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Uttarakhand

खोई जमीं तलाशता उक्रांद

राज्य आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाला उत्तराखण्ड क्रांति दल अपने नेताओं की निजी महत्वाकांक्षा के चलते आज पूरी तरह हाशिए पर पहुंच चुका है। वर्तमान विधानसभा चुनाव में एक बार फिर उत्तराखण्डियत के मुद्दों को आधार बना अपनी फिसल चुकी जमीं को पाने की जद्दोजहद करती दिखाई दे रहा है। हालांकि आम आदमी पार्टी की इंट्री के बाद उक्रांद अपनी इस खोई जमीं को तलाश कर पाएगा यह कह पाना खासा कठिन है

 

उत्तराखण्ड के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर घमासान शुरू हो चुका है। पांचवी विधानसभा गठन के लिए इस बार भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में कांटे की टक्कर देखने को मिल रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस को हराकर प्रचंड बहुमत के साथ राज्य में अपनी सरकार बनाई थी। अपनी जीत के इसी क्रम को फिर से दोहराने के लिए भाजपा ने छह माह पूर्व प्रदेश की सत्ता पुष्कर सिंह धामी के हाथ सौंपी। हालांकि चुनाव की तैयारियों में कांग्रेस भी पीछे नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को आगे कर कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई और भू कानून जैसे बड़े मुद्दों को लेकर इस बार चुनाव में भाजपा के खिलाफ मजबूती से उतर रही है। भाजपा और कांग्रेस के साथ ही आम आदमी पार्टी, बसपा और उत्तराखण्ड क्रांति दल (उक्रांद) भी पूरी तैयारियों के साथ चुनावी मैदान में है। उक्रांद राज्य का पहला ऐसा दल है जिसने न केवल सबसे पहले अपने उम्मदवारांे की घोषणा की है, बल्कि सबसे पहले अपना घोषणा पत्र भी जारी किया है। उक्रांद के घोषणा पत्र में भू-कानून से लेकर गैरसैंण राजधानी बनाने और पलायन तथा बेरोजगारी उन्मूलन के मुद्दे शामिल हैं। उत्तराखण्ड के विधानसभा चुनावों में किंग मेकर की भूमिका में रह चुका उक्रांद इन मुद्दों के साथ एक बार फिर जनता के बीच जाकर अपनी खोई हुई जमीं तलाश कर रहा है।

उक्रांद एकमात्र क्षेत्रीय दल है जिसने सबसे पहले पहाड़ी राज्य की कल्पना की थी। उत्तराखण्ड राज्य की परिकल्पना के पीछे सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यहां की जनता को लगता था कि उत्तर प्रदेश में रहकर इस पर्वतीय क्षेत्र के आठ जिलों का विकास इसलिए नहीं हो पाता है, क्योंकि लखनऊ और दिल्ली में बैठे नेता और नौकरशाह पहाड़ के भूगोल को नहीं जानते। वह यहां की नदियों जंगल और संस्कृति भाषा को भी नहीं जानते। तब उक्रांद ने जनता के बीच कहा था कि जब उनका राज्य बन जाएगा तो यहां अपने नेता होंगे, अपनी सरकार होगी और अपने अधिकारी, जो विकास की जिम्मेदारी लेंगे। 20 साल पहले उत्तराखण्ड तो अलग राज्य बन गया लेकिन उक्रांद की सरकार एक सपना बनकर रह गई।

42 वर्षों से राजनीति के अखाड़े में जमा उत्तराखण्ड क्रांति दल इन दिनों अपने ही राज्य में सियासी जड़े जमाने में जुटा है। पिछले चार विधानसभा चुनावों को देखें तो राज्य गठन से लेकर अब तक उक्रांद राज्य में अपना जनाधार खोता ही चला गया। 2017 के विधानसभा चुनाव में उक्रांद का एक भी विधायक चुनकर विधानसभा तक नहीं पहुंचा पाया। सूबे में कहा भी जाने लगा है कि उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में अपनी अहम भूमिका निभाने वाला एकमात्र क्षेत्रीय दल राज्य में लगभग अपनी सियासी जमीन खो चुका है। लोग तो यहां तक कह रहे हंै कि प्रदेश की जनता का भरोसा अब उक्रांद से उठता जा रहा है। जनता के बीच इस भरोसे को वापिस लाने के लिए दल के नेता इस बार ऐड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं।

राजधानी का सवाल उत्तराखण्ड क्रांति दल के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। हम गैरसैंण को पहाड़ की आत्मा मानते हैं। हमारा शुरू से ही मानना है कि गैरसैंण राजधानी एक जगह का नाम नहीं है, यह पहाड़ में विकास के विकेंद्रीकरण का दर्शन भी है। गैरसैंण को उत्तराखण्ड की स्थायी राजधानी बनाने राज्य के पर्वतीय क्षेत्र की जनता के सपने को दोनों दलों ने मिलकर चकनाचूर किया है। इसके अलावा जल, जंगल और जमीन भी हमारी प्राथमिकताओं में है। इस बार उक्रांद काफी दिनों बाद पहाड़ी मुद्दों को लेकर जनता के बीच जा रहा है। हमें जनता का असीम स्नेह मिल रहा है जो चुनाव परिणामों में सामने आएगा।
काशी सिंह ऐरी, केंद्रीय अध्यक्ष, उक्रांद

याद रहे कि 25 जुलाई 1979 को मसूरी में अविभाजित उत्तर प्रदेश से अलग पर्वतीय राज्य की अवधारणा के साथ उक्रांद का गठन हुआ था। तब उत्तर प्रदेश के शिक्षा निदेशक और कुमाऊं विश्वविद्यालय के पहले कुलपति रहे स्वर्गीय डाॅ डीडी पंत इसके संस्थापक अध्यक्ष बने थे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि उक्रांद के लिए पिछले दस बरस सबसे खराब रहे हैं। इस एक दशक के दौरान उक्रांद का दो बार बंटवारा हुआ। इस दल के संस्थापक दिवाकर भट्ट और काशी सिंह ऐरी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने इसे जनाधारहीन दल बना दिया। दोनों नेताओं ने एक दूसरे को पार्टी से निलंबित कर दिया था। एक गुट दिवाकर भट्ट यूकेडी (डी) और त्रिवेंद्र सिंह पंवार यूकेडी (पी) बना।

गौरतलब है कि वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के सबसे ताकतवर नेता दिवाकर भट्ट मंत्री पद के लालच में भाजपा की भुवन चंद्र खंडूरी सरकार में मंत्री बन बैठे थे। उनके इस रवैये से काशी सिंह ऐरी ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया था। इस आपसी खींचतान के चलते विधानसभा चुनावों में उक्रांद का राजनितिक वजूद दिनों दिन कम होता चला गया। उत्तराखण्ड के लोगांे का कहना है कि जब वक्त राजनीतिक संघर्ष का था तब उक्रांद ने संघर्ष का रास्ता छोड़कर सरकार के साथ सत्ता का सुख भोगने का फैसला ले लिया था। उक्रांद के लिए उल्टी गिनती यही से शुरू हुई।

भाजपा सरकार में एक के बाद एक गलत निर्णय लिए गए। इसके बाद चुनावों में हार के डर से वे निर्णय वापस लिए गए। पहले कांग्रेस और फिर भाजपा दोनों ने ही उत्तराखण्ड में जन विरोधी कार्य किए हैं। भाजपा सरकार ने बिना व्यापक विचार-विमर्श एवं आम राय के जिला विकास प्राधिकरण और गैरसैंण कमिश्नरी बना दी थी। भारी विरोध के बाद भी देवस्थानम बोर्ड जबरदस्ती बनाना और भू-कानून बदलना ये सभी कार्य जन विरोधी तो थे ही, साथ ही इसमें करोड़ों रुपये भी बर्बाद हुए। इस सरकार का सबसे घातक कार्य भू-कानून में बदलाव करना था, जिसने पूरे उत्तराखण्ड को झकझोर दिया है। यूकेडी उत्तराखण्ड के लिए सख्त भू-कानून लाएगी। हमारी पार्टी भाजपा और कांग्रेस से अलग जनता को राहत दिलाने वाले काम करेगी।
दिवाकर भट्ट, पूर्व अध्यक्ष, यूकेडी

उक्रांद अविभाजित राज्य उत्तर प्रदेश के दौरान ही 1980 में पहला विधानसभा चुनाव लड़ चुका था। तब उत्तराखण्ड मुद्दे को लेकर जनता की अपार सहानुभूति होते हुए भी दल से केवल एक ही कैंडिडेट रानीखेत से जसवंत सिंह चुनाव जीते थे। इसके बाद 1985 के विधानसभा चुनाव हुए। तब रानीखेत की सीट क्रांति दल हार गया। लेकिन डीडीहाट से काशी सिंह ऐरी चुनाव जीत गए। इसके बाद 1990 के विधानसभा चुनावों में दो सीटों पर विजय हासिल हुई। जिनमें रानीखेत से जसवंत सिंह और डीडीहाट से काशी सिंह ऐरी जीते थे। 1994 में उक्रांद ने पृथक राज्य के लिए जबरदस्त आंदोलन छेड़ा था।

इसके बाद जब उत्तराखण्ड अलग राज्य बना और पहली बार विधानसभा चुनाव साल 2002 में हुए। उक्रांद को इस चुनाव में 5.59 प्रतिशत वोट मिले थे। 2007 के चुनाव में क्रांति दल ने 61 प्रत्याशी उतारे। तब पार्टी को 3 सीटें मिली थी। हालांकि इस साल क्रांति दल का मत प्रतिशत भी घटा जो 5.59 प्रतिशत से 4.7 तक जा पंहुचा था। क्रांति दल की सबसे बड़ी गलती यह रही कि वह भाजपा और कांग्रेस के साथ सत्ता का स्वाद लेती रही। 2002 में कांग्रेस के साथ सरकार बनाने वाले क्रांति दल ने 2007 में भाजपा की सरकार आने पर भी सत्ता का साथ दिया। वर्ष 2012 के चुनाव में क्रांति दल महज 44 सीटों पर ही चुनाव लड़ पाया। इस बार क्रांति दल की हालात पहले से भी बदतर हुई। वह सिर्फ एक सीट ही जीत पाया। यही नहीं बल्कि उनका मत प्रतिशत भी घटकर 1.93 प्रतिशत रह गया था। चैंकाने वाली बात यह रही कि जिस 1 सीट पर उक्रांद के प्रीतम पंवार ने चुनाव जीता उन्होंने भी पार्टी का दामन छोड़ने में ही अपनी भलाई समझी। उक्रांद के एकमात्र विधायक प्रीतम पंवार ने कांग्रेस को समर्थन दिया और यूकेडी के कोटे से सरकार में मंत्री रहे। खास बात यह रही कि जो भी विधायक सरकारों में मंत्री बने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। चाहे वह दिवाकर भट्ट रहे हो जिन्हें 2012 में पार्टी से निकाला गया और उसके बाद प्रीतम पंवार को भी पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। इसके बाद अगला चुनाव 2017 में हुआ। तब 59 सीटों पर उक्रांद ने प्रत्याशी उतारे थे। दल किसी भी सीट पर जीत हासिल नहीं कर पाया। यहां तक कि उक्रांद नोटा से भी कम प्रतिशत वोट हासिल कर पाया। इस बार महज 0. 7 प्रतिशत वोट ही मिल पाए। दल के लगातार सिकुड़ते जनाधार के लिए इसके नेता भाजपा और कांग्रेस को दोष देते हैं कि इन दोनों राष्ट्रीय राजनीतिक दलों ने एक रणनीति के तहत क्षेत्रीय दल का अस्तित्व खत्म करने की सुनियोजित योजना बनाई। लेकिन राजनीतिक पंडितांे का कहना है कि उक्रांद अपनी गिरती हुई राजनीतिक साख और जनाधार के लिए खुद दोषी है। इस दल के नेताओं ने अपनी राजनीतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए पार्टी की बलि चढ़ा दी। नेताओं की महत्वकांक्षा और आपसी गुटबाजी की वजह से पार्टी का जनाधार गिरता चला गया। उत्तराखण्ड के निर्माण से लेकर राज्य के हर मुद्दों को उठाने में उक्रांद की अहम भूमिका रही है, लेकिन वक्त के साथ-साथ नेताओं की महत्वकांक्षा बढ़ना और बेहतर लीडरशिप का ना होना दल के जनाधार खोने की बड़ी वजह है। उत्तराखण्ड में यूकेडी के लिए सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों का इंतजाम तो है ही अपने इतिहास को न दोहराने यानी शीर्ष पार्टी नेतृत्व की गलतियों से सबक लेने की भी है। उक्रांद नेताओं का दावा है कि इस बार पार्टी दोनों ही चीजों का ध्यान रखकर आगे बढ़ रही है।

वरिष्ठ पत्रकार और डोईवाला से उक्रांद के घोषित उम्मीदवार शिव प्रसाद सेमवाल की मानें तो इस बार उनकी पार्टी पूरे जोश के साथ चुनावी मैदान में उतरी है। इस बार जनता दोनों राष्ट्रीय दलों से पूरी तरह उकता चुकी है। जनता क्षेत्रीय दल पर ही विश्वास जता रही है। सेमवाल कहते हैं कि ‘‘उनकी पार्टी में भाजपा और आरएसएस से दशकों तक जुड़े रहे संजय बहुगुणा की एंट्री हो चुकी है। बहुगुणा पूर्व मुख्यमंत्री डाॅ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के प्रतिनिधि भी रह चुके हैं। अभी ऐसे कई नेता उनकी पार्टी के सदस्य बनने वाले हैं। उनकी पार्टी में उत्तरा बहुगुणा भी आई है।’’ उत्तरा बहुगुणा एक अध्यापिका के तौर पर उस समय चर्चा में आई थी जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उन्हें अपने जनता दरबार से बाहर निकलवा दिया था। इसके बाद अभिनेता सलमान खान भी उत्तरा बहुगुणा को अपने शो में बुला चुके हैं।

 

राज्य में हर विभाग भ्रष्टाचार में लिप्त है। इसके लिए भाजपा नेतृत्व जिम्मेदार है। यूकेडी ने भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों के खिलाफ अभियान चलाया है। अन्य प्रदेशों से पहाड़ों में वापस आए प्रवासियों ने अब उत्तराखण्ड में ही रहने का मन बनाया है। वे राज्य को विकसित करना चाहते हैं। यहां पलायन सबसे बड़ा मुद्दा है जिसे खत्म करना हमारी पार्टी का प्रमुख एजेंडा है। पहाड़ के विकास के लिए पहाड़ की पार्टी को सत्ता में लाना जरूरी है। अगर 2022 में यूकेडी नहीं आती है तो इसका असर पहाड़ों पर पड़ेगा।
त्रिवेंद्र पंवार, संयोजक, उक्रांद

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