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Uttarakhand

टीम नड्डा में उत्तराखण्ड की उपेक्षा

लोकसभा चुनाव में लगातार दो बार प्रदेश की सभी पांचों सीटें भाजपा की झोली में डालने के लिए पार्टी कार्यकर्ता कड़ी मेहनत करते रहे हैं। बावजूद इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की दूसरी बार की कमेटी में प्रदेश के भाजपाई कोई अहम पद नहीं पा सके। हालांकि नई कार्यकारिणी में राज्यसभा सांसद नरेश बंसल को राष्ट्रीय सह कोषाध्यक्ष बनाया गया है लेकिन उत्तराखण्ड भाजपा के नेता इससे संतुष्ट नजर नहीं आ रहे हैं। आगामी 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तराखण्ड से हैट्रिक की उम्मीद पाल रही पार्टी का यह कदम कहीं नेताओं के लिए नकारा साबित न हो जाए

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने एक बार फिर से उत्तराखण्ड भाजपा नेताओं को नकार दिया है। नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में फिर उत्तराखण्ड
भाजपा नेताओं को कोई स्थान नहीं दिया गया है। इसमें सबसे ज्यादा गौर करने वाली बात यह है कि केवल एक राष्ट्रीय सह कोषाध्यक्ष का पद राज्यसभा सांसद नरेश बंसल को देकर भाजपा हाईकमान ने यह साफ कर दिया है कि प्रदेश के भाजपा नेताओं में खास तौर पर पहाड़ी मूल के नेताओं का नई कार्यकारिणी में कोई स्थान नहीं है। हैरानी की बात यह है कि ऐसा पहली बार नहीं किया गया है। जब नड्डा पहली बार राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे तब सितंबर 2020 में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन किया गया था तब भी प्रदेश के भाजपाइयों का कद इस लायक नहीं समझा गया कि वे राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थान पा सके। उस समय भी राष्ट्रीय भाजपा कार्यालय सचिव के पद पर महेंद्र पांडे नाम के ऐसे शख्स को बिठा दिया गया जो केवल नाम के लिए ही उत्तराखण्डी माना जाता रहा है जबकि उनका पूरा राजनीतिक जीवन दिल्ली और अन्य प्रदेश में ही व्यतीत हुआ है। ठीक उसी प्रकार से अनेक बड़े नेताओं को नकारते हुए नरेश बंसल को राष्ट्रीय सह कोषाध्यक्ष पद पर तैनात किया गया। राजनीतिक जानकारों की मानें तो इस तरह से अपने दोनों कार्यकाल में जेपी नड्डा द्वारा प्रदेश भाजपा के सभी बड़े नेताओं को एक संदेश दिया गया है कि उनकी निगाह में पहाड़ी नेताओं का वजूद दूसरे दर्जे से ज्यादा नहीं है।

यह भी गौर करने वाली बात है कि पूर्व में केंद्रीय भाजपा संगठन में उत्तराखण्ड से मजबूत प्रतिनिधित्व मिलता रहा है। पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के दोनों कार्यकाल में कई नेताओं को न सिर्फ कार्यकारिणी में स्थान दिया गया अपितु केंद्र की मोदी सरकार में भी प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिलता रहा है। अमित शाह के समय पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहे तीरथ सिंह रावत को राष्ट्रीय सचिव तथा हिमाचल प्रदेश का प्रभारी तक बनाया गया था। पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत को झारखंड का प्रभारी पद देकर उनकी राजनीतिक क्षमताओं का भाजपा ने उपयोग किया। यही नहीं वर्तमान राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी को राष्ट्रीय प्रवक्ता और मुख्य प्रवक्ता तक बनाया गया।

लेकिन जेपी नड्डा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में उत्तराखण्ड का प्रतिनिधित्व नकारा जाने लगा। तीरथ सिंह रावत और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को भी कोई स्थान नहीं दिया गया। जबकि माना जा रहा था कि तीरथ सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया है तो उन्हें कम से कम राष्ट्रीय संगठन में कोई बड़ा पद जरूर दिया जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। तीरथ सिंह रावत जिस तरह से अचानक ही राज्य के मुख्यमंत्री बनाए गए उसी तरह से उनको महज 105 दिनों में मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा।

ऐसा नहीं है कि प्रदेश के भाजपा नेताओं को राष्ट्रीय संगठन में ही तवज्जों नहीं मिली है। मोदी सरकार ने भी अपने मंत्रिमंडल में प्रदेश से केवल एक राज्य मंत्री का पद देकर किसी तरह से उत्तराखण्ड के नेताओं को पुचकारने का काम किया है। जबकि मोदी के दूसरे कार्यकाल में पहली बार पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार से सांसद रमेश पोखरियाल ‘निंशक’ को न सिर्फ कैबिनेट मंत्री बनाया गया, बल्कि शिक्षा मंत्री जैसे अहम पद से भी नवाजा गया था। हालांकि मोदी सरकार के मंत्रालयों के फेरबदल के बाद निशंक को भी मंत्री पद से चलता करके पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को रक्षा राज्यमंत्री का पद दिया गया। जबकि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में भी सिर्फ अजय टम्टा को राज्य मंत्री का पद दिया गया था।
2014 और 2019 में लगातार दोनों लोकसभा चुनाव में प्रदेश से भाजपा को सभी पांचां सीट पर भारी मतों से जीत हासिल हुई। जिससे यह माना जा रहा था कि कम से कम मोदी सरकार 2024 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए उत्तराखण्ड के हिस्से में एक कैबिनेट मंत्री पद तो जरूर देगी लेकिन इसके विपरीत भाजपा राष्ट्रीय संगठन में भी किसी नेता को स्थान तक नहीं देने से जहां भाजपा नेताओं में मायूसी है तो वहीं कार्यकर्ताओं में भी इसको लेकर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में मोदी सरकार द्वारा निशंक को कैबिनेट मंत्री पद से हटाए जाने के बाद जो भाजपा 2017 के विधानसभा चुनाव में 57 सीटों के प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई वहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में 15 सीटों के भारी नुकसान के बाद महज 42 सीटों पर सिमट गई। हालांकि भाजपा पूर्ण बहुमत से सरकार में अपनी वापसी करने में कामयाब तो रही लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी परंपरागत खटीमा सीट से भारी मतों से चुनाव तक हार गए।

आज हालत यह है कि प्रदेश के तमाम
भाजपा नेता यह दावा करते नहीं थकते कि प्रदेश में भाजपा की तीसरी पीढ़ी के युवा नेताओं की भरमार है और भविष्य में भाजपा के पास युवा नेतृत्व की कमी नहीं होने वाली। परंतु जिस तरह से राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने अपने दूसरे कार्यकल में भी प्रदेश भाजपा नेताओं को पूरी तरह से नकार दिया है वह अपने आप में कई सवाल तो खड़े करता ही है साथ ही उन नेताओं पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं जो अपने आप को भाजपा की थिंक टीम का हिस्सा बताते नहीं थकते। पूर्व मुख्यमंत्री निश्ांक मोदी सरकार में महज ढाई साल तक ही कैबिनेट मंत्री रह पाए जबकि उनको भाजपा का बड़ा नेता माना जाता रहा है। इसी तरह से पूर्व राज्यमंत्री अजय टम्टा जो कि प्रदेश भाजपा में एक युवा दलित नेता के तौर पर पहचान बनाने में सफल तो हुए लेकिन वे न तो राष्ट्रीय संगठन में जगह बना पाए और न ही मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में मंत्री पद पा सके। टिहरी की सांसद माला राजलक्ष्मी लगातार दो बार सांसद होने के बावजूद उनको आज तक भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में स्थान तक नहीं मिला। केंद्र में मंत्री पद तो उनके लिए दूर की कौड़ी ही रहा है।

तीरथ सिंह रावत भी मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद एक तरह से हाशिये पर ही नजर आते हैं तो राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी राष्ट्रीय प्रवक्ता पद से ज्यादा कुछ हासिल नहीं कर पाए। इसी प्रकार से भाजपा के अनेक बड़े नेता जो प्रदेश भाजपा संगठन में मजबूत पकड़ रखते रहे हैं उनको भी जेपी नड्डा ने अपनी टीम के लायक नहीं समझा। पहले ही प्रदेश में भाजपा भीतर पहाड़ी बनाम मैदान और गढ़वाल बनाम कुमाऊं को लेकर असंतोष की चर्चाएं हैं। उस पर नड्डा की टीम में एक भी पहाड़ी मूल के नेता को जगह न मिलने से यह असंतोष भाजपा में क्या रंग लाएगा इस पर सभी की निगाहें लगी हुई हैं। भाजपा सूत्रों की मानें तो राष्ट्रीय संगठन में प्रदेश के नेताओं की भारी अनदेखी और मोदी सरकार में लगातार सभी सीटों पर भारी जीत मिलने के बावजूद सम्मानजनक प्रतिनिधत्व नहीं मिलने के कारण भी 2022 में भाजपा को नुकसान हुआ है। 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश भाजपा नेताओं की अनदेखी चुनाव में क्या असर करती है यह देखना दिलचस्प होगा।

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