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Uttarakhand

रोजगार देने में पूरी तरह नाकाम रही त्रिवेंद्र सरकार

उत्तराखण्ड की त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार सवा तीन साल के कार्यकाल में अपने दावों पर खरा नहीं उतर पाई है। इस सरकार ने समय-समय पर सैकड़ों भर्तियां निकाले जाने की घोषणाएं जमकर की हैं। हालात ये हैं कि वर्ष 2016 के बाद अभी तक राज्य में एक बार भी पीसीएस की परीक्षा नहीं हो पाई है। जिन सैकड़ों पदों पर सीधी भर्ती किए जाने की घोषणाएं की गई थी, उनकी भर्ती प्रक्रिया भी शासन और विभागों में ही फंसी हुई है। हैरत की बात यह है कि कई ऐसी भर्तियों की भी घोषणाएं और विज्ञापन जारी कर दिए गए हैं जो पद रिक्त ही नहीं हैं।

प्रदेश में हर स्तर पर रोजगार के साधनों में कमी आती रही है। रोजगार का सबसे बड़ा माध्यम स्वरोजगार जिस पर केंद्र और राज्य सरकार का सबसे ज्यादा फोकस रहा है, में भी बड़ी तादात में कमी देखने को मिली है। खेती-किसानी के अलावा अन्य स्वरोजगार के मामलों में भी कई फीसदी की कमी देखने को मिली है जिसको राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय और ह्यूमन डेवलपमेंट ने अपनी-अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने अपनी यह रिपोर्ट उत्तराखण्ड के 96 ब्लॉक के 750 परिवारां के सर्वे द्वारा अलग-अलग समय पर तैयार की है। प्रदेश में बेरोजगारी के हालात किस कदर है इसका कई एजेंसियों की रिपोर्ट से साफ पता चलता है। मार्च 2019 के एनएसओ की रिपोर्ट से शिक्षित बेरोजगार युवाओं की संख्या में 14.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी। अब कोरोना संकट के दौरान प्रवासी उत्तराखण्डी बड़ी संख्या में वापस आए हैं इससे बेरोजगारों की संख्या के आंकड़ों में और भी इजाफा हुआ है।

इसके अलावा ह्यूमन डेवलपमेंट की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2012-17 के बीच स्वरोजगार करने वालों की संख्या में भी 12 फीसदी की कमी देखी गई है। इसके अनुसार वर्ष 2012 में 69 प्रतिशत लोग स्वरोजगार कर रहे थे जो 2017 में घट कर 56.96 तक रहा गया। हालांकि रिपोर्ट में सुखद बात यह है कि दैनिक वेतनभोगी रोजगार 6 प्रतिशत बढ़ा है तथा नियमित रोजगार भी 7 प्रतिशत बढ़ा है। इस रिपोर्ट में एक बात और सामने आई है जिसको प्रदेश में हमेशा से कहा जाता रहा है कि अनियोजित विकास जो कुछ ही जिलों में सिमट कर रह गया है। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश की आिर्र्थक तरक्की केवल तीन मैदानी जिलों तक ही सिमट कर रह गई है। जिसके चलते प्रदेश के अन्य जिलों में बेरोजगारी बढ़ी है।

प्रदेश सरकार के खेती को बढ़ावा देने और खेती-किसानी को रोजगार से जोड़ने के दावों पर भी सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं। सरकार के तमाम दावां के विपरीत आज भी प्रदेश में खेती- किसानी से रोजगार नहीं मिल पा रहा है जिसका दावा सरकार करती रही है। आज हालात यह है कि प्रदेश में कृषि एक जोखिम का कार्य से ऊपर नहीं उठ पाई है।

सेंटर फॉर मॉनीटिरिंग इंडियन इकोनॉमी सीएमआईई की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 में बेरोजगारी की रफ्तार 7.5 प्रतिशत थी जो कि राष्ट्रीय औसत 7.4 से अधिक था। अन्य प्रदेशों उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और केरल में बेरोजगारी कम हुई है। लेकिन उत्तराखण्ड में बढ़ी है। खेती के नाम पर सरकार द्वारा तमाम दावे करने के बावजूद रिपोर्ट कहती है कि प्रदेश में खेती-किसानी से रोजगार पाने में उत्तराखण्ड हिमाचल से बहुत कम है। यानी हिमाचल प्रदेश ने जितनी तरक्की खेती-किसानी में की है उत्तराखण्ड इन बीस वर्षों में भी हिमाचल के करीब नहीं पहुंच पाया है। इससे साफ है कि प्रदेश में खेती-किसानी के लिए सरकार केवल दावों और योजनाओं की घोषणाओं तक ही सीमित ही रही है।

अगर योजनाओं की बात करें तो उत्तराखण्ड में खेती-किसानी से जुड़ी योजनाओं का सही क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है जैसे कि फसल बीमा योजना। प्रदेश में फसल बीमा योजना किसानों के लिए लाभदायक नहीं हो पा रही है। उत्तरकाशी ओैर ऊधमसिंह नगर में मात्र 6 प्रतिशत खेती ही बीमा के दायरे में आ पाई है। जबकि राज्य सरकार द्वारा बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हैं कि प्रदेश के सभी किसानों को फसल बीमा से जोड़ने के लिए सरकार भरपूर काम कर रही है।

सरकार रोजगार के लिए मनरेगा को बड़ा पैमाना मानती रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा से रोजगार देने के दावे सरकार करती रही है, जबकि मनरेगा के हालात भी वैसे ही बने हुए हैं जैसे अन्य रोजगार देने वाली योजनाओं के हालात हैं। हैरत की बात यह है कि विगत तीन माह में प्रदेश सरकार ने बेरोजगारों को मनरेगा से जोड़ने के बड़े-बड़े दावे जमकर किए जबकि हकीकत में मनरेगा भी रोजगार देने में विफल रही है।

मनरेगा में 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देने के बावजूद महज 32 दिनां का ही रोजगार दिया जा सका है। जबकि प्रदेश में मनरेगा के तहत 11 लाख 26 हजार जॉब कार्ड धारक हैं। पिछले वित्तीय वर्ष की बात करें तो मनरेगा में 22 हजार लोगों को ही 100 दिनों का रोजगार मिल पाया है। यह हाल तब है कि जब उत्तराखण्ड में श्रमिकों की संख्या 18 लाख 50 हजार है जिसमें एक्टिव कार्ड धारक 7 लाख 13 हजार ही हैं।

इस सबके बावजूद उत्तराखण्ड सरकार ने मनरेगा में सौ दिनों के रोजगार को बढ़ाकर दो सौ दिनों का करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा है। जिसमें खेती-किसानी तथा मछली पालन को भी मनरेगा के कामों से जोड़ने का आग्रह केंद्र सरकार से किया गया है। कोरोना संकट के चलते प्रदेश में महिला स्वयं सहायता समूह के भी जॉब कार्ड बनाए जा रहे हैं। प्रवासियों को भी जॉब कार्ड बनाने के लिए सरकार काम कर रही है। जिससे यह साफ हो जाएगा कि कुल कितने लोग मनरेगा से रोजगार की मांग करते हैं।

वैसे मनरेगा के तहत अगर सौ दिनों का रोजगार नहीं मिल पा रहा है तो जितने दिन का रोजगार मिला है उसे काटकर शेष दिनों का बेरोजगारी भत्ता दिए जाने का भी प्रवाधान है, लेकिन राज्य में अभी तक बेरोजगारी भत्ता नहीं मिल पाया है। जब राज्य में सौ दिनों का ही रोजगार नहीं मिल पा रहा है तो सरकार किस आधार पर मनरेगा में दो सौ दिनों का रोजगार देने की बात कर रही है यह समझ से परे है।

इस सब में सबसे बड़ी बात यह है कि एक ओर प्रदेश सरकार महिला स्वयं सहायता समूहों को जॉब कार्ड बनाकर उनको जोड़ने की बात कर रही है, लेकिन इन्हीं महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा पूर्ववर्ती हरीश रावत सरकार में इंदिरा अम्मा भोजनालयों को एक के बाद एक बंद करती जा रही है। इसका बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि राज्य सरकार द्वारा इन भोजनालयों में दस रुपए प्रति थाली अनुदान दिया जाता रहा है जो लंबे समय से दिया ही नहीं गया है। इसके चलते अब कई जगहों पर चल रहे इंदिरा अम्मा भोजनालय बंद हो रहे हैं या बंद होने की कगार पर हैं, जबकि यह योजना महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए बहुत बड़ी सौगात के तौर पर रही है और इसे बढ़ाए जाने की भी बात पूर्ववर्ती सरकार के समय में हो रही थी।

प्रदेश सरकार द्वारा सवा तीन सालां तक बेरोजगारों के साथ छल ही किया गया है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र्र सिंह रावत द्वारा 2020 को रोजगार वर्ष के तौर पर प्रचारित किया गया है। लेकिन सरकार द्वारा बेरोजगारों के लिए घोषणाओं के अलावा कुछ न करने पर बेरोजगार संघ ने सरकार के खिलाफ सोशल मीडिया में एक बड़ा अभियान छेड़ दिया है। फेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सएप पर तकरीबन दो लाख युवाओं ने इस अभियान में हिस्सा लिया, जिसमें लंबे समय से रुकी हुई भर्तियों और भर्तियों के विज्ञापनों का प्रकाशन किया है, उनकी तुरंत भर्ती प्रक्रिया आरंभ न करने के अलावा प्रदेश पीसीएस परीक्षा न करवाए जाने को लेकर खासी नाराजगी जताई गई है।

इस अभियान को जिस तरह से युवाओं ने हाथों-हाथ लिया उससे इतना तो साफ हो गया है कि सरकार के खिलाफ युवाओं में भारी आक्रोश है जिसका असर सोशल मीडिया में देखने को मिला। बेरोजगार युवाओं ने सरकार और खास तौर पर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र्र रावत के खिलाफ जमकर भड़ास निकाली है। मुख्यमंत्री ने तीन सालों के कार्यकाल में सिर्फ अखबारों में ही भर्तियां निकाली और विज्ञापन से भर्तियां करवाने वाली सरकार कहकर तंज कसे गए।

बेरोजगारों ने इस अभियान में जो आरोप सरकार पर लगाए हैं वह कुछ हद तक सही भी सबित होते दिखाई दे रहे हैं। सरकार किस तरह से बेरोजगारों के साथ छलावा कर रही है इसका बड़ा प्रमाण वन दारोगा भर्ती पदों को देखकर ही समझ में आ जाता है। प्रदेश में बगैर पदों के सृजन किए हुए ही वन दारोगा के 316 पदों परा भर्ती के आदेश जारी कर दिए गए। बकायदा इसका विज्ञापन तक जारी किया गया। इसी तरह से मुख्यमंत्री द्वारा पुलिस विभाग में 17 सौ कॉन्स्टेबल पदों पर भर्ती करने की घोषणा की गई जबकि आरटीआई से ज्ञात हुआ हो चुका है कि पुलिस विभाग में कॉन्स्टेबल का कोई भी पद रिक्त नहीं है। लंबे समय बाद फॉरेस्ट गार्ड भर्ती की परीक्षा का आयोजन किया तो गया लेकिन इसमें भी भ्रष्टाचार और नकल का घुन लगा गया। जिसकी जांच अभी तक सामने नहीं आ पाई है। 900 पदों पर नर्सों की भर्ती की घोषणा की गई लेकिन भर्ती की प्रक्रिया अभी तक आरंभ नहीं हो पाई है।

एक जानकारी के अनुसार प्रदेश में पंजीकृत बेरोजगारों की संख्या 9 लाख के करीब है। अब प्रवासियों की वापसी से इसमें और भी इजाफा होना तय माना जा रहा है जिसके चलते बरोगजारों की संख्या बढ़ना निश्चित है जो सरकार के लिए और बड़ी चुनौती का सबब बन गया है।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र्र रावत द्वारा अपने फेसबुक एकाउंट में प्रदेश के युवाओं से जुड़ने के लिए एक कैम्पेन चलाया गया जिसमें उन्होंने सीधे बातचीत की, लेकिन इसमें भी अधिकतर युवाओं ने सरकार पर तंज कसे और फॉरेस्ट गार्ड भर्ती के अलावा सरकार की घोषणाओं पर जमकर घेरा गया। मुख्यमंत्री को कई सवालों से असहज होना पड़ा और जिसके बाद फेसबुक एकाउंट से इस कार्यक्रम का वीडियो ही हटा दिया गया।

इससे यह तो साफ हो गया है कि राज्य में बेरोजगारों की पीड़ा से सरकार अनभिज्ञ नहीं है। बेरोजगारों की संख्या में इजाफा होना और सरकार की रोजगार से जोड़ने के दावों का क्रियान्वयन सही तरीके से नहीं होना भी एक बड़ा कारण है। आने वाले समय में बेरोजगारी का यह बड़ा दंश प्रदेश की राजनीति में क्या प्रभाव छोड़ेगा यह तो आने वाला कल ही बताएगा। लेकिन कम से कम मुख्यमंत्री को तो इसका एक छोटा-सा प्रभाव देखने को मिल ही चुका है कि उनके फेसबुक एकाउंट के कार्यक्रम में उनकी ही सरकार की नीतियों पर युवा सीधे आईना दिखा चुके हैं।

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