[gtranslate]
Uttarakhand

बलूनी की सक्रियता से बढ़ी बेचैनी

उत्तराखण्ड में राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी की सक्रियता के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। भाजपा के बड़े नेता और विधायक बेचैन हैं कि कहीं पार्टी एक बार फिर सांसद को मुख्यमंत्री बनाने की परंपरा तो नहीं निभा रही है। खुद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र बेचैन नेताओं में शामिल बताए जाते हैं

 

उत्तराखण्ड की राजनीति में अविश्वास की भावना इस कदर बढ़ चुकी है कि यदि कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि लीक से हटकर कुछ काम करने लगे तो कइयां की सत्ता खिसकने का डर पैदा हो जाता है। अगर निर्वाचित जन प्रतिनिधि एक सांसद हो और उस पर तुर्रा यह कि वह प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी का सांसद हो, तो उत्तराखण्ड की राजनीति में कई तरह के कयासों से राजनीतिक गलियारे गूंजने लगते हैं। इन कयासों में नेतृत्व परिर्वतन और सक्रिय सांसद को मुख्यमंत्री बनाये जाने की सबसे ज्यादा चर्चायें होने लगती हैं। कुछ इसी तरह की चर्चायें उत्तराखण्ड की राजनीति इन दिनों हो रही हैं। इस बार की चर्चाओं में भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रमुख और राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी का नाम है। उनके राज्य सभा सांसद के शुरूआती कार्यकाल में उत्तराखण्ड के लिए किए जा रहे कामां को केंद्र में रखकर इस तरह के कयासों से राजनीतिक गलियारे गूंज रहे हैं।

छोटे से पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड में कुल आठ सांसद हैं जिनमें पांच लोकसभा और तीन राज्यसभा सांसद हैं। इनमें 6 सासंद सत्ताधारी भाजपा के हैं। जिनमें एक अनिल बलूनी हैं। शेष दो राज्यसभा सांसद कांग्रेस पार्टी के हैं। बलूनी ने अपने छह माह के कार्यकाल में खुद को बेहतर सांसद साबित करने में उन सांसदां के मुकाबले कामयाब हुये हैं जो पिछले दरवाजे से अपने- अपने राजनीतिक भविष्य के लिए राजनीति करते रहे हैं।

सांसद अनिल बलूनी के कामकाज पर एक नजर डालें तो यह साफ है कि अपने राज्यसभा सांसद के महज छह माह के कार्यकाल में उन्होंने ऐसे कई कामों पर लक्ष्य रखा जो सीधे तौर पर उत्तराखण्ड की जनता से जुड़े हैं। इसमें गौर करने वाली बात यह भी है कि बलूनी ने अपने कामां को अंजाम तक पहुंचाने में भरपूर प्रयास किया जिससे उनके सभी काम धरातल पर उतरते दिखाई दे रहे हैं। देहरादून से हल्द्वानी के लिए नई रेलगाड़ी शुरू करवाना, उत्तराखण्ड के लिए केंद्रीय आपदा राहत बल (एनडीआरएफ) की बटालियन का आंवटन, स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी से जूझती आम जनता के लिए सैनिक अस्पतालों में इलाज की सुविधा दिलवाना जैसे काम निश्चित ही जनहित में हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर देश का हर सांसद अपने कार्यकाल में एक गांव गोद लेकर उसका विकास कर रहा है। उत्तराखण्ड में मोदी की यह इच्छा दम तोड़ती जा रही है। सांसदां ने आदर्श ग्राम योजना के तहत जो गांव गोद लिये हैं, वह पहले से ही सभी सुविधाओं वाले हैं। बावजूद इसके किसी भी सांसद द्वारा गोद लिये गये गांव की हालत बेहतर हुई हो ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। उत्तराखण्ड का पौड़ी जिला जिसमें सबसे अधिक पलायन हुआ है और सबसे ज्यादा घोस्ट विलेज यानी गैर आबाद गांव भी पौड़ी जिले में ही हैं, उनमें से एक गांव को बलूनी ने गोद लिया है। पौड़ी जिले के दुगड्डा विकासखण्ड के ‘बौर गांव’ जिसे सरकारी अभिलेखों में घोस्ट विलेज घोषित किया गया है उस गांव को बलूनी द्वारा गोद लिया जाना एक सुखद बात कही जा सकती है। कम से कम पलायन के नाम पर अपने दर्द को मीडिया और मंचों में व्यक्त करने वाले नेताओं और जनप्रतिनिधियां को बलूनी ने आईना तो दिखाया ही है।

महज छह माह के कार्यकाल में ही बलूनी की सक्रियता जिस तेजी से समाने आई उससे भाजपा के कई नेताओं में बेचैनी देखी जा रही है। इस बेचेनी के माहौल से स्वयं मुख्यमंत्री भी कहीं न कहीं घिरे हुये नजर आ रहे हैं। जहां राज्य के हित में किये जा रहे कामों पर बलूनी को श्रेय देने से भाजपा के बड़े नेता परहेज करते दिखाई दे रहे हैं वहीं मुख्यमंत्री भी बलूनी को श्रेय देने से बचते रहे हैं। इसका प्रमाण देहरादून काठगोदाम के लिए नैनी-दून जनशताब्दी एक्सप्रेस के मामले में साफ तौर पर दिखाई दिया। केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल ने बलूनी की खुलकर तारीफ की और बताया कि बलूनी और उनके बीच इस ट्रेन को लेकर खूब नोकझोंक हुई है। बलूनी ने यह ट्रेन झगड़ कर ली। लेकिन मुख्यमंत्री ने राज्य को मिली इस सौगात पर बलूनी को श्रेय देने से परहेज किया। मुख्यमंत्री स्तर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में केंद्र सरकार और केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल का भरपूर आभार व्यक्त किया गया, लेकिन उसमें बलूनी के नाम का कहीं उल्लेख नहीं था। इसके अलावा नैनी-दून जनशताब्दी के लिए भाजपा के कई नेता श्रेय लेने का प्रयास करते दिखाई दिये जिनमें स्वयं मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत और सांसद भगत सिंह कोश्यारी प्रमुख थे। लेकिन पीयूष गोयल द्वारा अनिल बलूनी के प्रयासां का ही उल्लेख करने से साफ है कि भाजपा के कई दिग्गजों को बलूनी की प्रदेश में सक्रियता और काम करने की शैली से खासी बेचैनी बनी हुई है।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ बलूनी

आखिर सरकार और भाजपा में अनिल बलूनी को लेकर इतनी बेचैनी क्यों बनी हुई है। इसका मुख्य कारण यह है कि प्रदेश की राजनीति में सदैव एक सांसद का दखल माना जाता रहा है। अगर प्रदेश के विगत 18 वर्षों के राजनीतिक इतिहास को ख्ांगालें तो प्रदेश में सत्ता की कुर्सी एक तरह से सांसद के लिए आरक्षित मानी जाती रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनां ही दलों ने अपनी-अपनी पार्टी के भीतर विरोध के स्वरों को दरकिनार करते हुए मुख्यमंत्री के पद पर निर्वाचित विधायक के बजाए एक सांसद को ही तवज्जो दी है। भले ही कुछ वर्ष के बाद नेतृत्व परिवर्तन करके अपनी गलतियों को सुधारने का प्रयास किया हो, लेकिन इस प्रयास में भी अधिकतर सांसद को ही किसी न किसी तरह से केंद्र में रख कर प्रदेश की राजनीति में बड़े-बड़े प्रयोग किये हैं।

पृथक राज्य स्थापना के बाद अगर अंतरिम सरकार को छोड़ दें तो मुख्यमंत्री का पद दोनां ही दलों ने सांसदों के लिए एक तरह से आरक्षित रखा है। पहली निर्वाचित सरकार में कांग्रेस के तत्कालीन वरिष्ठ नेता और सांसद नरायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल हुई। भाजपा सरकार के दौरान भी पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद रहे भुवन चंद खण्डूड़ी को मुख्यमंत्री बनाया गया। कांग्रेस सरकार में भी टिहरी से सांसद रहे विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री का ताज पहनाया गया। विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी हरिद्वार के तत्कालीन सांसद हरीश रावत को मिली।

वर्तमान भाजपा सरकार में यह पहली बार हुआ है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी किसी निर्वाचित विधायक को नसीब हुई। हालांकि 2007 में भाजपा सरकार के दौरान खण्डूड़ी को हटाये जाने के बाद डॉ रमेश पाखरियाल निंशक जो कि तब विधायक थे, को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली थी। लेकिन महज दो वर्ष के बाद ही उनको पद से जाना पड़ा और खण्डूड़ी दोबारा मुख्यमंत्री बने।

2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को सफलता मिली तो पार्टी आलाकमान ने त्रिवेंद्र रावत को प्रदेश का मुखिया बनाया। इसे प्रदेश की राजनीति में एक सांसद को मुख्यमंत्री पद पर तेनात करने की परम्परा पर रोक लगाये जाने की पहल के तौर पर देखा गया। इसे सभी ओर से सराहा भी गया। विपक्षी कांग्रेस के उन नेताओं को भी इससे एक बड़ी उम्मीद नजर आई जो विधायक निर्वाचित होने के बावजूद आंकलन में सांसद से कमतर माने गये। लेकिन अब एक सांसद की प्रदेश की राजनीति में दखल और धमक शुरू हो गई है। इससे नई गठित परम्परा के खिसने का अंदेशा जताया जा रहा है। राज्य सभा सांसद अनिल बलूनी के कामकाज को लेकर कई तरह के कयास लगाये जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि आज भी प्रदेश की राजनीति में सांसद की धमक बरकरार है। आने वाले समय में फिर से नया प्रयोग राज्य के नसीब में दिखाई दे सकता है।

You may also like

MERA DDDD DDD DD