनीताल के डीएम को लिखे अपने पत्र में कहा है किः

1. नन्धौर नदी के अपर नन्धौर का क्षेत्र नन्धौर वन्यजीव अभ्यारण्य के ईको सेंसटिव जोन का भाग है जो पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार की अधिसूचना दिनांक 22 मई, 2020 से पारिस्थितिकी संवेदी जोन घोषित किया गया है। इस क्षेत्र में पाए जाने वाले जीव-जंतु बहुत महत्वपूर्ण हैं एवं पारिस्थितिकी, पर्यावरणीय और जैव विविधता की दृष्टि से सुरक्षित और संरक्षित करने के उद्देश्य से पारिस्थितिकी संवेदी जोन में उक्त गजट नोटिफिकेशन की धारा 4 में वाणिज्यिक खनन, पत्थर, उत्खनन और अपघर्षण ईकाइयों के क्रियाकलाप को निषेध किया गया है। यह भी अवगत कराना है कि उक्त गजट नोटिफिकेशन के प्रावधानों की प्रभावी निगरानी के लिए अधिनियम की धारा 5 में एक निगरानी समिति के गठन का प्रावधान है जिसके पदेन अध्यक्ष कलेक्टर/ जिलाधिकारी, नैनीताल हैं।

2. जनपद नैनीताल, ऊधमसिंह नगर, चंपावत की नदियों यथा गौला, कोसी, नन्धौर, शारदा आदि नदियों में उपखनिज के चुगान की अनुमति भारत सरकार द्वारा प्रदान की जाती है एवं अनुमति से पूर्व भारतीय जल एवं मृदा संरक्षण संस्थान की सर्वे रिपोर्ट, पर्यावरण प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की सीएए, सीटीओ रिपोर्ट, पर्यावरण स्वीकृति प्रमाण पत्र, एनबीडब्ल्यूएल आदि की रिपोर्ट प्राप्त की जाती है ताकि उपखनिज चुगान से पर्यावरण एवं वन्य जीवों के वासस्थल में कोई विपरीत प्रभाव न पड़े। प्रश्नगत स्थल आरक्षित वन है तथा नन्धौर वन्यजीव अभ्यारण्य के ईको-सेंसटिव जोन के अंतर्गत आता है।

3. यह भी अवगत कराना है कि इसी प्रकार से एक आदेश केरल राज्य द्वारा पम्बा नदी Sand Desilting के संबंध में जारी किया गया था। जिसमें माननीय न्यायालय N.GT. (Southern Zone)  द्वारा स्वतः संज्ञान (Suo-Motu) से लिया गया एवं OA.No 01/2021 Tribunal on its own motion Suo Motu  बनाम भारत सरकार व अन्य योजित हुआ, जिसमें माननीय न्यायालय द्वारा उच्च स्तरीय तकनीकी समिति का गठन किया गया एवं वाद विचारित हुआ। उक्त वाद में गठित तकनीकी समिति द्वारा MoEF & CC जारी EIA Notification 2006 यथा संशोधित 2016 के अनुसार पर्यावरणीय मंजरी अनिवार्य बताया गया है।

4. इसी प्रकार के समान प्रकरण में माननीय उच्चतम न्यायालय के समक्ष सिविल अपील संख्या 1627-1628/2022 (Diary No.19961/ 2020) विनय कुमार दलाई व अन्य बनाम ओडिसा राज्य व अन्य में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिनांक 02-03-2022 को आदेश पारित किया गया है, जिसकी प्रति पत्र के साथ संलग्न है, इसका भी अवलोकन कर लिया जाए। अपने इस पत्र में डीएफओ ने डीएम नैनीताल को यह भी सुझाव दिया है कि खनन की मात्रा का निर्धारण भारतीय जल एवं मृदा संरक्षण संस्थान (आईआईटी, रुड़की) से स्थलीय निरीक्षण (ग्राउंड रिपोर्ट) कराकर तय की जानी चाहिए। साथ ही यह सुझाव भी दिया है कि नन्धौर वन्यजीव अभ्यारण्य के इको सेंसटिव एवं शिवालिक ऐलिफेंट रिजर्व का मार्ग होने के कारण नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ से भी रिपोर्ट मंगानी चाहिए। साथ ही पर्यावरण कानूनों के अनुसार केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों का पालन करने हेतु संबंधित विभागों से भी रिपोर्ट मंगा लेनी चाहिए।

हड़बड़ी में नैनीताल जिलाधिकारी


नैनीताल के जिलाधिकारी धीरज सिंह गर्ब्याल हर कीमत पर राज्य सरकार द्वारा मैसर्स एपीएस इन्फ्रा को रिवर ड्रेजिंग नीति की आड़ में दी गई खनन की अनुमति को प्रभावी करना चाहते हैं। बहुत संभव है कि उन पर उच्च स्तर से दबाव पड़ रहा है। डीएम नैनीताल ने डीएफओ, हल्द्वानी वन क्षेत्र के पत्र में चिÐत सभी आशंकाओं, नियम एवं कानूनों तथा सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को दरकिनार करते हुए 16, अप्रैल 2022 को एक समिति बनाए जाने का निर्देश दे दिया है। इस समिति को ऐसे क्षेत्र, जहां नदी, गदेरों, नहर, जलाशय के द्वारा मलबा/आरबीएम/सिल्ट अत्यधिक मात्रा में जमा किया गया है और जिसके जमा होने से भू-कटाव एवं जान-माल का खतरा होने की संभावना है, का चिÐीकरण, स्थल सत्यापन व जमा खनिज की मात्रा का आकलन करने को कहा गया है। अपने आदेश में डीएम नैनीताल ने इस समिति को ‘तत्काल’ अपनी रिपोर्ट देने को भी कहा है।

  • अदालतों की ऐसे हो रही है अवमानना
    केंद्र सरकार द्वारा 8 अगस्त, 2019 को जारी अपने दिशा-निर्देशों में स्पष्ट रूप से कहा है कि सभी राष्ट्रीय पार्क/वन्य अभ्यारण्यों से सटे दस किलोमीटर क्षेत्र में कराए जाने वाले किसी भी विकास कार्य से पहले पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) कराया जाना जरूरी है। अपने इस दिशा-निर्देश पत्र में भारत सरकार ने किसी भी ईको सेंसटिव जोन की एक किलोमीटर की परिधि में किसी भी प्रकार के खनन को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है।

उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2006 में ‘टीएन गोदावरम् बनाम भारत सरकार’ तथा 2014 में ‘गोवा फाउंडेशन बनाम भारत सरकार’ मामले में अपना निर्णय दिया था कि किसी भी वन्य अभ्यारण्य, राष्ट्रीय पार्क एवं किसी भी वन क्षेत्र में खनन के नए पट्टे नहीं दिए जाएंगे। केवल पुराने अस्थाई पट्टां का ही नवीनीकरण किया जा सकता है, वह भी तब जबकि खनन क्षेत्र किसी राष्ट्रीय पार्क अथवा वन्य अभ्यारण्य के भीतर स्थित न हो।

  •   राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने ‘एमसी मेहता बनाम भारत सरकार’ मामले में अपना निर्णय देते हुए स्पष्ट रूप से किसी भी इको सेंसटिव जोन में खनन को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने का आदेश दिया है।
  •   2 मार्च, 2022 को उच्चतम न्यायालय ने विनय कुमार दलाई बनाम ओडिसा राज्य मामले में अपना निर्णय सुनाते हुए ओडिसा सरकार को आदेश दिया है कि इको सेंसटिव इलाकों में वृहद वन्यजीव संरक्षण योजना तैयार बगैर किसी भी प्रकार के खनन की आज्ञा न दी जाए।
  •   नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की चेन्नई स्थित पीठ ने विभिन्न पर्यावरण संरक्षण कानूनों एवं राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन कानून के मध्य उत्पन्न होने वाले विवादों की बाबत 22 अप्रैल, 2022 को एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। इस निर्णय में न्यायमूर्ति के. रामाकृष्णन एवं न्यायमूर्ति सत्यागोपाल कोरलापती ने स्पष्ट कर दिया है कि :
  • 1. ड्रेजिंग अथवा गाद निकालने की आड़ में नदियों से खनन की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
  • 2. वन क्षेत्र से यदि आपदा प्रबंधन के कारणों से ड्रेजिंग अथवा गाद निकाला जाना आवश्यक हो तो वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के तहत पूर्वानुमति जरूरी नहीं है लेकिन यदि नदी का प्राकृतिक प्रवाह बनाए रखने, बाढ़ नियंत्रण करने इत्यादि के लिए ड्रेजिंग की जाती है और निकाले गए खनिज को अन्यत्र प्रयोग में लाया जाता है तो वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार के वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के अंतर्गत पहले मंत्रालय से अनुमति ली जानी जरूरी है।
  • 3. किसी भी अवस्था में नदियों से ड्रेजिंग, गाद हटाने इत्यादि के नाम पर

ऐसे खनन की अनुमति नहीं है जिससे पर्यावरण को हानि पहुंचती है।

4. आपदा प्रबंधन जैसे बाढ़ नियंत्रण के लिए नदियों में ‘रिवर ड्रेजिंग एवं डिस्लिटिंग’ कराए जाने से पूर्व वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करना अनिवार्य है।

हाईकोर्ट में दाखिल हुई पीआईएल

उच्चतम न्यायालय, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और भारत सरकार के स्पष्ट आदेशों का खुला उल्लंघन करते हुए राज्य सरकार द्वारा आपदा प्रबंधन के नाम पर एक निजी कंपनी को इको सेंसटिव जोन में खनन की अनुमति देने के बाद अब नैनीताल हाईकोर्ट में सरकार के इस फैसले को चुनौती देने वाली जनहित याचिका दायर हो चुकी है। याचिकाकर्ता दिनेश कुमार चंदोला इससे पहले भी राज्य में बढ़ रहे अंधाधुंध खनन और राज्य सरकार की नीतियों को लेकर याचिका डाल चुके हैं। अपनी इस याचिका में चंदोला ने उच्च न्यायालय समक्ष समस्त प्रकरण को रखते हुए राज्य सरकार के इस आदेश पर तत्काल रोक लगाए जाने का अनुरोध किया है।

26 अप्रैल को नैनीताल हाईकोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया है कि बाढ़ नियंत्रण के लिए आरबीएम/सिल्ट इत्यादि को हटाया जा सकता है लेकिन हटाए गए खनिज को वन क्षेत्र में ही सुरक्षित रखना होगा। इस खनिज का किसी भी निर्माण कार्य में उपयोग नहीं किया जाएगा।

उपसंहार
सुप्रीम कोर्ट एवं नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा समय-समय पर दिए गए आदेशों की खुली अवहेलना कर राज्य सरकार द्वारा चुनाव से ठीक पहले खनन के लिए ‘रिवर ड्रेजिंग नीति’ बनाना और चुनाव अचार संहित से मात्र दो दिन पहले एक निजी कंपनी को आनन-फानन में अति संवेदनशील नन्धौर वन्य अभ्यारण्य क्षेत्र में खनन की अनुमति देना राज्य सरकार और राज्य के तत्कालीन खनन सचिव आर मिनाक्षी सुंदरम (वर्तमान में सचिव मुख्यमंत्री) की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़ा करने के साथ-साथ ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ जीतने के भाजपा के संकल्प की कलई भी खोलने का काम कर देता है।

हाईकोर्ट उत्तराखण्ड का अंतरिम आदेश खनन प्रेमियों के लिए भारी आघात है। बाढ़ नियंत्रण एवं आपदा के नाम पर रचे गए खेल पर हाल-फिलहाल उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है। अब देखना यह होगा कि ‘खनन बिना चैन कहां रे…’ की अगली धुन कैसे और कब सुनाई देगी।

 

बात अपनी-अपनी

मेरी जानकारी में नहीं है। नन्धौर में रिवर ड्रेजिंग नीति के तहत कोई खनन की अनुमति नहीं दी गई है। मेरे पास इसकी फाइल भी नहीं पहुंची है। डीएम नैनीताल ने खनन की अनुमति कैसे दे दी? एक बार डीएम नैनीताल से भी पूछिए किसके आदेश पर उन्होंने ऐसा किया।
पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड

मैंने तो अभी दो दिन पहले ही इस विभाग का चार्ज लिया है। मैंने इस मामले की केस स्टडी भी नहीं की है। जब तक केस स्टडी नहीं कर लेंगे तब तक हम कुछ नहीं कहेंगे।
पंकज पाण्डेय, सचिव खनन उत्तराखण्ड शासन

यह मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन है इसलिए हम कुछ नहीं कह सकते हैं।
धीरज गर्ब्याल, जिलाधिकारी नैनीताल

ऐसे ही एक मामले में दो राज्यों ने परमिशन दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने उनको जवाब तलब कर लिया। एनजीटी ने भी कहा कि खनन नहीं हो सकता है। एक ओडिसा में तो दूसरा केरला के पंबा नदी में खनन के आदेश निरस्त हो गए हैं। केरला में तो एनजीटी ने यह मामला स्वतः ही संज्ञान में लिया था। एनजीटी ने स्पष्ट कहा है कि आपदा एक्ट के तहत फॉरेस्ट कंजर्वेसन एक्ट 1980 कोओवर राइट नहीं कर सकते हैं। एमओईएफ (मिनिस्ट्री ऑफ फॉरेस्ट इन्वारमेंट एंड क्लाइमेट चेंज) ने भी स्पष्ट कर दिया था कि आपदा एक्ट के तहत खनन की अनुमति तब तक नहीं दी जा सकती है जब तक कि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी न हो। इसी के साथ आईआईटी रुड़की की स्थलीय निरीक्षण रिपोर्ट भी जरूरी है। लेकिन नन्धौर नदी से शासन ने सीधा अनुमति जारी कर दी, बावजूद इसके कि कोई क्लियरेंस नहीं थी। नन्धौर नदी में जहां आपदा एक्ट के तहत खनन आदि की अनुमति दी जा रही है वहां स्थलीय निरीक्षण से स्पष्ट होता है कि वहां कोई आपदा नहीं आ सकती है। हमने इस बाबत जिलाधिकारी नैनीताल को पत्र लिखकर अवगत करा दिया है। उनका कोई जवाब नहीं आया है।
बाबुलाल, डीएफओ, हल्द्वानी रेंज नैनीताल

उच्च न्यायालय ने इस मामले में उपखनिज के दोहन पर रोक लगा दी है और बाढ़ राहत कार्य की अनुमति दे दी है। साथ ही यह भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट, एनजीटी के आदेश और केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अनुमति नहीं ली गई है तो ऐसे में आपदा राहत के नाम पर आरक्षित वन क्षेत्र में खनन नहीं हो सकता है।
दिनेश कुमार चंदोला, याचिकाकर्ता

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