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पौड़ी लोकसभा सीट इस बार भी जबर्दस्त हॉट हो गई है। यहां पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खण्डूड़ी की राजनीतिक विरासत पर कांग्रेस-भाजपा दोनों दावा कर रहे हैं। ऐसे में बीसी खण्डूड़ी के सामने धर्म संकट है कि वे किस पक्ष में खड़े हों। कांग्रेस प्रत्याशी मनीष खण्डूड़ी उनके सुपुत्र हैं, तो भाजपा प्रत्याशी तीरथ सिंह रावत राजनीतिक शिष्य। तीरथ खण्डूड़ी के राजनीतिक उताराधिकारी माने जाते हैं। पूर्व में खण्डूड़ी के चुनाव संचालन का दायित्व भी वे निभाते रहे
उत्तराखण्ड की पौड़ी लोकसभा सीट लगभग हर चुनाव में आकर्षण का केंद्र रही है। इस बार भी यह सीट काफी हॉट बन गई है। कारण कि पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खण्डूड़ी के पुत्र मनीष खण्डूड़ी कांग्रेस टिकट पर मैदान में हैं, तो दूसरी ओर बीसी खण्डूड़ी के राजनीतिक शिष्य तीरथ सिंह रावत भाजपा प्रत्याशी हैं। तीरथ को भाजपा कार्यकर्ता खण्डूड़ी की विरासत का वास्तविक उत्तराधिकारी बता रहे हैं, तो कांग्रेस की कोशिश है कि जनता के बीच यह संदेश जाए कि बीसी खण्डूड़ी को भाजपा ने ठुकराकर अच्छा नहीं किया जिससे उनके पुत्र को सहानुभूति का लाभ मिले।
राजनीतिक इतिहास की बात करें तो पोड़ी संसदीय क्षेत्र में 37 साल तक कांग्रेस का कब्जा रहा, तो पिछले 23 वर्षों से भाजपा का डंका बजता रहा है। देश और प्रदेश को पौड़ी लोकसभा क्षेत्र ने एक से बढ़कर एक राजनेता दिए हैं। देश के पहले आम चुनाव 1951 में इस सीट पर कांग्रेस के भक्त दर्शन चुनाव जीते थे। भक्त दर्शन लगातार चार बार इस सीट से सांसद चुने गए। 1971 में कांग्रेस ने प्रताप सिंह नेगी को उम्मीदवार बनाया और इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा। वर्ष 1977 में जनता पार्टी की लहर के चलते पौड़ी सीट कांग्रेस के हाथां से फिसल गई और जनता पार्टी के जगन्नाथ शर्मा यहां पहले गैर कांग्रेसी सांसद निर्वाचित हुए। 1980 में कांग्रेस के तत्कालीन मुख्य महासचिव
हेमवती नंदन बहुगुणा इस सीट पर विजयी रहे। लेकिन कांग्रेस से मतभेद के चलते उन्होंने कांग्रेस को अलविदा कह दिया। पौड़ी में उपचुनाव हुआ तो बहुगुणा ने ऐतिहासिक जीत हासिल की।
तत्कालीन समय में पूरी कांग्रेस पार्टी यहां तक कि उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार ने पूरी तरह से इस उप चुनाव में बहुगुणा के खिलाफ मोर्चा खोला, लेकिन बहुगुणा ने कांग्रेस को जबदस्त पटखनी देते हुए जीत हासिल की थी। यह चुनाव आज भी राजनीतिक जानकारों के बीच खासा चर्चित रहता है। 1984 में कांग्रेस के चंद्रमोहन सिंह नेगी ने पौड़ी सीट पर जीत हासिल की। 1989 में नेगी जनता दल के टिकट पर फिर से चुनाव जीते।
वर्ष 1991 में भाजपा ने पहली बार पोड़ी सीट पर  जीत हासिल की। भाजपा ने सेवानिवृत्त मेजर जनरल भुवन चंद्र खण्डूड़ी को अपना उम्मीदवार बनाया और पहली बार खण्डूड़ी सांंसद बने। 1996 के चुनाव में कांग्रेस के सतपाल महाराज उन्हें हराकर पहली बार संसद पहुंचे। लेकिन अगले ही चुनाव में खण्डूड़ी ने कांग्रेस से यह सीट छीन ली ओैर लगातार चार बार चुनाव जीतकर भाजपा का कब्जा बरकरार रखा। 2007 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया और खण्डूड़ी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया तो पोड़ी संसदीय सीट पर उपचुनाव हुआ। इस उपचुनाव में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए लेफ्टिनेंट जनरल टीपीएस रावत भाजपा के उम्मीदवार बने।  2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सतपाल महाराज ने भाजपा के टीपीएस रावत को हराकर फिर से इस सीट पर कब्जा किया, परंतु 2014 के आम चुनाव में भाजपा के बीसी खण्डूड़ी ने भारी मतों से कांग्रेस के सतपाल महाराज को हराकर जीत हासिल की। इस तरह से देखा जाए तो भाजपा ने वर्ष 1991 से पौड़ी सीट पर 23 वर्षों से अपना कब्जा रखा। इस दोरान केवल कांग्रेस एक बार ही जीत पाई।
पौड़ी लोकसभा सीट चार जिलों में फैली हुई है। जिसमें पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी और नैनीताल जिले की 14 विधानसभा सीटें शामिल हैं। इनमें पौड़ी जिले की पोड़ी, कोटद्वार, यमकेश्वर, श्रीनगर, चौबट्टाखाल, लैंसडॉन विधानसभा सीटे हैं। रुद्रप्रयाग जिले की केदारनाथ और रुद्रप्रयाग विधानसभा सीटें हैं। इसी तरह से चमोली जिले की बदरीनाथ, धराली, कर्णप्रयाग विधानसभा सीटें हैं। टिहरी जिले के देवप्रयाग और नरेंद्र नगर विधानसभा क्षेत्र तथा नैनीताल जिले का रामनगर विधानसभा क्षेत्र पौड़ी लोकसभा सीट में शामिल है। इन 14 विधानसभा क्षेत्रों में 13 लाख 24 हजार मतदाता हैं। जो आने वाले 11 अप्रैल को भाजपा और कांग्रेस उम्मीदवारों के भविष्य का फैसला करेंगे।
 लोकसभा क्षेत्र की 14 विधानसभा सीटों में से 13 भाजपा के कब्जे में हैं। सिर्फ एक केदारनाथ में ही कांग्रेस के विधायक हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि भाजपा ने कांग्रेस पर बहुत बड़ी मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल की हुई है। राजनीतिक तौर पर भाजपा के तीरथ सिंह रावत नई पीढ़ी के बड़े नेता माने जाते हैं। आरएसएस पृष्ठभूमि के तीरथ संघ प्रचारक और संगठन मंत्री के पद पर भी काम कर चुके हैं। अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय तीरथ सिंह रावत पहली बार एमएलसी का चुनाव जीते थे। पृथक उत्तराखण्ड बनने के बाद तीरथ सिंह रावत भाजपा की अंतरिम सरकार में शिक्षा मंत्री रह चुके हैं। 2002 के विधानसभा चुनाव में रावत पौड़ी विधानसभा सीट से कांग्रेस के यशपाल बेनाम से महज 7 मतों से पराजित हुए। 2012 के चुनाव में वे पहली बार चौबट्टाखाल विधानसभा सीट से जीते। लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उनकी जगह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए सतपाल महाराज को उम्मीदवार बनाया।
तीरथ सिंह रावत के बारे में कहा जाता है कि उन्हें कभी भी भाजपा सरकार में रहकर जनसेवा का मौका नहीं मिला। 2007 में जब भाजपा की सरकार बनी तो वे महज 7 मतों से चुनाव हार गए और 2012 में जब चुनाव जीते तो प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी। इसी तरह 2017 में जब भाजपा मोदी लहर पर सवार होकर प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई तो उनका टिकट ही कट गया। तीरथ सिंह रावत भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे हैं। अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में भाजपा को राज्य की पांचों लोकसभा सीटों पर जीत हासिल करवाने और प्रदेश में भाजपा के 16 लाख भाजपा सदस्य बनाने का श्रेय भी तीरथ सिंह रावत को दिया जाता है। इसके अलावा पंचायत और निकाय चुनाव में भी रावत के अध्यक्ष पद पर रहते हुए पार्टी बड़ी जीत हासिल कर चुकी है। तत्कालीन समय में पांच नगर निगमों में भाजपा ने कब्जा किया था। साथ ही कांग्रेस से अधिक नगर पालिकाओं और नगर पांचायतों में जीत हासिल की थी। पौड़ी से भाजपा के बड़े नेताओं में रावत का नाम शुमार होता है। बीसी खण्डूड़ी के राजनीतिक शिष्य के तौर पर भी रावत की पहचान बनी हुई है। भाजपा सूत्रां की मानें तो बीसी खण्डूड़ी के चुनाव संचालन और रणनीति बनाने में तीरथ सिंह रावत का बड़ा योगदान रहा है। यहां तक कि 2007 में कांग्रेस के टीपीएस रावत को भाजपा में शामिल करके खण्डूड़ी के लिए धुमाकोट सीट को खाली करवाने में तीरथ सिंह रावत की पर्दे के पीछे बड़ी भूमिका रही थी। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में टिकट कटने के बावजूद तीरथ सिंह ने अपने क्षेत्र से नाता नहीं छोड़ा है। क्षेत्र में लगातार अपनी उपस्थिति बनाए रखने का पूरा लाभ उन्हें मिला।
 कांग्रेस ने भाजपा के दिग्गज और पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खण्डूडी के सुपुत्र मनीष खण्डूड़ी को उम्मीदवार बनाकर जनता में खण्डूड़ी के प्रति उपजी सहानुभूति का फायदा उठाने का प्रयास किया है। स्वयं मनीष खडूड़ी का दावा है कि उनके पिता बीसी खण्डूड़ी का पूरा आशीर्वाद उनके साथ है। दिलचस्प यह है कि खण्डूड़ी की पुत्री ऋतु खण्डूड़ी यमकेश्वर से भाजपा टिकट पर चुनाव जीतकर पहली बार प्रदेश की राजनीति में आई हैं, जबकि मनीष खण्डूड़ी का कोई राजनीतिक करियर नहीं रहा है। पेशे से इंजीनियर और उच्च शिक्षा प्राप्त मनीष खण्डूड़ी केवल अपने पिता बीसी खण्डूड़ी की राजनीतिक छांव तले पहला राजनीतिक युद्ध जीतने के प्रयास में हैं। जनरल खण्डूड़ी के चुनाव नहीं लड़ने की इच्छा के बाद भाजपा के सामने पौड़ी सीट पर उम्मीदवार खड़े करने की बड़ी चुनौती बन चुकी थी। भाजपा इस सीट पर खण्डूड़ी की पसंद के चेहरे को ही खड़ा करना चाहती थी। लेकिन कांग्रेस से मनीष खण्डूड़ी को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद तीरथ सिंह रावत ही भाजपा और खण्डूड़ी की एक मात्र पसंद बने। इसके चलते चुनाव में ठाकुर और ब्राह्मण समीकरणों को साधने का बड़ा अवसर भी भाजपा को मिला है।
राजनीतिक जानकारां का मानना है कि जनता और मतदाताओं में आज भी बीसी खण्डूड़ी का एक बड़ा असर बना हुआ है। इसको देखते हुए कांग्रेस ने मनीष खण्डूड़ी पर चुनावी दांव खेला है। इसके अलावा पूर्व में 37 वर्षों से कांग्रेस का राजनीतिक कब्जा इस सीट पर रहा है, उसका एक बड़ा प्रभाव आज भी इस क्षेत्र में कहीं न कहीं बना हुआ है, जबकि तीरथ सिंह सिंह रावत के पीछे भाजपा से जुड़े मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग है जो कि खण्डूड़ी की राजनीतिक विरासत को दो हिस्सों में बांट सकता है। एक हिस्सा भाजपा के कैडर वोटों का है, साथ ही खण्डूड़ी के राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर तीरथ सिंह को फायदा मिल सकता है। इसके चलते आज पौड़ी का चुनाव शिष्य और पुत्र के बीच सिमट चुका है। अब देखना खासा दिलचस्प होगा कि 13 लाख 24 हजार मतदाता किस उम्मीदवार को बीसी खण्डूड़ी की असली विरासत सौंपते हैं।
जनरल के घर लहराया पंजा

जसपाल नेगी

मनीष खण्डूड़ी वो नाम है, जिसने उत्तराखण्ड की राजनीति में एक नई बहस खड़ी कर दी है। उनको हर कोई अपने पिता बीसी खण्डूड़ी के राजनीतिक वारिस के रूप में देखना चाहता था, लेकिन उन्होंने कांग्रेस का दामन थामकर एक नई राजनीति और बहस को जन्म दे दिया। आमतौर पर किसी भी नेता के नामांकन के वक्त उमड़ी भीड़ को उसकी ताकत की तौर पर देखा और आंका जाता है। इस लिहाज मनीष खण्डूड़ी ने पौड़ी में नामांकन के दौरान अपनी ताकत का एहसास बड़ी मजबूती से करा दिया। बात केवल इतनी भर नहीं है। बात यह है कि 29 साल बाद जनरल खण्डूड़ी के घर पर पंजा लहराया गया। जाहिर है, भाजपा का झंडा अब वहां से हटा दिया गया है।
मनीष खंडूड़ी के नामांकन में भीड़ उमड़ पड़ी। भीड़ को देखकर हर कोई हैरान था। लोग आंकलन करते दिखे कि दो दिन पहले राजनीति में कदम रखने वाले मनीष को इतना समर्थन कहां से और कैसे मिल रहा है। ये भीड़ भाजपा को डराने के लिए भी काफी है। भाजपा दावा कर रही थी कि मनीष को कोई नहीं जानता, लेकिन जिस तरह से भीड़ उमड़ी, उससे एक बात तो साफ हो गई कि मनीष को बहुत लोग जानते हैं।
नामांकन के दौरान मनीष खण्डूड़ी का जोश देखने लायक था। उनके समर्थक भी पूरे जोश में नजर आए। भारी बारिश के बावजूद उनके समर्थन में भीड़ जमी रही। लोगों ने अपने नेता के लिए जमकर नारेबाजी भी की। लोगों का ये जोश भाजपा के जुबानी हमलों का जवाब देने में सफल नजर आता है। इससे भाजपा को नए सिरे से सोचने की जरूरत भी है। यह उन लोगों के लिए भी एक संदेश है, जो जनरल खंडूड़ी को लेकर गलत बयानबाजी कर रहे हैं। मनीष को मिले समर्थन से उन्हें कम से कम इतना तो समझ में आ ही गया होगा कि मनीष के साथ कांग्रेस कार्यकर्ता तो थे ही भाजपा के भी कई कार्यकर्ता भीड़ के बीच नजर आ रहे थे। कहा जा रहा है कि आने वाले दिनों में मनीष के समर्थन का यह आंकड़ा और बढ़ सकता है।

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