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Uttarakhand

त्रिवेंद्र राज में असुरक्षित पत्रकार

त्रिवेंद्र सरकार के राज में पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं। ताजा मामला ‘दि संडे पोस्ट’ के पत्रकार मनोज बोरा पर बदमाशों द्वारा गोली मारे जाने का है। बदमाशों की इस करतूत ने आम जनता को भी भयभीत कर दिया है

उत्तराखण्ड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार चौथे स्तंभ को सुरक्षा देने में नाकाम साबित हो रही है। इस सरकार ने पूर्व में जहां एक इलेक्ट्रॉनिक चैनल के संपादक पर मुकदमे दर्ज कराकर अपनी तानाशाही का प्रदर्शन किया, वहीं इसके शासन में माफियाओं के भी हौसले बुलंद हो गए। माफियाओं के निशाने पर पत्रकार रहे। अभी कुछ दिन पूर्व जब पूरे देश में रंगों के पर्व होली पर दुश्मन भी गले मिल रहे थे तो हल्द्वानी में एक हिस्ट्रीशीटर ने एक पत्रकार को निशाना बना डाला। मोहन भट्ट नामक पत्रकार पर जानलेवा हमला किया गया। इससे पूर्व सितारगंज में स्वत्रंत हलचल के संपादक और पूर्व में ‘दि संडे पोस्ट’ के स्थानीय ब्यूरो चीफ रहे रवि रस्तोगी पर भाजपा के ही एक नेता ने हल्लाबोल दिया था। त्रिवेंद्र रावत सरकार का पत्रकारों के प्रति असहिष्णुता का रवैया उस समय सामने आया जब देहरादून स्थित सचिवालय में संवाददाताओं को अधिकारियों के कार्यालय में घुसने पर बैन लगा दिया गया था।

पत्रकारों पर हो रहे हमलों से न सिर्फ पत्रकार, बल्कि पूरा समाज चिंतित है। इस बीच पत्रकारों ने देहरादून में प्रदेश के पुलिस महानिदेशक अनिल रतूड़ी से मिलकर पुलिस और प्रशासन के रवैये पर रोष प्रकट किया। 26 मार्च 2019 को वरिष्ठ पत्रकार बीएस नेगी के नेतृत्व में श्रमजीवी पत्रकार संगठन के पत्रकारों का एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मिला और कहा कि प्रदेश में पत्रकार असुरक्षित हैं। आए दिन उनके साथ आपराधिक घटनाएं घटती रहती हैं। सभी पत्रकारों ने ‘दि संडे पोस्ट’ के पत्रकार मनोज बोरा पर हुए हमले का जिक्र करते हुए कहा कि आचार संहिता लागू हो जाने के बाद भी बदमाशों का खुलेआम पत्रकारों पर हमला करना पुलिस की नाकामी को प्रकट करता है। पत्रकारों ने प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को एक ज्ञापन भी सौंपा। जिसमें दोषियों की जल्द गिरफ्तारी की मांग की गई।

पत्रकारों पर हो रहे हमलों ने सोचने-समझने वाले राजनेताओं को भी चिंतत किया है। इस बीच प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 26 मार्च को हल्द्वानी स्थित कृष्णा अस्पताल पहुंचकर पत्रकार मनोज बोरा का हाल चाल जाना। रावत ने मनोज बोरा से कुशल क्षेम पूछने के बाद प्रदेश सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि जब प्रदेश में पत्रकार ही सुरक्ष्ति नहीं हैं, तो आम आदमी का क्या होगा। हल्द्वानी में ‘दि संडे पोस्ट’ के पत्रकार मनोज बोरा पर हुए हमले के बाद पत्रकारों में आक्रोश पैदा हो गया है। जिसके फलस्वरूप 26 मार्च को सभी पत्रकारों ने एकजुटता का प्रदर्शन किया। इसी के साथ उन्होंने प्रशासन की प्रेस का बहिष्कार कर दिया।

 

बदला लेने के लिए किया हमला

पत्रकार मनोज बोरा पर हुए हमले की ठोस पृष्ठभूमि है। इसे थोड़ा पीछे जाकर समझा जा सकता है। 31 जनवरी 2019 का दिन था जब हल्द्वानी निवासी दिव्य रावत के साथी राजेश मठपाल के फोन पर अलग-अलग मोबाइल नंबरों से धमकी भरे फोन आते हैं। जिसमें जलाल सहित उनके साथियों को जान से मानने की धमकी दी जाती है। यही नहीं, बल्कि फोन पर धमकी देने वाले शख्स ने यह कहकर सनसनी मचा दी कि उसने उन लोगों को मारने की सुपारी ले रखी है। जिन मोबाइल फोन से धमकियां दी गई उनका न केवल ट्रू कॉलर से पता लगाया गया, बल्कि सभी बातों की रिकॉर्डिंग भी की गई। सबूत के साथ पुलिस के समक्ष रिपोर्ट दर्ज करने की गुहार लगाई गई। लेकिन लगातार रिपोर्ट दर्ज करने में आनाकानी की जाती रही। यहां तक कि उत्तराखण्ड पुलिस के पुलिस महानिदेशक (क्राइम) अशोक कुमार से इस मामले की शिकायत करनी पड़ी। तब जाकर हल्द्वानी पुलिस ने मामला दर्ज किया। हद तो तब हो गई जब धमकी देने वाला गैंग सितारगंज से हल्द्वानी हमला करने के उद्देश्य से चल दिया। वह गैंग चोरगलिया तक पहुंच चुका था। पुलिस की हीलाहवाली का यह एक उदाहरण मात्र है।

पुलिस की लापरवाहियां यहीं तक नहीं सिमटती हैं, बल्कि वह इस मामले को गंभीरता से लेने के बजाए हल्के में लेती रही। मोबाइल पर धमकी देने वाले सितारगंज के आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का पुलिस बाल बांका तक नहीं कर सकी। न तो उनकी गिरफ्तारी हुई और न ही उन पर कोई सख्त कार्यवाही, जबकि दूसरी तरफ कारोबारी दिव्य रावत और उसके साथी सचिन जलाल, राजेश मठपाल और मनोज बोहरा लगातार अपनी जान बचाए जाने की गुहार लगाते रहे। पुलिस चौकी से लेकर पुलिस मुख्यालय तक कोतवाल, एसपी, एसएसपी और डीजीपी सभी के दर पर वह अपनी जान की सुरक्षा मांग करते की रहे, लेकिन मात्र रिपोर्ट दर्ज करने की औपचारिकता के सिवाय कुछ नहीं हुआ। पुलिस के इस उदासीनतापूर्ण रवैये के चलते ही बदमाशों के हौसले बुलंद होते हैं। आलम यह है कि 25 मार्च को बदमाशों ने दिनदहाड़े हल्द्वानी जैसे व्यस्त शहर में पत्रकार मनोज बोरा पर जानलेवा हमला कर दिया। हमलावरों ने पूर्व नियोजित षड्यंत्र की तरह घटना को अंजाम दिया।

दोनों हमलावर दिव्य रावत की स्कॉरपियो गाड़ी नंबर यूए04एए2002 का पीछा करते-करते मनोज बोरा के घर शिव शक्ति विहार बिठौरिया नंबर एक तक जा पहुंचे। जब वह गाड़ी से उतरे तो मामले को उलझाने के लिए उन्होंने पहले मनोज से किराए के मकान की बाबत बात की। जब मनोज ने किराए के लिए कमरा खाली न होने की बात कही तो उसके पैर में गोली मार दी। मनोज की किस्मत अच्छी थी कि हमलावरों का निशाना चूक गया और गोली उसके पैर पर ही लगी। गोली की आवाज सुनकर जैसे ही लोग इकट्ठा हुए तो हमलावार भाग खड़े हुए। लेकिन इस दौरान उनका वह कारतूस वहीं रह गया। घटना स्थल पर मिला 9 एमएम का वह कारतूस इस हादसे का एक छोटा सा नमूना है। असली अपराधी अभी सामने आने बाकी हैं। क्या पूर्व की भांति पुलिस इस मामले की निष्पक्ष जांच कर पाएगी, यह सवालों और संदेहों के घेरे में है।

सूत्रों की मानें तो यह हमला मनोज बोरा पर नहीं, बल्कि कारोबारी दिव्य रावत पर किया जाना था। हमलावरों का टारगेट दिव्य रावत था, क्योंकि जिस स्कॉरपियो गाड़ी में मनोज बोरा था वह दिव्य रावत की थी। हमलावरों ने दिव्य रावत की गाड़ी समझकर उसका पीछा किया जब मनोज बोरा गाड़ी से नीचे उतरा तो हमलवारों ने शायद उसको दिव्य रावत समझकर ही उसको पहले बातों में उलझाया और उसके बाद उस पर गोलियां दाग दी। जाहिर है कि हमलावर दिव्य रावत को निशाना बनाना चाहते थे। हालांकि यह भी हो सकता है कि बदमाशों का लक्ष्य मनोज बोरा ही हो, क्योंकि वह दिव्य रावत के साथ ही रहता है। पूर्व में सचिन जलाल के मोबाइल पर जान से मारने की धमकी देने वाले आरोपियों का यह कहना कि उन्होंने उनको मारने की सुपारी ले ली है, वह इस ओर इशारा करता है।

मनोज बोरा पर हुए हमले को पुलिस-प्रशासन हल्के में लेकर अपराधियों को बढ़ावा दे रहा है। हो सकता है कि अपराध से जुड़े लोगों की यह शुरुआत हो। आगे किसी बड़ी घटना को अंजाम दिया जा सकता है। इससे पहले भी एक मामले का यहां उल्लेख जरूरी है। यह मामला कारोबारी दिव्य रावत और सचिन जलाल से जुड़ा हुआ है। गत् 15 जनवरी 2019 को नैनीताल जनपद की कोतवाली हल्द्वानी में एक रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। रिपोर्ट हल्द्वानी के रौतेला कॉलोनी निवासी सतीश नैनवाल ने कराई थी। जिसमें कहा गया कि वह अपनी बीमार पत्नी को कृष्णा अस्पताल में डॉक्टरों को दिखाने गया था। जहां दिव्य रावत और सचिन जलाल नामक व्यक्ति ने उससे गाली गलौच की और जान से मारने की धमकी दी। रिपोर्ट में यह भी लिखा गया कि दोनों ने मारपीट करते हुए उसकी पत्नी को भी गिरा दिया। सतीश नैनवाल ने इस रिपोर्ट में घटना का दिन 15 जनवरी 2019 तथा समय तीन बजे दर्शाया था। लेकिन सतीश नैनवाल द्वारा दर्ज रिपोर्ट का झूठ उस समय सामने आ गया जब कृष्णा अस्पताल के मैनेजमेंट ने अपने लेटर पैड पर लिखकर दिया कि इस दिन दिव्य रावत अस्पताल में भर्ती थे। कृष्णा अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉक्टर दिनेश चंद्र पंत की रिपोर्ट के अनुसार दिव्य रावत कृष्णा अस्पताल में 15 जनवरी 2019 के दोपहर 12 बजकर 33 मिनट पर एडमिट हुए थे। दिव्य को अस्पताल की एमरजेंसी में एडमिट किया गया। जिनको अगले दिन यानी 16 जनवरी 2019 को 11 बजकर 48 मिनट पर डिस्चार्ज किया गया। अस्पताल के पास बकाया इसके सीसीटीवी फुटेज भी मौजूद हैं। पुलिस की इस मामले में जांच पड़ताल भी हुई। कृष्णा अस्पताल के सिक्योरिटी इंचार्ज डीएम धपोला की मानें तो अस्पताल में उत्तराखण्ड पुलिस की वर्दी में एक महिला पुलिसकर्मी आई थी, वह सीसीटीवी रिकॉर्ड रूम से 18 जनवरी 2019 को फुटेज लेकर गई थी। पुलिस की लापरवाही का आलम यह है कि दो माह बाद भी इस मामले की जांच स्पष्ट नहीं हो सकी है।

बात अपनी-अपनी

हमने दो हमलवारों को गिरफ्तार कर लिया है। दोनों ही सितारगंज निवासी हैं। जिनमें से एक का नाम राहुल श्रीवास्तव और दूसरे का नीरज है। राहुल पर दिल्ली में दो मामले दर्ज हैं। मनोज बोरा पर यह हमला सतीश नैनवाल ने कराया है। सतीश नैनवाल का पूर्व में खनन कारोबारी दिव्य रावत के साथ झगड़ा हो गया था। उसका बदला लेने के लिए हमला किया गया। हमलावारों ने मनोज को ही दिव्य रावत समझकर गोली चला दी।
सुनील कुमार मीणा, एसएसपी नैनीताल

 

मैंने पुलिस के समक्ष जो अपने बयान दिए थे उनमें बता दिया था कि हमलावार सितारगंज के हैं जिन्होंने सतीश नैनवाल के इशारे पर मुझे गोली मारी। मैं दिव्य रावत के साथ र हता हूं। इसलिए मुझ पर हमला किया गया।
मनोज बोरा, पीड़ित पत्रकार

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