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Uttarakhand

चुफाल की राह में कांटे ही कांटे

धामी सरकार में मंत्री बिशन सिंह चुफाल डीडीहाट विधानसभा सीट से सीटिंग विधायक हैं। हर बार इस सीट पर टक्कर कांटे की होती रही है लेकिन बाजी अंत में चुफाल मार ले जाते हैं। इस बार शायद ऐसा न हो। कारण है जन सामान्य की अपने विधायक से विकास कार्यों के न होने के चलते नाराजगी, भाजपा सरकार का डीडीहाट को जिला न बनाना और पार्टी के दमदार नेता किशन भंडारी का एक बार फिर बगावत की राह पकड़ना। भंडारी के निर्दलीय चुनाव लड़ने की स्थिति में कांग्रेस को लाभ मिलना तय है। हालांकि अभी चुनाव कुछ माह दूर है और मुख्यमंत्री धामी का पैतृक गांव इसी विधानसभा का हिस्सा है। ऐसे में यदि धामी यहां के लिए कुछ करते हैं तो चुफाल की राह में चौतरफा बिछे कांटे कुछ कम हो सकते हैं

डांडी एवं हाट से जुड़कर बने डीडीहाट में इन दिनों अलग जिले की मांग को लेकर आंदोलन चल रहा है। इसके समर्थन में पूर्व सैनिक, ग्राम प्रधान, व्यापारी, टैक्सी यूनियन यानी हर तबका आगे आना शुरू हो गया है। जिले को लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है। जिला न बनने को लेकर कांग्रेस को कटघरे में खड़ी करने वाली भाजपा के समक्ष अब असमंजस की स्थिति है। स्थानीय विधायक बिशन सिंह चुफाल के लिए इस मुद्दे को सुलझाना टेड़ी खीर साबित हो रहा है। भाजपा सरकार पर आरोप है कि वह जिला बनाने को लेकर गंभीर नहीं हैं, इस पर जनता को लगातार छला जा रहा है। चुनावी वर्ष में जिले की मांग कम से कम भाजपा-कांग्र्रेस पर भारी पड़ने वाली है। जिले की यह मांग कोई पुरानी नहीं है। वर्ष 1962 से जिला बनाने को लेकर यहां के वाशिंदे संघर्ष करते आ रहे हैं। वर्ष 1994 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने दीक्षित आयोग का गठन किया था, जिसे देखना था कि क्या डीडीहाट जिला बनाने के मानकों में खरा उतरता है? बाद मे इस आयोग ने इसे जिला बनाने की संस्तुति दी थी। 8 दिसंबर 2011 को भाजपा सरकार में जिला बनाने का शासनादेश तो जारी हुआ लेकिन गजट नोटिफिकेशन नहीं हो पाया। जिससे यह जिला बनने से रह गया। तब से लगातार यह राजनीति का हिस्सा भी बनकर रह गया।

भौगोलिक दृष्टि से देखें तो डांडी यानी छोटी पहाड़ी एवं हाट यानी बाजार के नाम से प्रसिद्ध डीडीहाट प्रदेश की राजधानी से 520 किमी की दूरी पर स्थित है। फिर यहां से मीलों दूर स्थित हैं सैकड़ों गांव। सभी गांव बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर समय-समय पर संघर्षरत रहे हैं। अब चंूकि चुनावी वर्ष है तो इन सभी समस्याओं एवं मांगों को मुद्दा बनाकर विपक्ष परिवर्तन और विकास के नारे को आगे कर जनता के बीच जा रहा है। कुल मिलाकर इस विधानसभा सीट पर पिछले चुनावों की भांति इस बार भी चुनावी संग्राम रोचक होने जा रहा है। बड़ी बात यह है कि प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का पैतृक गांव भी इसी विधानसभा में पड़ता है। लोगों को उनसे काफी उम्मीदें हैं। अगर वह इस क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार में उतर गए तो भाजपा को कुछ बढ़त मिल सकती है। क्षेत्र के तल्लाबगड़ क्षेत्र एवं गर्खा, डीडीहाट, कनालीछीना, अस्कोट, जौरासी, सिंगाली, नारायणनगर, बंदरलीमा, हचीला, चरमा में युवा मुख्यमंत्री की उपस्थिति खासा प्रभाव डाल सकती है।

डीडीहाट का राजनीतिक परिदृश्य देखें तो यह पिछले दो दशक से अधिक समय से भाजपा व विशन सिंह चुफाल का गढ़ रहा है। 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा के ही किशन सिंह भंडारी ने पार्टी से बगावत कर
निर्दलीय चुनाव लड़ इसे तोड़ने की कोशिश की थी लेकिन सफल नहीं हो पाए। दूसरे स्थान पर आकर अपनी ताकत का एहसास वह जरूर करा गये। लेकिन बाद में पार्टी अनुशासनहीनता की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी एवं पार्टी से उन्हें निष्काषित होना पड़ा। किशन भंडारी की नाराजगी की वजह वर्ष 2014 में अंतिम समय में जिला पंचायत अध्यक्ष का टिकट न मिलने को लेकर थी। इसीलिए वह 2017 में चुफाल के खिलाफ विधानसभा चुनाव लड़े। फिलहाल वह निष्कासन काल में हैं। किशन भंडारी की मानें तो भाजपा उनका निष्कासन खत्म कर उन्हें टिकट देती है तो ठीक, अगर नहीं देती उनका निर्दलीय लड़ना तय है। निर्दलीय लड़ने की स्थिति में वह भाजपा का गणित अवश्य बिगाड़ सकते हैं। वह मानते हैं कि पिछला चुनाव वह आसानी से जीत जाते अगर आखिरी क्षण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिथौरागढ़ में जनसभा न की होती तो। कारण जो भी रहे हों लेकिन अंतिम परिणाम हमेशा बिशन सिंह चुफाल के पक्ष में ही गया है। एक बार नहीं, बार-बार बाजी मारने में वह सफल रहे हैं। हर बार उन्हें मजबूत टक्कर मिली है। कांग्रेस से टिकट के दावेदार प्रदीप पाल एवं एडवोकेट रमेश कापड़ी भी काफी दमदार नेता रहे हैं। रमेश कापड़ी 2002 में इस सीट से चुनाव लड़ चुके हैं। वह हरीश रावत सरकार में दर्जा राज्य मंत्री भी रहे हैं। इसके अलावा कांग्रेस के प्रदीप पाल भी काफी दमदार नेता हैं। युवाओं के बीच उनकी अच्छी पकड़ है। वह पिछले पांच सालों से जनता के बीच में हैं। लेकिन वर्तमान विधायक बिशन सिंह चुफाल की राजनीतिक हैसियत भी कम नहीं है। जनता एवं संगठन में उनकी अच्छी पकड़ है। वह पांच बार इस सीट से लगातार विधायक रहे हैं। एक बार भी चुनाव नहीं हारे हैं। पहली बार वर्ष 1996 में वह उत्तर-प्रदेश सरकार में यहां से विधायक चुने गए, तब से लगातार अजेय बने हुए हैं।

ऐसे में कहा जा सकता है कि इस बार का चुनाव भी कांटे का होगा। इसके अलावा भाजपा -कांग्रेस के असंतुष्टों और बागियों पर भी निगाह है। अंदरखाने काम शुरू हो गया है। असंतुष्टों और निष्कासितों को पार्टी में लाने की रणनीति भी बनने लगी है। ऐसे में आने वाले समय में यहां का राजनीतिक परिदृश्य काफी रोचक होने वाला है। पूरे विधानसभा में डीडीहाट विधानसभा परिवर्तन की ओर, डीडीहाट विधानसभा कांग्रेस की ओर, चलो परिवर्तन का इतिहास बनाते हैं। इन नारों के जरिए कांग्रेस बिशन के गढ़ में माहौल बनाने में लगी हुई है। कांग्रेस लगातार डीडीहाट विधानसभा क्षेत्र की समस्याओं को लेकर मुखर है।

बाराबीसी क्षेत्र, मुवानी, डीडीहाट, देवलथल, मूनाकोट, कनालीछीना जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में फैली इस विधानसभा को साध पाना कोई सरल काम नहीं है। समस्याओं का मकड़जाल है तो लोगों की अपेक्षाएं भी। 2022 को फतह करने के लिए कांग्रेस ने अगस्त क्रांति के अवसर पर पार्टी कार्यालय का शुभारंभ भी कर दिया है। चुनाव जीतने के लिए हर एक बूथ काफी महत्वपूर्ण है। डीडीहाट विधानसभा में 132 बूथ हैं जिसमें सर्वाधिक 87 बूथ कनालीछीना क्षेत्र में हैं। मूनाकोट में 30 बूथ हैं। इस तरह कनालीछीना एवं मूनाकोट मिलाकर 117 बूथ बनते हैं। ऐसे में हर दावेदार और पार्टी को इन बूथों को मजबूत करने के लिए अच्छी खासी मेहनत करनी पड़ रही है। डीडीहाट विधानसभा सीट काफी पुरानी है। यह उत्तर प्रदेश के समय से चली आई है। वर्ष 1985, 1989, 1993 में यहां से उत्तर प्रदेश विधानसभा में पहुंचे। इस सीट से वह हैट्रिक मारने में सफल रहे। राज्य गठन के बाद वह यहां से पलायन कर कनालीछीना सीट से 2002 में चुनाव लड़े व जीते। आने वाले चुनावों में वह कनालीछीना, डीडीहाट, धारचूला से चुनाव लड़े लेकिन जनता ने उनको लगातार नकार दिया।

डीडीहाट के आम लोगों एवं विपक्षी दलों का कहना है कि राज्य बनने के बाद उनके हिस्से का विकास भी उनसे दूर हो गया। मेडिकल कालेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, बेस अस्पताल सहित विकास के बड़े ढ़ांचे जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ चले गए। एक आशा थी कि जिला बनेगा तो विकास होगा लेकिन वह भी नहीं बन पाया है। पेयजल मंत्री होने के बाद भी कई इलाके पेयजल से वंचित हैं। वर्ष 2011 में पंपिंग योजना स्वीकृत हुई। 24 किमी. लंबी यह योजना एक दशक बाद भी नहीं बन पायी है। जबकि इसमें अभी तक 23 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। भाजपाई जिन सड़कों को अपनी उपलब्धि बताते हैं उसे विपक्षी कहते हैं कि एक भी सड़क चलने लायक नहीं है। इसके अलावा मोबाइल नेटवर्क, विभागीय कार्यों में अनियमितताओं को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। डीडीहाट सीएचसी में रेडियोलॉजिस्ट का पद लंबे समय से रिक्त चल रहा है। अल्ट्रासाउंड मशीन का उपयोग वर्षों से नहीं हो पाया है। स्कूलों में शिक्षकों एवं अस्पतालों में डाक्टरों की कमी बनी हुई है। वहीं दूसरी तरफ बीडीसी बैठक में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य पानी जैसे मुद्दों पर हंगामा दिखाता है कि अभी क्षेत्र में विकास पहुंचा नहीं है। डीडीहाट-दूनाकोट, डीडीहाट- भनड़ा, दूनाकोट-गराली जैसी अहम सड़कों की स्थिति पर हंगामा होता रहा हैं लेपार्थी एवं अटल गांव वाले पानी की समस्या से परेशान हैं। प्राथमिक विद्यालय कौली को सुधारीकरण चाहिए तो लीमाभाट वालों को स्कूल। यानी चहुंऔर समस्याओं व मांगों का अंबार है।

अभी निर्दलीय प्रत्याशी हूं। दावेदारी रहेगी। भाजपा टिकट देगी तो ठीक नहीं तो निर्दलीय लडूंगा। मेरा लड़ना तय है। भाजपा में नीचे से ऊपर तक काम कर चुका हूं। अब विधायक के तौर पर जनता की सेवा करना चाहता हूं। पिछले चुनाव में भी मैं जीत जाता अगर आखिरी क्षणों में पिथौरागढ़ में नरेंद्र मोदी की जनसभा न होती तो। बिशन सिंह चुफाल ने 2014 में अंतिम समय में जिला पंचायत अध्यक्ष का मेरा टिकट काट दिया। इसीलिए 2017 में मुझे पार्टी से बगावत कर चुनाव लड़ना पड़ा। मैं अभी भाजपा से तो निष्कासित चल रहा हूं लेकिन पार्टी का अभी भी प्राथमिक सदस्य हूं। मेरा बैर बिशन सिंह के साथ है न कि भाजपा के साथ। जहां तक वर्तमान विधायक के कामकाज का सवाल है तो उनके पास बताने के लिए एक भी उपलब्धि नहीं है। 25 साल में 350 सड़कें काटने का दावा करते हैं। लेकिन एक भी सड़क चलने लायक नहीं है। अस्पताल रेफरल सेंटर बन गए हैं। बिशन सिंह ने सिर्फ ठेकेदारों को पनपाया। कई ठेकों में तो उनकी पार्टनरशिप भी है। विकास के नाम पर क्षेत्र में न तो इंजीनियिरिंग कॉलेज, मेडिकल कॉलेज, एनएनएम, जीएनएम कुछ भी नहीं है। बिशन सिंह पूरी तरह से फेल रहा है। उनका नेतृत्व बेहद कमजोर रहा है।
किशन भंडारी, निर्दलीय भाजपा से निष्कासित नेता

 

मैं 2002 में डीडीहाट से कांग्रेस का प्रत्याशी था। मैं भूतपूर्व सैनिक भी हूं। यह पूरा क्षेत्र सैनिक बाहुल्य क्षेत्र है। मैं कांग्रेस का वफादार सिपाही रहा हूं। अगर पार्टी अवसर देगी तो मैं अवश्य चुनाव लडूंगा। क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य का मुद्दा तो है ही वहीं सबसे बड़ा मुद्दा खेती है। पहाड़ में खेती उजड़ गई है। इससे पलायन बढ़ा है। भाजपा सरकार द्वारा गठित पलायन आयोग खुद ही पलायन कर गया है। पलायन कैसे रुकेगा, इसका जबाव आज तक इस आयोग ने नहीं दिया। कांग्रेस ने 2016 में पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम लाई थी लेकिन वर्तमान सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। जब तक पहाड़ों में चकबंदी लागू नहीं होती तब तक पलायन नहीं रुक सकता। हिमाचल भी हमारे जैसा है लेकिन आज चकबंदी के जरिए उसने विकास की गाथा लिखी है। स्थानीय स्तर पर खेती से जुड़े हार्टिकल्चर, फ्लोरीकल्चर जैसे तमाम क्षेत्रों के विकास के लिए कोई काम नहीं हुआ। स्थानीय नौजवान अपने को ठगा महसूस कर रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों की जमीन लगातार घट रही है। कई लोगों के पास तो जमीन ही नहीं बची है। खेती की जोत घट रही है। जब जोत बढ़ेगी तो मालिकाना हैसियत भी बढ़ेगी। लेकिन वर्तमान सरकार ने इस तरफ काम नहीं किया। जहां तक स्थानीय विधायक के कामों की बात है तो पिछले 25 सालों में पांच काम भी बताने को उनके पास नहीं हैं। स्वास्थ्य केंद्र रेफरल सेंटर बने हुए हैं। दो बार सरकार में मंत्री, इतने लंबे समय से विधायक हैं। एक मात्र पॉलीटेक्निक जो उनकी उपलब्धि रही अब वह भी बंदी के कगार पर खड़ा है। डीडीहाट, कनालीछीना व मूनाकोट में विकास के जो ढांचे खड़े हैं वह सब कांग्रेस की देन हैं। डीडीहाट में साहसिक पर्यटन केंद्र एवं भगवान मलयनाथ मंदिर तक स्थानीय विधायक सालों बाद रोपवे नहीं बना पाए। अन्य मांगों को तो छोड़ दीजिए।
रमेश कापड़ी, कांग्रेस, दावेदार

 

पक्का दावेदारी रहेगी। मैं पिछली बार भी चुनाव लड़ा था। मुझे अच्छे मत मिले थे। मैं विधानसभा क्षेत्र में पिछले पांच साल से जनता के मुद्दों पर संघर्ष कर रहा हूं। मैंने कांग्रेस संगठन में युवाओं को जोड़ा है। परिवर्तन के नारे के साथ हम जनता के बीच में हैं। जहां तक विकास की बात है तो बिशन सिंह चुफाल 25 साल से यहां से विधायक हैं। दो बार प्रदेश में मंत्री रह चुके हैं लेकिन उनके पास बताने को लेकर एक भी उपलब्धि नहीं है। क्षेत्र की जनता, जानवर सब पीने के पानी को तरस रहे हैं। यह हाल है पेयजल मंत्री के क्षेत्र का। पहले यहां स्कूलों में विज्ञान के विषय थे लेकिन अब न विषय बचे, न ही विषयों के अध्यापक ही हैं। विद्यालयों में विज्ञान लैब नहीं है। स्वास्थ्य केंद्रों में फिजीशियन नहीं है। ऐसे में लोग जाएं तो जाएं कहां। सड़कें आधी-अधूरी कटी हैं। स्कूल एक-एक कर बंद हो रहे हैं। पंचायतों में युवाओं के पास खेलने के लिए मैदान नहीं हैं विधायक जी सिर्फ
लच्छेदार बातें करते हैं। धरातल पर उनके पास बताने को कुछ भी नहीं है। ऐसे में अगर इस क्षेत्र का विकास चाहिए तो जनता को इस बार परिवर्तन करना पड़ेगा। हम परिवर्तन के नारे के साथ जनता के बीच हैं। हमारी प्राथमिकता में स्वास्थ्य, शिक्षा के साथ पर्यटन भी होगा। हम कोशिश करेंगे कि युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार मिल सके ताकि उनको इधर-उधर न भटकना पड़े।
प्रदीप पाल, कांग्रेस दावेदार

विधायक जी ने 80 प्रतिशत गांवों में सड़कें पहुंचा दी हैं। जहां पर सड़कें स्वीकृत नहीं हो पा रही थी वहां पर विधायक निधि से सड़कें काटी हैं। पहले लोग धारे-नौलों से पानी लाने को मजबूर थे, आज शत-प्रतिशत गांवों में पानी पहुंच चुका हैं। विधायक ने क्षेत्र के कई विद्यालयों काउच्चीकरण कराया। क्षेत्र में महिला इंटर कॉलेज, जोरासी एवं सिंगाली में को-ऑपरेटिव बैंक खुले। अब चौबाटी एवं दूनाकोट में शीघ्र खुलने जा रहे हैं। जिससे क्षेत्रीय लोगों को घर पर ही बैंकिग सुविधा मिली है। कनालीछीना में पालीटेक्निक खोला। नारायण नगर डिग्री कालेज, इंटर कॉलेज के साथ ही कई स्टेडियमों का निर्माण विधायक जी ने किया है। जो लोग दुष्प्रचार कर रहे हैं उन्हें विधायक द्वारा किए कामों को स्वीकार भी करना चाहिए। आज चुनावी दौरों में वह उन्हीं सड़कों से जा रहे हैं जो विधायक जी ने काटी थी। विपक्षी विधायक जी के खिलाफ दुष्प्रचार कर माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हम आने वाले समय में क्षेत्र में स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराएंगे। रोजगार हमारी प्राथमिकता में होगा। हमें उम्मीद है कि वर्ष 2022 से एक बार फिर बिशन सिंह चुफाल इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करेंगे।
हरेन्द्र चुफाल, भाजपा नेता पूर्व ब्लॉक प्रमुख

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