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Uttarakhand

आर-पार के मूड में उपनल कर्मचारी

सुशीला तिवारी अस्पताल और राजकीय मेडिकल कॉलेज में लंबे समय से कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारी आंदोलनरत हैं। वर्ष 2010 में मेडिकल कॉलेज का राजकीयकरण किया गया। तब कुछ कर्मचारी नियमित हुए लेकिन बहुतों को संविदा और आउट सोर्स पर ही रखा गया। कई समितियों ने इन्हें नियमित करने की सिफारिश की लेकिन सरकार ने अपनी ही समितियों की सिफारिश अभी तक नहीं मानी है। अब ये कर्मचारी ‘समान काम, समान वेतन’ के लिए सड़क पर उतर आए हैं

उत्तराखण्ड राज्य निर्माण को 21 वर्ष पूरे होने वाले हैं। इस इक्कीस वर्षों के लंबे समय में सरकारें समस्याओं को निपटाने के बजाय उसे लटकाने में दिलचस्पी ली है। कर्मचारियों की समस्याओं के प्रति भी सरकारें संजीदा नहीं रही है। नौकरशाही पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता ने इसे और बढ़ाया ही है। इससे कर्मचारियों के सामने हड़ताल एक मात्र रास्ता रह जाता है। हल्द्वानी स्थित सुशीला तिवारी अस्पताल और राजकीय मेडिकल कॉलेज के सैकड़ों कर्मचारियों के सामने भी सड़कों पर उतरने के अलावा कोई और रास्ता शासन ने नहीं छोड़ा था।

सुशीला तिवारी अस्पताल और राजकीय मेडिकल कॉलेज में वर्षों से कार्यरत 695 आउटसोर्स कर्मचारी आंदोलन की राह पर हैं। सरकार अपने तथा उच्च न्यायालय के आदेशों की भी परवाह नहीं कर रही है। कैबिनेट समिति की सिफारिशें नौकरशाही के चक्र में उलझकर रह जा रही है। जिस कारण इनसे कर्मचारियों का विश्वास उठता जा रहा है। समितियों की सिफारिशें कर्मचरियों को देने के बजाय उनसे छीन लेने की मंशा ज्यादा दिखाती हैं। इसी अविश्वसनीयता के कारण वरिष्ठ सेवानिवृत्त नौकरशाह इंदु कुमार पाण्डे अपनी अध्यक्षता वाली समिति से स्वयं हट गए। सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज के आंदोलनरत कर्मचारियों में स्टॉफ नर्स, टैक्नीशियन, क्लर्क, स्टैनो, डाटा एंट्री ऑपरेटर, फार्मेसिस्ट, वार्ड ब्वॉय, आया, सफाई कर्मचारी हैं। इनमें से कई 20-22 सालों से यहां कार्यरत हैं। ये कर्मी अपने भविष्य के लिए आशंकित है। इतने समय से कार्यरत कर्मचारी ठेकेदार प्रथा में ही काम कर रहे हैं। इस कारण ये हमेशा नौकरी जाने की आशंका में रहते हैं।

सुशीला तिवारी स्मारक वन चिकित्सालय अपने स्थापना के समय ट्रस्ट के अधीन था। 2010 में इसका राजकीयकरण किया गया। तब चिकित्सकों सहित लगभग 200 कार्यरत कर्मियों का नियमितीकरण कर दिया गया। शेष कर्मचारियों को ठेका प्रथा के अंतर्गत आउटसोर्स के तहत काम कर रहे हैं। ठेकेदार बदलते गए और ये कर्मचारी अस्पताल में कार्य करते रहे। कई कर्मचारी 1998 से यहां कार्यरत हैं। इन्होंने अपने बेहतर भविष्य की आस में यहां जिंदगी खपा दी। कई सेवानिवृत्त भी हो गये। जिस समय इसका राजकीयकरण किया गया था, उसके शासनादेश में स्पष्ट उल्लेख है कि ट्रस्ट में कार्यरत समस्त कर्मचारियों को ‘जहां हैं, जैसा हैं’, की स्थिति में लिया जाए। 2016 में मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली समिति ने निर्णय लिया था कि आउटसोर्स से कार्यरत कर्मचारियों को समायोजित किया जाएगा।

निर्णय हो गया। कर्मचारी अच्छे भविष्य के सपने देखने लगे। लेकिन सरकार ने अभी तक समिति के निर्णय को अमल में लाने की दिलचस्पी नहीं दिखाई है। साल 2016 के शासनादेश के मुताबिक आउटसोर्स के वे सभी कर्मचारियों, जिसने 7 वर्ष से अधिक की सेवा दी है, वे संविदा के पात्र हैं। लेकिन अभी तक शासनादेश लागू नहीं किया गया है। जबकि ऐसे कई अन्य उदाहरण हैं, जहां आउटसोर्स कर्मियों को विनियमित किया गया है। समान परिस्थितियां लेकिन व्यवस्थाएं अलग-अलग। शायद ऐसा इसलिए कि सरकार विरोधाभास में उलझी है। लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय हल्दूचौड़ (हल्द्वानी) तथा राठ महाविद्यालय पौड़ी गढ़वाल के राजकीयकरण के समय वहां सभी कर्मचारी को नियमित कर दिया गया। फिर सुशीला तिवारी अस्पताल और राजकीय मेडिकल कॉलेज हल्द्वानी के साथ सौतेला व्यवहार क्यों? इसका जवाब शासन के पास नहीं है। इनकी मांगों के संबंध में सरकार ने कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत की अध्यक्षता में एक उप समिति भी गठित की थी। बताते हैं, ‘इस उप समिति की रिपोर्ट पर वित्त विभाग ने अपनी आपत्ति लगा दी है। जिस कारण इनका मामला कैबिनेट की बैठकों में नहीं रखा जा रहा है।’

यहां के आउटसोर्स कर्मियों को वर्ष 2011 में उपनल के अधीन कर दिया गया। उपनल के अधीन काम करने वाले ये कर्मचारी अपनी अधिकतम सेवा देने के बदले न्यूनतम वेतन पा रहे हैं। लगभग एक माह से आंदोलित इन कर्मचारियों की मांग है, ‘उनकी मानदेय भी ‘समान काम, समान वेतन नीति’ के तहत तय हो। साथ ही उच्च न्यायालय के चरणबद्ध तरीके से नियमितीकरण के आदेश को भी सरकार लागू करे।’ राज्य में कई अन्य विभाग भी हैं, जहां ‘समान काम-समान वेतन नीति’ के तहत वेतन दिया जा रहा है। इसमें उत्तराखण्ड पावर कॉेरपोरेशन मुख्य है।

सुशीला तिवारी अस्पताल और राजकीय मेडिकल कॉलेज में कार्यरत ये उपनल कर्मी कोविड की पहली एवं दूसरी लहर में अपनी जान की परवाह न करते हुए सुशीला तिवारी अस्पताल की सुविधाएं संभाल रहे थे। महामारी के दौरान जब सब लोग संक्रमण के भय से दूरी बनाए हुए थे, तब इन कोरोना योद्धाओं ने अपनी सेवाओं में कोई कमी नहीं की थी। नियमित कर्मचारियों का संस्थान में ओपीडी पर्ची एवं अन्य जांच निःशुल्क किया जाता है। वहीं इन उपनल कर्मियों को अपने ही संस्थान में इन सेवाओं के लिए भुगतान करना पड़ता है। यानी एक संस्थान में समान काम करने वाले कर्मियों के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं। इन सभी अव्यवस्थाओं के लिए ही चुनावों से ऐन पहले ये कर्मचारी सरकार से दो-दो हाथ करने का मन बना चुके हैं।

 

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