[gtranslate]
Uttarakhand

पर्यावरण संरक्षण का मोल

पर्यावरण संरक्षण की कीमत वसूले जाने की वर्षों पुरानी मांग आखिरकार रंग लाई है। मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रदेश में सकल पर्यावरण उत्पाद आधारित व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है। इसके साथ ही उत्तराखण्ड इस व्यवस्था को लागू करने वाले देश का पहला राज्य बन गया है। अब प्रदेश में राज्य योजना में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के साथ सकल पर्यावरण उत्पाद जीईपी को भी आधार बनाया जा सकेगा। इसके तहत राज्य में मोैजूद सभी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं और विभाग सभी प्रति वर्ष जलवायु बजट की व्यवस्था करेंगे। इस बजट को राज्य में पर्यावरणीय सेवाओं को बढ़ाने के लिये खर्च किया जायेगा। प्रदेश में एक वर्ष के भीतर सभी राजस्व अभिलेखों में दर्ज सूखे तालाबों और जल स्रोतों का पुनर्जीवन किया जाएगा। यही नहीं सरकार ने यह भी निर्णय लिया है कि प्रत्येक वर्ष पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन के लिये विशिष्ट कार्य करने वाले विभाग, जिले संस्थानों तथा विभागों व व्यक्तियों को विश्व पर्यावरण दिवस पर सम्मानित किया जायेगा।

राज्य योजना में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के साथ सकल पर्यावरण उत्पाद (जीईपी) को भी अब आधार बनाया जाएगा। पर्यावरणविद् से लेकर विपक्षी पार्टियों के नेता तक इसे मुख्यमंत्री तीरथ रावत सरकार का अच्छा निर्णय मान रहे हैं

हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड सदेैव से ही जल जंगल और जमीन के साथ साथ पर्यावरण संरक्षण के लिये जाना जाता रहा है। हिमालयी क्षेत्र होने के साथ इस प्रदेश की भौगौलिक और पारिस्थतिक स्थितियां अलग होने के बावूजद जिस प्रकार से यहां के निवासियों ने अपने आप को पर्यावरण और जलवायु के साथ बेहतर सांमजस्य बना जीवन यापन किया है, वह अपने आप में ही खास रहा है।  हालांकि इसका एक बड़ा नुकसान स्वयं उत्तराखण्ड के निवासियांे को अपने विकाय कार्यों में बड़ी अड़चन के तौर पर भी देखने को मिलता रहा है। जबकि उत्तराखण्ड देश को आक्सीजन के देने का काम करता रहा है। एक अनुमान के मुताबित 71 फीसदी क्षेत्र में वनजंगल होने के बावजूद यहां के निवासियों को अनेक दुश्वारियों से जूझना पड़ रहा है। यह आज भी जारी है। तमाम विकास कार्य वन कानून और पर्यावरण के नाम पर रोक दिये जाते हंै। अधिकतर विकास कार्य स्वीकृत होने में ही वर्षों तक लंबित रहते हैं। इसके चलते उत्तराखण्ड में ग्रीन बोनस की मांग हमेशा से उठती रही है। साथ ही अनेक पर्यावरणविद् ओैर जानकार सरकार पर दबाब बनाये हुये थे कि सरकार अपने बजट में सकल पर्यावरण उत्पाद को शामिल कर के ग्रीन बोनस की मांग को जायज ओैर सही ठहरा सकती है जिससे जनता को पर्यावरण सरंक्षण के कारण होने वाली समस्याओं से राहत मिल सके।

सकल पर्यावरण उत्पाद की कीमत को अगर सरसरी तौर पर देखा जाये तो आंकड़े बेहद चैेंकाने वाले है। प्रदेश की सिर्फ वन संपदा की ही कीमत 14 लाख करोड़ आंकी गई है जो कि अपने आप में एक बड़ा मूल्य माना जा सकता है। अर्थ और सांख्यिकी विभाग के द्वारा अनुमानित किया है कि उत्तराखण्ड देश को हर वर्ष 95 हजार करोड़ के मूल्य की पर्यावरणीय सेवा दे रहा है। इसके अलावा प्रदेश की सदानीरा नदियों को सदैव जल से परिपूर्ण करने वाले ग्लेशियरों का भी विशेष योगदान है। प्रदेश के वन कार्बन को सोख कर देश को आॅक्सीजन देने का काम करते है। मैदानी क्षेत्र में भी उत्तराखण्ड की जलवायु और पर्यावरण पूरी पारिस्थितिकी को संभालने का काम कर रहा है। अर्थ और सांख्यिकी विभाग ने राज्य के वनो से मिल रही सेवाओं के मूल्य का आंकड़ा अपनी रिपोर्ट में दिया है। जिसके अनुसार वनो से प्रतिवर्ष मिलने वाले रोजगार की कुल कीमत 300 करोड़, 3385 करोड़, चारा 776 करोड़, लकड़ी 1243 करोड़, ग्रीन पूल 73 हजार 386 करोड़ तथा बाढ़ रोकने में 1306 करोड़ मूल्य आंका गया है। इसके अलावा प्रर्यावरणीय प्रवाह मूल्य 95 हजार 112 करोड़ और वन एवं पर्यावरण संपदा के जमा भंडार का मूल्य 14 लाख 13 हजार 676 करोड़ तथा 7 लाख 21 हजार 101 करोड़ मूल्य की इमारती लकड़ी का भंडार राज्य में मोैजूद माना गया है। राज्य के वनों द्वारा प्रति वर्ष काॅर्बन सोखने का मूल्य 2 लाख 55 हजार 725 करोड़ और राज्य में स्थित वन भूमि की कीमत 4 लाख 36 हजार 849 करोड़ मानी गयी है। गौर करने वाली बात है कि स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के एक मामले में यह माना है कि एक पेड़ पर्यावरणीय सेवाओं के साथ- साथ 74 हजार 500 करोड़ मूल्य की आक्सीजन देता है।

अब राज्य सरकार के ने अपने बजट में सकल पर्यावरण उत्पाद को शामिल करके भविष्य के कई मार्ग को खेलने का काम किया है। इसको लेकर अब राज्य के पर्यावरणविद् और चिंतक खासे उत्साहित हैं। सभी का मानना है कि अब राज्य जो कि वर्षों से पर्यावरण संरक्षण के लिये काम करता रहा है, अब उसका मेहनताना राज्य को मिलेगा। कम से कम अब राज्य में स्थित पर्यावरण और वन संपदा का वास्तविक मूल्य लगाया जा सकेगा और इसके चलते राज्य को ग्रीन बोनस जो कि उसका हक है मिल सकता है। सकल पर्यावरण उत्पाद को बजट में शामिल करने की लंबी लड़ाई लड़ने वाले हैस्को संस्था के अध्यक्ष अनिल जोशी इस पर खासे उत्साहित हैं। अनिल जोशी तकरीबन 12 वर्षों से इस मामले को लेकर मुखर रहे हंै। इसके लिए वे हाईकोर्ट भी गए जिसमें लंबी सुनवाई के बाद 2018 में हाईकोर्ट में सरकार ने माना कि सरकार जल्द ही सकल पर्यावरण उत्पाद को अपनाएगी। आखिरकार वर्तमान सरकार ने इस बात को मानते हुए घोषण कर दी है। उत्तराखण्ड में वनाधिकार आंदोलन को चलाने वाले कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय का मानना है कि उनके आंदोलन का मूल भी यह है कि हमारे द्वारा संरक्षति किए गए पर्यावरण और वन सम्पदा का मूल्यांकन किया जाए और इसका लाभ सीधे तौर पर उत्तराखण्ड के नगारिकों को ही मिले।

वर्ष 1944-45 में यह यूरोपीय देशों में आरंभ हुआ था। पारिस्थितिकी तंत्र का मूल्यांकन करने के लिये यह अनेक देशों में फैलता रहा। हमने इसके लिये, कई कार्यक्रम किये साईकिल यात्राएं की। सरकारों और मुख्यमंत्रियों से जिलों में बैठके की। सभी इसे मानने की बात तो करते थे, लेकिन लागू करने के लिये तैयार नहीं थे। हम इसको लेकर हाईकोर्ट भी गये जहां सरकार ने माना कि वह इसे लागू करेगी। हमने इस मामले को राज्य में सबसे पहले निंशक सरकार के समय में उठाया था। निश्ंाक भी स्वयं इसको लेकर उत्साहित थे, लेकिन वह इसे बजट में शामिल नहीं कर पाए। इसके बाद 5 मुख्यमंत्री आये और सभी ने अपनी सहमति तो दी, लेकिन साहस कोई नहीं कर पाया। आखिरकार बाजी मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत जी के हाथ लगी और उन्होंने जीईपी को जीडीपी में शामिल करने की घोषणा कर के इसे लागू कर दिया। हालांकि सकल पर्यावरण उत्पाद और ग्रीन बोनस दोनों अलग अलग विषय हैं। पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित करने के लिये ही सकल पर्यावरण उत्पाद को शामिल किया गया है, लेकिन इससे आने वाले समय में ग्रीन बोनस की मांग को और भी मजबूती मिलेगी। तो यह कहा जा सकता है कि सरकार का यह साहस भरा निर्णय राज्य और देश के साथ- साथ पर्यावरण और इको सिस्टम को बेहतर करने के लिये बड़ी भूमिका निभाएगा।

अनिल जोशी, अध्यक्ष हैस्को

हमारा वनाधिकार आंदोलन को अगर देखो तो उसके मूल में भी यही मांग ही रही है। जिस पारिस्थितिकी तंत्र को हम उत्तराखण्ड और हिमालय वासियों आदिवासियों ने बचाये रखा, उसका सरंक्षण किया, लेकिन उसका फायदा हमसे ही छीन लिया गया। आज सरकार राज्य में नदियों ग्लेशियरों और वनों की बात कर रही है, तो यह कहां से आया। सरकार ने तो कोई ऐसा काम नहीं किया। सदियों से हिमालय वासियों ने ही इसे बनाया संवारा और इसका सरंक्षण किया। अब सरकार ने अच्छा काम किया है। हम इसका पूरा स्वागत और समर्थन करते है। अब कम से कम यह तो पता लग सकता है कि जो काम हिमालय निवासियों ने वर्षों से किये उनका कितना मूल्य है। और इस मूल्य का लाभ सीधे तौर पर उत्तराखण्ड के निवासियों को मिले। वनाधिकार आंदोलन इसी हक को लेकर आरंभ किया गया है। यह वनाधिकार आंदोलन की जीत है।

किशोर उपाध्याय, वनाधिकार आंदोलन के प्रेणता

You may also like

MERA DDDD DDD DD