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मनी लॉन्ड्रिंग का अद्भुत खेला

      

घोटालों और भ्रष्टाचार का गढ़ बने उत्तराखण्ड में सरकारी जमीन की लूट का एक अनोखा और हैरतनाक मामला ‘दि संडे पोस्ट’ इस खबर के जरिए उजागर कर रहा है। यह लूट हैरतनाक और अनोखी इसलिए है क्योंकि जिस 50 बीघा सरकारी जमीन का पट्टा पाने के लिए इस जमीन पर कई दशकों से काबिज व्यक्ति लगातार प्रयास करता रहा हो, 2016 में जब उसे सफलता मिली तो उसके भीतर यकायक ही ‘वैराग्य’ पैदा हो गया। उसने लगभग 100 करोड़ बाजारी मूल्य वाली जमीन एक गरीब व्यक्ति को दान कर दी। इस गरीब ने तत्काल ही सात रसूखदार लोगों को एक ही दिन में यह जमीन बेच डाली। इन सात लोगों में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के पुत्र हरेंद्र कुंजवाल शामिल हैं। सबसे हैरतनाक दान दी गई जमीन के एक हिस्से को भारी रकम चुका दानकर्ता बलवंत सिंह के पुत्र द्वारा खरीदा जाना है। हैरतनाक इसलिए भी कि इस जमीन का पट्टा तत्कालीन डीएम नैनीताल दीपक रावत ने कई नियमों को ताक में रखते हुए किया जिससे सरकार को राजस्व की भारी हानि हुई। हैरतनाक इसलिए भी क्योंकि जिस व्यक्ति ने दान में मिली जमीन को करोड़ों में बेचा वह मात्र एक लाख रुपया मिलने की बात कह रहा है। बाकी रकम कहां गई यह बताने में वह खुद को असमर्थ बता खामोश हो जाता है। अब सच का पर्दाफाश होने के बाद यह देखा जाना दिलचस्प होगा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दावा करने वाले राज्य के ‘धाकड़’ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस प्रकरण की तह में जाते हैं या फिर रसूखदारों के दबाव में आ खामोश रहते हैं

 

  •  सुनील भारद्वाज की रिपोर्ट

 

पटकथा

अंग्रेज हुकूमत से आजादी मिलने पश्चात् भूमिहीनों को जमीन उपलब्ध कराने और जमींदारों के शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए जमीन संबंधी व्यवस्था में बड़े स्तर पर सुधार किए गए। इन सुधारों में एक महत्वपूर्ण सुधार जमींदारी उन्मूलन अधिनियमों के रूप में सामने आया जिसके अंतर्गत किसी एक व्यक्ति अथवा एक परिवार के पास अधिकतम कृषि भूमि की मालिकाना सीमा तय की गई। साथ ही समस्त भूमि का वर्गीकरण भी किया गया। इन कानूनों के लागू होने के बाद निश्चित ही बड़े स्तर पर भू-सुधार देश भर में हुए लेकिन इसी के साथ इन कानूनों को दरकिनार कर जमीनों की लूट का ‘खेला’ भी बड़े पैमाने पर शुरू हो गया। हमारी इस खबर के केंद्र में ऐसी ही एक जमीन है जिसे बेहद शातिराना तरीके से खुर्द-बुर्द किया गया। राज्य सरकार के स्वामित्व वाली इस जमीन का वर्तमान में बाजारी मूल्य लगभग सौ करोड़ के आस-पास है। इस ‘महाघोटाले’ को अंजाम तक पहुंचाने में सरकारी तंत्र की सक्रिय भागेदारी स्पष्ट रूप से सामने आती है और देवभूमि से ‘देवताओं’ के पलायन और ‘दुष्टों’ के प्रभाव का पर्दाफाश कर देती है। इस घोटाले को सामने लाने का श्रेय हल्द्वानी निवासी एक आरटीआई एक्टिविस्ट रवि शंकर जोशी को जाता है जिन्होंने सूचना के अधिकार को हथियार बना सारे प्रमाण जुटाने और उन्हें सार्वजनिक करने की सराहनीय और जोखिम भरी पहल की है। तो चलिए समझते हैं कैसे एक बेशकीमती 50 बीघा जमीन का लूट का ‘खेला’ उत्तराखण्ड में रचा गया और सरकारी जमीन को निजी हाथों में सौंपने के इस ‘खेला’ में किस प्रकार जिला नैनीताल का सरकारी अमला लुटेरों का हमराहगीर बना।

‘खेला’ वर्ग-चार की जमीन को वर्ग-एक में बदलने का

इस लूट को समझने के लिए पहले यह समझा जाना जरूरी है कि जमीनों का वर्गीकरण क्या होता है। भू-सुधार कानूनों के अंतर्गत सरकारी जमीन को 6 श्रेणियों (वर्गों) में बांटा गया है। वर्ग-1 में वह जमीन आती है जिसका मालिकाना हक राज्य सरकार अथवा ग्रामसभा के पास होता है। इस श्रेणी में ही वर्ग-1 (क) की भूमि शामिल है। वर्ग-1(क) उस भूमि को कहा जाता है जो राज्य सरकार किसी भूमिहीन व्यक्ति को कुछ समय के लिए कृषि कार्यों हेतु पट्टे पर आवंटित करती है। इस प्रकार की जमीन को समय-समय पर पट्टाधारक के नाम भी कर दिया जाता है जिसे वह बेच भी सकता है। इसी प्रकार वर्ग-1(ख) उस भूमि को कहा जाता है जो सरकार द्वारा पट्टाधारक के नाम सरकारी ग्रांट के द्वारा कर दी जाती है। इस ग्रांट की जमीन को बेचने का अधिकार पट्टाधारक के पास नहीं होता है। जमीनों के वर्गीकरण में एक जमीन वर्ग-4 की कहलाई जाती है। उस
सरकारी जमीन को वर्ग-4 की जमीन कहा जाता है जिस पर बगैर सरकारी पट्टे अथवा ग्रांट के किसी व्यक्ति द्वारा लंबे समय से अवैध कब्जा कर उसमें खेती की जा रही हो। इस प्रकार की जमीन पर काबिज व्यक्ति के पास यदि स्वयं की जमीन न हो तो उसे भूमिहीन मानते हुए सरकार द्वारा उसे कानूनी तौर पर पट्टा दे दिया जाता है। यहां यह समझा जाना जरूरी है कि वर्ग-4 की जमीन को पट्टे की जमीन में तभी बदला जा सकता है जबकि ऐसी जमीन पर काबिज व्यक्ति जमींदार न हो और भूमिहीन होने के चलते अपने और अपने परिवार के लिए उसे जमीन की जरूरत हो। यह भी गौरतलब है कि राज्य सरकारें समय-समय पर पट्टे पर दी गई जमीनों का मालिकाना हक भूमिहीन पट्टेदारों को देती आई हैं। मालिकाना हक मिलने के बाद ऐसी जमीनों को पट्टेदार बेचने का अधिकार पा जाता है। सरल शब्दों में वह जमीन का मालिक बन जाता है। सरकारी जमीनों को खुर्द-बुर्द करने का सारा खेला भी यहीं से शुरू होता है। रसूखदार लोग भूमिहीन न होते हुए भी सरकारी जमीन का पट्टा हासिल कर लेते हैं और फिर उसे ऊंचे दामों में बेच डालते है। इस महाघोटाले में भी ठीक ऐसा ही हुआ है।

बेशकीमती जमीन का दाननामा

किस्सा ग्राम देवला तल्ला, हल्द्वानी में 50 बीघा जमीन की लूट का

इस महाघोटाले के केंद्र में है हल्द्वानी के गौलापार इलाके की एक 3.107 हेक्टेयर (लगभग 50 बीघा जमीन) जो ग्राम देवला तल्ला में स्थित है। वर्तमान में यह इलाका तेजी से विकसित हो रहा है। यहां जमीनों का मूल्य तभी से आसमान छूने लगा था जब इस इलाके में एनडी तिवारी सरकार के समय कैबिनेट मंत्री और क्षेत्र की विधायक डॉ इंदिरा हृदयेश ने एक विशाल चिड़ियाघर बनाने का प्रस्ताव सरकार को भेजा था। राज्य की नैनीताल स्थित हाईकोर्ट को गौलापार में बनाए जाने के निर्णय बाद यहां जमीनों के दामों में भारी उछाल इन दिनों देखने को मिल रहा है। इस 3 ़107 हेक्टेयर जमीन का बाजारी भाव लगभग सौ करोड़ के करीब बताया जा रहा है। इस जमीन पर बीते कई दशकों से बलवंत सिंह पुत्र मोहन सिंह निवासी ग्राम देवला तल्ला का परिवार काबिज रहते आया है। सूचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त जानकारी के अनुसार बलवंत सिंह लंबे समय से अपने अवैध कब्जे को वैध कराने के लिए उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहते हुए जिला नैनीताल अधिकारी के समक्ष प्रयास करते रहे लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। सरकारी दस्तावेजों से स्पष्ट होता है कि उनके द्वारा समय-समय पर इस अवैध कब्जे की सरकारी वर्ग-4 की जमीन को वर्ग-1(ख) में बदलने संबंधी प्रार्थना पत्रों को स्वीकार नहीं किए जाने के पीछे सबसे बड़ा कारण बलवंत सिंह के पास जीवन-यापन के लिए खुद की पर्याप्त भूमि का होना रहा। नैनीताल जिले के पुराने बाशिंदों को नब्बे के दशक में बतौर डीएम नैनीताल तैनात रहे एक कर्मठ और दबंग छवि के अफसर एस ़पी ़ उर्फ सूर्य प्रताप सिंह अवश्य याद होंगे। एस ़पी ़ सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान नैनीताल और हल्द्वानी शहर को अतिक्रमण मुक्त करने का एक अभियान छेड़ा था जिसकी जद में जिले के कई राजनेता और रसूखदार लोग आ गए थे। बलवंत सिंह द्वारा उपरोक्त वर्णित 3 ़107 हेक्टेयर जमीन पर अपने अवैध कब्जे को पट्टे में बदलने की गुहार 1991 में तत्कालीन डीएम, नैनीताल सूर्य प्रताप सिंह की दिवानी अदालत में लगाई थी। एस ़पी ़ सिंह ने इस मुकदमें का निस्तारण करते हुए 22 अप्रैल, 1991 को जारी करने आदेश में बलवंत सिंह की याचिका को खारिज करते हुए आदेश दिया था कि ‘उपरोक्त मामले में वर्ग-4 की भूमि का नियमतिकरण दिनांक 20/04/1991 को निरस्त किया जा चुका है। कृपया संबंधित अवैध कब्जादार को सूचित करें और कब्जेदार के विरुद्ध बेदखली की कार्यवाही सुनिश्चित करें।’ डीएम के स्पष्ट आदेश बाद भी बलवंत सिंह का कब्जा इस जमीन पर बना रहा। एस ़पी ़ सिंह को राजनीतिक दबाव चलते कुछ अर्सा बाद ही नैनीताल से अन्यंत्र स्थानांतरित कर दिया गया और इस तरह से उनका उपरोक्त आदेश सरकारी फाइलों में कहीं गहरे दफन हो गया।

1991 में तत्कालीन डीएम एसपी सिंह का आदेश जिसमें नियमितीकरण को निरस्त करते हुए कब्जेदार से कब्जा वापस लिए जाने का निर्णय दिया गया

राज्य गठन के बाद जमीन का खुर्द-बुर्द होना

तत्कालीन जिलाधिकारी सूर्य प्रताप सिंह द्वारा बलवंत सिंह की याचिका को निरस्त करने और उसे जमीन से बेदखल करने के स्पष्ट आदेशों के बावजूद बलवंत सिंह का न केवल अवैध कब्जा उक्त भूमि पर बना रहा बल्कि उसके द्वारा दोबारा इस जमीन को पट्टे पर लेने का प्रयास भी किया गया। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों अनुसार वर्ष 1998 में एक बार फिर से बलवंत सिंह ने ऐसा ही प्रयास किया जिस पर तत्कालीन जिला अधिकारी को भेजी गई अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन नायब तहसीलदार हल्द्वानी ने स्पष्ट रूप से लिखा ‘ग्राम देवला तल्ला की उक्त भूमि पर काबिज व्यक्तियों, श्री बलवंत सिंह पुत्र मोहन सिंह, हरगोविद सिंह, कृष्णपाल सिंह पुत्रगण प्रीतम सिंह के विरुद्ध बेदखली का वादा परगना मजिस्ट्रेट महोदय के न्यायालय में चल रहा है जैसा की पत्रावली के अवलोकन करने से विदित होता है। अतः ऐसी स्थिति में काबिज व्यक्तियों के पक्ष में खाता संख्या 43 में दर्ज वर्ग-4 की भूमि का नियमितीकरण की कार्यवाही किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है।’ हल्द्वानी के तत्कालीन तहसीलदार ने अपने नायब तहसीलदार की रिपोर्ट को सही मानते हुए डीएम नैनीताल को लिखा ‘जिलाधिकारी महोदय, आख्या के पेरा ‘A’ के अनुसार प्रश्नगत् भूमि के संबंध में बेदखली वाद विचाराधीन है अतः विनियमितीकरण की कार्यवाही स्थगित रखना उचित होगा।’ इस तरह से उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहते इस जमीन का पट्टा बलवंत सिंह के नाम नहीं किया गया और वह अवैधकब्जेदार बना रहा। राज्य गठन के कुछ बरस बाद लेकिन ‘चमत्कार’ हो गया। यह ‘चमत्कार’ संभवतः इस जमीन का
बाजारी भाव कई गुना बढ़ने और इस जमीन का राज्य के रसूखदार लोगों की नजरों में आना रहा। बलवंत सिंह ने उत्तराखण्ड गठन के बाद एक बार फिर से जमीन का पट्टा अपने नाम कराने का प्रयास किया।

1998 में तत्कालीन नायब तहसीलदार और तहसीलदार की रिपोर्ट जिसमें नियमितीकरण की कार्यवाही रोकने की बात कही गई थी

इस बार उसकी ‘मेहनत’ रंग लाई और उसके अवैध कब्जे की वर्ग-4 की भूमि का नियमितीकरण कर वर्ष 2011 में वर्ग-4 से वर्ग 1(ख) में बदल दी गई। वर्ग 1(ख) की भूमि गवर्नमेंट ग्रांट के बतौर भूमिहीनों को दी जाती है जिसको बेचने का अधिकार पट्टेदार के पास नहीं होता। यहां प्रश्न उठता है कि जिस जमीन को अवैध कब्जे से मुक्त कराने का मुकदमा चल रहा था उसे वर्ग-4 से वर्ग 1(ख) में कैसे बदला गया? बहरहाल इस ‘जीत’ के बाद अब शुरू हुआ असल ‘खेला’ इस वर्ग-1(ख) की सरकारी ग्रांट की जमीन को वर्ग 1(क) में बदले जाने का। वर्ग-1(क) की भूमि को सक्रमणीय भूमि कहा जाता है जिसके मालिक को यह अधिकार होता है कि वह अपनी भूमि का उपयोग कृषि के अतिरिक्त भी किसी कार्य के लिए कर सकता है। ऐसी जमीनों का सरकार समय-समय पर पूरा मालिकाना हक पट्टेधारकों को दे देती है जिसके बाद वह इस भूमि को बेचने अथवा इसका व्यावसायिक उपयोग करने का अधिकार पा जाते हैं।

वर्ग-1(ख) की जमीन का वर्ग-1(क) में बदलना

वर्ष 2016 में जब राज्य में हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार सत्तारूढ़ थी तब तत्कालीन जिलाधिकारी, नैनीताल ने बलवंत सिंह की बरसों की इच्छा पूरी करते हुए इस जमीन को वर्ग-1(ख) से बदल कर वर्ग-1(क) में तब्दील कर डाला। 2016 में नैनीताल जनपद के डीएम दीपक रावत थे जो वर्तमान में कुमाऊं मंडल के आयुक्त हैं। डीएम ने इस आदेश को जारी करते समय कई तथ्यों को पूरी तरह नजरअंदाज करने का काम किया जिससे इस आशंका को बल मिलता है कि पूरे ‘खेला’ में राज्य के प्रभावशाली लोगों का दबाव जमीन के वर्तमान मालिकों के नाम इस आशंका की पुष्टि भी करते हैं लेकिन उनकी बात बाद में। पहले नैनीताल जनपद के तत्कालीन डीएम दीपक रावत के आदेश को समझा जाना जरूरी है ताकि इस ‘महाघोटाले’ की तह तक पहुंचा जा सके।

2016 में प्रभारी अधिकारी परितोष वर्मा का पत्र जिसमें बलवंत सिंह के दावे की बाबत महत्वपूर्ण बिंदु उठाए गए

 

बलंवत सिंह द्वारा पेश याचिका में उक्त जमीन को वर्ग-1(ख) से बदल कर वर्ग-1(क) में किए जाने की बात कही गई थी। 25 जून, 2016 को इस याचिका की बाबत तत्कालीन अपर जिलाधिकारी ने टिप्पणी की कि ‘पत्रावली के अवलोकन करने पर पाया गया कि पूर्व परगनाधिकारी द्वारा दी गई आख्या दि. 03/04/1998 में कहा गया है कि प्रश्नगत् भूमि के संबंध में बेदखली का वाद विचाराधीन है।’ ए.डी.एम. की इस टिप्पणी का कोई भी संतोषजनक उत्तर नहीं दिया गया। इतना ही नहीं जिला प्रशासन के राजस्व विभाग ने यह भी सुनिश्चित करने का कोई प्रयास नहीं किया कि बलवंत सिंह और उसके परिवार के पास खुद की कितनी भूमि पहले से है। ऐसा किया जाना इसलिए जरूरी है क्योंकि सरकारी जमीन को पट्टा किसी भी सूरत में ऐसों को आवंटित नहीं किया जा सकता है जिनके पास 12.5 एकड़ से अधिक जमीन हो। तत्कालीन जिलाधिकारी एवं उनके अधीनस्थ जिला प्रशासन के अधिकारियों की बलवंत सिंह पर ‘कृपा’ यहीं पर नहीं रूकी। उत्तराखण्ड सरकार के जिस शासनादेश सं .453/XVIII(II)/2014-7 (46/2008) दिनांक 11 मार्च, 2015 तथा शासनादेश सं 1846/XVIII(II)2015-17(46)/2008 दिनांक 26 नवंबर, 2015 के अंतर्गत इस जमीन को भूमि वर्ग-1(ख) से भूमि वर्ग-1 (क) में बदला गया उस आदेश में स्पष्ट तौर पर उल्लेख है कि भूमि के श्रेणी बदलने हेतु ‘उक्त भूमि के कब्जे की अवधि के भू-राजस्व का बीस गुना तथा जिलाधिकारी द्वारा निर्धारित सर्किल रेट की 40 प्रतिशत धनराशि नजराना के रूप में जमा कराया जाना आवश्यक है।’ इसी शासनादेश में यह भी कहा गया है जिन पट्टा आवंटियों ने श्रेणी परिवर्तन हेतु संपूर्ण धनराशि दि.31 दिसंबर, 1989 तक जमा करा दी हो, उनसे भूमि श्रेणी परिवर्तन के लिए अतिरिक्त नजराना नहीं लिया जाएगा।

बलवंत सिंह का शपथ पत्र जिसे सत्य मानते हुए बगैर समुचित रिकॉर्ड भू-राजस्व और नजराना माफ कर दिया गया

बलवंत सिंह की जमीन के मामले में आरटीआई से प्राप्त जानकारी हैरान करने वाली है। जिला नैनीताल के राजस्व विभाग के पास ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था जिससे यह तय किया जा सके कि बलवंत सिंह ने सरकार को कभी भी कोई धनराशि भू-राजस्व के बतौर जमा कराई हो। हैरानी इस बात पर है कि कोई भी रिकॉर्ड उपलब्ध न होने के बावजूद बगैर भूराजस्व एवं सर्किल रेट के अनुसार 40 प्रतिशत का नजराना सिर्फ इस आधार पर बलवंत सिंह से नहीं लिया गया क्योंकि उसने एक शपथ पत्र दाखिल कर दिया था जिसमें यह कहा गया कि ‘उक्त भूमि के विनियमितीकरण हेतु शासनादेश के अनुसार अपेक्षित धनराशि दिनांक 31-12-1989 से पूर्व दिनांक 29-12-1989 को जमा करवा दी गयी थी। उक्त धनराशि जमा कराने संबंधी अभिलेख वर्तमान में मेरे घर में मुझे नहीं मिल रहे है।’ मात्र इस शपथ पत्र के आधार पर बगैर कोई प्रमाण बलवंत सिंह पर तत्कालीन डीएम ने कृपा की बारिश करते हुए जमीन को वर्ग-1(ख) से वर्ग-1(क) कर डाला। यहां यह उल्लेखनीय है कि 2 फरवरी, 2016 को नैनीताल जिलाधिकारी में तैनात प्रभारी अधिकारी परितोष वर्मा ने इस बिंदु को रेखांकित करते हुए एसडीएम हल्द्वानी को लिखा था कि ‘आवेदक द्वारा पूर्व में जमा की गई धनराशि का साक्ष्य भी उपलब्ध कराएं।’ जिला प्रशासन ने बाद में बलवंत सिंह के शपथ पत्र को ही साक्ष्य मानने का कारनामा अंजाम दे दिया।

बलवंत सिंह बना दानवीर कर्ण, कर दी समस्त जमीन दान


कहानी या महाघोटाले में अब आता है जबरदस्त मोड़। बरसों से जिस जमीन को पाने के लिए बलवंत सिंह ‘संघर्ष’ कर रहे थे। उस जमीन का मालिक बनते ही उनके भीतर ‘वैराग्य’ पैदा हो गया। कलयुग में भी दानवीर कर्ण समान ‘महापुरुष’ बनने की चाह में उसने यह समस्त 50 बीघा जमीन 10 मार्च, 2016 को एक गरीब व्यक्ति रविकांत फुलारा, निवासी कमलुवागांजा, हल्द्वानी को दान कर दी। रविकांत फुलारा एक कमजोर आर्थिक स्थिति वाले व्यक्ति हैं और ‘दि संडे पोस्ट’ को उपलब्ध जानकारी अनुसार वर्तमान में हल्द्वानी शहर में पहले पेंटर का काम करते थे और वर्तमान में अन्य छोटे-मोटे काम कर अपना जीवन-यापन करते हैं। कमजोर आर्थिक स्थिति के बावजूद फुलारा ने इस दान की जमीन का स्टाम्प शुल्क 19 लाख रुपया तत्काल जमा करा यह जमीन अपने नाम करवा ली। ‘बैरागी’ हो चले बलवंत सिंह ने संभवतः भूदान आंदोलन के जनक कहलाए जाने वाले विनोबा भावे जी के वचनों से प्रेरणा लेकर 10 मार्च, 2016 के दिन सर्किल रेट के हिसाब से 3 ़76 करोड़ की यह जमीन का भूदान कर दिया। यहां यह गौरतलब है कि यह दान उन्होंने उक्त जमीन का वर्गीकरण फरवरी, 2016 में वर्ग-1(ख) से वर्ग-1(क) में तब्दील होने के मात्र कुछ दिनों बाद ही कर डाला।

कहानी में एन्ट्री होनी असल खिलाड़ियों की

 


अब आता है कहानी में जबरदस्त मोड़ और पूरा प्रकरण बन जाता है बॉलीवुड की फिल्मों सरीखा। दान में प्राप्त 50 बीघा जमीन अब असल किरदारों के नाम करने की कवायद शुरू होती है और प्रवेश होता है राजनीतिक रूप से बेहद शक्तिशाली मास्टर माइंड और पूंजीपतियों का। स्मरण रहे सर्किल रेट से इतर इस जमीन का बाजारी मूल्य लगभग सौ करोड़ के करीब बताया जाता है। इस बेशकीमती जमीन को एक ही दिन 9 मई,2016 यानी दान में मिलने के मात्र 40-50 दिन बाद सात लोगों को रविकांत फुलारा बेच देते हैं। इन सात लोगों में सबसे गौरतलब नाम हरेंद्र सिंह कुंजवाल का है। हरेन्द्र सिंह कुंजवाल के पिता प्रदेश के नामी राजनेता गोविंद सिंह कुंजवाल हैं जो 2016 में राज्य विधानसभा के अध्यक्ष थे। खरीददारों के नाम, जमीन का हिस्सा और जमीन की कीमत निम्न है-

रविकांत फुलारा द्वारा उपरोक्त 6 लोगों को बेची गई जमीन में सबसे चौकाने वाला नाम अरविंद सिंह माहरा का है जिसने ़440 हेक्टेयर जमीन कुल 48 लाख 41 हजार में खरीदी। अरविंद सिंह इस जमीन के दानकर्ता बलवंत सिंह के पुत्र हैं। उन्होंने अपने पिता द्वारा दान में दी जमीन को क्योंकर खरीदा? यह जांच का विषय है। ‘दि संडे पोस्ट’ के पास मौजूद इन सभी रजिस्ट्री के दस्तावेजों में से केवल अरविंद सिंह द्वारा खरीदी गई जमीन का मूल्य 48,41,00 किस बैंक के किस चैंक नंबर से रविकांत फुलारा को दिया गया है, का जिक्र नहीं है। अन्य सभी रजिस्ट्री में भुगतान का पूरा ब्यौरा दिया गया है। बहुत संभव है कि अरविंद सिंह द्वारा रविकांत फुलारा को कोई भुगतान किया ही नहीं गया हो और जमीन की बंदरबांट के समय कुछ जमीन अपने पास रखने का इरादा बनने के चलते ़440 हेक्टेयर दान में दी गई जमीन को वापस खरीदा दिखाया गया हो।

उपसंहार

सरकारी जमीन की इस लूट में जिला प्रशासन की भूमिका पूरी तरह संदिग्ध रही है। तमाम नियमों को दरकिनार कर उक्त भूमि के कब्जे की अवधि के भू-राजस्व का बीस गुना तथा सर्किल रेट के हिसाब से 40 प्रतिशत धनराशि का नजराना लिए बगैर और जिस जमीन पर अवैध कब्जे को खाली कराए जाने का मुकदमा चला हो, बगैर सारे तथ्य की पड़ताल कराए 2011 में तत्कालीन डीएम द्वारा जमीन को वर्ग-4 से वर्ग-1(ख) में बदलना और 2016 में तत्कालीन डीएम द्वारा उसे वर्ग-1(ख) से वर्ग-1(क) में तब्दील करना जिला प्रशासन की भूमिका पर बड़े सवाल खड़ा करता है। ठीक इसी प्रकार जिस जमीन का मालिकाना हक पाने के लिए बलवंत सिंह दशकों से जुटा रहा हो, उसको जमीन का मालिकाना अधिकार मिलते ही दान कर देना भी पूरी तरह संदिग्ध है। यह भी समझ से परे है कि क्योंकर अपने पिता द्वारा दान में दी गई जमीन के कुछ हिस्से को मात्र 40-50 दिनों के भीतर ही बेटा भारी मूल्य चुकाकर वापस खरीदता है। रजिस्ट्री में भुगतान का पूरा विवरण न होने से भी संदेह पैदा होता है कि वाकई जमीन को खरीदा गया या फिर यह केवल कागजी कार्यवाही मात्र थी। तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल के पुत्र का बतौर खरीददार नाम सामने आने से यह शंका उत्पन्न होती है कि सारा खेल हरेंद्र सिंह कुंजवाल और अन्य रसूखदार लोगों द्वारा खेला गया जिसमें जिला प्रशासन के अधिकारियों की मिलीभगत रही। यह शंका भी जन्म लेती है कि जिस रविकांत फुलारा के नाम बलवंत सिंह ने जमीन कथित रूप से दान की क्या उस रविकांत फुलारा के पास ही यह करोड़ों की रकम बनी रही या फिर ‘मनी लॉन्ड्रिग’ के जरिए यह रकम बलवंत सिंह के पास पहुंच गई। ऐसी शंका इसलिए क्योंकि ‘दान’ में मिली जमीन को करोड़ों में बेचने वाला रविकांत आज भी आर्थिक रूप से संपन्न नहीं है और वह करोड़ों का मालिक बन जाने बाद भी ऑटो चला अपना जीवन-यापन कर रहा है।

‘दि संडे पोस्ट’ को दिए अपने बयान में फुलारा ने दावा किया है कि उसके नाम से बैंक में एक खाता बलवंत सिंह द्वारा खुलवाया गया था। इसी खाते में जमीन की खरीद-फरोख्त की रकम का आदान-प्रदान हुआ। फुलारा की मानें तो उसे पास इस आदान-प्रदान का मात्र एक लाख रुपया आया। बाकी रकम कहां गई पूछे जाने पर रविकांत फुलारा चुप्पी साध लेते हैं। प्रदेश सरकार के मुखिया पुष्कर सिंह धामी भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का दावा करते हैं। लगभग 100 करोड़ मूल्य की इस जमीन को खुर्द-बुर्द किए जाने का सच सामने आने के बाद अब उनके दावे की परख होनी बाकी है। यदि मुख्यमंत्री धामी निष्पक्ष जांच का आदेश देते हैं तो निश्चित ही दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा। संकट लेकिन यह कि इस जांच के दायरे में बड़े नौकरशाह और राज्य के रसूखदारों का आना तय है। ऐसे में धाकड़ धामी अपनी ‘जीरो टॉलरेंस नीति’ को लागू कर पाते हैं या नहीं, यह देखा जाना रोचक रहेगा।

 

Ravi kant Fulora

मुझे केवल एक लाख मिला : फुलारा

इस पूरी कहानी के एक अहम किरदार रविकांत फुलारा जिन्हें ‘दानवीर कर्ण’ समान बन बलवंत सिंह ने समस्त जमीन दान कर दी थी, ‘दि संडे पोस्ट’ ने रविकांत से संपर्क साध उनका पक्ष जानना चाहा तो सारा सच सामने आ गया। रविकांत फुलारा संग हुई बातचीत को हमारे द्वारा वीडियो रिकॉर्ड किया गया है। बकौल फुलारा बलवंत सिंह ने उनका एक खाता उत्तराखण्ड ग्रामीण बैंक में खुलवाया था जिसके जरिए सारी खरीद-फरोख्त को अंजाम दिया गया। फुलारा की माने तो करोड़ों के इस लेन-देन में उन्हें मात्र 1 लाख रुपया मिला। फुलारा यह भी नहीं जानते कि दान की जमीन की रजिस्ट्री के लिए करीबन 19 लाख की स्टांप ड्यूटी उनके नाम पर किसने दी। वे कहते हैं कि सारी जमीन बलवंत सिंह ने ही सात लोगों को बेची। वे यह भी दावा करते हैं कि उन्हें खरीददारों की बाबत कोई भी जानकारी नहीं है। बकौल फुलारा बलवंत सिंह ने उनसे उनके नए खुलवाए खाते के ब्लैंक चैक पूर्व में ही ले लिए थे। स्पष्ट है कि इस खाते में आए भुगतान को बलवंत सिंह ने ही कहीं अन्य ट्रांसफर किया होगा। फुलारा का ‘दि संडे पोस्ट’ को दिया गया बयान स्पष्ट करता है कि वे इस ‘खेला’ में एक मोहरा मात्र थे। अब यह सरकार पर निर्भर करता है कि वह पूरे मामले की जांच कराए ताकि सरकारी जमीन को खुर्द-बुर्द किए जाने और मनी लॉन्ड्रिग के आरोपियों की शिनाख्त हो सके और बेशकीमती सरकारी जमीन वापस राज्य के नाम दर्ज कराई जा सके।

 

बात अपनी-अपनी

मामले की जांच चल रही है। जांच बाद ही कुछ कहना उचित होगा।
धीरज गर्ब्याल, जिलाधिकारी, नैनीताल

मेरे पिता के राजनीतिक रसूख के इस्तेमाल का आरोप गलत है। मैं तो जमीन के चक्कर में पड़ता ही नहीं। आनंद दरम्वाल के कहने पर मैंने जमीन खरीद, सारा भुगतान एक नंबर में किया। इस जमीन को खरीदने के लिए हमने कोई सिंडिकेट नहीं बनाया। हमारा कहना है कि इसकी जांच कर ली जाए। डीएम साहब जांच कर भी कर रहे हैं।
हरेंद्र कुंजवाल, विवादित जमीन के खरीददार

शासनादेश से पक्की हुई जमीन हमने खरीदी। तुम्हारे कहने से कोई गलत नहीं हो जाएगा। हमारी नजर में सब कुछ सही हुआ है।
आनंद सिंह दरम्वाल, विवादित जमीन की खरीददार दीपा दरम्वाल के पति

मैंने तो भूमिधरी की जमीन खरीदी है। फुलारा से सारे कागजात चेक कराकर ही मैंने नंबर एक में पैसा देकर रजिस्ट्री कराई है।
अजय गुप्ता, विवादित जमीन के खरीददार

राजनीतिक रसूखदार व्यक्तियों तथा जिला-प्रशासन के अधिकारियों-कर्मचारियों के भ्रष्ट गठजोड़ से जनपद-नैनीताल में सीलिंग सीमा से अधिक भूमि को भू-माफियाओं के नाम वर्ग 1 (क) श्रेणी में दर्ज की गई। आवेदक के शपथ पत्र के दावे को ही पूर्णतः सत्य मानते हुए विनियमितीकरण के एवज में नजराने की कोई धनराशि जमा न कर राजकोष को करोड़ों की हानि पहुंचाई गई तथा उक्त भूमि की खरीद-फरोख्त में करोड़ों के कालेधन का प्रयोग किया गया है।

प्रश्नगत् प्रकरण में ग्राम-देवला तल्ला पजाया खाता सं.-40 की 3.107 हेक्टेयर श्रेणी वर्ग (ख) की कृषि-भूमि को फरवरी 2016 में श्री बलवंत सिंह, पुत्र-श्री मोहन सिंह के नाम श्रेणी वर्ग 1 (क) में विनियमितीकरण की संपूर्ण प्रक्रिया अवैध व नियम विरुद्ध है तथा सीलिंग अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत प्रश्नगत् संपूर्ण भूमि राज्य सरकार में निहित करने के सर्वथा योग्य है। मेरी मुख्यमंत्री जी से मांग है कि उक्त विनियमितीकरण की संपूर्ण प्रक्रिया को अवैध/शून्य घोषित करते हुए सीलिंग-एक्ट के प्रावधानों के अंतर्गत उक्त संपूर्ण भूमि को राज्य सरकार में निहित करने, प्रश्नगत् भूमि पर बने प्लॉटिंग क्षेत्र को सीज करने, उपनिबंधक कार्यालय, हल्द्वानी में प्रश्नगत् भूमि के पंजीकरण पर रोक लगाने, पंजीकरण हो चुके भूखंडों के भू-राजस्व अधिनियम-1901 की धारा-34-35 के अंतर्गत दाखिल खारिज की कार्यवाही पर रोक लगाते हुए प्रश्नगत् प्रकरण में सम्मिलित सभी व्यक्तियों से जुर्माने सहित राजस्व की पूर्ण वसूली सुनिश्चित की जाए।
रविशंकर जोशी, आरटीआई एक्टिविस्ट

नोटः- तत्कालीन जिलाधिकारी दीपक रावत (वर्तमान में कुमाऊं कमीश्नर) से कई बार संपर्क साधा गया लेकिन उन्होंने प्रत्युत्तर देना उचित नहीं समझा।

 

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