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Uttarakhand

बदहाली की कगार पर तिखौनकोट किला

संरक्षण के अभाव में अब यह किला खंडहर में तब्दील हो चुका है। साहसिक पर्यटन के शौकीनों के चलते यह जगह कभी-कभी गुलजार जरूर रहती है। यहां लोग रॉक क्लाइंबिंग के लिए आते हैं। यह किला तब अभेद्य माना जाता था। लोककथाओं के अनुसार जब कत्यूरी राजा कमजोर पड़ने लगे और चंद अपनी राजधानी अल्मोड़ा ले आए तो उन्हें तिखौनकोट की ख्याति का पता चला। कालांतर में चंद वंशी राजाओं का प्रभुत्व बढ़ता गया। तब यह समूचा किला कत्यूर एवं चंद राजाओं के बीच बड़ा युद्ध क्षेत्र बन गया

कुमाऊं के शासक रहे कत्यूरी राजाओं का तिखौनकोट किला संरक्षण के अभाव में अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। साहसिक पर्यटन के शौकीनों के चलते यह जगह कभी-कभी गुलजार जरूर रहती है। यहां लोग रॉक क्लाइंबिंग के लिए आते हैं। लेकिन इसकी असल पहचान कुमाऊं के सबसे बड़े युद्ध क्षेत्र के रूप में रही है। कत्यूरी राजाओं के समय यह अभेद्य किला रहा। किसी समय इस क्षेत्र का राजा तिखैनी था। तिखौनकोट की ऊंची चोटी पर उसका किला था। बाद में यह किला इसी राजा के नाम पर ‘तिखोनकोट’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। पहले यह कत्यूरियों का मांडलिक राजा था। बाद में चंद राज्य के साथ लड़ाई में मारा गया। पहले जब चंदों की फौज यहां पर लड़ने आयी तो तिखैनी की सेना से पार नहीं पा पाई, उसे वापस लौटना पड़ा था। बाद में पणकोट गांव के चिल्वाल लोगों ने चंदों की आज्ञा लेकर पहरी राजा से युद्ध किया। पहरी की फौज का पानी बंद कर उसकी सेना को पस्त किया। इस युद्ध में तिखैन राजा मारा गया और यह दुर्ग चंद राजाओं के अधिकार में आ गया। आज भी यहां 700 मीटर ऊंचाई पर कोट की माई यानी हनुमान मंदिर विद्यमान है। यह दुर्ग रानीखेत तहसील के मजखाली के तिखौनपट्टी क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यह ऊंचे टीले पर निर्मित है। बताते हैं कि इस किले के दक्षिण दिशा में एक सुरंग थी जो अब बंद हो चुकी हैं। बताते हैं कि इसी सुरंग से राजा तक गोपनीय सूचनाएं पहुंचाई जाती थी। अब इस कोट में पहुंचने के लिए एक ही आम रास्ता है।

इस दुर्ग में विशाल चट्टानें हैं। इन्हीं चट्टानों के बीच किसी समय कत्यूरी राजाओं की अदालत लगा करती थी। इस जगह पर अब हनुमान मंदिर स्थित है। यहां कभी मांडलिक राजाओं का शासन रहा। तिखौन, स्यूनरा, बिसौत, महरुड़ी, बौरारो, कैंडारो, कालीगाड़, रियूनी, अठागुंली, द्वारसों, खासपरजा तथा उच्यूर यानी यहां पर 12 मंडल थे। ये मांडलिक राजा कर वसूली, सैन्य ताकत बढ़ाने, रियासत की सीमाओं की निगरानी करने का काम करते थे। महाराजा तक गुप्त संदेश भेजने के लिए सुरंग का उपयोग करते थे। यहां के किले, भवनों के खंडहर, नौला, भूमिगत जल प्रबधंन कत्यूरकालीन साम्राज्य के वैभव की कहानी कहते हैं। इतिहासकारों का कहना है कि प्रकृति द्वारा प्रदत्त सुरक्षित पहाड़ियां तत्कालीन राजाओं के सैन्य संगठन चलाने के केंद्र बने। जिन्हें ‘कोट’ यानी दुर्ग का नाम दिया गया। ये ऐसे अभेद्य किले हैं जहां तक पहुंचना असंभव है। लेकिन सेना को यहां तक पहुंचने के लिए चट्टानों को तराशा गया ताकि सेना यहां चढ़ व उतर सके। कुमाऊं में कत्यूरकाल के अभ्युदय के साथ ही सैन्य परंपरा एवं युद्ध तकनीक पर आधारित ‘कोट’ अस्तित्व में आ चुके थे। सैन्य संगठन को सुरक्षा देने वाले कोट यानी प्राकृतिक किलों का इस्तेमाल बाद में चंद राजाओं ने भी किया। अल्मोड़ा से 38 किमी दूर तिखौनकोट या तिखौन किला भी कत्यूरकालीन समृद्ध इतिहास, जल संस्कृति, दुर्ग निर्माण की अद्भुत कला को संजोए हुए है। हालांकि अब यह धरोहर संरक्षण के अभाव में खंडहर में तब्दील हो चुकी है।

कहते हैं कि कुमाऊं में तिखौनकोट सबसे बड़ा युद्ध क्षेत्र रहा। कत्यूर वंश के मांडलिक तिखैन राजा को तिखौन कोट का जिम्मा दिया गया। यह किला तब अभेद्य माना जाता था। लोककथा के अनुसार जब कत्यूरी राजा कमजोर पड़ने लगे और चंद अपनी राजधानी अल्मोड़ा ले आए तो उन्हें तिखौनकोट की ख्याति का पता चला। कालांतर में चद वंशी राजाओं का प्रभुत्व बढ़ता गया। तब यह समूचा किला कत्यूर एवं चंद राजाओं के बीच बड़ा युद्ध क्षेत्र बन गया। जब चंद राजाओं ने यहां पहला आक्रमण किया तो वह इस पहाड़ी का रास्ता नहीं तलाश सकी। दूसरे हमले में व गुप्त मार्ग ढूंढने में सफल रही और उन्होंने तिखैन को मार डाला तब से तिखौन कोट चंद वंश के अधीन हो गया। तिखोन किले में पहुंचने के लिए रानीखेत रोड पर मजखाली, फिर सोमेश्वर रोड पर कोरीछीना से पहुंचा जा सकता है। इस कोट तक पहुंचने के लिए एक किलोमीटर पैदल दूरी तय करनी पड़ती है।

कत्यूरी राजाओं ने शासन व्यवस्था दुरुस्त रखने के लिए जीते गए राज्यों के राजाओं को अपना मांडलिक घोषित किया। इन क्षेत्रों से आए धनधन्य से कत्यूर राजाओं ने जल, कृषि एवं पथ व्यवस्था में सुधार किया। इस किले में मजबूत दीवार बनाई गई तो सुरंग भी तैयार की गई। यहां पर बने सुराग गोले बारुद दागने के काम आते थे। कत्यूरकाल में ऊंची पहाड़ियों पर बने किलों के अवशेष, चट्टानों पर रखी नींव, चहारदीवारी के पत्थर यह सभी उनकी सैन्य शक्ति, युद्धक कौशल व समृद्ध इतिहास के साथ ही उनकी युद्ध तकनीक की कौशलता को भी प्रदर्शित करते हैं।

इस ऐतिहासिक किले के अलावा भी कई ऐसी ऐतिहासिक धरोहरें हैं जो उपेक्षित चल रही हैं जिनका संरक्षण नहीं हो पाया है। दरअसल, हम ऐतिहासिक विरासतों को संभालने के मामले में काफी पीछे हैं। इतिहास हमें बताता है कि अतीत में क्या कुछ हुआ? यह हमें सबक भी देता है। ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण इस तरह से किया जाय कि वह पर्यटन से जुड़ जाए।
डॉ. चंदन सिंह, इतिहासकार

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