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Uttarakhand

समाधान ढूंढने की विफल कवायद

कांग्रेस में चिंतन शिविर पहले भी हुए हैं लेकिन कांग्रेस का उदयपुर चिंतन शिविर उन परिस्थितियों में हुआ है जब उसके सामने अस्तित्व का संकट है और उसे उस नई भाजपा से मुकाबला करना है जिसने साम-दाम-दंड-भेद के माध्यम से हिंदुस्तान के अट्टिकांश राज्यों में अपनी मजबूत राजनीतिक पैठ बना ली है। साथ ही कांग्रेस पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के वैचारिक द्वंद्व से गुजर रही है। शिविर के मात्र पांच दिन बाद युवा नेता हार्दिक पटेल का कांग्रेस से इस्तीफा संकेत देता है कि इस शिविर में हुआ चिंतन युवा कांग्रेसियों की चिंता का ठीक से निवारण कर पाने में असफल रहा है

उदयपुर में संपन्न हुए तीन दिवसीय चिंतन शिविर के माध्यम से कांग्रेस ने क्या वो हासिल किया जिस पर राजनीतिक प्रेक्षकों की नजर थी या फिर उसने एक अवसर को फिर खो दिया? आजादी की लड़ाई में राजनीतिक और सामाजिक आधारों की छतरी के रूप में रही कांग्रेस आज ऐसी कौन सी बीमारी से ग्रस्त हो गई है जिसका इलाज उसे नहीं सूझ रहा है। 2022 की शुरुआत में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की निराशाजनक हार के साए में आयोजित कांग्रेस का चिंतन शिविर क्या एक कदम आगे बढ़कर दो कदम पीछे खींचने की कवायद मात्र रह गया? उदयपुर का चिंतन शिविर इन आशाओं के साथ आयोजित किया गया था कि कांग्रेस के कायाकल्प का नया विचार यहां से निकलेगा। इस चिंतन शिविर में बहुत से नये विचार निकल कर जरूर आए जिन्हें कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा गठित किए गये विभिन्न समूहों ने इस चिंतन शिविर में रखा था। लेकिन ये सब उन परिस्थितियों में हो रहा था जहां एक पूर्णकालिक अध्यक्ष, कमजोर पार्टी संगठन, पार्टी के अंदर बड़े सुधार, सौ वर्ष से पुरानी पार्टी को बदलते वक्त के अनुसार ढालने, भाजपा जैसी सशक्त पार्टी की चुनौती का मुकाबला करने की रणनीति और धर्मनिरपेक्षता, जातिगत संतुलन साधने के लिए उसकी रणनीति में स्पष्टता का अभाव साफ नजर आता है। चिंतन शिविर में विचार विमर्श और निर्णयों को भी आधे-अधूरे तरीके से संबोधित किया गया।

चिंतन शिविर में सबसे महत्वपूर्ण विमर्श जिस बात पर हुआ, जिसकी जरूरत आज कांग्रेस को है भी, वह था पार्टी संगठन में युवाओं को तवज्जो देने की बात। जिसमें 50 फीसदी युवाओं की भागीदारी का वादा कांग्रेस ने किया है। ये कदम कांग्रेस ने देर से जरूर उठाया लेकिन कांग्रेस नेतृत्व इस वादे को गंभीरता से अमल में लाता है तो कांग्रेस में काफी हद तक बदलाव देखने को मिल सकता है। हिंदुस्तान की राजनीति और शायद कांग्रेस के अंदर भी सामाजिक और आर्थिक वर्गों की बात करें तो एक स्पष्ट विभाजन रेखा देखी जा सकती है, अतीतोन्मुखी और भविष्योन्मुखी के बीच जिसमें अतीतोन्मुखी का प्रतिनिधित्व वो प्रौढ़ पीढ़ी करती है जो परंपरागत राजनीति से हटना नहीं चाहती और भविष्योन्मुखी का प्रतिनिधित्व वो युवा वर्ग करता है जो परंपरागत राजनीति के बरक्स पार्टी को समय के अनुसार ढालने के पक्ष में है। मध्य प्रदेश और राजस्थान का उदाहरण लें जहां युवा ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट कांग्रेस को सत्ता की दहलीज पर ले आये लेकिन सरकार का मुखिया चुनने में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने युवाओं के स्थान पर कमलनाथ और अशोक गहलोत को प्राथमिकता दी। युवा पीढ़ी का कांग्रेस छोड़कर जाना यू अकारण नहीं हैं। कांग्रेस की युवा पौध से भाजपा की बगिया का गुलजार होना दिखाता है कि जिन अवसरों को कांग्रेस गंवा रही है उन्हीं अवसरों का लाभ भाजपा लेने से चूक नहीं रही है। शायद कांग्रेस नेतृत्व को समझ आ रहा है कि जमीन पर संघर्ष के लिए युवा पीढ़ी को बढ़ावा वक्त की जरूरत है लेकिन ये समझ सिर्फ कागजों तक सीमित न रह जाए ये चिंता आम कार्यकर्ता की है। ‘एक परिवार, एक टिकट’ का मुद्दा बर्र के छत्ते को छेड़ने जैसा है क्योंकि इसकी जद में कांग्रेस के नेताओं का एक बड़ा तबका आ जाता है जिसने अपनी राजनीतिक विरासत का जिम्मा अपने पारिवारिक सदस्यों को सौंप रखा है। इस पर सतही चर्चा कर चिंतन शिविर में इसे 2024 के लोकसभा चुनावों तक टाल दिया गया। यही हाल नेताओं की उम्र सीमा तय करने के विचार का हुआ जिस पर स्पष्ट दृष्टिकोण रखने का साहस पार्टी नहीं दिखा पाई।

धर्मनिरपेक्षता जो कांग्रेस की विचारधारा का मूलभूत तत्व रहा है उसको लेकर भी कांग्रेस का द्वंद्व इस चिंतन शिविर में देखने को मिला ओर दुविधा साफ नजर आई। नरेंद्र मोदी के हिंदूवादी ब्रांड का मुकाबला कांग्रेस कैसे कर पाएगी उस पर पार्टी की स्पष्ट नीति न होना दिखलाता है कि धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर पार्टी अभी भ्रम में है। भले ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर चोट करने का आरोप नरेंद्र मोदी और भाजपा पर मढ़ा हो लेकिन उसको रोकने के लिए कांग्रेस ने क्या किया और भविष्य में वो क्या करने जा रही है उसका जिक्र उनके भाषणों में कहीं नहीं था। धर्मनिरपेक्षता के मामले में कांग्रेस की वैचारिक दृढ़ता के अभाव ने हिंदुओं को कांग्रेस से तो दूर किया ही उसका आधार माने जाने वाले मुस्लिम भी उससे दूर हो गये। इस वैचारिक आधार का विभाजन कांग्रेस के बड़े नेताओं में भी देखने को मिला जहां कमलनाथ और भूपेश बघेल सरीखे नेता ऐसे कार्यक्रमों की वकालत करते देखे गए जो पार्टी की धार्मिक प्रतिबद्धताओं को दिखाते हों वहीं कुछ नेता राजनीति में धर्म के घालमेल का विरोध करते दिखे। कभी महिला आरक्षण ‘कोटे में कोटा के अंदर कोटा’ का विरोध करने वाली कांग्रेस अब महिला आरक्षण में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यकों के लिए कोटे के पक्ष में नजर आई। अगर यही नजरिया 2010 में अपनाया होता तो आज विधायिका में महिला आरक्षण एक हकीकत होता। अब बदलते समय के साथ कांग्रेस की इस सोच में परिवर्तन प्रगतिशील कदम है या प्रतिभागी ये विचारणीय प्रश्न जरूर है।

कांग्रेस चिंतन शिविर में जनता से जुड़े मुद्दे बेरोजगारी, महंगाई सिर्फ सतही रूप से चर्चा में आए और इनसे परहेज किया गया। सवाल है कि क्या कांग्रेस ने भी इन मुद्दों को नियति मान लिया है? लंबे समय तक सत्ता में रही कांग्रेस अभी भी उस सत्ता के आभामंडल से बाहर निकल नहीं पाई हैं और जिस विपक्ष की उम्मीद जनता उससे करती हैं उस भूमिका को वो तलाश नहीं पाई है वरना भाजपा ने इन्हीं मुद्दों को भुना कर 2014 में कांग्रेस से सत्ता छीनी थी। अगर कांग्रेस अपने साठ सालों के कार्यों का मूल्यांकन करती है तो उसे भाजपा के विपक्ष के कार्यकाल का भी अध्ययन करना चाहिए क्योंकि भाजपा जैसा सशक्त विपक्ष भारत की आजादी के बाद शायद ही रहा हो। सत्ता में होने के बाद भी हमेशा आक्रामक मुद्दा में रहने वाली भाजपा का मुकाबला जनता के सवालों को आक्रामकता के साथ उठाकर ही किया जा सकता है महज रस्म अदायगी से नहीं।

कांग्रेस चिंतन शिविर में जिस बात पर सबकी निगाहें थी कि शीर्ष नेतृत्व खासकर अध्यक्ष पद के लिए पड़ी धुंध कुछ छटेगी लेकिन शीर्ष नेतृत्व का मुद्दा उत्तर तलाश नहीं पाया। शिविर में राहुल गांधी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की मांग उठी वहीं कुछ एक नेता प्रियंका गांधी को पार्टी की कमान सौंपने की मांग करते देखे गये। 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफे के बाद स्थाई अध्यक्ष के इंतजार में कांग्रेस के सामने नेतृत्व का अनसुलझा मामला किसी चुनौती से कम नहीं है। शायद ये असल चुनौती है जिससे कांग्रेस को पार पाना है। संगठन में निचले स्तर तक बदलाव व पुनर्गठन की कवायद का दावा करने वाली कांग्रेस अपने शीर्ष स्तर के नेतृत्व पर कोई स्पष्ट रूख नहीं दिखाई पाई। चिंतन शिविर में राहुल गांधी के नेतृत्व में 2 अक्टूबर से गांधी जयंती के अवसर पर ‘कश्मीर से कन्याकुमारी’ तक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ शुरू करने की घोषणा की गई। अगर इसे गंभीरता से पार्टी आगे बढ़ाकर जनता तक अपना वैचारिक संदेश पहुंचाने का मंच बनाती है तो इसके राजनीतिक लाभ पार्टी को मिल सकता है।

लंबे समय बाद चिंतन शिविर के माध्यम से कांग्रेस ने वैचारिक मंथन की कवायद शुरू की है। इस चिंतन शिविर के माध्यम से कांग्रेस ने कितना वैचारिक और राजनीतिक लाभ प्राप्त किया ये कदम उम्मीद तो जगाते हैं लेकिन जमीन पर उतारने के लिए ईमानदारी से की गई कवायद ही इनकी सफलता तय करेगी। लोकतंत्र में कोई अपराजेय नहीं है इस देश की जनता ने इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे नेताओं को चुनावी मैदान में हरा कर अपनी ताकत को दिखाया है। जनता माफ नहीं करती बल्कि कठोर इम्तहान ले आपसे जवाबदेही की अपेक्षा करती है। अगर विपक्ष सड़कों पर गंभीरता से संघर्ष करते दिखे तो जनता आपके पीछे खड़ी हो जाती है। गुजरात चुनाव, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के चुनाव इसके उदाहरण हैं। भारत का मतदाता सत्ता को उसकी सीमाएं और विपक्ष को उसकी संभावनाएं साथ-साथ दिखाता है बशर्ते राजनीतिक दल अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं के साथ ईमानदार हों। कुल मिलाकर कांग्रेस का यह चिंतन शिविर किसी खास नतीजे पर पहुंचे बगैर ही समाप्त हो गया। शिविर के मात्र पांच दिन बाद गुजरात कांग्रेस के नेता हार्दिक पटेल का पार्टी छोड़ना संकेत देता है कि युवा नेताओं की आस्था कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व से पूरी तरह टूट चुकी है।

चिंतन शिविर ने पूरी पार्टी में सकारात्मक ऊर्जा का संचार किया है। सामाजिक न्याय, सांप्रदायिक सद्भाव, समाज के हर वर्ग की चिंता कांग्रेस की नीतियों एवं मूल्यों में शामिल रहे हैं। चिंतन शिविर में इन्हीं सब मुद्दों पर विचार किया गया। समाज के हर वर्ग को किस प्रकार देश की मुख्यधारा में शामिल करने के प्रयास पर चर्चा हुई क्योंकि भाजपा की नीतियों ने देश के सामाजिक एवं धार्मिक ताने-बाने को जिस प्रकार छिन्न-भिन्न करने और देश के अंदर विभाजन का जो काम किया है उसके चलते कांग्रेस का उत्तरदायित्व और भी बढ़ जाता है। इन्हीं चुनौतियों का सामना करने के लिए कांग्रेस के चिंतन शिविर में मंथन हुआ।
यशपाल आर्य, नेता प्रतिपक्ष, उत्तराखण्ड

वर्तमान में कांग्रेस जिन चुनौतियों से गुजर रही है उनसे कैसे निपटा जाए उस पर विमर्श के लिए मंथन शिविर आयोजित किया गया था। राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा विभिन्न विषयों पर समूह बनाए थे जिनकी रिपोर्ट पर दो दिन चिंतन शिविर में मंथन हुआ उसमें लोगों के विचारों को समाहित कर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी को भेजा गया। चुनौतियों से निपटने के लिए युवाओं को आगे बढ़ाना और पार्टी को कैडर आधारित पार्टी बनाने की दिशा में सकारात्मक विमर्श हुआ। पार्टी संग इन में पचास प्रतिशत पद पचास वर्ष से कम आयु के व्यक्तियों को देने पर सहमति बनी। विश्वास कीजिए जल्द ही पार्टी नए स्वरूप में दिखाई देगी।
करन माहरा, प्रदेश अध्यक्ष उत्तराखण्ड कांग्रेस

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