[gtranslate]
Uttarakhand

उत्तराखंड: भाजपा के नवनिर्वाचित सुप्रीमो की नई चुनौतियां

उत्तराखंड: भाजपा के नवनिर्वाचित सुप्रीमो की नई चुनौतियां

उत्तराखण्ड में भारतीय जनता पार्टी ने बंशीधर भगत को अध्यक्ष के तौर पर एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। कैलाश चन्द्र पंत तथा कैलाश शर्मा की भी इस पद के लिए अहम दावेदारी थी, लेकिन बंशीधर भगत दोनों पर भारी पड़े। कैलाश शर्मा की दावेदारी सांकृतिक थी, परंतु कैलाश चन्द्र पंत की गंभीर दावेदारी ने थोड़ा माहौल गरमाए रखा। अंततोगत्वा पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने अपना भरोसा बंशीधर भगत पर ही जताकर उन्हें उत्तराखण्ड प्रदेश भाजपा के आठवें अध्यक्ष के तौर पर चयनित किया।

निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट द्वारा दावेदारी से इंकार करने के बाद बंशीधर भगत का दावा सबसे मजबूत हो गया था। हालांकि, कैलाश पंत अंत तक अपनी दावेदारी पर अड़े रहे, लेकिन पार्टी ने भगत के लंबे अनुभव को तरजीह दी। नव निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत के लंबे अनुभव से इंकार भी नहीं किया जा सकता। लेकिन पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट के कार्यकाल की जो समृद्ध विरासत उन्हें मिली है उसे सहेज कर रखना उनके लिए कठिन चुनौती होगी।

खासकर तब जबकि उनके नेतृत्व में पार्टी संगठन 2022 के विधानसभा चुनाव में जनता से रूबरू होगा। उस वक्त त्रिवेंद्र सरकार के कार्यकाल की सत्ताविरोधी लहर का सामन करना उनके लिए बड़ी चुनौती होगी। वो भी ऐसे मोड़ पर जब मोदी लहर का ज्वार काफी उतार पर होगा। अजय भट्ट द्वारा संगठन में स्थापित मानकों पर खरा उतरने की भगत के सामने बड़ी चुनौती होगी क्योंकि अजय भट्ट अपनी विरासत में एक लंबी लकीर खींच गए। ये अजय भट्ट का ही अध्यक्षीय कार्यकाल था जब प्रदेश में किसी भी राजनीतिक दल ने विधानसभा चुनाव में 57 सीटें जीतने का कीर्तिमान स्थापित किया था। साथ ही लोकसभा की पांचों सीटों पर भी कब्जा किया था।

भाजपा के नवनिर्वाचित अध्यक्ष बंशीधर भगत को जमीन से जुड़ा नेता माना जाता है। 1975 में जनसंघ से जुड़ने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी से प्रभावित भगत भाजपा के सदस्य बने। ग्राम प्रधान से अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत करने वाले भगत के धैर्य का ही परिणाम है कि आज वो भाजपा के प्रदेश के संगठन के मुखिया हैं और शायद भाजपा के इस दावे को भी परिलक्षित करता है कि पार्टी का आम कार्यकर्ता भी संगठन के शीर्ष पर पहुंच सकता है।

संघर्षों से तपा व्यक्ति ही भविष्य का नेता होता है, यह बात बंशीधर भगत पर सटीक बैठते हैं। 1982 में किसानों की समस्याओं को लेकर बनाई गई किसान संघर्ष समिति के बैनर तले किसानों की आवाज उठाना हो या फिर जमरानी बांध निर्माण के प्रति उनका संघर्ष व प्रतिबद्धता, जन आंदोलनों ने उनकी नेतृत्व क्षमता को गढ़ा है। जमरानी बांध का निर्माण पूर्व औपचारिकताओं को अंतिम चरण में पहुंचने में बंशीधर भगत का बड़ा योगदान है।

1984 में पनियाली ग्राम से अपनी चुनावी राजनीति की शुरुआत करने वाले बंशीधर भगत 1889 में नैनीताल ऊधमसिंह नगर भाजपा की जिला इकाई के अध्यक्ष बने। 1991 में पहली बार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर नैनीताल से विधायक निर्वाचित होने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1996 में कल्याण सिंह की सरकार में खाद्यमंत्री, वन राज्यमंत्री बने। 2002 में उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के बाद बनी अंतरिम सरकार में कृषि सहकारिता गन्ना सहित कई विभागों के कैबिनेट मंत्री बने।

2002 के विधानसभा चुनाव में हल्द्वानी विधानसभा सीट से कांग्रेस की कद्दावर नेता डॉ. इंदिरा हृदयेश को पराजित किया तथा खण्डूड़ी सरकार में परिवहन व वन जैसे महत्वपूर्ण विभागों के कैबिनेट मंत्री रहे। नये परिसीमन के बाद बनी कालाढूंगी विधानसभा सीट से 2012 व 2017 में विधायक चुने गये। 2017 के विधानसभा चुनाव में जीतने के बाद भी उन्हें पार्टी ने मंत्रिमंडल में स्थान नहीं दिया। ये उनको अखरा था और उन्होंने अपनी नाराजगी भी जाहिर की थी। फिर भी उन्होंने धैर्य बनाए रखा था। एक समय राजनीतिक हलकों में चर्चा की थी कि अगले चुनाव में 70 साल की उम्र सीमा के चलते शायद भाजपा में उनके राजनीतिक जीवन की यह अंतिम पारी हो, लेकिन उसी वक्त उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में अपनी दावेदारी कर सबको चैंका दिया तथा क्षेत्र में सक्रिय हो गए।

हालांकि पार्टी ने अजय भट्ट भट्ट को उम्मीदवार बना दिया था। उसके बाद भी उनकी विधानसभा सीट से अजय भट्ट की जीत का अंतर खासा था। 69 वर्षीय बंशीधर भगत की सादगी व सहजता उनकी ताकत है। राजनीतिक जीवन से इतर बंशीधर भगत का एक चेहरा और है जिसको ऊंचापुल में होने वाली रामलीला में देखा जा सकता है। वर्षों से रामलीला में दशरथ के पात्र की भूमिका निभाते आ रहे बंशीधर भगत एक अच्छे कलाकार भी हैं।

उत्तराखण्ड की राजनीतिक पार्टियां जिस प्रकार क्षेत्रीय व जातिगत समीकरणों को संतुलन लगाने का कार्य करती हैं उस परिस्थिति में अध्यक्ष का पद जाति के हिसाब से ब्राह्मण और क्षेत्र के हिसाब से कुमाऊं को मिलना था। शुरुआत में अजय भट्ट को पुनः अध्यक्ष बनाने की चर्चा थी, परंतु अजय भट्ट द्वारा अनिच्छा जाहिर करने के बाद नई सुगबुगाहट शुरू हुई। हालांकि एक कार्यक्रम में भाजपा के नेता कैलाश चन्द्र पंत अपनी पार्टी की सेवाओं व कैलाश शर्मा युवा होने के नाते दावेदारी जता रहे थे। कैलाश चन्द्र पंत का कहना है अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने पार्टी से पहली बार कुछ मांगा था। पार्टी के हर महत्वपूर्ण पद पर अपनी दावेदारी की थी, लेकिन पार्टी का निर्णय सिर-माथे पर।

पार्टी के हमने अपने मां की तरह माना है उसका जो भी आदेश होगा मुझे स्वीकार है। पार्टी सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत का झुकाव लालकुआं से विधायक नवीन चन्द्र दुमका के पक्ष में था। जब कि संघ व केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ व निवर्तमान अध्यक्ष अजय भट्ट बंशीधर भगत के पक्ष में थे। इन सब पर पार्टी ने बंशीधर भगत को तरजीह दी। झारखण्ड, हरियाणा व महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के परिणामों ने भाजपा फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। युवाओं को तरजीह देने का दावा करने वाली भाजपा ने उत्तराखण्ड में अपने पुराने अनुभवी कार्यकर्ता को अध्यक्ष बनाकर पुराने नेताओं को सकारात्मक संदेश देने का प्रयास किया है।

बंशीधर भगत के सिर पर अध्यक्ष का ताज तो सज गया। लेकिन बड़ी परीक्षा संगठन को गतिशील बनाकर 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए लगाना है। 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए वाकई भगत के सामने परिस्थितियां विकट होंगी। मोदी का करिश्मा उत्तराखण्ड में कितना काम करेगा, ये समय बताएगा। अभी तो झारखण्ड, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ में मोदी का चेहरा भाजपा के काम नहीं आया है। इन राज्यों की जनता ने राज्य सरकारों के काम पर वोट दिया है। ऐसे में जनता त्रिवेंद्र सरकार के कामकाज का भी मूल्यांकन करेगी। त्रिवेंद्र से लोगों की नाराजगी निरंतर बढ़ती जा रही है। ऐसे में कुल मिलाकर बंशीधर भगत को भाजपा ने कठिन चुनौतियों के समय जिम्मेदारी सौंपी है। देखना होगा कि वो कैसे इन चुनौतियों से उबर सकते हैं। भाजपा की वापसी करवाकर नये राजनीतिक रामायण का परिदृश्य लिखते हैं।  -संजय स्वार

You may also like

MERA DDDD DDD DD