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Uttarakhand

33 वर्षों तक पहाड़ों में सेवा करने वाले डॉक्टरों को सजा दे रही उत्तराखण्ड सरकार

देहरादून। उत्तराखण्ड शासन की बड़ी लापरवाही के चलते आयुर्वेदिक चिकित्सकों को अपनी पेंशन ओैर ग्रेच्युएटी के लिए तरसना पड़ रहा है। 33 सालों की नौकरी के बावजूद सेवानिवृत्त हो चुके आयुष चिकितसकों को पेंशन और ग्रेच्युएटी का लाभ नहीं मिल पा रहा है। आज कई चिकित्सकों के सामने रिटायरमेंट के बाद का जीवन-यापन करना ही मुश्किल को चुका है, जबकि नियमानुसार इन सभी चिकित्सकों को उनका हक मिल जाना चाहिए। हैरानी इस बात की है कि इस मामले को लेकर पहले ही राज्य सरकार हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से हार चुकी है, लेकिन शासन के अधिकारियों की हठ के चलते कई चिकित्सकों को उनके हकां से वंचित किया जा रहा है। राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट से फटकार लगने के बाद राज्य में दैनिक वेतनभोगी और वर्कचार्ज कर्मचारियों को तो पेंशन आदि की सुविधा जारी कर चुकी है। लेकिन आयुष चिकित्सकों को इसका लाभ नहीं दिया जा रहा है।

दरअसल, इस पूरे मामले को जानने के लिए तीन दशक पीछे जाना पड़ेगा। अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय में राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के लिए तत्कालीन प्रदेश सरकार ने वर्ष 1988 में आयुर्वेदिक चिकित्सकों की तदर्थ भर्तियां की थी। उस समय उत्तराखण्ड के सभी पांचों जिलों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में आयुर्वेदिक चिकित्सकां को तैनात किया गया। इससे उत्तराखण्ड क्षेत्र के पहाड़ी जिलों में स्वास्थ्य केंद्रां और अस्पतालों में एलोपैथ चिकित्सकों की भारी कमी से जूझते निवासियों को इससे बड़ी राहत मिली। तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के समय प्रदेश में तदर्थ रूप से सही भर्तियां होती थी। जिसके लिए शासन के द्वारा एक कमेटी बना कर भर्तियां की जाती थी। कमेटी के निर्णय के बाद भर्तियां की गई और इसके तीन वर्ष की सेवा के बाद सभी तदर्थ चिकित्सकों को रेग्युलर लिए जाने का निमय बनाया गया। बाद में कर्मचारी चयन आयोग का गठन होने के बाद तदर्थ नियुक्तियों पर रोक लगा दी गई थी। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद से लेकर अभी तक राज्य में एक भी तदर्थ नियुक्ति नहीं हुई है।

जैसे कि नियमानुसार वर्ष 1991 में सभी तदर्थ चिकित्सकों को नियमित किया जाना था, लेकिन तब के शासन के ढीले रवेये के चलते नियम को लागू नहीं किया गया। सरकार भी इस मामले में ढीला रवेया अपनाए हुए थी। चिकित्सकों के विरोध और उनको विनियमित करने की मांग को देखते हुए सरकार ने सभी तदर्थ चिकित्सकों की नियमित चिकित्सकों के ही समान सुविधाओं फंड, पेंशन और ग्रेच्युएटी आदि की सुविधाओं को तो बरकरार रखा, लेकिन वर्ष 2000 तक भी इन चिकित्सकों को नियमित करने पर कोई निर्णय नहीं लिया सका।

वर्ष 2000 में पृथक उत्तराखण्ड राज्य बना तो इन सभी चिकित्सकों को उत्तर प्रदेश या उत्तराखण्ड का विकल्प दिया गया। उत्तराखण्ड में 22 वर्ष सेवा करने वाले चिकित्सकों ने उत्तराखण्ड राज्य का विकल्प स्वीकार किया। उत्तराखण्ड व उत्तर प्रदेश अधिनियम में स्पष्ट किया गया था कि जो भी कर्मचारी उत्तर प्रदेश से उत्तराखण्ड आएंगे उनको कोई वित्तीय नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। यानी जो उत्तर प्रदेश के समय से नियमानुसार सुविधाएं आदि दी जा रही थी और कर्मचारी नियमावाली के तहत प्रावधान था वे सभी उत्तराखण्ड में आने वाले कर्मचारियों को सभी लाभ उत्तराखण्ड में मिलने थे।

वर्ष 2002 में उत्तराखण्ड सरकार द्वारा कर्मचारी नियमावली बनाई गई और उसमें प्रावधान किया कि वर्ष 1998 से पहले जो भी उत्तर प्रदेश के कर्मचारी उत्तराखण्ड में कार्यरत रहे हैं औेर वे उत्तराखण्ड बनने के बाद से कार्यरत हैं उन सभी को विनियमित किया जाएगा। इसके तहत 2002 में इन सभी चिकित्सकों को नियमित किया गया।

इस मामले में उत्तराखण्ड शासन की कार्यप्रणाली सबसे बड़ी हैरान करने वाली है। इन चिकित्सकों को वर्ष 2002 में नियमावली के अनुसार विनियमित किया गया, लेकिन आदेश चार वर्ष बाद यानी वर्ष 2006 में दिए गए। इस बीच सभी चिकित्सकों को एक नियमित कर्मचारी के तौर पर सभी सुविधाएं ओैर कटौतियों मिलती रही। यही नहीं वर्ष 2002 के बाद से और वर्ष 2006 के बाद जो भी चिकित्सक सेवानिवृत्त हुए या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद सेवा मुक्त हुए उन सभी को पेंशन आदि राज्य सरकार देती रही।

वर्ष 2018 में उत्तराखण्ड में वर्कचार्ज और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों द्वारा हाईकोर्ट नैनीताल में अपनी पेंशन आदि के लिए वाद दखिल किया गया जिस पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि वह सभी वर्कचार्ज कर्मचारियों और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को उनकी जब से वे सेवा में रहे हैं, पेंशन जारी करे। हाईकोर्ट के आदेश पर राज्य सरकार ने अप्रैल 2018 में नई कर्मचरी नियमावली बनाई और उसमें प्रावधान किया कि सभी वर्कचार्ज और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के पदां पर जब से मूल नियुक्तियां यानी उनको नियमित किया जाएगा तब से उनको पेंशन अनुमान्य होगी। इस पर कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट चले गए और सुप्रीमकोर्ट से भी सरकार को कोई राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कर्मचारियों के पक्ष में आया तो राज्य सरकार ने सभी को पेंशन अनुमान्य कर दी।

यहां गौर करने वाली बात यह है कि वर्कचार्ज और दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को एक समय सीमा के भीतर सेवा से ब्रेक भी दिया जाता है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी कर्मचारियों के हितां को मानते हुए राज्य सरकार को उनके पक्ष में पेंशन जारी करने का आदेश दिया था, लेकिन वर्ष 1988 में उत्तर प्रदेश में तदर्थ भर्ती लिए गए और नियमानुसार तीन वर्ष की सेवा के बाद स्वतः ही नियमित माने जाने तथा 2002 में उत्तराखण्ड कर्मचारी नियमावली में नियमित लिए गए आयुर्वेदिक चिकित्सकों को अभी तक पेंशन और ग्रेच्युएटी की सुविधाए नहीं दी जा रही है।

आयुर्वेदिक चिकित्सकों का कहना है कि दैनिक वेतन और वर्कचार्ज कर्मचारियों के आगे राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट से मुकदमा हार गई ओैर इसकी गाज आयुर्वेदिक चिकित्सकों पर सरकार द्वारा गिराई गई। सरकार ने आदेश जारी कर दिया कि 2006 से किसी को पेंशन आदि नहीं दी जाएगी।

अब सवाल यह है कि जो आयुर्वेदिक चिकित्सक उत्तराखण्ड में अपनी सेवाएं देते रहे हैं, यहां तक कि जिन पर्वतीय जिलां में ऐलोपैथ के चिकित्सक अपनी सेवाएं देने में कतराते रहे हैं उनकी अगर पहाड़ी जिलों में स्थानांतरण हो जाता है तो राजनीतिक सिफारिशें लगा कर मैदानी जिलों में स्थानांतरण करवाने में सबसे आगे रहते हैं, जबकि आयुर्वेदिक चिकित्सक अपनी सेवाएं देने में पीछे नहीं हैं तो सरकार किस आधार पर उनकी पेंशन आदि रोकी है।

आज 120 आयुष चिकित्सक सेवानिवृत्त हो चुके हैं जिनमें 105 चिकित्सकों को पेंशन आदि दी गई, लेकिन 15 चिकित्सकों को पेंशन का लाभ नहीं दिया जा रहा है, जबकि आने वाले समय में तकरीबन 30 ऐसे चिकित्सक हैं जो अगले वर्ष सेवानिवृत होने वाले हैं उनका भी भविष्य अंधकारमय बना हुआ है।

31 जुलाई 2019 को हरिद्वार जिले में कार्यरत डाक्टर दिवाकर मिश्रा सेवानिवृत्त हुए हैं। 33 वर्ष की सेवा के बाद उनको पेंशन से महरूम रखा जा रहा है। डाक्टर दिवाकर मिश्रा ने दि संडे पोस्ट को अपना वीडियो बयान दिया है जिसमें उन्होंने अपनी पीड़ा जाहिर की है। इसी तरह से डॉक्टर जेपी सेमवाल भी अपर जिला आयुर्वेद अधिकारी के पद से छह माह पूर्व सेवानिवृत्त हुए हैं उनको भी पेंशन नहीं दी जा रही है।

डॉक्टर जेपी सेमवाल का कहना है कि यह सब शासन की लापरवाही है। दैनिक वेतन कर्मचारियों के मामले में शासन को सुप्रीम कोर्ट से मुंह की खानी पड़ी जिसका खामियाजा शासन आयुष चिकित्सकों को भुगतना पड़ रहा है। वित्त सचिव और वित्त विभाग सरकार को अंधेरे में रख रहा है। जब दैनिक कर्मचारियों के हितों पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया तो हमें क्यों उस हित से अलग रखा जा रहा है।

वास्तव में इस मामले में उत्तराखण्ड शासन ने लापरवाही बरती प्रतीत होती है। सोची-समझी रणनीति के तहत आयुष चिकित्सकों को नियमितकरण करने में देरी की गई। पहले तो 2002 में कर्मचारी नियमावली में नियमित किया गया, लेकिन 2006 में आदेश जारी किया। जानबूझ कर 4 वर्ष तक आदेश को रोका गया। 2006 में नियमित किया गया। दैनिक वेतनभोगी और वर्कचार्ज कर्मचारियों को तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर पेंशन आदि दिए जाने का आदेश जारी कर दिया, जबकि आयुष चिकित्सकों को इसका लाभ नहीं दिया जा रहा है।

अब आयुष चिकित्सक सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुके हैं। राजकीय आयुर्वेदिक एवं युनानी चिकित्सा सेवा संघ के बैनर पर वरिष्ठ आयुष चिकित्सकों के पेंशन आदि के लिए आंदोलन करने की बात कही जा रही है। हैरानी की बात यह है कि इस मामले में मुख्यमंत्री से संघ के पदाधिकारी भी मिल चुके हैं और सरकार के आयुष मंत्री हरक सिंह रावत इस मामले को विगत एक वर्ष से कैबिनेट में लाकर पेंशन आदि दिए जाने की बात कहते रहे हैं। विगत एक वर्ष से कई कैबिनेट बैठकें हो चुकी हैं, पंरतु आयुष चिकित्सकों की पेंशन का मामला सरकार सुलझा नहीं पाई है।

 

बात अपनी-अपनी

हमारी सरकार से मांग है कि हमारे वरिष्ठ चिकित्सकों को उनकी पेंशन का लाभ दिया जाए। जब सरकार दैनिक वेतनभोगियों को पेंशन आदि दे रही है तो जिन चित्सिकों ने अपने जीवन के 33 वर्ष उत्तराखण्ड में स्वास्थ्य सेवाओं में बिता दिया उनको अपने हक के लिए लड़ना पड़ रहा है। अगर सरकार हमारी मांगां को नहीं मानती तो हमारे पास कोर्ट जाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। लेकिन हम चाहते हैं कि इस मामले को न्यायालय की बजाय सरकार इसे मानवता के आधार पर लागू करे। इससे न तो कर्मचारियों की छवि को नुकसान होगा और न ही सरकार पर कोई सवाल उठेगा।
डॉक्टर हरेन्द्र सिंह रावत, महासचिव राजकीय आयुवर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा सेवा संघ

सेवानिवृत्त आयुर्वेदिक अधिकारियों को पेंशन और सेवानिवृत्ति के लाभ से वंचित रखना दुर्भाग्यपूर्ण है। 2002 की नियमावली के अनुसार नियमित लिए गए चिकित्सकों को जनबूझ कर 2006 में नियमित किया गया, जबकि नियमावली में 2002 में ही नियमित माने जा चुके हैं। अब सरकार और शासन की एक गलती और लापरवाही के चलते आज सेवानिवृत्त चिकित्सकों के सामने अपना जीवन व्यतीत करना बहुत बड़ी गंभीर समस्या बन चुका है। हमारी सरकार से मांग है कि जल्द से जल्द पेंशन आदि की सुविधा बहाल करे।
डॉक्टर डी सी पसबोला, प्रवक्ता राजकीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी चिकित्सा सेवा संघ

सरकार किस हद तक हमारे साथ अन्याय कर रही है यह इस बात से पता चल जाता है कि 18 वर्ष की सेवा करने के बाद हमको नियमित किया गया। पूरे 18 सालों की नौकरी तक सरकार ने हमारी खाकर बैठ गई। अगर सरकार हमको पहले ही कह देती तो हम नौकरी ही छोड़ देते। अब मैं 1988 से 2019 तक अपनी सेवाएं सरकार को देता रहा हूं और सरकार ने रिटायरमेंट के बाद मुझे क्या दिया मेरी पेंशन के हक से ही मुझे वंचित कर दिया। हमारे संघ के लोग सबसे मिल चुके हैं। मुख्यमंत्री से सभी मिल चुके हैं। सभी कहते हैं कि न्याय होगा लेकिन कर कोई नहीं रहा है। अब हमारे पास सिर्फ कोर्ट का ही सहारा है और हमें पूरा उम्मीद हैं कि जिस तरह से कोर्ट ने दैनिक वेतन भोगियों के हक में सरकार को पेंशन देने के लिए आदेश दिया। वेसा ही आदेश हमारे हक में भी मिलेगा। हम तो सरकार के नियमित कर्मचारी हैं और वे तो दैनिक वेतन कर्मचारी थे। जब उनको उनका हक मिला तो हमें कैसे नहीं मिलेगा।
डॉक्टर दिवाकर मिश्रा, पूर्व जिला आयुर्वेदिक अधिकारी हरिद्वार

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