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सीमांत पिथौरागढ़ के दूरस्थ गांव निवासी हिमांशु जोशी ने मेहनत और लगन से रंगमंच की दुनिया में अपना नाम बनाया

पिथौरागढ़। जनपद के मसमोली जैसे दूरस्थ और छोटे से गांव से निकल हिमांशु बी ़ जोशी रंगमंच की दुनिया में अपना नाम स्थापित करने में सफल रहे हैं। पिछले दिनों जिला मुख्यालय में थिएटर फांर एजुकेशन इन मास सोसाइटी ने हिमांशु द्वारा निर्देशित ‘जगत मल्ल का जागर’ वीडियोज फिल्म दिखाई। इस वीडियो फिल्म को काफी सराहा गया। पहाड़ों में लगने वाले ‘जागरों’ पर आधरित यह फिल्म एक दस्तावेजीकरण के रूप में है। इस विद्या को झोड़े शैली में संपूर्ण गाथा एवं अवतरण को संकलित किया गया है। लिटिल गु्रप एवं रेसिंग टांरटाइज दिल्ली ने संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से इस वीडियो (दस्तावेजीकरण) फिल्म को निर्मित किया है। हिमांशु पिछले २५ वर्षों से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय तथा कई अन्य महत्वपूर्ण रंगमंच संस्थाओं से जुड़े रहे हैं। सलमान रश्दी के ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ का राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिए नाट्य रूपांतरण हो या फिर शमा फुतेहाली के अंगे्रजी नाटक ‘ताजमहल’ का अनुवाद इन्होंने किया। असम की राजनीतिक परिस्थितियों पर ‘मेमसाब पृथ्वी’ के लिए लेखन किया तो वहीं भारत में पहली बार प्रस्तुत हुई रंगमंच-सर्कस ‘क्लाउन्स एंड क्वाउड्स के लिए सहलेखन भी इन्होंने किया। कई नाटकों की मंच, प्रकाश और ब्रोशर-पोस्टर परिकल्पना भी यह सफल रूप से कर चुके हैं। हिमांशु भारत रंग महोत्सव के कार्यक्रम में समन्वयन और तकनीकी समन्वयक के रूप में बेहतर काम कर चुके हैं। इन्होंने हिंदी के जाने माने कवि स्व. भवानी प्रसाद मिश्र के जीवन और कूतित्व पर ‘हां, मैं गीत बेचता हूं’ नाटक लिखा, जिसे हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा प्रस्तुत किया। हिमांशु ने बच्चों के लिए भी बेहतर काम किया है। बच्चों को केंद्र में रखकर ‘इक्कीसवीं सदी की दादी, मंगल ग्रह का रहस्य और चरखा जैसे विषयों पर नाटक लिखे एवं निर्देशित किए हैं। जी शंकर पिल्लई के ‘खोज’, ख्वाजा अहमद अब्बास के ‘बंबई के फुटपाथ पर एक हजार रातें’ और शेक्सपियर के ‘रोमियो और ‘जूलियट’, सिखों के छठे गुरू हरकिशन साहिब के वचनों पर आधारित ‘ऐसा गुर बढ़ भागी पाया’ का सफल निर्देशन किया है। साहित्य कला परिषद के युवा महोत्सव १९९८ में ‘चने’ तथा युवा नाट्य समारोह २०१४ में ‘हानूश’ नाटक का सफल निर्देशन किया। अभी हाल में निराला की कविता ‘राम की शक्ति पूजा’ जिस पर ‘अ-राम की शक्ति पूजा’ नाटक जो दलित विमर्श को केंद्र में रखकर बनाया गया था, इसमें इनके द्वारा किए गए निर्देशन को काफी सराहना मिली। हिमांशु बी जोशी एक लेखक, निर्देशक और प्रकाश परिकल्पक के रूप में अपना नाम बनाने में सफल रहे हैं। बीते बर्षों में यह मोहन उप्रेती, एमके रैना, कीर्ति जैन, त्रिपुरारी शर्मा, हेमा सिंह, अभिलाष पिल्लई, बिपिन कुमार, भारती शर्मा, दीपक शिवराम, लोकेंद्र त्रिवेदी, जेपी सिंह, प्रकाश भाटिया जैसे महत्वपूर्ण निर्देशकों के नाटकों में सफल प्रकाश परिकल्पना कर चुके हैं। विद्यालयों, कांलेजों में भी यह कई नाटक निर्देशित एवं डिजाइन कर चुके हैं। इसके अलावा रंगमंच की पत्रिका ‘नटरंग’ के संपादकीय सहायक भी यह रह चुके हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका ‘रंग प्रसंग’ में इनका दारियो फो के नाटक ‘अ वुमन अलोन’ का अनुवाद प्रकाशित होने के साथ ही कई महत्वपूर्ण लेख एवं अनुवाद प्रकाशित हुए हैं। पिथौरागढ़ में होने वाली ‘हिलजात्रा’ पर आधारित एक महत्वपूर्ण आलेख भी इस पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। कई कविताएं, आलोचना, कथन, साक्षात्कार ‘जनसत्ता’ जैसे प्रतिष्ठित पत्र में प्रकाशित हुए हैं। भारत के अलावा जापान, इंग्लैंड एवं मांरीशस में हिमांशु अब तक कई नाटकों का सफल प्रस्तुतीकरण कर चुके हैं। हिमांशु रंगमंचों पर अपनी सफल छाप छोड़ने के साथ ही अकादमिक रूप से भी अपने कैरियर को नई ऊंचाई प्रदान करने में सफल रहे हैं। ‘भारतीय रंगमंच में रंगों का मनोविज्ञान’ विषय पर भारत सरकार के संस्कूति मंत्रालय के अधीन १९९८-९९ में कनिष्ठ शोधवृत्ति के साथ ही वर्ष २०११-१२ में ‘चेंजिंग ऑप्टिक्स इन मल्टीकल्चरल थिएटर’ विषय पर वरिष्ठ शोधवृद्धि प्राप्त की। ‘आज तक’ चैनल में विज्ञापन फिल्मों में अभिनय भी किया तो कई डांक्युमेंटरीज भी लिखी। २००८ से लेकर २०१३ तक हिमांशु राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अकादमिक कार्यक्रम समन्वयक भी रहे। आज बतौर स्वतंत्र रंगकर्मी वह देशभर में सफल रंग कार्य कर अपने प्रतिभा के रंगों को उकेर रहे हैं।

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