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Uttarakhand

विज्ञापनों के जरिए कोरोना पर लगाम लगाने का प्रयास कर रही त्रिवेंद्र सरकार

देहरादून। उत्तराखण्ड की त्रिवेंद्र रावत सरकार कुछ खास दैनिक समाचार पत्रों में नियमित फुलपेज के विज्ञापन देकर कोरोना पर लगाम लगाने का प्रयास कर रही है। विज्ञापनों में सरकार जनता को सावधानियां बरतने की बात करते हुए कोरोना से किस तरह से लड़ रही है, इसका जमकर उल्लेख किया जा रहा है। लेकिन हालात तब भी नहीं सुधर पा रहे हैं। आज कोरोना के मामले 40 हजार से भी ज्यादा हो चुके हैं और 491 लोगों की मौत हो चुकी है। शासन-प्रशासन के अलावा राजनीति में भी कोरोना ने अपना डंक इस कदर मारा है कि आधा दर्जन से भी अधिक विधायक इसकी चपेट में आ चुके हैं। स्वयं विधानसभा अध्यक्ष प्रेमचंद अग्रवाल के अलावा नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदेश भी कोराना पॉजिटिव होकर उपचार करवा रही हैं।

सरकार के कोरोना महामारी से निपटने के तमाम दावों की पोल नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश के मामले में सामने आ गई। हल्द्वानी के सबसे बड़े मेडिकल कॉलेज और कोविड अस्पताल सुशीला तिवारी हॉस्पिटल में नेता प्रतिपक्ष को सुविधाएं तक नसीब नहीं हो पाई जिसके चलते उनको देहरादून के निजी मैक्स हॉस्पिटल में भर्ती करवाना पड़ा।

मैक्स हॉस्पिटल के हालात इस कदर हैं कि स्वयं मुख्यमंत्री के फोन के बावजूद अस्पताल प्रशासन नेता प्रतिपक्ष को एक अलग कमरा तक मुहैया नहीं करवा पाया। बकौल नेता प्रतिपक्ष मैक्स अस्पताल के प्रशासन और कर्मचारियों का व्यवहार भी सही नहीं था। आखिरकार नेता प्रतिपक्ष को गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में ले जाना पड़ा, जहां वे कोविड का उपचार करवा रही हैं, जबकि मुख्यमंत्री और उनकी सरकार कोरोना से लड़ने के लिए राज्य में सबसे बेहतर सुविधा देने का दावा कर रही है। लेकिन कुमाऊं के सबसे बड़े अस्पताल सुशीला तिवारी मेडिकल कॉलेज के हालात इस कदर हैं कि नेता प्रतिपक्ष तक को सुविधाएं मुहैया नहीं करवा पाया। इससे यह तो साफ हो गया कि प्रदेश में कोरोना से निपटने के दावे धरातल पर उतने खरे नहीं उतरे हैं जितने कि सरकार विज्ञापनों में प्रचारित कर रही है।

यही नहीं देहरादून के सबसे बड़े कोविड अस्पताल दून के भी हालात कुछ इस तरह के बन चुके हैं। आप कोरोना संक्रमण के भारी दबाव के चलते दून अस्पताल में आईसीयू के बेड तक फुल हो चुके हैं। यही नहीं देहरादून के तमाम निजी अस्पतालों के भी आईसीयू बेड फुल हो चुके हैं जिसके चलते मरीजों को यहां से वहां भटकने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

राज्य का स्वास्थ्य विभाग भी कोरोना के बढ़ते दबाव के चलते लाचार ही नजर आ रहा है। कोरोना की जांच के लिए प्राइवेट लैबों में कोरोना के नाम पर जमकर लूट-खसोट के मामले तो पहले ही तेजी से सामने आ रहे थे। लेकिन अब तो जांच रिपोर्ट पर ही गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। सरकारी जांच रिपोर्ट में एक आदमी की रिपोर्ट निगेटिव आ रही है, जबकि प्राइवेट जांच केंद्र में उसी व्यक्ति की जांच पॉजिटिव आ रही है। प्राइवेट जांच लैबों में कोरोना के दस फीसदी ज्यादा मामले आए हैं। स्वयं मुख्यसचिव ने इस मामले में कड़ी कार्यवाही करने का आदेश तक जारी किया है ओैर 7 प्राइवेट जांच लैबों को कोरोना जांच करने की अनुमति निरस्त कर दी गई है।

हैरानी की बात यह है कि प्राइवेट जांच केंद्रों के मामले में पूर्व से ही तमाम तरह की अनियमितता के मामले सामने आ रहे थे। लेकिन स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और प्रशासन चुप्पी साधे बैठा रहा। जब जांच के लिए तय धनराशि निश्चित कर दी गई तो नया खेल रचा जाने लगा और मारीजों को कोरोना पॉजिटिव बनाया जाने लगा। अब जाकर सरकार की नींद खुली और कार्यवाही करने की बात कही जा रही है।

 

आज प्रदेश में कोरोना संक्रमण का आंकड़ा 40963 तक पहुंच चुका है जिसमें अभी तक इससे मरने वालों की तादात 491 तक हो चुकी है। 20 सितंबर को जारी हेल्थ बुलेटिन के अनुसार राज्य में 12455 कोरोना के एक्टिव मरीज हैं। इससे ठीक होने वाले मरीजों की कुल तादात 27828 है। राजधानी देहरादून के हालात तो सबसे ज्यादा खराब हो चुके हैं। केवल देहरादून जिले में 20 सितंबर तक 4227 कोरोना के एक्टिव केस चल रहे हैं और अभी तक 239 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि देहरादून जिला राजनीतिक और प्रशासनिक तौर पर सबसे आगे है। सरकार और शासन का मुख्यालय देहरादून में होने के बावजूद कोरोना से जिले के हालात बद से बदतर हो रहे हैं।

इन सबके बावजूद सरकार कोरोना से निपटने के बड़े-बड़े दावे कर रही है। मजेदार बात यह है कि इन दावों को समाचार चैनलों और अखबारों में विज्ञापनों के जरिए जमकर प्रचार कर रही है। तीन माह पूर्व मुख्यमंत्री ने कोरोना को हल्के में लेते हुए बयान जारी किया था कि उत्तराखण्ड में कोरोना 25 हजार तक भी पहुंच सकता है लेकिन अब 40 हजार से भी ज्यादा कोरोना के मामले हो चुके हैं। इसके बावजूद राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं के हालात इस कदर बने हुए हैं कि नेता प्रतिपक्ष को भी समुचित सुविधाएं सरकारी अस्पतालों या निजी अस्पतालों में नहीं मिल पा रही हैं। पर्वतीय क्षेत्रों के हालात का इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।

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