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उत्तराखण्ड में भर्ती घोटालों का जिन्न बाहर आने के बाद राज्य के मुख्य राजनीतिक दल भाजपा-कांग्रेस बैकफुट पर हैं। नौकरियों की बहती गंगा में दोनों ही दलों के लोगों ने जमकर हाथ धोए हैं। खासकर विधानसभा सचिवालय में जिस प्रकार अपने-अपने लोगों को भरकर युवाओं के साथ छल किया गया है, उससे भाजपा-कांग्रेस की साख पर बट्टा लग गया है। इन सबके बीच अपने को सामाजिक संगठन कहने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर इन नियुक्तियों की तपिश पहुंची है, जिससे आरएसएस के बड़े पदाधिकारियों की भूमिका और संघ की छवि पर सवाल खड़े हो गए हैं। सोशल मीडिया पर कई सूचियां वायरल हो रही हैं जिनमें आए नाम कथित रूप से संघ के कई पदाधिकारियों के नजदीकियों के बताए जा रहे हैं।

इन नामों और इनके निकट संबंधियों की सूची में कितनी सच्चाई है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन इस प्रकरण की गूंज संघ के नागपुर कार्यालय तक सुनाई दी है। सूत्र बताते हैं कि संघ का शीर्ष नेतृत्व इस विवाद से खुश नहीं है और वह इस प्रकरण में सख्त कार्रवाई कर कड़ा संदेश देना चाहता है। इसी कवायद के चलते उत्तराखण्ड में आरएसएस के भीतर बड़े बदलाव की चर्चा ने जोर पकड़ा है और भविष्य में परिवर्तन देखने को मिले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए उ त्तराखण्ड में भर्ती घोटालों का जिन्न बाहर आने के बाद राज्य के मुख्य राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस दोनों ही बैकफुट पर हैं। नौकरियों की बहती गंगा में दोनों ही दलों के लोगों ने जमकर हाथ धोया है। खासकर विधानसभा सचिवालय में जिस प्रकार अपने-अपने लोगों को भरकर प्रदेश के युवाओं के साथ छल किया गया है, उसने भाजपा और कांग्रेस दोनों की साख पर बट्टा लगा दिया है।

इन सबके बीच अपने को सामाजिक संगठन कहने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर इन नियुक्तियों की तपिश पहुंची है जिससे आरएसएस के बड़े पदाधिकारियों की भूमिका और संघ की छवि पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। सोशल मीडिया पर कई सूचियां वायरल हो रही हैं जिनमें आए नाम कथित रूप से संघ के कई पदाधिकारियों के नजदीकियों के बताए जा रहे हैं। इन नामों और इनके निकट संबंधियों की सूची में कितनी सच्चाई है, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा, लेकिन संघ के बचाव में जिस प्रकार भाजपा का संगठन और उसके नेता सक्रिय हुए, उससे भाजपा के अंदर संघ की ताकत का पता चलता है।

भारतीय जनता पार्टी का मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ खुद को गैर राजनीतिक संगठन कहता है लेकिन भाजपा की आंतरिक राजनीति में उसका दखल छिपा नहीं है। भाजपा के संगठन में संगठन मंत्री और सह संगठन मंत्री आरएसएस से ही आते हैं और उनका संगठन के मामलों में पूरा दखल रहता है। फिर वह चाहे राष्ट्रीय स्तर का संगठन हो या फिर राज्यों में प्रादेशिक स्तर का संगठन हो। प्रांत प्रचारक, क्षेत्रीय प्रचारक और जिला प्रचारक जैसे स्वयं सेवकों के माध्यम से सरकार और भाजपा के संगठन पर आरएसएस पैनी नजर एवं दखल रखता है। आरएसएस के भाजपा संगठन व सरकार पर भरपूर असर के चलते ही भाजपा के बड़े नेता आरएसएस के बड़े पदाधिकारियों के दर पर नतमस्तक होते देखे जाते हैं। लेकिन उत्तराखण्ड विधानसभा में पिछले दरवाजे से हुई नियुक्तियों में संघ के बड़े नेताओं के चहेतों का नाम आने से नैतिकता की वह परत अब उघड़ती नजर आ रही है, जिस कथित नैतिकता की आड़ में संघ स्वयं को सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन होने का दंभ भरता है। हालांकि यह पहला अवसर नहीं है जब संघ से जुड़े पदाधिकारियों के नाम भर्ती घोटालों में उछला हो, इससे पूर्व मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले में पूर्व सरसंघ चालक के एस सुदर्शन और वरिष्ठ पदाधिकारी सुरेश सोनी के नाम उछले थे।

उत्तराखण्ड में कुछ ऐसे ही आरोप संघ के प्रांत प्रचारक से लेकर अन्य पदाधिकारियों पर लगे हैं। सबसे ज्यादा चर्चा विधानसभा सचिवालय में हुई बैकडोर एंट्री पर है जिसमें प्रांतीय प्रचारक युद्धवीर यादव के भांजे दीपक, विभाग प्रचारक भगवती प्रसाद के भाई बद्री प्रसाद और प्रांत प्रचारक अजेय कुमार के वाहन चालक विजय सुंदरियाल की है। इन्हीं विवादों के बीच एक लंबी सूची सोशल मीडिया में वायरल हुई जिसमें दावा किया गया कि इसमें शामिल नाम प्रांत प्रचारक युद्धवीर यादव के निकट संबधियों के हैं। हालांकि इस सूची की सच्चाई क्या है यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा लेकिन इस सूची के वायरल होते ही संघ का तंत्र सक्रिय हो गया और अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करा दी गई। आश्चर्य की बात है कि ऐसे ही पूर्व प्रकरणों पर प्रभावितों को कोर्ट जाने की नसीहत देने वाले राज्य के पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार इस मुद्दे पर उन लोगों के खिलाफ जांच करने के लिए खासे सक्रिय हो उठे जिनके सोशल मीडिया पर यह सूची वायरल हुई थी। देहरादून पुलिस ने ऐसों के खिलाफ आनन- फानन में एफआईआर तक दर्ज कर डाली है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष करण माहरा पुलिस महानिदेशक की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि ऐसे ही प्रकरणों पर कांग्रेस की ओर से की गई शिकायतों पर डीजीपी उदासीन रहते हैं।

उत्तराखण्ड में आरएसएस हमेशा भाजपा संगठन व सरकार पर हावी रहा है। कई भाजपा नेताओं की राजनीति संघ के पदाधिकारियों के आशीर्वाद से ही चमकी है। भाजपा के अंदर पदों की बात हो या चुनावों में टिकट की बात हो, संघ का वरदहस्त कई लोगों के राजनीतिक भविष्य को संवार गया। भले ही इसमें अधिकार से बाहर जाकर हस्तक्षेप क्यों न करना पड़ा हो। 2022 के विधानसभा चुनाव में कई ऐसे उदाहरण हैं जब संघ के हस्तक्षेप के चलते ऐेसे व्यक्ति तक चुनाव में टिकट पा गए जिनके बारे में चर्चा थी कि वे भाजपा के सदस्य तक नहीं थे। संघ से आए भाजपा के प्रांतीय संगठन मंत्री अजेय जी के निजी सहायक गौरव सिंह पुष्कर सिंह धामी के पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके जन संपर्क अधिकारी बने। उसके पश्चात् विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल द्वारा की गई 72 नियुक्तियों में गौरव सिंह विधानसभा में नियुक्ति पा गए। ये चर्चाएं आम हैं कि आयुर्वेद विश्वविद्यालय में प्रांत प्रचारक युद्धवीर सिंह के छह-सात रिश्तेदार नौकरी पाए हैं। पूर्व क्षेत्र प्रचारक आलोक के मौसेरे भाई गौरांग गर्ग पहले भारतीय जनता पार्टी के देहरादून कर्यालय में कार्यरत थे।

2017 में भाजपा की सरकार आने के बाद गौरांग गर्ग को कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य का पीआरओ बना दिया गया। पूरे पांच वर्ष रेखा आर्य का जन संपर्क अधिकारी रहने के बाद विधानसभा में हुई नियुक्ति पाने वालों में गौरांग गर्ग का नाम भी शामिल है। इसी प्रकार पूर्व कैबिनेट मंत्री और हरिद्वार से वर्तमान विधायक मदन कौशिक के पीआरओ रहे अमित कुमार का भी संबंध आरएसएस से रहा है। अमित कुमार का नाम उन 72 लोगों में शामिल है जो विधानसभा में नियुक्ति पाए हैं।
डोईवाला शुगर मिल में कार्यरत रहे अमित कुमार राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री शिव प्रकाश के करीबी बताए जाते हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भाजपा की मातृ संस्था है, ऐसे में उसका सरकारों और संगठन पर प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। लेकिन अब जिस प्रकार संघीय मानसिकता के आचरण में विचलन नजर आता है, उससे प्रतीत होता है कि अपनी विचारधारा की सरकारों ने उसको अपने मूल उद्देश्य से भटका दिया है। लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े रहे एक स्वयं सेवक के अनुसार ‘संघ के स्वयं सेवक एक औपचारिक व्यवस्था के तहत भाजपा में संगठन मंत्री और सह संगठन मंत्री के तौर पर अपना योगदान जरूर देते थे जो वर्तमान में भी है।

भाजपा के अंदर राजनीतिक प्रबंधन में किसी प्रकार की भूमिका उनकी नहीं मानी जाती। बदलते हालातों में संघ अपनी विचारधारा पर अडिग है, मगर व्यक्तियों के विचलन से इंकार नहीं किया जा सकता।’ वैसे भी अब संघ में समर्पित स्वयं सेवक जो पुराने समय में थे, ढूंढ़ पाना मुश्किल है। भाजपा सरकारों के बनने के बाद से संघ के पदाधिकारी भी सुविधाभोगी हो गए हैं। पैदल भ्रमण करने की संस्कृति वाले संघ में आज पदाधिकारी वातानुकूलित वाहनों से चलना पसंद करते हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वक्त के साथ बदलाव ने संघ की कार्य संस्कृति पर बड़ा असर डाला है। चुनाव के समय व्यक्तिनिष्ठ होकर टिकट बंटवारे में हस्तक्षेप के चलते संघ की छवि पर नकारात्मक असर पड़ा है। अल्मोड़ा जिले से वर्तमान में एक मंत्री को भाजपा में शामिल होने पर संघ के केंद्रीय स्तर तक के पदाधिकारियों के वरदहस्त की चर्चा थी जबकि उस वक्त स्थानीय सांसद अजेय टम्टा उनको भाजपा में शामिल करने के खिलाफ थे। पूर्व संगठन मंत्री रहे संजय कुमार भी अपने समय विवादास्पद रहे थे। उत्तराखण्ड राज्य बनने के पश्चात् भाजपा के नेता संघ पृष्ठभूमि से ही आए हैं और संघ के माध्यम से वे खुद अपनी राजनीतिक पैठ बनाने के प्रयास में वे संघ पदाधिकारियों को उपकृत करने से परहेज नहीं करते।

विधानसभा में पिछले दरवाजे से हुई भर्तियों ने किसी की छवि पर सबसे ज्यादा असर डाला है तो वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ही है। इसका सबसे ज्यादा असर संघ के कैडर के मनोबल पर पड़ा है। असहज महसूस कर रहे संघ के पदाधिकारी और कैडर कुछ भी कहने से बच रहे हैं। खासकर इसमें आरएसएस के बड़े पदाधिकारियों के नाम आने से ज्यादा किरकिरी हुई है और संघ पहली बार बचाव की मुद्रा में है। सख्त अनुशासन, समाज सेवा, संस्कृति उत्थान, परिवार से दूरी और सादा जीवन जैसे ध्येय आरएसएस ने स्थापित किए हैं। उनके मद्देनजर भर्ती जैसे प्रकरण उनकी साख पर बदनुमा दाग की तरह हैं। पूर्व में भाजपा से जुड़े नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि ‘उत्तराखण्ड में भाजपा सरकारों के समय संघ पदाधिकारियों की खुलेआम मनमर्जी चली है।

राज्य के तमाम विश्वविद्यालयों, स्ववित्त पोषित शैक्षिक संस्थानों में अतिक्रमण, भगवाकरण की कोशिशों समेत लगभग हर विभाग में संघ का कहीं न कहीं हस्तक्षेप दिखता है।’ उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इस प्रकरण की गूंज संघ के नागपुर कार्यालय तक सुनाई दी है। सूत्र बताते हैं कि संघ का शीर्ष नेतृत्व इस विवाद से खुश नहीं है और वह इस प्रकरण में सख्त कार्रवाई कर कड़ा संदेश देना चाहता है। इसी कवायद के चलते उत्तराखण्ड में आरएसएस के अंदर बड़े बदलावों की चर्चा ने जोर पकड़ा है और भविष्य में बड़े बदलाव देखने को मिले तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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