Uttarakhand

त्रिवेंद्र की भेदभावपूर्ण नीति

देवप्रयाग से एनसीसी अकादमी को अपने गृह जनपद ले जाने के लिए मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जो आतुरता दिखाई उसने भेदभाव की राजनीति में एक नई इबारत लिख डाली है। त्रिवेंद्र सरकार श्रीदेव सुमन विश्व विद्यालय को भी डोईवाला विधानसभा क्षेत्र में स्थानांतरित करने के आदेश जारी कर चुकी है। त्रिवेंद्र से पहले भुवन चन्द्र खण्डूड़ी और रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार भी टिहरी की विकास योजनाओं को अन्यत्र स्थानांतरित कर चुकी हैं। इससे जनता में आक्रोश है। देवप्रयाग में अकादमी बचाने के लिए शुरू हुआ आंदोलन अब संपूर्ण टिहरी जिले के विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल खड़े कर रहा है

 

टिहरी जिले के लोगों का देश की आजादी में अहम योगदान रहा है। ब्रिटिश हुकूमत के समय विक्टोरिया क्राॅस विजेता गवर सिंह गढ़वाली इसी जले के थे। श्रीदेव सुमन जैसे क्रांतिकारी इसी जिले ने दिए। प्रसिद्ध संत स्वामी राम तीर्थ को टिहरी की धरती में ही ज्ञान प्राप्त हुआ था। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से संपन्न टिहरी के लोगों का राष्ट्र के विकास में भी अहम योगदान रहा। यहां तक कि जब जरूरत पड़ी तो वे टिहरी बांध परियोजना के लिए अपनी पैतृक जगहों से उजड़ गए। विकास की यहां के लोगों को भारी कीमत चुकानी पड़ी। सैकड़ों हेक्टेयर उपजाऊ भूमि, घर, जमीन, जंगल, इतिहास संस्कृतति सब कुछ लोगों ने अपनी आंखों से जलमग्न होते देखा। लेकिन विंडबना ही है कि विकास और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की दृष्टि से इस जिले के लोगों के साथ हमेशा भेदभाव होता रहा है। योग्यता और क्षमता के बावजूद यहां के लोगों को राजनीतिक दृष्टि से हाशिये पर रखा गया, जबकि विकास का हाल यह है कि गलती से कोई बड़ा संस्थान जिले में प्रस्तावित हो भी गया तो बड़े राजनेता उसे भी अपने गृह जनपद में ले जाने से नहीं चूकते।

अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय को देखें तो वर्षों तक टिहरी जिले में कोई विश्वविद्यालय नहीं बनाया जा सका। उच्च शिक्षा के नाम पर दो-चार डिग्री काॅलेज जरूर खड़े किए गए, लेकिन उनमें से कितने बच्चे देश के उच्च स्थानों पर पहुंचे यह किसी को पता नहीं है। कृषि औद्यानिकी, वानिकी विश्वविद्यालय: उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद टिहरी जिले के लिए कई बड़ी-बड़ी घोषणाएं हुई। लेकिन उन पर आज तक अमल नहीं हो पाया है। जो कार्य पूरे हुए भी हैं तो उनको धीरे-धीरे पौड़ी या अन्य जिलांे में स्थानांतरित किया जाने लगा। इसका सबसे बड़ा प्रमाण पूर्ववर्ती तिवारी सरकार के समय टिहरी रानीचैरी में कृषि औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय की स्थापना प्रदेश की पहली निर्वाचित कांग्रेस की तिवारी सरकार के समय में की गई थी।

माना जाता है कि 2002 में कांग्रेस सरकार आई तो तत्कालीन विधायक किशोर उपाध्याय के प्रयासांे के चलते मुख्यमंत्री पंडित नारायण दत्त तिवारी टिहरी में विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए तैयार हुए थे। इसका उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रांे में कृषि और बागवानी से विकास और अनुसंधान को गति देना था। हालांकि 2007 में इसे पंत नगर कृषि विश्वविद्यालय के रानीचैरी परिसर से संचालित किया गया था। तीन माह यह संचालित भी हुआ। लेकिन मार्च 2007 में सरकार परिवर्तित हुई और भाजपा सरकार वजूद में आई।


तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी ने भाजपा नेताओं के दबाब में इसे पौेड़ी के भरसार में स्थानांतरित करने का आदेश जारी करके टिहरी को तिवारी सरकार द्वारा मिली सौगात से वंचित कर दिया। तब से लेकर यह विद्यालय भरसार में ही संचालित हो रहा है। श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय: कुछ इसी तरह से श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के मामले में भी देखने को मिल रहा है। इसकी स्थापना 2010 में भाजपा की तत्कालीन निशंक सरकार द्वारा टिहरी के समीप बादशाही थौल में की गई थी। लेकिन अब इस विश्वविद्यालय को मौजूदा त्रिवेंद्र रावत सरकार देहरादून के डोईवाला विधानसभा क्षेत्र में स्थानांतरित करने का आदेश जारी कर चुकी है। हालांकि सरकार का दावा है कि श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय का डोईवाला में एक बड़ेे परिसर के तौर पर ही संचालन किया जाएगा, लेकिन उच्च शिक्षा राज्यमंत्री धनसिंह रावत ऋषिकेश के पंडित ललित मोहन राजकीय महाविद्यालय में श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय का कैंपस शुरू करने का आदेश दे दिया है। एक जिले में एक ही विश्वविद्यालय के दो-दो परिसर बनाए जाने से यह साफ है कि सरकार की मंशा श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय को टिहरी से देहरादून स्थानांतरित करने की है।

श्री देव सुमन विश्वविद्यालय प्रदेश की उच्च शिक्षा के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है। गढ़वाल विश्वविद्यालय को केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाया गया था तो प्रदेश के सैकड़ांे महाविद्यालयों की संबद्धता खतरे में आ चुकी थी। तब गढ़वाल में कोई भी राजकीय विश्वविद्यालय नहीं था, जो इन महाविद्यालयों को संबद्धता प्रदान कर सके। तत्कालीन निशंक सरकार द्वारा कुछ समय के लिए हरिद्वार के संस्कृत विश्वविद्यालय को ही प्रदेश के राजकीय महाविद्यालयों को संबद्धता देने के लिए अधिकृत किया गया था। सरकार के इस कदम का खासा विरोध भी हुआ था।

इसके बाद श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के निर्माण में तेजी दिखाई गई और बादशाही थोल में विश्वविद्यालय स्थापित हो पाया। लेकिन अब मौजूदा सरकार अपने राजनीतिक हितांे को साधने के लिए श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय को मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र डोईवाला के अंतर्गत माजरा क्षेत्र में स्थानांतरित करने का आदेश जारी कर चुकी है। यहां पर गौेर करने वाली बात यह है कि ऋषिकेश विधानसभा क्षेत्र के विधायक और विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल भी अपनेक्षेत्र में एक महाविद्यालय की मांग करते रहे हैं। चुनाव में वे जनता से ऐसा वादा भी करते रहे है। इसके चलते मुख्यमंत्री ने अपनी विधानसभा सीट डोईवाला के अखिरी छोर माजरा में श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय को
स्थपित करने का निर्णय लिया जिससे डोईवाला सहित ऋषिकेश विधानसभा क्षेत्र को एक साथ फायदा मिल सके। जबकि श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय पर्वतीय क्षेत्र टिहरी, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी के हजारों विद्याार्थियों के लिए सबसे नजदीकी विश्वविद्यालय था। अब सरकार स्वयं ही पलायन को बढ़ावा देने का काम कर रही है। गढ़वाल विश्वविद्यालय की दृष्टि से भी टिहरी जिले से भेदभाव हुआ। चैरास की बहुत ज्यादा उपजाऊ भूमि विश्वविद्यालय के काम आई, लेकिन महत्व श्रीनगर को ज्याद दिया गया। गढ़वाल विश्वविद्यालय का लगभग 80 फीसदी क्षेत्र टिहरी जिले के चैरास क्षेत्र में आता है जो सैकड़ों एकड़ में फैला है। साथ ही बादशाही थोैल में स्वामी रामतीर्थ संघटक महाविद्यालय था। अब यह केंद्रीय विद्यालय को सौंपने दिया गया है।

जानकारांे का मानना है कि प्रदेश के राजनेताओं में अपने प्रदेश के भाविष्य को समझनेे की कूवत ही नहीं रही है जिसके चलते बना बनाया विश्वविद्यालय केंद्र सरकार को सौंप दिया गया। गढ़वाल विश्वविद्यालय की विशाल परिसंपत्ति प्रदेश सरकार की थी। अब प्रदेश सरकार के हाथांे में कहीं भी इतने बड़े पैमाने पर भूमि नहीं बची है जिसमें कोई विश्वविद्यालय बनाया जा सके।

राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद-टिहरी जिले के लिए घोषित योजनाओं को अन्यत्र जिलों में स्थानांतरित करने का काम रुकने के बजाय तेजी से आगे बढ़ाया जाता रहा है। स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री कार्यकाल में नरेंद्र नगर में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद यानी एससीआरटी का मुख्यालय स्थापित किया गया था। जिसे देहरादून में स्थानांतरित किया जा चुका है। इस मामले में बड़ी ही दिलचस्प बात देखने को मिली है। सरकार और प्रशासन के अलावा राजनेताओं की घोर उदासीनता कहें या लापरवाही, यह मुख्यालय नाम के लिए ही नरेंद्र नगर से संचालित होता रहा है। 2012 के बाद तो पूरी तरह से इसको एक तरह देहरादून में ही संचालित किया जाने लगा। लेकिन कागजों में और सरकारी सूचना निर्देशनी में यह एससीआरटी का मुख्यालय नरेंद्र नगर से ही संचलित होने का दिखावा किया जाता रहा है। मौजूदा सरकार भी इस पर उदासीन बनी रही और 2019 में अब पूरी तरह से एससीआरटी का मुख्यालय देहरादून के नालापानी में राजीव गांधी नवोदय विद्यालय में स्थानांतरित हो गया है। जिसकी पुष्टि स्वयं सरकार द्वारा की जा चुकी है। हालांकि कई वर्षों तक सरकार और प्रशासन इस बात से इंकार करते रहे हैं कि एससीआरटी का मुख्यालय स्थानांतरित हुआ है। वे इस नरेंद्र नगर से ही संचालित होने की बात कहते रहे।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र के क्षेत्रवाद से पीड़ित स्थानीय लोग

एनसीसी अकादमी देवप्रयाग -कांग्रेस की हरीश रावत सरकार के समय देवप्रयाग में एनसीसी एकेडमी की स्थापना की घोषणा की गई थी। भारी राजनीतिक दबाब के बावजूद हरीश रावत सरकार द्वारा देवप्रयाग में ही एनसीसी अकादमी की स्थापना के लिए शासन को निर्देश जारी किए गए थे। मुख्यमंत्री के सीधे निर्देश देने के बाद शासन-प्रशासन हरकत में आया तथा इसके लिए भूमि के चयन की प्रक्रिया आरंभ की गई। देवप्रयाग माल्डा श्रीकोट के स्थानीय ग्रामीणांे ने अपनी व्यक्तिगत 4.111 हेक्टेयर तथा ग्राम समाज की 2.042 हेक्टेयर भूमि सरकार को एनसीसी अकादमी की स्थापना के लिए सौंपने का प्रस्ताव दिया। इस प्रस्ताव के बाद 8 जनवरी 2015 को उप महानिदेशक एनसीसी तथा संयुक्त निदेशक उत्तराखण्ड सरकार द्वारा भूमि का निरीक्षण करके आकदमी की स्थापना की प्रक्रिया आरंभ की गई।

इसके बाद 9 फरवरी 2016 को माल्डा श्रीकोट देवप्रयाग में एनसीसी अकादमी की स्थापना के लिए बजट आवंटन के लिए तत्कालीन सचिव एस राजू भारत सरकार तथा अपर मुख्यसचिव उत्तराखण्ड सरकार रणवीर सिंह द्वारा एनसीसी से पत्राचार किया गया। जिस पर 9 फरवरी 2016 को 29 करोड़ 32 लाख का बजट स्वीकृत किया गया और 50 लाख टोकन मनी भी स्वीकृत की गई।

लेकिन मार्च 2017 में प्रदेश में प्रचंड बहुमत से भाजपा की सरकार बनी और त्रिवेंद्र रावत मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुए तो अकादमी के लिए अच्छा नहीं रहा। त्रिवेंद्र सरकार द्वारा अकादमी का कार्य आरंभ नहीं किया गया। इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री इस अकादमी को अपने गृह जनपद पौड़ी ले जाए जाने के लिए शुरुआती दौर में मन बना चुके थे। जिसके चलते एनसीसी ने इसके निर्माण के लिए कोई निविदा आदि प्रक्रिया आरंभ नहीं की। सूत्रों की मानें तो सरकार पहले ही एनसीसी को देवप्रयाग में अकादमी के निर्माण पर आपत्ति जताकर इसे पौड़ी के देवार ले जाने के लिए पत्राचार आरंभ कर चुकी थी। जिस पर अब स्वयं मुख्यमंत्री द्वारा मुहर लग चुकी है। सरकार के आदेश पर अब देवप्रयाग में स्थापित होने वाली एनसीसी अकादमी को पौड़ी के देवार में स्थानांतरित करने का आदेश जारी हो चुका है।

इस पूरे प्रकरण में यह साफ तौर पर देखने को मिला है कि देवप्रयाग के स्थानीय भाजपा विधायक विनोद कंडारी अपने ही विधानसभा क्षेत्र में स्थापित होने वाली बड़ी योजना को लेकर कभी गंभीर नहीं दिखाई दिए। हालांकि बयानबाजी से पौड़ी स्थानांतरण किए जाने पर विरोध जरूर जताते रहे, लेकिन अपनी ही सरकार और खास तौर पर मुख्यमंत्री के सामने विरोध तक नहीं जता पाए।

एनसीसी अकादमी बचाओ आंदोलन के अध्यक्ष और देवप्रयाग नगर पालिका अध्यक्ष कृष्णकांत कोटियाल का कहना है कि 22 स्थानीय व्यक्तियों का शिष्टमंडल विधायक के साथ भरी बरसात में मुख्यमंत्री जी से मिलने उनके आवास पर गया, लेकिन तीन घंटों की इंतजारी के बावजूद मुख्यमंत्री जी ने मिलने का समय तक नहीं दिया। विधायक और उनके चार खास लोगों को ही मिलने की अनुमति दी। तब से विधायक इस पर चुप्पी साधे हुए हैं। जनता में कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री देवप्रयाग के लिए किसी अन्य बड़ी योजना की स्वीकृति देंगे। इससे यह तो साफ हो जाता है कि मुख्यमंत्री किस हद तक एनसीसी अकादमी को अपने गृह क्षेत्र पौड़ी स्थानांतरित करने का मन बना चुके हैं। एक माह से ज्यादा का समय आंदोलन का हो चला है। बावजूद इसके सरकार इस पर किसी भी तरह का पुनर्विचार करने से स्पष्ट तौर पर इंकार कर चुकी है। यहां तक कि कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने भी एक शिष्टमंडल के साथ इस संबंध में मुख्यमंत्री से मिलने के लिए समय मांगा, लेकिन समय देने के बावजूद मुख्यमंत्री ने उनसे मिलने पर इंकार कर दिया।

एक जिले से महज 10 वर्षों में चार बड़ी योजनाओं का अन्य स्थानों पर स्थानांतरित हो जाना अपने आप में ही बड़ा सवाल खड़े करता है। राजनीतिक तौर पर देखा जाए तो यह सभी चारों योजनाएं कांग्रेस सरकार द्वारा ही स्थापित की गई थीं, लेकिन जब-जब भाजपा की सरकारें सत्ता में आई तब तब टिहरी से एक एक कर योजनाएं अन्यत्र स्थापित की जाती रही हैं। हैरानी की बात है कि इस मामले में टिहरी जिले के जनप्रतिनिधियों की गंभीर चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।

 

राजनीतिक उपेक्षा ही टिहरी के नसीब में

एक अगस्त 1949 को तत्कालीन टिहरी रियासत का विलय भारत गणराज्य में में हुआ था। इस विलय के बाद टिहरी एक स्वतंत्र राज्य के तौर पर वजूद में आया। हालांकि यह कुछ ही समय तक रहा और बाद में इसे संयुक्त प्रांत जो कि बाद में उत्तर प्रदेश के नाम से अस्तित्व में आया उसी में मर्ज कर दिया गया। तत्कालीन भौगोलिक स्थिति के अनुसार आज का उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग जिले टिहरी के ही हिस्से थे जो कालांतर में स्वतंत्र जिले बना दिए गए। आजादी के बाद देश में पहले आम चुनाव में टिहरी लोकसभा क्षेत्र बनाया गया। देशभर के लोकसभा क्षेत्रों की संख्या में टिहरी की संख्या ‘एक’ रखी गई।

आज टिहरी को एशिया का सबसे बड़े बांध ‘टिहरी बांध’ के नाम से जाना जाता है। साथ ही आने वाले समय में टिहरी के नाम पर एक और खासियत जुड़ने वाली है और वह है डोबरा चांटी झूला पुल जो कि भारत में अपनी ही तरह का पहला पुल है। यह पुल निर्माणाधीन है ओैर माना जा रहा है कि इस वर्ष के अंत तक यह पुल जनता को समर्पित हो सकता है।

राजनीतिक तौर पर टिहरी जिले को बेहद जागा हुआ जिला कहा जाता रहा है। सामंतशाही के दौर में टिहरी जिले में राजतंत्र से मुक्ति पाने के लिए कई बड़े आंदोलन हुए। प्रजामंडल जैसे संगठनों द्वारा टिहरी रियासत के जुल्मांे के खिलाफ जनता को जागरूक करके आंदोलन किए गए हैं। इसी प्रजामंडल से निकले हुए अमर शहीद श्रीदेव सुमन द्वारा चैरासी दिनों की भूख हड़ताल देश के आंदोलनों के इतिहास में अपना अलग स्थान रखती है। 1930 में 30 मई के दिन तत्कालीन टिहरी रियासत के रवांई घाटी के तिलाड़ी मैदान में रियासत द्वारा जंगलों पर अपने परंपरागत हक-हकूकांे के लिए आंदोलन कर रहे सैकड़ों स्थानीय निवासियों पर तीन ओर से गेलियां दाग कर नरसंहार किया गया था। जिस तरह से पंजाब के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश सरकार के सैनिकों ने नरसंहार किया था उसी तरह का यह नरसंहार हुआ था। आज भी उत्तराखण्ड में इसे तिलाड़ी नरसंहार कहा जाता है। यही नहीं टिहरी जिला कई सामाजिक आंदोलनों की भी कर्मभूमि रहा है। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में टिहरी की भूमिका नकारी नहीं जा सकती है।

टिहरी जिले के प्रतापनगर और रैका पट्टी तथा आज का उत्तरकाशी जिला कभी वामपंथ की एक बड़ी कर्मभूमि रही है। कभी इस क्षेत्र को लाल घाटी कहा जाता था जो कई बामपंथी नेताओं की कर्मभूमि रही है। भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों के लिए भी टिहरी की भूमि ने खासी राजनीतिक उर्वराशक्ति दी है। इन सबके बावजूद राजनीतिक तौर पर टिहरी जिला उपेक्षा का शिकार रहा है। आज टिहरी जिले की लगभग पूरी आबादी बुनियादी सुविधाआंे की कमी से जूझ रही है। हाल ही में प्रताप नगर में स्कूली बच्चों की वाहन दुर्घटना से हुई मौत के मामले में सरकार की उदासीनता देखने को मिली है। इस दुर्घटना मंे नौ बच्चांे की मौत होने के बावजूद मुख्यमंत्री को मृतक बच्चों के परिजनों से मिलने के लिए एक सप्ताह से ज्यादा का समय लग गया। यहां तक कि घायल बच्चों को टिहरी में उपचार की सुविधा तक नहीं होने से उनको ऋषिकेश के एम्स में भर्ती कराना पड़ा, जबकि टिहरी के जिला अस्पताल को सरकार हिमालयन हाॅस्पिटल को पीपीपी मोड पर देकर टिहरी में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने का दावा कर चुकी है।

टिहरी बांध प्रभावितांे की समास्याएं आज भी जस की तस बनी हुई हैं। बांध के कारण काला पानी जैसा बन चुका प्रताप नगर सरकारी उदासीनता का सबसे बड़ा प्रमाण बनकर सामने आया है। शिक्षा के नाम पर फर्जी स्कूलांे का संचालन होना उच्च शिक्षा के नाम पर महज डिग्री काॅलेज बनाए जाने के आलावा इस क्षेत्र में रोजगार के एक भी साधन न होना यह साफ करता है कि सरकार ने प्रताप नगर और टिहरी के कई क्षेत्रों की ओर देखना जरूरी नहीं समझा। राजनीतिक तौर पर भी टिहरी जिले को उपेक्षित रखा गया है। टिहरी के महाराजा स्वर्गीय मानवेंद्र शाह आठ बार टिहरी के सांसद रहे, लेकिन उनको एक बार भी केंद्र सरकार में मंत्री नहीं बनाया गया, जबकि महाराजा कांग्रेस-भाजपा दोनों ही पार्टियों से सांसद रह चुके हंै। वर्तमान टिहरी संासद महारानी माला राजलक्ष्मी लगातार तीन बार से संासद हैं, लेकिन उनको भी केंद्र में मंत्री पद नसीब नहीं हो पाया है। विजय बहुगुणा भी दो बार सांसद रहे, लेकिन मंत्री पद उनके खाते में भी नहीं आ पाया।

 

बात अपनी-अपनी

सरकार का यह कदम बहुत ही निदंनीय है। मेरी हार्दिक इच्छा है कि पौड़ी के लिए कुछ किया जाना चाहिए, लेकिन क्या इसके लिए मुख्यमंत्री टिहरी के प्रति अन्याय करेंगे? सरकार जिस तरह से एक के बाद एक ऐसे संस्थानों को टिहरी से देहरादून ले जाने का काम कर रही है, वह गलत है। अगर सरकार को यही करना है, तो पहले वह पहाड़ांे से सभी नागरिकों को मैदान में बसा दे फिर पहाड़ों में कोई काम ही नहीं बचेगा। आज सरकार पूरी तरह से पहाड़ के एजेंडे से हाथ खींच चुकी है। इस सरकार के एजेंडे में पहाड़ का विकास है ही नहीं। मैं इसके लिए पहाड़ और खास तौर पर टिहरी के जनप्रतिनिधियों की ही उदासीनता मानता हूं। अगर जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र के विकास के लिए तत्पर नहीं रहेंगे तो सरकार भी अपने हाथ खींच लेती है। टिहरी जिले में तो भाजपा के ही विधायक हंै उनको जवाब देना चाहिए कि उनकी पार्टी की सरकार उनके जिले के साथ इस तरह का व्यवहार क्यों कर रही है।

हरीश रावत, पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड

सरकार का यह कदम बहुत ही गलत है। जनता इसके विरोध में आंदोलन कर रही है। हम इसको कोर्ट में चुनौती देने वाले हंै। सरकार इस तरह से कोई संस्थान जिसके निर्माण की प्रक्रिया पूरी कर दी गई हो किसी अन्य स्थान पर केवल इसलिए नहीं ले जा सकती कि वह मुख्यमंत्री का गृह क्षेत्र है। मैं इसके लिए टिहरी के नेताओं को ही जिम्मेदार मानता हूं। स्थानीय विधायक इस पर चुप हैं। हो सकता है कि मुख्यमंत्री जी ने उनकी बात ही नहीं सुनी हो या फिर उनका भी कुछ हित साधा हो। लेकिन मैं इतना कह सकता हूं कि सरकार एनसीसी एकेडमी को कहीं और नहीं ले जा सकेगी। हम ऐसा होने ही नहीं देंगे।

दिवाकर भट्ट, अध्यक्ष उक्रांद एवं पूर्व विधायक देवप्रयाग

मैं इस मामले में मुख्यमंत्री जी से मिला हूं। मेरे साथ पूर्व विधायक नैथानी जी और किशोर उपाध्याय भी गए थे। आप उनसे पूछिए कि उनके सामने मुख्यमंत्री जी ने क्या कहा था। बैठक में मुख्यमंत्री जी ने हमको कहा कि आप मुझे एनसीसी एकेडमी का जीओ दिखा दंे तो मैं इसे शिफ्ट नहीं करूंगा। पूर्व सरकार ने इसका जीओ तक जारी नहीं किया है। हमने शासन में बहुत ढूंढ़ा, लेकिन कहीं भी इसका जीओ नहीं मिला है। अब आप ही बताइए कहीं बगैर शासनादेश के कोई संस्थान खड़ा किया जा सकता है। लेकिन क्षेत्रीय जनता के विरोध को देखते हुए माननीय मुख्यमंत्री जी ने हमको कहा है कि वे देवप्रयाग में कोई अन्य बड़ा संस्थान देंगे। मुझ पर जो आरोप लगा रहे हैं वे सब राजनीति से प्रेरित हैं।

विनोद कंडारी, विधायक देवप्रयाग

पूरे देश में केवल पांच राज्यों में एनसीसी एकेडमी की स्थापना होनी थी जिसमें पांचवा राज्य उत्तराखण्ड को लिया गया है। यह भारत सरकार की योजना है। हमने 5 दिसंबर 2016 को इसका शिलान्यास मुख्यमंत्री जी के हाथों कराया था। इसमें एनसीसी के अधिकारी और सभी उच्चाधिकारी भी शामिल थे। एनसीसी ने इसके लिए कुल 29 करोड़ 32 लाख का बजट स्वीकृत किया जिसमें 22 करोड़ प्रदेश सरकार ने अपनी तरफ से रखा जो कि प्रदेश सरकार द्वारा किश्तों में दिए जाना तय किया गया। अब सरकार ने पौड़ी की कैबिनेट बैठक में निर्णय ले लिया कि एनसीसी एकेडमी पौड़ी शिफ्ट की जाएगी। एक तरफ सरकार कहती है कि एकेडमी के लिए कोई जीओ जारी नहीं हुआ है और दूसरी तरफ इसे पौड़ी शिफ्ट किया जाएगा। देवप्रयाग के विधायक को इतनी भी समझ नहीं है कि उसे क्या बात कहनी है तो अपने मुख्यमंत्री से कोई विरोध भी नहीं कर पा रहा है। जनता का इतना भारी विरोध हो रहा है फिर भी विधायक चुप्पी साधे हुए हैं। हम एनसीसी एकेडमी को किसी सूरत में देवप्रयाग से पौड़ी या कहीं और शिफ्ट नहीं होने देंगे।

मंत्री प्रसाद नैथानी, पूर्व विधायक देवप्रयाग

मैं इसके लिए हमेशा से लड़ता रहा हूं, पर किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। टिहरी बांध विस्थापितों के लिए मैंने अपनी ही सरकार से सवाल किए तो मुझे मंत्री पद से हटा दिया गया। वानिकी विश्वविद्यालय मैं तिवारी जी से लड़कर टिहरी में लाया था जिसे भाजपा की सरकार ने पौड़ी स्थानांतरित कर दिया। जिस पर मैं धरने पर भी बैठा, लेकिन मेरा साथ कांग्रेस के विधायकों तक ने नहीं दिया। प्रदेश सरकार हो या केंद्र सरकार किसी के एजेंडे पर टिहरी जिला कभी भी नहीं रहा है। आज तक यहां से कोई सांसद केंद्र में मंत्री नहीं बनाया गया है। प्रदेश में अगर मंत्री बने हंै तो टिहरी को उपेक्षित किया गया है। इसके लिए मैं सरकार को दोष कैसे दे सकता हू? सरकार तो चहती ही नहीं है टिहरी का कोई विकास हो पाए इसलिए सरकार पर क्यों सवाल खड़े करें? सवाल तो टिहरी के जनप्रतिनिधियों पर खड़ा हो रहा है जिनके आपसी मतभेदांे के चलते जनता परेशान है। एनसीसी अकादमी को मुख्यमंत्री तभी पौड़ी ले जाने में सफल हो रहे हंै कि जब जिले के विधायक चुप हंै।

किशोर उपाध्याय, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कांग्रेस

वानिकी विश्वविद्यालय टिहरी में ही चल रहा है। भरसार में केवल उद्यान विभाग शिफ्ट हुआ है। श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय का हेड क्वार्टर टिहरी में ही है और रहेगा। अन्य स्थानों पर केवल कैंपस बनाए जा रहे हंै। टिहरी के विकास के लिए में अपनी सरकार और मुख्यमंत्री जी के काम से पूरी तरह से संतुष्ट हूं। टिहरी की कहीं कोई उपेक्षा नहीं हो रही है।

धन सिंह नेगी, विधायक टिहरी

देवप्रयाग क्षेत्र के विधायक मुख्यमंत्री से विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हंै। अब हमारा एक ही उद्देश्य है कि हम देवप्रयाग से अकादमी को कहीं और नहीं ले जाने देंगे। चाहे इसके लिए हमें कुछ भी करना पड़े। हम इसके लिए महापंचायत कर रहे हैं जिसमें जिले के सभी जनप्रतिनिधि शामिल होंगे।

कृष्णकांत कोटियाल, अध्यक्ष एनसीसी अकादमी बचाओ समिति

हमारा आंदेालन तक तक नहीं रुकेगा जब तक सरकार अपना आदेश वापस नहीं लेती। हमलोगों ने अपनी जमीनें अकादमी को दान में दी हैं। पूर्व सरकार ने इसके लिए बजट भी स्वीकृत करवा दिया था। अब मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत इसे अपने घर पौड़ी ले जा रहे हैं। उनको अपने घर में योजना चाहिए तो नई योजना लाएं।
जयपाल सिंह पंवार, संयोजक एनसीसी अकादमी बचाओ समिति

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