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इस बार चुनाव में पहले जैसी रौनक नहीं दिखाई दी। कार्यकर्ता मजबूरी में अपने प्रत्याशियों के पीछे रहे। स्टार प्रचारकों की सभाओं में भी भीड़ नहीं जुटी। ऐसे में मतदाताओं की खामोशी बोलने से भी ज्यादा बोल दे रही है

राज्य में मतदान के बाद अब हार-जीत की अटकलों का दौर शुरू हो गया है। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता, उम्मीदवारों के साथ ही राजनीति में रुचि रखने वाले फीडबैक के आधार पर परिणामों के अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। इसके इतर अल्मोड़ा संसदीय सीट के मतदाताओं का अपना अलग मिजाज रहा है। उच्च राजनीतिक चेतना वाले इस संसदीय क्षेत्र के मतदाता कभी राष्ट्रीय मुद्दों पर तो कभी क्षेत्रीय मुद्दों को अहमियत देते रहे हैं। कभी लगातार एक ही उम्मीदवार पर इसने भरोसा जताया तो कभी चुनाव दर चुनाव नए उम्मीदवारों के सिर जीत का सेहरा बांधता रहा। कभी यह लहर में बहता है, तो कभी लोकलुभावन वादों व नारों में फंस जाता है। मतदाता का यही उलझा हुआ मतदान व्यवहार हमेशा से चौंकाता रहा है। हां, एक बात जो समान रही वह यह कि इसने हमेशा रार्ष्ट्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों पर ही बदल-बदल कर भरोसा जताया है। इस बार के संसदीय चुनाव में यहां का मतदाता किसी लहर में तो नहीं दिखता, लेकिन उसकी खामोशी पूर्वानुमानों के आधार पर उम्मीदवार का भविष्य तय करने वालों को भी असमंजस में डाले हुई है।

 

इस संसदीय सीट के तमाम चुनावी अभियानों पर नजर डालें तो इस बार चुनाव प्रचार में वह रंगत नहीं दिखाई दी जो पिछले चुनावों में दिखाई पड़ती थी। पार्टी कार्यकर्ता मजबूरी में भले ही उम्मीदवारों के पीछे दिखाई दिए हों, लेकिन आम जनता ने इससे दूरी बनाए रखी। स्टार प्रचारकों की सभा से लेकर गली- नुक्कड़ में आयोजित होने वाली सभाओं से भी भीड़ नदारद दिखी जो आम मतदाता की नाराजगी को प्रदर्शित करती रही। यह एक इशारा भी था कि राजनीतिक दलों व उम्मीदवारों से आम आदमी का किस तरह मोह भंग हो रहा है। भाजपा की तरफ से पिथौरागढ़ में राजनाथ सिंह व अल्मोड़ा में अमित शाह स्टार प्रचारक थे। पिथौरागढ़ में भाजपा के पूर्व अध्यक्ष एवं निवर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की सभा में भीड़ का नदारद रहना भी काफी चर्चा में रहा था। कांग्रेस प्रत्याशी प्रदीप टम्टा के पक्ष में अल्मोड़ा में राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने सभा की थी। इसके अलावा अन्य कोई ऐसा स्टार प्रचारक उनके पास नहीं था जो मतदाताओं को लुभा सकता था। कांग्रेस हालिया तैयार किए गए अपने ‘न्याय’ के सहारे है। लेकिन इसके इतर पार्टी ने जिस तरह से अपने घोषणा पत्र में सशस्त्र बलों संबधी अधिनियम (आफ्स्पा) व अनुच्छेद 370 के साथ ही एयर स्ट्राइक को लेकर सवाल उठाए उससे इस सैन्य बाहुल्य संसदीय सीट के सैन्य मतदाताओं में नाराजगी भी दिखाई दी तो वहीं भाजपा ने एयर व सर्जिकल स्ट्राइक जैसे राष्ट्रवादी मुद्दों को भुनाने का भरपूर प्रयास किया। हालांकि कांग्रेस ने राफेल पर भाजपा को घेरने का प्रयास अवश्य किया, लेकिन भाजपा ने मोदी सरकार के भ्रष्टाचारमुक्त कार्यकाल एवं पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में हुए घोटालों पर कांग्रेस को घेरने की भरसक कोशिश की। इसके अलावा दोनों दलों ने किसानों, जवानों एवंयुवाओं को लुभाने में कसर नहीं छोड़ी।


कांग्रेसी उम्मीदवार प्रदीप टम्टा प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा, कुमाऊं में एम्स, पैरा मिलिट्री फोर्स के बलिदान सपूतों को शहीद का दर्जा देने के साथ ही जल, जंगल व जमीन जैसे मुद्दों पर जनता को रिझाने की कोशिश करते रहे। पूरे चुनावी अभियान में जनसंवाद कांग्रेसी उम्मीदवार की ताकत रहा तो पार्टी का कमजोर संगठन, आंतरिक गुटबाजी व असंतोष उनकी कमजोरी रही। उनका पूरा समय मोदी मैजिक के तिलिस्म को तोड़ने में लग गया। वहीं भाजपा उम्मीदवार अजय टम्टा अपने पांच साल के कार्यकाल में किए गए कार्यों की अपेक्षा मोदी नाम पर अधिक आश्रित रहे। भाजपा एवं आनुसांगिक संगठनों की मजबूती और सक्रियता उनका मजबूत आधार बना रहा तो ग्रामीण क्षेत्रों में विकासहीनता की स्थिति, क्षेत्र में कम सक्रियता, आम आदमी तक बेहतर संवाद अदायगी न हो पाने के साथ ही एंटी इनकंबेसी से उन्हें जूझना पड़ा। अजय टम्टा के पक्ष में आए तमाम स्टार प्रचारकों के साथ ही खुद अजय टम्टा भी चुनाव अभियानों के दौरान मोदीनाम ही अधिक जपते रहे। कांग्रेस के स्टार प्रचारकों ने मोदी को निशाना बनाया, लेकिन स्थानीय स्तर के मुद्दों को छूने से दोनों पार्टियां परहेज करती रही। हालांकि महिला, युवा व पूर्व सैनिक मतदाताओं को साधने का काम दोनों पार्टियों ने किया।

स्थानीय मुद्दों से भले ही इन दोनों दलों ने परहेज किया हो, लेकिन यहां हार-जीत की भूमिका ग्रामीण क्षेत्रों से ही तय होनी है। 88 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्र वाले इस संसदीय सीट में दोनों उम्मीदवार चुनाव प्रचार के दौरान सैकड़ों गांवों तक अपनी पहुंच बना ही नहीं पाए। चुनाव बहिष्कार करने वाले गांवों की जनता तक भी यह उम्मीदवार नहीं पहुंच पाए। देखने की बात यह है कि कम सक्रियता का यह नुकसान किसे होता है। यह चुनाव सिर्फ उम्मीदवारों का भाग्य ही तय नहीं करने वाला है, बल्कि राज्य सरकार व विधायकों के कामकाज के साथ ही विपक्षी दलों की भी कड़ी परीक्षा लेने वाला है। जनता के पास हर किसी का हिसाब है। इस संसदीय सीट में विधायकों द्वारा किए गए कार्यों के साथ ही इनकी छवि भी हार-जीत का खाका खींचेगी। चुनाव सभाओं के दौरान भले ही राष्ट्रीय मुद्दे हावी रहे हों, लेकिन चुनाव परिणामों को तय करने में स्थानीय मुद्दों की भी अहम भूमिका होगी। यही वजह है कि पूरे चुनाव अभियानों के दौरान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत लगातार इस संसदीय सीट में डटे रहे।

गिरता मतदान प्रतिशत

अल्मोड़ा संसदीय सीट पर इस बार भी मतदान प्रतिशत 53. 30 प्रतिशत पर सिमट कर रह गया जो वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनावों के मुकाबले 64 प्रतिशत कम था। मतदान प्रतिशत बढ़ाने के तमाम प्रयासों के बाद भी मतदाता कम ही प्रेरित हो पाए। चुनाव बहिष्कार भी इसका एक कारण रहा। मतदान प्रतिशत का न बढ़ना तरह के सवाल खड़े करता है। वर्ष 1952 से लेकर वर्ष 2019 तक अब तक हुए 17 चुनावों पर नजर डालें तो वर्ष 1952 से लेकर 1971 तक के बीच इस सीट पर 30 प्रतिशत से कम मतदान हुआ। वर्ष 1952 के पहले चुनाव में 27 प्रतिशत, वर्ष 1957 में 24 प्रतिशत, इसी वर्ष हुए उपचुनाव में 19 प्रतिशत, वर्ष 1962 में 27.30 प्रतिशत, वर्ष 1967 में 28 प्रतिशत तो वर्ष 1971 में 29 प्रतिशत मतदान हुआ। पहली बार वर्ष 1977 में इस संसदीय सीट के मतदान प्रतिशत में उछाल आया और यह 44 प्रतिशत पर पहुंचा। लेकिन 1980 के चुनाव में यह घटकर 38 प्रतिशत पर आ गया। वर्ष 1984 में यह बढ़कर 45 प्रतिशत हुआ तो वर्ष 1989 के चुनावों में 44 प्रतिशत पर पहुंचा। इन वर्षों में 30 प्रतिशत आंकड़ा आवश्य बढ़ा, लेकिन 50 प्रतिशत तक नहीं पहुंचा। वर्ष 1991 में फिर घटकर 40.12 प्रतिशत, वर्ष 1996 में 43.38 प्रतिशत, वर्ष 1998 में 46.45 प्रतिशत, वर्ष 1999 में 41.82 प्रतिशत, वर्ष 2009 में 46.75 प्रतिशत रहा। पहली बार वर्ष 2014 के संसदीय चुनावों में 50 प्रतिशत का आंकड़ा पार हुआ। इस बार 53.94 प्रतिशत मतदान हुआ। इस सीट पर अभी तक सबसे कम 19 प्रतिश्ता मतदान हुआ है।

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